HI/580804 - जवाहरलाल नेहरू को लिखित पत्र, बॉम्बे

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जवाहरलाल नेहरू को पत्र (पृष्ठ १ से ५)
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जवाहरलाल नेहरू को पत्र (पृष्ठ २ से ५)
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जवाहरलाल नेहरू को पत्र (पृष्ठ ३ से ५)
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जवाहरलाल नेहरू को पत्र (पृष्ठ ४ से ५)
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जवाहरलाल नेहरू को पत्र (पृष्ठ ५ से ५)


०४ अगस्त, १९५८


पंडित श्री जवाहरलाल नेहरू,

भारत के प्रधान मंत्री,
नई दिल्ली-२

मेरे प्रिय पंडित जी,

कृपया मेरा सम्मानजनक नमस्कार स्वीकार करें। मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि गुरुकुल विश्वविद्यालय हरिद्वार में २/८/५८ को दिए गए आपके भाषण ने मुझे भारतीय संस्कृति के बारे में कुछ बताने के लिए प्रेरणा दी है। भारतीय संस्कृति का मूल सिद्धांत अध्यात्मवाद है जो अभूतपूर्व भौतिकवाद के बाहरी आकर्षण की सख्त उपेक्षा करता है।

आप पश्चिमी तरीकों के भौतिक समायोजन को भारतीय संस्कृति की आध्यात्मिकता के साथ समायोजित करने के बारे में सोच रहे हैं और मैं आपको यह संकेत देने की विनती करता हूं कि भौतिकता को आध्यात्मिक पूर्णता तक पहुंचाने के उद्देश्य से करना मानव गतिविधि का सही समायोजन है।

यदि आध्यात्मिक प्राप्ति का उद्देश्य भुलाया जाए, तो भौतिकवाद की पूरी योजना से हताशा प्राप्त होना निश्चित है और यह ही प्रकृति का नियम है। प्रकृति का नियम एक श्रेष्ठ अधिकारी द्वारा बनाया गया है और कोई भी व्यक्ति भौतिक विज्ञान के आंशिक समायोजन द्वारा इस भौतिक प्रकृति की जटिलताओं को पार नहीं कर सकता है। पश्चिम का इतिहास, यूनानियों और रोमनों के समय से लेकर परमाणु युद्ध के आधुनिक युग तक – सिर्फ यह इंद्रिय संतुष्टि भौतिकवाद की एक सतत श्रृंखला है और नतीजा यह है कि ३००० साल के उपलब्ध ऐतिहासिक अभिलेख में पश्चिमी लोग कभी शांति से नहीं रहे हैं। न ही भविष्य में किसी भी समय उनके लिए शांति से रहना संभव होगा, जब तक कि वर्तमान युग के लिए उपयुक्त आध्यात्मिकता का संदेश उनके दिल तक नहीं पहुंच जाता।

इसलिए भारत को पश्चिमी जीवन की नकल करने में अपना समय व्यर्थ नही करना चाहिए। आपने यह स्वीकार किया है कि भारत की संस्कृति की स्थिति बहुत उच्च क्रम की है। लेकिन साथ ही आप भौतिक विज्ञान के उन्नति द्वारा भारत की भौतिक समृद्धि को प्राप्त करना चाहते हैं। और यह वैज्ञानिक ज्ञान क्या है? अध्यात्मवाद भी उन्नत वैज्ञानिक ज्ञान है। भौतिक विज्ञान की उन्नति आध्यात्मिक सहायता के बिना सामान्य लोगों को वांछित भौतिक समृद्धि भी नहीं दे सकती है। महात्मा गांधी के स्वराज आंदोलन को भौतिकवाद से अधिक आध्यात्मिकता में समायोजित किया गया था। क्या आपको लगता है कि नए प्रकार के वाहन या टेलिफोनिक या रेडियो संचार या फिर जीवन की ऐसी कोई अन्य सुविधा, भौतिक समृद्धि ला सकती है? ये नहीं हो सकता। भौतिक समृद्धि का अर्थ है कि लोगों को पर्याप्त भोजन प्राप्त होना चाहिए या सही स्वास्थ्य द्वारा आत्मा और शरीर को एक साथ रखने के लिए प्रबन्ध होना चाहिए ताकि उनकी आध्यात्मिक चेतना का विकास हो जिसकी अनुपस्थिति पशुओं के इन्द्रिय-संतुष्टि जीवन में विशिष्ट है। क्या आपको लगता है कि आपकी विभिन्न योजनाएँ भौतिक समृद्धि के उस मानक को लेकर आई हैं या आधुनिक पश्चिमी सभ्यता उस आदर्श समृद्धि को ला सकती है? अगर उनके भौतिक आवश्यकताओं की पूर्ति के लिए सभी सुविधाएं दी जाएं तब भी उनके जीवन की आध्यात्मिक संतुष्टि होने तक अशांति बनी रहेगी। यही शांति का रहस्य है।

अमेरिकी और रूसी दोनों भौतिक रूप से उन्नत हैं और हालांकि उनके पास जीवन के अलग-अलग राजनीतिक दर्शन हैं, वे भौतिक रूप से खुश और शांतिपूर्ण नहीं हैं, क्योंकि दोनों आध्यात्मिक बोध की उपेक्षा कर रहें हैं, वैसे ही जैसे एक बच्चा टूटी हुई भाषा मे मां के लिए रोता है। आप दुनिया के लोगों के शांति हेतु, एक सच्चे भारतीय दूत के रूप में उनकी आध्यात्मिक उत्कंठा को संतुष्ट करने में मदद कर सकते हैं। दुनिया में शांति बनाने के आपके ईमानदार प्रयास को विश्व प्रसिद्धि प्राप्त है और यह समय आपके दोस्तों की मदद करने के लिए उपयुक्त है, और साथ ही विश्व शांति के लिए भारतीय आध्यात्मिक उन्नति के मानक को गौरवान्वित किया जा सकता है। कृपया ठंडे मस्तिष्क से इस मामले पर विमर्श करें।

गरीबी का मतलब है ज्ञान की गरीबी। प्रधान मंत्री चाणक्य पंडित एक फूस के घर या झोपड़ी में रहते थे, लेकिन सम्राट चंद्र गुप्त के दिनों में वे भारत के अधिनायक थे। महात्मा गांधी, आपके राजनीतिक गुरु, ने स्वेच्छा से तथाकथित गरीब भारतीयों के तौर-तरीकों को स्वीकार किया था और तब भी वे भारत के भाग्य के अधिनायक थे। लेकिन क्या वे सादगी और एक सरल चरखे को अपनाने के कारण वास्तविकता में गरीबी के शिकार थे? उन्हें हमेशा अपने आध्यात्मिक ज्ञान पर गर्व था। इसलिए यह आध्यात्मिक ज्ञान ही है जो एक आदमी को वास्तव में समृद्ध बनाता है न कि कोई रेडियो सेट या फिर मोटर कार। इसलिए कृपया कर के भारतीय संस्कृति के इस स्थिति को समझने की कोशिश करें और इस उन्नत ज्ञान को - अपने पश्चिमी बंधुओ को, एक उत्कृष्ट व मुक्त व्यक्तियों के अनुगत प्रदान करने की कोशिश करें और यह पश्चिमी भौतिक उन्नति के बदले मे भारतीय संस्कृति का आदान-प्रदान होगा जिसका प्रतिफल - एक शांत दुनिया मे एक सुखद जीवन होगा।

यहां आध्यात्मिक आंदोलन का एक मंसूबा है (इसमें एक अपील संलग्न है)। मैं आपके जैसे व्यक्तियों की मदद के बिना, अकेले - इसे एक प्रभावी रूप देने में बहुत संघर्ष कर रहा हूं। आप लगभग बिना किसी कठिनाई और उपद्रव के इस आंदोलन की बहुत मदद कर सकते हैं।

इलाहाबाद के आपके पुराने मित्र के रूप में मेरी विनम्र सलाह यह है कि अब आपको प्रधानमंत्री पद को त्यागपत्र देना चाहिए और क्योंकि आप एक विश्वप्रसिद्ध लोकप्रिय सज्जन हैं, आप अब अपने मूल्यवान जीवन के बाकी हिस्सों को इस संगठित आध्यात्मिक आन्दोलन मे संलग्न कर - भारतीय आध्यात्मिक बोध के साथ पश्चिमी भौतिक विज्ञान का वास्तविक समायोजन करें।

इसलिए कृपया इस प्रस्ताव पर बहुत गंभीरता से सोचें और मुझे इस पर अपनी प्रतिक्रिया देकर उपकृत करें। यदि आप थोड़ा सा समय देते हैं, तो मैं आपको इसके महत्व के बारे में और अधिक वेग से आश्वस्त कर पाऊँगा। आपको प्रत्याशा में धन्यवाद और आपके शीघ्र उत्तर की प्रतीक्षा है।

सादर,

ए.सी. बी.

प्रति पंजीकृत डाक से निजी पत्र

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