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		<title>HI/520726 - रामकृष्ण को लिखित पत्र, इलाहाबाद</title>
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[[File:520726_-_Letter_to_Ramakrishna_2.jpg|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;रामकृष्ण को पत्र (पृष्ठ 2 of 2)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ABHAY CHARAN DE &amp;amp; SONS&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ALLAHBAD BRANCH&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
MANUFACTURERS OF PHARMACEUTICAL DRUGS, ABSOLUTE ALCOHOL, ETHER SULPH&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
OHLOROFORM, INJECTULES, MEDICINAL SPECIALITIES, FINE CHEMICALS, SURGICAL&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
DRESSINGS AND GENERAL TOILET PREPARATIONS.&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
57-B Canning Road,&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
(MAHATMA GANDHI MARG)&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Proprietor&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
SRI ABHAY CHARAN DE&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
CALCUTTA OFFICE&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
6 &amp;amp; 7 Sita Kanto Banerjee Lane.&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
P.O.HATKHOLA. &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
Ref.No. - Allahabad &#039;&#039;[handwritten]&#039;&#039; 26/7/1952&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;[handwritten]&#039;&#039; &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
26 जुलाई, 1952 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय रामकृष्ण, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमति सुलक्समोना के पत्र के जवाब में, मैं उनके लिए एक पत्र भेज रहा हूं, जो उन्हे भेजा जा सकता है।  मैं अपनी स्थिति को सुधारने के लिए यहां आया था लेकिन मैं देखता हूं कि मेरी बुरी किस्मत को सुधारना असंभव है।  पिछले दो वर्षों से लगभग मैंने इस व्यवसाय से ₹ ६०० /- महीने तक के खर्च को पूरा किया है।  कलकत्ता, इलाहाबाद, रांची हाईकोर्ट और आरवाई यात्रा, इन पांच अलग-अलग चीजो के खर्च अब तक पूरी तरह से मिले हैं।  लेकिन अचानक मेरी बहन प्रतिद्वंद्वी फर्मों की रचना मुझे इस जगह से हटाने के लिए की गई है।  उनकी चाल से ड्रग कंट्रोलर ने मेरे व्यवसाय को पिछले डेढ़ महीने के लिए सस्पेंड कर दिया और इसके परिणाम स्वरुप लगभग 1000 / - रुपयो को ताला लगा दिया गया है और सील कर दिया गया है और मुझे अपने नौकरों ने  शर्मिंदा कर दिया है।  मुझे तुरंत स्थापना शुल्क देने के लिए 300 / - रुपये की आवश्यकता है जिसके बिना मैं बहुत अपमानित हूं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं व्यवसाय को फिर से खोलने के लिए अपने स्तर पर सर्वश्रेष्ठ प्रयास कर रहा हूं लेकिन फिर भी सामान्य स्थिति में आने में न्यूनतम एक सप्ताह लगेगा।  मैं बुरी तरह से फंसा हुआ हूं और बहुत ही शर्मिंदा हूं।  क्या आप कृपया मेरी मदद करेंगे जैसा आपने कई बार किया है?  एक बेटे को अपने पिता से पूछने में कोई शर्म नहीं होती, इसलिए मुझे इसके लिए कोई शर्म नहीं है क्योंकि वर्तमान समय में कोई और मदद भी नहीं है।  यदि आप मदद कर सकते हैं, तो कृपया मुझे 300 / - रुपये का T.M.O भेजें और मेरी प्रतिष्ठा और सम्मान बचाए।  मै उम्मीद करता हूँ कि मैं आपको  एक पखवाडे के बाद इस राशि को वापस कर दुँगा।  जैसे ही मेरा व्यवसाय खोला जाएगा, मैं एक बार में ही 1000 / - रुपये वापस प्राप्त कर लूंगा।  भगवान आप पर कृपा करे। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका स्नेही ससुर&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एन.बी. मैं उम्मीद करता हूँ  कि आपका टी.एम.ओ. मुझे अगले सोमवार तक या अगले मंगलवार को मिलेगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एसीडी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
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		<title>HI/560000 - सदस्यों को लिखित पत्र, बॉम्बे</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
अज्ञात तिथि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बॉम्बे कार्यालय: 93, नारायण धुरु सेंट बॉम्बे -3&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिनांकित डाक चिह्न के अनुसार।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रील भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराज के दिव्य आदेशानुसार, मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि - हर पहलू में भ्रष्ट होती दुनिया की स्थिति को देखते हुए अब मानव जाति, सामान्य नेताओं, आधुनिक नेताओं, दार्शनिकों और धर्मवादियों की दिव्य चेतना को पुनर्जीवित करने का समय आ गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीवात्मा की दिव्य चेतना का विकास मनुष्य में प्राकृतिक विकास द्वारा होता है, लेकिन भौतिक प्रकृति पर प्रभुत्व जमाने की इच्छा के कारण कभी-कभी कृत्रिम बल द्वारा इसे कम कर दिया जाता है। इसका परिणाम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह है कि सभ्यता की ऐसी प्रणाली लोगों को अल्पजीवी बनाती है,  जीवन (आध्यात्मिक ज्ञान) में महत्वपूर्ण विषयों को समझने में मंद बनाती है, पूर्णता के अनुपयुक्त मार्ग को स्वीकार करवाती है, भौतिक समृद्धि में भी अभागा बनाती है और सदैव व्याधियों और संकटों से पीडित रखती है। और ये भगवद्- विहीन सभ्यता प्रणाली में प्रकृति द्वारा प्रदत्त कुछ उपहार हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस समय उपरोक्त लक्षण, भगवद्- विहीन नेताओं द्वारा जनता में शांति और समृद्धि लाने की विभिन्न योजनाओं के बावजूद भी विश्व-भर में प्रभावशाली है। सुप्त दिव्य चेतना को आध्यात्मिक ज्ञान के प्रसार द्वारा पुनर्जीवित करना ही एकमात्र उपाय है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्- दर्शन इस विशेष कार्य के लिए व्यापक दृष्टिकोण के साथ चारों ओर से मानव कल्याण कार्यों के लिए समर्पित है और इसके लिए शिक्षित क्षेत्र की ओर से अनेक सराहनाएं हैं। अब यह निर्णय लिया गया है कि उपरोक्त पत्रकीय की प्रतियां निम्नलिखित स्तर में विश्व के प्रमुख व्यक्तियों को डाक की जाएंगी: (1) अफगानिस्तान 1,000, (2) अमरिका 10,000, (3) अर्जेंटीना 500, (4) बेल्जियम 500, ( 5) ब्राज़ील 500, (6) बर्मा 1,000, (7) कनाडा 500, (8) चिली 500, (9) चीन 10,000, (10) चेकोस्लोवाकिया 500, (11) डेनमार्क 500, (12) मिस्र 1,000, (13) इथियोपिया 500, (14) फ्रांस 1,000, (15) जर्मनी 5,000, (16) ग्रीस 1,000, (17) इंडोनेशिया 500, (18) ईरान 500, (19) इराक 500, (20) इटली 1,000, (21) जापान 2,000 , (22) लाओस 500, (23) मेक्सिको 500, (24) मोनाको 500, (25) मंगोलिया 500, (26) नेपाल 500, (27) नीदरलैंड 1,000 (28) नॉर्वे 1,000, (29) फिलीपींस 500, (30) ) पोलैंड 500, (31) सऊदी अरब 500, (32) सूडान 500, (33) सीरिया 500, (34) थाईलैंड 500, (35) स्वीडन 500, (36) तुर्की 500 (37) वियतनाम 500, (38) USSR 10,000, (39) यूगोस्लाविया 500, (40) ऑस्ट्रिया 500, (41) बुल्गारिया 500, (42) फिनलैंड 500, (43) पवित्र देखें 500, (44) हंगरी 500, (45) रुमानिया 500, (46) स्विट्जरलैंड 500 , (47) ऑस्ट्रेलिया 2,000, (48) कैम बोडिया 500, (49) सीलोन 500, (50) घाना 500, (51) मलाया 500, (52) पाकिस्तान 1,000, (53) यूनाइटेड किंगडम 10,000। यह अपेक्षा की जाती है कि सभी बुद्धिमान व्यक्ति पूर्ण सुधार के लिए इस आध्यात्मिक आंदोलन से जुड़ेंगे। यह प्रचार कार्य संकीर्तन यज्ञ का अंश है जो इस युग के लोगों के लिए संस्तुत किया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कठिनाई यह है कि पथभ्रष्ट व्यक्ति इंद्रियतृप्ति के विषय में आत्म-साक्षात्कार की अपेक्षा अधिक रुचि रखते हैं, जो जीवन का सर्वोच्च लक्ष्य है। हमने इसलिए कठिन कार्य का निष्पादन है और इसे करना हमारा कर्तव्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम आपको इस सामूहिक कल्याण के विशेष कार्य में सहयोग देने के लिए और भगवद्- दर्शन द्वारा किए गए आध्यात्मिक प्रचार के व्यापक प्रचार- प्रसार के विषय में सहायता करने के लिए आमंत्रित करते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हम आपसे अनुरोध करेंगे कि आप भगवद्- दर्शन के कुछ अंकों के प्रकाशन, मुद्रण और वितरण का खर्च वहन करें। यह पत्रिका एक महीने में दो बार जारी किया जाता है और 2 x 1,000 प्रतियों की लागत इस प्रकार है: -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छपाई में रु। 72 / -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कागज़ 50 / -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पोस्टिंग (डाक-शुल्क की छूट मूल्य पर) 40 / -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पैकिंग 8 / -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
________&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कुल रु। 170 / - रु।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
________&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रुपए मात्र एक सौ सत्तर।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया एक वर्ष में एक,  दो,  तीन या अधिक से अधिक 2 x 12 मुद्दों के लिए खर्च में योगदान करने का प्रयास करें। यदि नहीं, कम से कम एक वर्ष में एक महीने के लिए आप भगवान के लिए भार स्वीकार कर सकते हैं और दानकर्ता के रूप में अपने नाम के साथ उनका वितरिण कर सकते हैं। भगवान की ओर से आपकी कड़ी मेहनत के पैसे के साथ आध्यात्मिक मूल्य की यह सेवा, भगवान द्वारा स्वीकार की जाएगी और आप अपने जीवन में विफल हुए बिना आध्यात्मिक अनुभूति प्राप्त कर पाएँगे। कृपया इसे तथ्यात्मक रूप से ठीक उस प्रकार अनुभव करें जिस प्रकार एक भूखे पेट व्यक्ति को भरपेट भोजन ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आध्यात्मिक प्रकाश प्राप्त करने के लिए यज्ञ,  दान और तपस्या तीन आवश्यक वस्तुएँ हैं। आपके लिए प्रस्तावित पथ सबसे सरल है, उपरोक्त तीन महत्वपूर्ण आध्यात्मिक कार्यों को करना । इस अवसर को जाने न दें। कृपया इसे तुरंत अपनाएं और परिणाम देखें कि यह कैसे कार्य करता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आशा करते हैं आप इसका पालन करेंगे। कृपया पत्रिका के वर्तमान अंक को पढ़ें जो एक प्रबुद्ध आत्मा द्वारा दान में दिया गया है और साथ-साथ आप संसार के उद्धार के लिए स्वयं का अच्छा उदाहरण रखें।&lt;br /&gt;
प्रत्याशा में आपका धन्यवाद,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदीय,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
गोस्वामी अभय चरण भक्तिवेदांत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संपादक: भगवद्- दर्शन और संस्थापक सचिव लीग ऑफ़ डिवोटीज़&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संलग्नक: - १।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
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		<title>HI/581100 - भाई को लिखित पत्र, झाँसी</title>
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		<updated>2021-03-29T06:47:17Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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[[File:581100_-_Letter_to_Brother_2.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;भाई को पत्र (पृष्ठ २ से  ४)(प्रारंभ में पाठ अनुपस्थित)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
[[File:581100_-_Letter_to_Brother_3.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;भाई को पत्र (पृष्ठ ३ से  ४)(प्रारंभ में पाठ अनुपस्थित)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
[[File:581100_-_Letter_to_Brother_4.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;भाई को पत्र (पृष्ठ ४ से ४)(प्रारंभ में पाठ अनुपस्थित)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अज्ञात तिथि &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय भाई, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
कृपया मुझे क्षमा करें यदि मैंने आपको मेरे प्रिय भाई कह कर गुस्ताखी की है। वास्तव में आप मेरे प्रिय भाई हैं और जब आप मुझे जान जायेंगे तब आपके हर्ष की सीमा नही होगी। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
हमारे शाश्वत पिता सर्वशक्तिमान भगवन श्री कृष्ण, जिन्होंने महान दर्शनशास्त्र भगवद् गीता के ज्ञान को दिया था, ऐसे परम पिता के संबंध में आप मेरे भाई हैं। और इस पारलौकिक ज्ञान की पुस्तक से मैंने जाना है कि आप और अन्य सभी जीवित प्राणी, चाहे वे किसी भी रूप में हों, मेरे भाई हैं। &amp;lt;br/&amp;gt; &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
लेकिन मैं कुछ अन्य कम बुद्धिमान भाइयों को जानता हूं, जो की अब पशु साम्राज्य में हैं, और वे मुझे पहचान नहीं पाएंगे, भले ही मैं उन्हें अपने प्यारे भाइयों के रूप में संबोधित करूं, क्योंकि वे सब बहुत बुरी तरीके से भौतिक चेतना से ढके हुए हैं। चूंकि आप एक इंसान हैं और आपकी चेतना विकसित है, मैंने सीधे आपको &amp;quot;मेरे प्यारे भाई&amp;quot; से संबोधित करने का साहस उठाया है। इसलिए कृपया करके मेरे इस प्रयास को किसी गलत दृष्टिकोण से न देखें।  &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
ऐसा हो सकता है, हालांकि मैं इसे नहीं मानता, की आप उन अन्य भाइयों में से एक हैं, जो हमारे शाश्वत पिता परमेश्वर जैसे किसी व्यक्ति के अस्तित्व में विश्वास नहीं करते हैं। लेकिन अगर आप ऐसा मानते हैं, तो मैं आपको बता दूँ कि आप गलत हैं। आपके इस अभिशंसा का कारण या तो दूसरे बहके हुए भाईयों का बेहकावा है, या फिर आप हमारे शाश्वत पिता से संपर्क करने मे असफल रहें हैं। अतः, यदि आप उन पर विश्वास नही करते हैं, तो आप सही चेतना में नही हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
मैं आपको हर तरीके से समझाने के लिए तैयार हूं कि, हमारे शाश्वत पिता हैं और वे चाहते हैं कि आप और हम सब अपने स्थायी घर को वापस चले जाएं। यदि आप यह तर्क देते हैं कि ऐसा कोई भी परमपिता परमेश्वर नहीं है, तो मैं अभी भी पूरी गंभीरता के साथ आपसे वितर्क करने के लिए तैयार हूँ। ऐसे में आप कृपया कर के मुझे अपने निश्चित दृष्टिकोण का प्रासंग दें ताकि मैं उन सभी विचारों का एक-एक करके उत्तर देने का प्रयास कर सकूं। और अगर आप मुझसे बहस करने की इच्छा रखतें हैं, तो मेरा आपसे केवल यही अनुरोध है कि इस तरह के तर्कों के लिए हमें हमेशा बहुत ईमानदार और गंभीर होना चाहिए। एक बार जब हम इस तरह से आश्वस्त हो जाते हैं, फिर हमें उसी के अनुसार कार्य करने के लिए तैयार रहना चाहिए। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
आप यह भी तर्क दे सकते हैं कि अगर कोई भगवान है, तो उन्हें शांति से उनके लोक पर या किसी भी जगह पर रहने दो, हमें उनसे कोई लेना देना नहीं है। उस मामले में मैं फिर से कहूंगा कि उनसे अपना भुलाया हुआ रिश्ता स्थापित करने की हर एक वजह आपके पास है। &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
मान लीजिए कि आप एक अमीर आदमी के बेटे हैं और आपने अपने घर को छोड़ दिया है, अपने पिता की संपत्ति, घर और खुशी को भूल गए हैं। और अगर कोई व्यक्ति आपको अपने आलीशान पैतृक संपत्ति के अमित मूल्य के बारे में जानकारी देता है, जो आप अपने जन्मसिद्ध दावे से प्राप्त कर सकते हैं, तो क्या आप उस दोस्त की उपेक्षा करेंगे? मुझे यकीन है कि आप ऐसा नहीं करेंगे। मैं आपको ऐसी महत्वपूर्ण जानकारी देने में सक्षम हूं। &amp;lt;br/&amp;gt; &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
मैं आपको चुनौती दे सकता हूं कि आप अपने वर्तमान के स्थिति मे खुश नहीं हैं। आपके पास तथाकथित संचित भौतिक धन, अच्छा स्वास्थ्य अन्य सभी वस्तुएँ हो सकती हैं लेकिन फिर भी आप हमेशा कुछ कमी और निराशा महसूस करते रहते हैं और कोई भी वस्तु आपको सोची गयी मात्रा में खुशी नही दे पाती है। यदि आप ऐसा महसूस नहीं करते हैं, तो फिर आप एक असामान्य व्यक्ति हैं या फिर एक मुक्त संत हैं या फिर अंततः , लघु चेतना से भ्रमित अज्ञान में हैं। अगर आपको असामान्य रूप से खुशी महसूस होती है, तो मैं आपसे निम्नलिखित कुछ सादे प्रश्न पूछूंगा। वे इस प्रकार हैं:- &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
१) क्या आप मरना पसंद करते हैं? &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
२) क्या आप अपना जन्म दोबारा लेना पसंद करेंगे ? &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
३) क्या आपको बूढ़ा होना पसंद है? &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
४) क्या आप एक रोगग्रस्त आदमी बनना पसंद करेंगे ? &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
मुझे यकीन है कि आप इन सभी सवालों का जवाब एकमात्र शब्द &amp;quot;नहीं&amp;quot; में देंगे। अगर आप खुद को खुश मानते हैं तो क्या आपने उपरोक्त सभी समस्याओं को किसी भी तरह से हल किया है? क्या आपके भौतिक ज्ञान के विशाल संसाधनों ने इन सामान्य प्रतीत होने वाली अति गंभीर  संशयओं का समाधान निकाला है? क्या आपको लगता है कि आप कभी भी उपरोक्त समस्याओं को कितने भी समय में हल कर पाएंगे? यदि आप फिर से सहमति नही जताते हैं, तो फिर मैं आपको एक असामान्य स्थिति के अंतर्गत ही देख पाऊँगा। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
इसलिए कृपया इस कृत्रिम धारणा के शिकार में आकर पागल न बने। अपनी समस्याओं के अज्ञानता में मत रहें। एक जागरूक आदमी की तरह बनें और स्वीकार करें कि आप कभी भी यथार्थ रूप से खुश नहीं हो पाएं हैं और आपको खुशी की वांछित मात्रा कभी भी नही मिल पाई है। &amp;lt;br/&amp;gt;  &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
जिस तरह से आप खुश रहना चाहते हैं या अपनी निर्मित विचारधारा के अंतर्गत - दूसरों को खुश करना चाहतें है - उसे &amp;quot;माया&amp;quot; या भ्रम कहा जाता है। खुद को और दूसरों को खुश करने के इस भ्रामक तरीके से, आपको केवल सभी संबंधितों के लिए बहुत सारी गड़बड़ी और उलझाव पैदा करने का श्रेय दिया गया है। यह भौतिक दुनिया के इतिहास का रिकॉर्ड है। साम्राज्य आता है और साम्राज्य चला जाता है, परंतु जीवन की समस्याएं वैसी की वैसी रहती हैं। इसलिए कृपया करके, एक शांत मस्तिष्क और धैर्य से अपने भीतर चिंतन करें कि क्या आप वास्तव में खुश हैं।  &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
जिस खुशी के पीछे आप भाग रहें हैं, उसे आत्मनिरीक्षण से प्राप्त किया जा सकता है। आप खुद के दोस्त और खुद ही के दुश्मन हैं। आप अपने आत्म प्रयास से खुद को ऊपर उठा सकते हैं और उसी प्रयास से आप खुद का पतन कर सकते हैं। बस दिशा और रास्ता जानना है। सही दिशा में आप सही तरीके से खुद को खुश कर सकते हैं। इसलिए कृपया हमें संपर्क करें और हम आपको आपकी यथार्थ खुशी तक पहुँचाने में मदद करेंगे।  यह कोई सपना नहीं है और न ही कोई झांसा। आपको खुद पता चल जायेगा कि आपने उस रास्ते में कितनी दूर तक प्रगति की है और हमारा कर्तव्य केवल आपकी मदद करना होगा।  यह सोचकर कि आप हमारे भक्तों के समूह के एक भावी सदस्य बनेंगे, मैं आपको प्रॉस्पेक्टस की एक प्रति भेज रहा हूं और मैं ईमानदारी से चाहता हूं कि आप इस महान संस्था के सक्रिय सदस्य बनें। भुगतान या भुगतान के बिना आप बिना किसी दाइत्व के एक सदस्य बन सकते हैं और समूह आपको हमेशा दिव्य पुत्र के रूप में स्वीकार करेगा । &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
सादर, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
भक्तों के समूह के लिए, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
अभय चरणारविंद भक्तिवेदांत, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अध्यक्ष&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/660928_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%A3_%E0%A4%AE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%9C_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%AF%E0%A5%89%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%95&amp;diff=545211</id>
		<title>HI/660928 - श्रीपाद नारायण महाराज को लिखित पत्र, न्यू यॉर्क</title>
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		<updated>2021-03-02T01:36:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1966 - श्रील प्रभुपाद के पत्र Category:1966-09 - Lectures and Letters Category:HI/1966 - श्रील प्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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२८ सितंबर, १९६६&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
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२८ सितंबर, १९६६&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;quot;श्री श्री गुरु गौरांग जयथो&amp;quot;&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
एयर मेल द्वारा पंजीकृत डाक&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णा भावनामृत के लिए संस्था, इंक.&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
ट्वेंटी-सिक्स एवेन्यू, न्यूयॉर्क, एन.वाई. १०००३&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
टेलीफोन: ६७४-७४२८&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आचार्य: स्वामी ए.सी. भक्तिवेदांत&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
न्यासी (पी.स. वे सभी मेरे शिष्य हैं, और उनके सभी नाम अब वैष्णव नाम हैं।)&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
लैरी बोगार्ट&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जेम्स एस ग्रीन&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
कार्ल एयरगन्स&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
राफेल बालसम&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
रॉबर्ट लेफकोविट्ज़&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
रेमंड मोरिस&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्टेनली मॉस्कोविट्ज़&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
माइकल ग्रांट&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
हार्वे कोहेन&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीपाद नारायण महाराज,&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
मुझे आपका पत्र दिनांक २०.९.६६ समय पर प्राप्त हुआ। हमारा रिश्ता निश्चित रूप से सहज प्रेम पर आधारित है। यही कारण है कि हमें एक दूसरे को भूल जाने का कोई सवाल ही नहीं है। गुरु और गौरांग की दया से आपके लिए सब कुछ शुभ हो। यह मेरी निरंतर प्रार्थना है। जबसे पहली बार मैंने आपको देखा, तब से मैं आपका निरंतर शुभचिंतक रहा हूं। मेरी पहली नज़र में श्रील प्रभुपाद ने भी मुझे इतने प्यार से देखा। ये मेरे श्रील प्रभुपाद के पहले दर्शन से ही मैंने प्यार करना सीखा। यह उनकी असीम दया है, कि उन्होंने मेरी जैसे   एक अयोग्य व्यक्ति को अपनी कुछ इच्छाओं को पूरा करने में लगा दिया है। श्री रूप और श्री रघुनाथ के संदेश का प्रचार करने के लिए मुझे संलग्न करना उनकी अकारण दया है।&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
यहां प्रचार का कार्य बहुत अच्छा चल रहा है। मैंने पत्र के साथ इसके विवरण की एक प्रति भेजी है। यदि आप कर सकते हैं तो, इसे प्रकाशन करने का प्रयास करें, और इस समाचार को विभिन्न समाचार पत्रों को दे सकते हैं। यहां सरकार ईसाई धर्म को छोड़कर किसी भी अन्य धर्म के प्रचार के लिए बहुत सतर्क है। इसलिए मुझे केवल एक वर्ष तक रहने के बाद छोड़ने का आदेश दिया गया है। मैं भी लौटने को तैयार हूं, लेकिन मेरे शिष्य नहीं चाहते कि मैं जाऊं। वे सरकार के इस आदेश के खिलाफ मुकदमा दर्ज करने की व्यवस्था कर रहे हैं। पाँच सौ डॉलर खर्च होंगे, लगभग ४००० /- रुपये। वे इतना पैसा खर्च करने के लिए तैयार हैं। उपर्युक्त अमेरिकी सज्जन आज रात एक बैठक करेंगे, और चौबीस घंटे के भीतर वे भुगतान करने के लिए एक वकील की व्यवस्था करेंगे। इसलिए ऐसा लगता है, कि मुझे श्रील प्रभुपाद की इच्छा को पूरा करने के लिए यहां अधिक समय तक रहना होगा। भले ही वे मुझे हर प्रकार की सुविधा और आराम में रखते हों, फिर भी मेरा मन वृंदावन लौटने के लिए उत्सुक है, और मैं आप सभी को देखने के लिए उत्साहित हूं।&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
मैं इस पत्र के साथ प्रचार का विवरण भेज रहा हूं। १५०० /- का एक चेक भी शामिल है। आपके द्वारा दी गई मूल्य सूची में कुल रु १५४४ /- आता है, लेकिन गलती से आपने १०८० /- रु लिखा है। वैसे भी मैं कम या ज्यादा समायोजित करूंगा, और बाद में आपको भेजूंगा। सब कुछ ठीक से पैक करके कलकत्ता या कोचीन भेजा जाना चाहिए। कहां भेजना है, मैं आपको अपने अगले पत्र में लिखूंगा।&lt;br /&gt;
मेरा कमरा दिल्ली में ताले में बंद है। यदि आप या आपके कोई वफादार प्रचारक दिल्ली में प्रचार करना चाहते हैं, तो मुझे बताएं। यदि आप दिल्ली में काम करना चाहते हैं तो आप उस कमरे का उपयोग कर सकते हैं, और प्रचार कर सकते हैं। यदि आप दिल्ली जाना जारी रखते हैं, तो आपके अवलोकन के तहत मेरे प्रकाशन कार्य पर ध्यान रखा जा सकता है।&lt;br /&gt;
आपने मुझे लिखा, &amp;quot;आप मुझे, मेरी क्षमता के अनुसार भारत में किसी भी प्रचार कार्य में संलग्न कर सकते हैं। मैं हमेशा ऐसा करने के लिए तैयार रहूँगा।&amp;quot; इसलिए मैं आपकी शुभकामनाओं से पूरे दिल से प्रचार कर सकता हूं।&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
यहाँ, पंद्रह पढ़े-लिखे लड़कों ने मुझसे (शिश्वतो) शिष्यत्व स्वीकार किया है। उन्होंने शराब, मांस, नशा, मारीजुआना, चाय, कॉफी, अंडे आदि को त्याग दिया है, और हर दिन मेरे द्वारा दिए गए कृष्ण-प्रसादम का सम्मान कर रहे हैं। वे कभी नहीं जानते थे कि दही, चपाती, चावल, पालक, दूध और फल कैसे लेते हैं, लेकिन अब इस तरह के प्रसाद खाने से वे काफी खुश हैं, और हमेशा ध्यानपूर्वक आवंटित सेवा कर रहे हैं। इसलिए, जब ये युवा लड़के पूरी तरह से तैयार हो जाएंगे, तो उनके माध्यम से इन पश्चिमी देशों में व्यापक प्रचार होगा। मैं हमेशा उन्हें याद दिलाता हूं कि मैं बूढ़ा हो गया हूं। &amp;quot;किसी भी समय मुझे यमराज को नमस्कार कहना पड़ सकता है, इसलिए आप सभी इस कृष्ण चेतना को ठीक से समझने का प्रयास करें।&amp;quot; मुझे लगता है कि वे इसे ठीक से स्वीकार करने की कोशिश कर रहे हैं। अन्यथा, वे मुझे यहाँ रखने के लिए ४००० /- से ५००० /- रु मुकदमा दायर करने के लिए खर्च क्यों करेंगे? वैसे भी, कृष्ण की दया और आपकी शुभकामनाओं और आशीर्वाद से, मुझे कोई असुविधा नहीं हुई। मेरा स्वास्थ्य भी अच्छा है। मेरी एकमात्र चिंता यह है कि भारत में मेरी अनुपस्थिति के कारण मेरा प्रकाशन कार्य बाधित हो गया है। इस बारे में, यदि आप थोड़ा पर्यवेक्षण कर सकते हैं, तो मुझे कोई चिंता नहीं होगी। दिल्ली में मेरा एक गृहस्थ शिष्य है, और एक या दो अन्य लोग भी हैं, लेकिन उन्हें प्रकाशन का कोई अनुभव नहीं है। यदि आप देखरेख कर सकते हैं, तो श्रीमान चंद्रशेखर और उनके बेटे चंद्र मोहन आपकी मदद करेंगे। मेरे पास एक उचित प्रेस, कागजात की आपूर्ति, और अधिकारियों के साथ एक व्यवस्था है, लेकिन इसकी देखभाल करने वाला कोई नहीं है। मेरा पत्र मिलते ही मुझे अपनी राय बताएं। मथुरा में एक प्रेस है, लेकिन यह दिल्ली की तरह सुविधाजनक नहीं है। किताबें अमेरिका में छप सकती हैं। अंतिम प्रकाशन बहुत अच्छा है, लेकिन बहुत महंगा है। भारत से पैसा लाना भी मुश्किल है, इसलिए छपाई वहीं करनी पड़ती है। इसमें तो कोई शक ही नहीं है।&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपने मंदिर के बारे में जो सुना है वह सच है। जितना कि न्यूयॉर्क में राधा-कृष्ण मंदिर बनाने के लिए आवश्यक है, कानपुर के सर पदमपत उतना खर्च करने के लिए तैयार हैं। लेकिन यह भारत सरकार के साथ मुद्रा विनिमय के लिए संभव नहीं था। मेरे द्वारा लाए गए श्रीमद भागवतम् के आधे हिस्से वितरित किए गए हैं। यहां उच्च कोटि के लोग, भगवान के भक्तों को पागल समझते हैं। शुरुआत में मैंने उनके साथ जुड़ने की कोशिश की। मैं राज्यपाल के सचिव और अन्य लोगों से परिचित हो गया; लेकिन उनके असभ्य स्वभाव को देखकर मैंने अपना ध्यान मध्य वर्ग-विशेषकर युवा और शिक्षितों की पर केंद्रित किया। यहाँ युवा शिक्षित सम्प्रदाय को पश्चिमी सभ्यता से घृणा है। मारिजुआना लेकर और महिलाओं के साथ संगत कर वे बर्बाद हो रहे हैं। सरकार उनकी परवाह नहीं करती। उन्हें बल द्वारा वियतनाम युद्ध के लिए भेजा जाता है। यहां की राजनीतिक स्थिति अच्छी नहीं है। इसका मतलब है कि उनका भविष्य बहुत उज्ज्वल नहीं है। इस स्थिति के कारण, श्रीमन् महाप्रभु इस देश में आए हैं। मैं चैतन्य महाप्रभु के पद कमलों की धूल देने की कोशिश कर रहा हूं, और जो लोग स्वीकार कर रहे हैं वे खुशी महसूस कर रहे हैं। वे मुझे प्यार से स्वीकार कर रहे हैं, यह सोचकर कि मैं उन्हें जीवन दे सकता हूं। आपको यह सब समाचार का जानकारी संयुक्त विवरण में मिल जाएगा।&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
एक क्रॉसचेक भेजा जा रहा है। अगर आपके पास बैंक खाता है तो इसे नकदीकरण कराना मुश्किल नहीं होगा। अन्यथा आप बॉन महाराजा, या अन्य दोस्तों की मदद से पैसा इकट्ठा कर सकते हैं। मेरा पत्र मिलते ही कृपया मुझे उत्तर दें।&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
निवेदना&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
(मैं खुद को आपके सामने प्रस्तुत करता हूं)&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
पी.एस.किसी भी पेशेवर मृदंगा वादक की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि कोई अच्छा भक्त है जो आना चाहता है, तो मुझे उसका नाम और पता भेजें।&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
संलग्नक-एक चेक #: ००५५४४५ रुपये १५०० /- (रुपये पंद्रह सौ)&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
एसीबी का विवरण&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
© गौड़ीय वेदांत प्रकाशन सीसी-बीवाय-एनडी&amp;lt;/br&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
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		<title>HI/550204 - संयुक्त स्टॉक कंपनियों के रजिस्ट्रार को लिखित पत्र, इलाहाबाद</title>
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		<updated>2021-03-01T01:38:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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[[File:550204_-_Letter_to_Registrar_of_Joint_Stock_Companies_1b.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;संयुक्त स्टॉक कंपनियों के रजिस्ट्रार को पत्र (पृष्ठ 1 of 1 - second part)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
०४ फरवरी १९५५&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
संयुक्त स्टॉक कंपनियों के  निबंधक&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
उत्तर प्रदेश- लखनऊ।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री गुरु - गौरांग जयतः।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रीमान,&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
तीसरे तत्क्षण को आपके साथ मेरे साक्षात्कार के संदर्भ में, मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन और नियमों और भक्तों के संघ के नियमों (उर्फ़ सर्बभौमा भगवता समाज) के पंजीकरण के संबंध में, मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि मैंने शुल्क रु ५० (सिर्फ पचास रुपये) इम्पीरियल बैंक ऑफ इंडिया लिमिटेड, लखनऊ में जमा कर दिए हैं और आपकी सलाह के अनुसार निम्नलिखित आपके हाथ में सोंपता हूँ।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
(१) मेमोरेंडम ऑफ एसोसिएशन स्पष्ट रूप से भक्तों के संघ के वर्तमान सदस्यों द्वारा हस्ताक्षरित है।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
(२) नियम और विनियम भक्त संघ के वर्तमान सदस्यों द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
(३) जमा चालान नं ८१डी /४ ३/३ रु ४० के लिए&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
कृपया उपरोक्त की प्राप्ति सूचना दें और अपने सुविधानुसार जल्द से जल्द जरूरतमंदों को करें।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस संबंध में सभी पत्राचार अधोहस्ताक्षरी को उनके वर्तमान पते में संबोधित किया जा सकता है, जैसा कि ऊपर बताया गया है।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका धन्यवाद,&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका आभारी-&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
संलग्न पत्र - ३।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/490901_-_%E0%A4%97%E0%A5%80%E0%A4%A4%E0%A4%BE_%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B0_%E0%A4%9F%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%8D%E0%A4%9F_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%95%E0%A4%B2%E0%A4%95%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%BE&amp;diff=543186</id>
		<title>HI/490901 - गीता मंदिर ट्रस्ट को लिखित पत्र, कलकत्ता</title>
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		<updated>2021-02-07T07:10:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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[[File:490901_-_Letter_to_Gita_Mandir_Trust_2.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;गीता मंदिर ट्रस्ट को पत्र (पृष्ठ 2 of ?)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
[[File:490901_-_Letter_to_Gita_Mandir_Trust_3.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;गीता मंदिर ट्रस्ट को पत्र (पृष्ठ 3 of ?) (पृष्ठ अनुपस्थित)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सितंबर ०१, १९४९&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
सचिव&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री गीता मंदिर ट्रस्ट,&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
गीता मंदिर रोड,&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
अहमदाबाद।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रीमान,&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
मैं आदरणीय स्वामीजी १०८ श्री श्रीमद् विद्यानंदजी महाराज का आशीर्वाद स्वीकार करते हुए आपका बहुत आभारी हूं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि विदेशों में प्रचार करने का आपका कार्यक्रम अभी भी विचाराधीन है। मैं भगवद्-गीता के प्रचार संबंधी अपने विचारों को प्रस्तुत करने का अनुरोध करता हूं और अपने विचारों के संबंध में आपकी प्रतिक्रिया जानकर मुझे खुशी होगी:&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
मेरा मानना है कि विश्व अशांति का वास्तविक समाधान पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण के दिव्य संदेश में है जो हाल ही उन्होंने भगवद्-गीता में दिया है।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस पवित्र दार्शनिक प्रवचन में परमभगवान ने खुद को बीजप्रदा पिता घोषित किया है, जो जीव के बीजों को माता प्रकृति के गर्भ में संसेचन करते हैं जो सभी किस्म के जीवों या प्रजातियों को जन्म देती है। तो सीधा-सादा सच यह है कि परमपिता भगवान हैं, भौतिक प्रकृति माँ है और सभी जीवित प्राणी सर्वशक्तिमान पिता परमभगवान और माँ प्रकृति के बहुत सारे बच्चे हैं। पूरी व्यवस्था सिर्फ एक परिवार की इकाई है, और हमें आश्चर्य होना चाहिए कि इस महान सार्वभौमिक परिवार इकाई में इतनी विसंगति क्यों है?&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
इसका उत्तर भी भगवद्-गीता में दिया गया है। कहा जाता है कि सृष्टि में पुरुषों के दो वर्ग हैं। एक वर्ग को देव (ईश्वरीय) और दूसरे वर्ग को असुर (राक्षसी या ईश्वर रहित) कहा जाता है। सर्वशक्तिमान पिता भगवान के पुत्र होने के नाते, सभी जीवों की अपनी- अपनी स्वतंत्रता है। ईश्वर प्रदत्त इस स्वतंत्रता का सभी उचित या अनुचित तरीके से उपयोग कर सकते हैं।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
जब कोई जीव अनुचित रूप से ईश्वर-प्रदत्त स्वतंत्रता का उपयोग करता है और इस तरह की स्वतंत्रता को अपनी इच्छा-पूर्ति या ईश्वर की योजना को पूरा किए बिना लागू करता है, तो वह तुरंत ईश्वर की मायावी ऊर्जा के संपर्क में आसुरी गुणों को विकसित करता है और पूर्ण रूप से असुर बन जाता है। लेकिन जो ईश्वर द्वारा दी गई स्वतंत्रता का दुरुपयोग नहीं करता और अपनी इंद्रिय-संतुष्टि के काम में नहीं लगता, बल्कि परमभगवान की योजना को पूरा करता है, वह देवता या ईश्वरीय बना रहता है। अर्थ-संतुष्टि के इस कार्य में परमभगवान के असुर बच्चे परमभगवान की योजना को भूल जाते हैं और इसलिए अपने लाभ के लिए परमभगवान की स्थिति का फायदा उठाने की कोशिश करते हैं जो कभी-कभी केंद्रीकृत होता है और कभी-कभी विस्तारित होता है। देवता या ईश्वरीय पुत्र इस तरह के कार्य नहीं करते हैं और इसलिए उन्हें असुरों से अलग माना जाता है।&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
जैसा कि उसे स्वाभाविक रूप से होना चाहिए, माता प्रकृति या परमभगवान की भौतिक ऊर्जा, परमभगवान की सबसे वफादार रखैल है। वह अपने असुर बच्चों के शोषणकारी मकसद को बर्दाश्त नहीं करती है और इसके लिए उसे देवी माया की भूमिका को स्वीकार करना पड़ता है और वह तुरंत अपना विकट त्रिशूल लेती है और हथियार को असुर के ह्रदय में संक्रमित करती है, हालांकि मरने वाला उसका अपना बेटा है । इस प्रकार असुर त्रिगुण कष्टों के अधीन है और यह परमभगवान की योजना के अनुसार किया जाता है। अत: माँ प्रकृति अपने अवज्ञाकारी पुत्रों का पीछा करती है ताकि उन्हें परमभगवान की योजना को पूरा करने के सही मार्ग पर लाया जा सके। असुरों और देवताओं दोनों के लाभ के लिए दंड की प्रक्रिया आवश्यक है। इस तरह की प्रक्रिया परमभगवान की योजना को फिर से स्थापित करती है। लेकिन असुरों को जब परमभगवान की योजना के अनुसार कार्य करने के लिए बदला जाता है, तो वे तुरंत देवता बन जाते हैं। जब असुर देवता बन जाता है तो प्रकृति का क्रोध शांत हो जाता है&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
[पृष्ठ अनुपस्थित]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
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		<title>HI/550900 - भाई को लिखित पत्र, अज्ञात स्थान</title>
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		<updated>2021-02-02T17:23:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:Letters to Unknown or Written from Unknown Place Category:HI/...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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[[File:550900_-_Letter_to_Brother_1.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;भाई को पत्र (पृष्ठ 1 of ? - typed)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
[[File:550900_-_Letter_to_Brother_2.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;भाई को पत्र (पृष्ठ 2 of ? - handwritten (पाठ गुम))&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अज्ञात तिथि&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय भाई,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आपकी पृच्छा प्राप्त हुई और मुझे खुशी है कि आप आस्तिकता के विज्ञान और तकनीकों अथवा उच्चतम स्तर के अध्यात्मवाद को सीखने के लिए भक्तों का संघ का सदस्य बनना चाहते हैं। इसके साथ सूचीपत्र संलग्न है, कृपया इसे पाएं और इस महान संस्थान का स्थायी सदस्य बनने के लिए स्वयं निर्णय लें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सदस्यता शुल्क का उल्लेख नीचे किया गया है, जो संघ के पंजीकृत नियमों और विनियमों से निकाला गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नियम १. “संघ के सामान्य निकाय में जीवन के चार क्रमों के सदस्य शामिल होंगे (ए) ब्रह्मचारी (बी) गृहस्थ (सी) वानप्रस्थ (डी) संन्यासी या त्यागी।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नियम ४. “सदस्यता शुल्क के भुगतान के अनुसार सदस्यों को तीन वर्ग ए, बी और सी में परिभाषित किया जाएगा। (ए) जो लोग प्रति माह ५००/- रुपये और अधिक का योगदान करेंगे वे “ए” वर्ग के होंगे। (बी) जो लोग प्रति माह ५०/- रुपये और अधिक का योगदान करेंगे, वे “बी” वर्ग के होंगे। (ग) जो लोग प्रति माह १०/- रुपये और अधिक का योगदान करेंगे, वे “सी” वर्ग के होंगे।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नियम १६. “प्रत्येक सदस्य कार्यकारी समिति के सदस्यों के चुनाव या किसी अन्य उद्देश्य के लिए आयोजित एक आम बैठक में व्यक्तिगत रूप से अथवा प्रतिनिधि द्वारा मतदान के हकदार होंगे।”&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि आपको लगता है कि आप प्रति माह उपर्युक्त सदस्यता शुल्क का भुगतान करने में असमर्थ हैं, तो आप निशुल्क सदस्यता या कम मूल्य के मासिक सदस्यता के लिए कार्यकारी समिति को आवेदन दे सकते हैं, जो इस विषय पर निर्णय लेगी।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
लेकिन अगर आप उपदेशक सदस्य बन जाते हैं, तो उस स्थिति में आपको १० रुपये का भुगतान करना होगा - केवल “भक्ति-शास्त्री” की डिग्री के लिए, जो आपके संघ के उपदेशक सदस्य बनने के लिए पंजीकृत प्रमाण पत्र की डिग्री से सम्मानित किया जाएगा और आप संघ की ओर से आवश्यक उपदेश कार्य कर करेंगे। उपदेश कार्य इस प्रकार किया जाता है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(१) जैसे ही आपको “भक्ति-शास्त्री” की डिग्री का प्रमाण-पत्र मिलता है, आप तुरंत इस संस्था के प्रामाणित उपदेशक बन जाते हैं और इसके लिए आपको नियमित रूप से “भगवद् -गीता” पढ़ना होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(२) जैसे ही आप “भगवद् -गीता” पढ़ेंगे, आपके मन में उस पुस्तक में दी गई बहुत सारी शिक्षाओं के प्रति सवाल उठेगा और आप हमसे उन सवालों के जवाब पूछने के लिए स्वतंत्र हैं, जिन्हें आपकी समझ के लिए बहुत स्पष्ट रूप से जवाब दिया जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(३) कुछ सामान्य प्रश्नों के उत्तर पहले से ही विभिन्न पृष्ठो में दिए गए हैं और उनमें से एक को उदाहरण और आपकी समझ के लिए इसके साथ भेजा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(४) ये सवाल और जवाब का उपदेश आपको दूसरों को देना होगा, ताकि आप और आपके श्रोता दोनों उस प्रक्रिया से लाभान्वित हों।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(५) यदि आप अपने परिवार और घर के बाहर दूसरों के पास नहीं जा सकते हैं, तो आप अपने परिवार के सदस्यों के बीच प्रचार का काम कर सकते हैं और इस बैठक में आपके अन्य दोस्त, पड़ोसी और रिश्तेदार भी शामिल &lt;br /&gt;
हो सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(६) इस बैठक को अपने घर या अपने घर के पास किसी अन्य उपयुक्त स्थान पर नियमित रूप से एक घंटे के लिए रखें और श्रद्धा और भक्ति के साथ “भगवद् -गीता” के भजन या श्लोक का जाप करें। यदि संभव हो तो भगवद् -गीता के पाठ के पूर्व और समाप्ति पर भगवान के पवित्र नाम का मंत्र जप किया जा सकता है जैसा कि नीचे उल्लेख किया गया है - हरे कृष्ण हरे कृष्ण कृष्ण कृष्ण हरे  हरे हरे राम हरे राम राम राम हरे हरे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(७) अब बैठक में उठने वाले प्रासंगिक प्रश्नों का उत्तर या तो प्रासंगिक रूप से दिया जा सकता है और “भगवद् -गीता” के अधिकार के अनुसार। लेकिन अगर यह कठिन पाया जाता है तो सवाल तुरंत हमारे पास भेजा जा सकता है और यह सभी संबंधितों की स्पष्ट समझ के लिए हमारे द्वारा बहुत अच्छी तरह से और स्पष्ट रूप से उत्तर दिया जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(८) कुछ श्रोता भी इस संघ के प्रचारक बनने में रुचि ले सकते हैं और हमें उसी तरह से इनका स्थानापन्न करते हुए विशेष खुशी होगी जिस तरह से हमें आपके साथ काम करने में होगी। हम सो रहे सदस्यों की तुलना में उपदेश देने वाले सदस्यों में अधिक रुचि रखते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उपदेश का आदर्श हमेशा जीवन के अंतिम लक्ष्य के लिए किया जाएगा। जीवन का अंतिम लक्ष्य परमभगवान के साथ हमारे खोए हुए संबंध को फिर से स्थापित करना है, जोकि पूर्ण निरपेक्ष हैं, और हम सभी जीव उनके अंश है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किसी न किसी तरह हम आदिकाल से परमभगवान के साथ अपने संबंध को भूल गए हैं और हमारे संबंध की विस्मृति के कारण, हम कई जीवनों से विभिन्न प्रजातियों के शरीर में घूम रहे हैं, जिनकी संख्या में ८४ लाख हैं। &lt;br /&gt;
मृत्यु के बाद एक शरीर से दूसरे में स्थानांतरित होने की यह प्रक्रिया जीव की बीमारी का एक __ है और इस मानव रूपी जीवन में इस रोग को प्रभावपूर्ण ढंग से ठीक करना संभव है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए जीवन के इस मानव रूप का मूल्य बहुत बड़ा है और इस जीवन का एक क्षण खो जाने का अर्थ है अपार मूल्य का नुकसान। इसलिए उस समय की उपेक्षा न करें जो आपको प्रकृति के नियमों द्वारा आवंटित किया गया है और इसका पूरी तरह से उपयोग करें - पशु जीवन के मामले में नहीं बल्कि मानव जीवन में। भोजन करना, सोना, भयभीत होना और इन्द्रियों की तृप्ति की प्रक्रिया हमारे जीवन के पशुता हिस्से की होती हैं, लेकिन मनुष्य के रूप में हमें अपने तिगुना दुखों के कारण की खोज करने के लिए और समय और अपव्यय के बिना के बिना इस जीवन में इसे सुधारने का विशेषाधिकार मिला है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्तों का संघ इस भावना में मानवता की सेवा करने के लिए खड़ी है और मानव व्यवहार के इस महान कार्य में उपदेशक सदस्य के सहयोग से संघ और उसके उपदेशक सदस्यों दोनों को लाभ होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मानवता के लिए जो सबसे अधिक लाभ संभव है, वह है जीवों की दिव्य चेतना प्राप्त करने के लिए उपदेश देने का यह कार्य। ऐसा करने से, हम न केवल एक जीव को घर वापस और वापस परमभगवान के पास भेजते हैं, बल्कि साथ ही हम खुद भी वापस परमभगवान के घर वापस जाते हैं। इस प्रचार कार्य के अवसर पर उठो और लोगों और विशेष रूप से अपने परिवार के सदस्यों के लिए एक वास्तविक उपकारी बनो।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[पृष्ठ अनुपस्थित]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
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		<title>HI/610320 - वैज्ञानिक अनुसंधान और सांस्कृतिक मामलों के मंत्रालय को लिखित पत्र, कटक</title>
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		<updated>2021-02-01T01:45:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिनांक : २०/०३ /१९६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रेषक : त्रिदंडी गोस्वामी अभय चरण भक्तिवेदांत स्वामी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
क्रमांक. १/८५९, केशी घाट, (वृंदावन)  मथुरा, उ. प्र.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राप्तकर्ता : &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सचिव,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैज्ञानिक अनुसंधान और सांस्कृतिक मंत्रालय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भारत सरकार,&lt;br /&gt;
नई दिल्ली&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमान,&lt;br /&gt;
मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि मेरा संन्यास आश्रम जीवन मानव आत्मा के सांस्कृतिक विज्ञान की शोध की सेवा में समर्पित है। मैं इस तरह से कई पुस्तकों का लेखक हूं और मेरी पुस्तिका &amp;quot;अन्य ग्रहों की सुगम यात्रा&amp;quot; पर दिल्ली विश्वविद्यालय के कुलपति डॉ. एन.के.सिद्धांत द्वारा प्रस्तावना की प्रति आपके अवलोकन के लिए भेज दिया है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैसे कि ९ मुझे १९६१ के मई महीने में जापान में आयोजित होने वाली द कल्चरिंग ह्यूमन स्पिरिट सम्मेलन के आयोजकों द्वारा आमंत्रित किया गया है। आपके संदर्भ के लिए बोना फाइड्स की प्रति भी भेजी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं एक संन्यासी हूं और मेरा जीवन का उद्देश जीवन के आध्यात्मिक दृष्टिकोण को विकसित करने के विचार को प्रचारित करना है जो अकेले मानव समाज की शांति और समृद्धि ला सकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं जापान में मानव आत्मा के संवर्धन सम्मेलन में अंतरराष्ट्रीय स्तर पर शामिल होने वाले उन प्रतिनिधियों को इस उद्देश्य के लिए एक अंतरराष्ट्रीय आंदोलन की आवश्यकता के बारे में दुनिया के सभी प्रबुद्ध लोगों के सहयोग के बारे में प्रभावित करना चाहता हूं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जापानी आयोजक मेरे खर्चों को पूरा करने के लिए सहमत हुए हैं जैसा कि आप इसे संलग्न कागजात से पाएंगे तथा इस सम्मेलन में भाग लेने के लिए बस मुझे जापान भेजने की मैं मदद मांग रहा हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपको इस संबंध में सूचित करना चाहता हूं कि निम्नलिखित सज्जन मुझे तथा साहित्यिक व्यवसाय में मेरी सांस्कृतिक गतिविधियों के बारे में अच्छी तरह से जानते हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
1. भारत के उपराष्ट्रपति डॉ.एस. राधाकृष्णन&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
2. डॉ. एच. के. महताब&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
3. भागीरथी महापात्र म.प्र&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे ९ मई १९६१ को या उससे पहले जापान (टोक्यो) पहुंचना चाहिए और मैं आपसे इस संबंध में सहायता और सुविधाएं देने का अनुरोध करूंगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके शीघ्र जवाब कि प्रतीक्षा है तथा प्रत्याशा में आपको धन्यवाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका आभारी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/580802_-_%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A4%AC%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%AC%E0%A5%89%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A5%87&amp;diff=542562</id>
		<title>HI/580802 - हरबंसलाल को लिखित पत्र, बॉम्बे</title>
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		<updated>2021-02-01T01:21:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र ज...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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[[File:580802_-_Letter_to_Harbanslal_2.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;हरबंसलाल को पत्र (पृष्ठ 2 of ?)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगस्त ०२, १९५८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय हरबंसलाल जी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि आप अब व्यवसाय के साथ-साथ सांस्कृतिक मिशन पर दौरे के लिए विदेश में गए हैं और मुझे आशा है कि आप अपने अच्छे स्वास्थ्य के साथ-साथ मछली पकड़ने के अनुभव का आनंद भी  ले रहे होंगे। हमारे पास पिछले 20 वर्षों से एक जर्मन व भारतीय अधिवासित मित्र थे, जो कई भाषाओं में  विद्वान है। वे कहते थे कि जर्मनी में, जहाँ भी कोई भारतीय और विशेष रूप से छात्र गए है, उन्हें अपने भारतीय सांस्कृतिक ज्ञान के अनुपात में अच्छी तरह से आदर व सत्कार के साथ अभिनंदित् किया गया है। जर्मनी और रूस में- विद्वानों और विचारकों को यह अच्छी तरह से पता है कि सांस्कृतिक ज्ञान के बारे में जानने के लिए, कोई भी अध्येता, उन भारतीयों से आगे नहीं निकल सकता है, जिनके पास आध्यात्मिक जांच में लगे सदियों का आधार है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 भारतीय विचार पद्धति के अनुसार, हर एक को सलाह दी जाती है कि वह न केवल मानव समाज का, बल्कि अन्य जीवों का उद्धार भी करे।  अन्य लोगों के गलत व्याख्या के विपरीत  भारतीय केवल गाय के उपासक न होकर , एक अति उतकृष्ट् भावना के अनुगत,  शिशुओं को दूध की आपूर्ति मात्र के लिए, गाय की कई प्रजातियों का आभार व्यक्त करते हुए उन्हें सात माताओं मे से एक का दर्जा देते हैं।  इसे भारतीय सांस्कृतिक मिशन कहते हैं।  हमें हर जीवित प्राणी को अपने भाई- बंधु के रूप में देखना चाहिए और उससे प्रेम का आदान- प्रदान करना चाहिए।  महात्मा गांधी का दर्शन -  &#039;सार्वभौमिक भाईचारे&#039; के इस अभिप्राय से शुरू हुआ था,जो केवल मानव प्रकार तक ही सीमित नहीं है बल्कि जीवन की सभी प्रजातियों के लिए है।  यही वास्तविक बुद्धिमत्ता का संकेत है।  भगवद-गीता में कहा गया है कि एक विद्वान  - एक शिक्षित ब्राह्मण को , जो शिक्षा के साथ अच्छा व्यवहार करता है और  एक चंडाल - जो कुत्तों को खाता है, दोनो को  सम्य दृष्टि से देखता है ।  और इस समान दृष्टि का उद्देश्य क्या है?  उद्देश्य यह है कि हमें हर एक जीव को सर्वोच्च ब्रह्म के  अंश  के रूप में देखना, नाकि उसके बाहरी पोशाक को, जो जन्म जन्मांतर बदलता रहता है।  मुझे आशा है कि आप इस भारतीय   परिप्रेक्ष्य का हर उस स्थान पर प्रचार करेंगे जहाँ पर  आपको अवसर मिलेगा।  मुझे लगता है  इस वक्त में ,जब परमाणु बम्ब सबके सर पर मंडरा रहा है, लोगों को इन भारतीय संदेशों की आवश्यकता है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 आप जानते हैं कि मैं &#039; लीग ऑफ डिवोटीस &#039;के साथ साथ कांग्रेस  के एक सांस्कृतिक मिशन से जुड़ा हुआ हूं -जो परोपकार के इस संदेश को व्यापक रूप से देने का प्रयास कर रहा है।  परोपकार का मानक ऐसा होना चाहिए जो वर्तमान जीवन के साथ-साथ मृत्यु के बाद के जीवन में भी उपयोगी हो।  हर समझदार आदमी इसी तरीके से परोपकार के बारे में विमर्श करता है।  अस्थायी इंद्र तृप्ति,  परोपकार नहीं है।  अतः कृपया कर इन प्राधिकृत परोपकारी गतिविधियों का निष्पादन -विदेश में शुरू करें क्योंकि आप वहां जा चुके हैं।  मुझे लगता है कि आपका वहाँ जाना __ भारतीय संस्कृति का उपर्युक्त उपदेश है।  मुझे पत्राचार द्वारा आपसे संपर्क रखने में खुशी होगी, ताकि मैं आपको इस सेवा के लिए अपना विनम्र सुझाव दे सकूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 साथ ही- मैं आपको सूचित करना चाहता हू कि मैं एक उपयुक्त आवासीय स्थान की चाह में बंबई में अपने दिन – काफ़ि कष्टपूर्वक तरीके से गुजार रहा हूं। इस संबंध में, श्रीमान, मैं आपको याद दिलना चाहता हूं की आपने मुझे   अपने कुछ फ्लैटों के ख़ाली होने के पश्चात, उनमे जगह देने का वादा किया था। मैं समझता हूं कि कुछ फ्लैट जल्द ही खाली होने वाले हैं और मेरा आपसे अनुरोध है कि मुझे एक खाली फ्लैट दे मेरे कष्टों का निवारं करे। एक ऐसा फ्लैट जिसमे कम _____&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[  पर्ची लापता ]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/610329_-_%E0%A4%A1%E0%A5%89%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%9F%E0%A4%B0_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A7%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=542561</id>
		<title>HI/610329 - डॉक्टर राधाकृष्णन को लिखित पत्र, दिल्ली</title>
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		<updated>2021-02-01T01:05:28Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिनांक : २९ मार्च, १९६१ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय डॉक्टर राधाकृष्णन, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने २४वें के आपके तत्काल पत्र और मामलों को नोट किया है और इसके साथ धन्यवाद स्वीकार करने की विनती करता हूं । मैं २६ वीं रात को कटक से वापस आ गया हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आप जानते हैं कि मैं एक संन्यासी हूं और मेरा बैंक से कोई संबंध नहीं है और न ही मैं वित्तपोषण संस्था से जुड़ा हुआ हूं। लेकिन जापानी आयोजकों ने मेरे साहित्य को पसंद किया है और वे चाहते हैं कि मैं वहां मौजूद रहूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो कांग्रेस जापान में सम्मेलन में होने जा रही है, वह इस बात पर है कि हमें मानव अध्यात्म को कैसे संवर्धित करना चाहिए। जबकि भारतीय नेता मानव शरीर के भौतिक निर्माण पर अधिक महत्व दे रहे हैं, अन्य देशों के प्रबुद्ध लोग मानव अध्यात्म के बारे में सोच रहे हैं। दूसरे देशों के लोग जिन्होंने पहले से ही भौतिकवाद की कड़वाहट का परीक्षण किया है, वह अब  इसके अलावा कुछ और मांग रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पहले के समय में  भारत के ऋषि-मुनियों मानव अध्यात्म पर एक विस्तृत तरीके से विकास किया है । श्रीपाद शंकराचार्य, रामानुजचार्य, मध्वाचार्य और बाद में श्री चैतन्य इन सभी ने दुनिया के सभी मनुष्य के कल्याण के लिए इस विषय को सबसे अधिक वैज्ञानिक रूप से पेश किया। इसलिए मुझे लगता है कि भारत सरकार ने उपर्युक्त आचार्यो के सभी प्रतिनिधियों को आत्मीयता का संदेश देने के लिए वहाँ भेजना चाहिए। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक ईश्वरविहीन सभ्यता (नास्तिक सभ्यता) शांति और समृद्धि नहीं ला सकती है और जब वे इसके बारे में चिंतित होते हैं तो हमें आवश्यक औषधि का प्रबंध करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए मैं इस सम्मेलन में जाने के लिए बहुत उत्सुक हूं, हालांकि मेरे पास वहां जाने का कोई साधन नहीं है। वे भी मुझे वहां बुलाने के लिए बहुत उत्सुक हैं और अगर मैं कहता हूं कि आर्थिक साधनों की चाह के लिए मैं इस सम्मेलन में शामिल नहीं होना चाहता, तो मुझे लगता है कि यह मेरे देश का अपमान होगा। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पूर्व में जमींदार और प्रधान ऐसे प्रयासों के लिए मदद प्रदान करते थे। लेकिन वे अब समाप्त हो चुके हैं। इन स्थितियों में ऐसे महान मिशन में हमारी यात्रा की व्यवस्था करना सरकार का कर्तव्य है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए मैं कामना करता हूं कि आप विशेष रूप से मेरे मामले की सिफारिश मंत्री हुमायूं कबीर को कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि यह पूरी तरह से असंभव है, तो व्यक्तिगत रूप से आप मुझे बिना किसी कठिनाई के वहां भेज सकते हैं। वे पहले से ही मेरे बोर्डिंग और रहने के लिए भुगतान करने के लिए सहमत हो गए हैं। मैं आपको यह भी सूचित कर सकता हूं कि अंतर्राष्ट्रीय कृषि विज्ञान सचिव ने पहले ही मेरे कुछ साहित्य प्रकाशित करने के लिए सहमति दे दी है। अगर आप कृपया किसी तरह मुझे वहां भेजते हैं, तो यह मेरे मिशन के लिए एक मौका होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका धन्यवाद।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सादर,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
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		<title>HI/570507 - श्री पदमपत सिंघानिया को लिखित पत्र, कानपुर</title>
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		<updated>2021-01-28T01:17:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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[[File:570507_-_Letter_to_Sri_Padampat_Singhania_3b.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;श्री पदमपत सिंघानिया को पत्र (पृष्ठage 3b of 5)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
[[File:570507_-_Letter_to_Sri_Padampat_Singhania_4.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;श्री पदमपत सिंघानिया को पत्र (पृष्ठ 4 of 5)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
[[File:570507_-_Letter_to_Sri_Padampat_Singhania_5.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;श्री पदमपत सिंघानिया को पत्र (पृष्ठ 5 of 5)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
07 मई, 1957                                                              &lt;br /&gt;
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 श्री पदमपत सिंघानिया,&lt;br /&gt;
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 कमला टॉवर,&lt;br /&gt;
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 कानपुर&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
 मेरे प्रिय श्री पद्मपत जी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 मेरे गत पत्र के सिलसिले में, जो मुझे आशा है की  इस समय तक आपके पास पहुँच चुका होगा , और दुनिया भर में  शक्तिशाली मंत्र के प्रसारण हेतु  -आपके अनुरोध के संदर्भ में, मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि प्रत्येक मंत्र में उपसर्ग - &#039;नमः&#039; को आम तौर पर जोड़ा जाता है।  उदाहरण के लिए -आपने उस  दिन नमः शिवाय कहा था। अब यह मंत्र, व्यावहारिक रूप से, भगवान शिव के पवित्र नाम की ओर संकेत देता है।  &#039;ना&#039; का अर्थ है नकारना और &#039;मा&#039; का अर्थ है मिथ्य अहंकार या अहंकार।  इसलिए नमः शिवाय का अर्थ है शिव नाम के प्रति आत्मसमर्पण।  उस शब्दों में- भगवान शिव के प्रभुत्ता  को स्वीकार करने का  वाक्यांश  है &#039;नमः शिवाय&#039;।  अतः ,निष्कर्ष यह है कि एक देवता के मंत्र में उस देवता का नाम स्वभाविक रूप से एकीकृत होता है ।  और इन मंत्रों में आध्यात्मिक शक्ति- नारद जैसे ऋषियों के द्वारा  अधिभारित की जाती है -जैसे तांबे को चुंबकीय बल द्वारा विद्युतीकृत किया जाता है।  व्युत्पत्ति संबंधी अक्षर इसी शैली से आध्यात्मिक शक्ति के साथ विकसित हो जाते है और इस तरह के सभी मंत्रों में भगवान या भगवत् तत्त्व  के पारमार्थिक पवित्र नाम को दर्शाया जाता है।  जब हम अधिकारियों द्वारा प्रस्तुत मंत्रों का जप करते हैं , तब यह प्रक्रिया ध्वनि तरंगों द्वारा देवत्व के व्यक्तित्व के साथ संचार सस्थापित करती है- जैसा कि हमने   भौतिक तरंगों के कंपन से बनी -भौतिक दुनिया  के साथ अनुभव किया है।  अगर सही प्रविधि के अनुसार इन मंत्रों का उच्चारण्ड  किया जाए, तब उनमे ऐसी शक्तियाँ प्रकट होती हैं।  और मंत्रों का जाप करने से ही संपूर्ण अस्तित्व का आध्यात्मिकरण होता है - उसी तरह जैसे किसी गोलाकार वस्तु में ऊष्मा का विस्तार।  मंत्र सिद्धि का अर्थ है पूर्ण मुक्ति।  इसलिए, भगवन के पवित्र नाम और मंत्र के बीच कोई अंतर नहीं है।  &#039;मन&#039; का अर्थ है मन और &#039;त्र&#039; का अर्थ है उद्धार।  जो मानसिक अटकलों से किसी को बचाता है उसे &amp;quot;मंत्र&amp;quot; कहा जाता है।  &amp;quot;मंत्र सिद्धि&amp;quot; का अर्थ -स्थूल और सूक्ष्म मानसिक स्थर के परेह जाना है।  वही अर्थ _______ के लिए है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खास इस युग में, भगवत तत्त्व  के स्तर  तक पहुंचाने के सभी मंत्र, हरि नाम पर केंद्रित हो चुके हैं।  इसलिए हम ब्राह्ननारदीय पुराणम (३८/१२६) में हरिनाम पर  एक विशेष बल पाते हैं जो इस प्रकार है:&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 हरेर्नाम हरेर्नाम हरेर्नामैव केवलं&lt;br /&gt;
कलौ नास्त्यैव नास्त्यैव नास्त्यैव गतिरन्यथा&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 उपरोक्त कथन निम्नलिखित तरीके से बहुत महत्वपूर्ण है: &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  ज्ञान प्राप्त करने के  दो अलग प्रक्रियाएं हैं।  एक वियोजक  है और दूसरा आगमनात्‍मक  है।  वियोजन के प्रक्रिया में हम उच्च अधिकारियों के कथन से निष्कर्ष निकालते हैं जबकि  आगमनात्‍मक के प्रक्रिया द्वारा हम  स्वयं के अपूर्ण ज्ञान द्वारा सत्य का अनुसंधान करते हैं और फ़िर निष्कर्ष निकालते हैं।  उदाहरण के लिए कहें कि यदि हम जानना चाहते हैं कि मनुष्य नश्वर कैसे है तो हमें दैनिक मृत्यु के आंकड़ों पर विश्लेषण करना होगा।  राम मर जाता है, स्याम मर जाता है, पिता मर जाते है, माँ मर जाती है, यह मर जाता है, वह मर जाता है, आदि,   ये सभी आकड़े हमें इस निष्कर्ष पर पहुंचाते है कि आखिरकार मनुष्य मर ही जाता है और इसलिए -&#039;सारे मनुष्य नश्वर है &#039;  ।  लेकिन ज्ञान की इस प्रक्रिया का दोष यह है कि यह हो सकता है कि हमने एक व्यक्ति को नहीं देखा हो, जो की हजारों वर्षों के बाद भी जीवित है।  जैसे ही हमें यह जानकारी मिलती है , वैसे ही पूर्व निष्कर्ष- एका एक  बदल जाता है और हमें यह कहना पड़ता है कि &#039;अधिकांश लोग नश्वर हैं&#039;।  इस तरह वैज्ञानिक चिंतन के अनुसंधान कार्यो में लगातार परिवर्तन हो रहे हैं क्योंकि यह कार्य उन व्यक्तियों द्वारा किया जा रहा है जो स्वयं -गलती, भ्रम, धोखा और असिद्धता के चार सिद्धांतों द्वारा प्रतिबंधित है।  इसलिए, वियोजन की प्रक्रिया अधिक प्रभावी है।  हमने वेदों जैसे आधिकारिक स्त्रोत्रों में  पढ़ा है की मनुष्य नश्वर है और हमने इसे स्वीकार किया है।  वेद कहते हैं कि मल अशुद्ध है लेकिन गाय का मल शुद्ध है।  वेद कहते है कि हड्डी अछूत है, लेकिन  शंख हड्डी होने के बावजूद भी पवित्र है।  आम आदमी के लिए वेदों के कथन विरोधाभासी प्रतीत होते होंगे।  लेकिन इस तरह के विरोधाभास के बावजूद, क्योंकि हम हिंदू वेदों को अधिकार के रूप में स्वीकार करते हैं, हम गोबर को शुद्ध मानते हैं और उसे रसोई में भी इस्तमाल करते हैं।  इसीलिए हम शंख को भी स्वीकारतें हैं।जबकी   शंख एक जानवर की  हड्डी  है, लेकिन क्योंकि यह वेदों द्वारा स्वीकार किया जाता है -हम शंख को हमारे घर के- पवित्र पूजा स्थली में रखते हैं।  यदि हम भौतिक प्रयोगशाला में जांच करते हैं या रासायनिक परीक्षण द्वारा इसका विश्लेषण करते हैं, तो हम एक आदमी के मल और गाय के मल या फिर  बैल की  हड्डी और एक शंख के बीच , कोई अंतर नहीं पाएंगे।  फिर भी पूरे हिंदू मुस्लिम टकराव , गांधी और जिन्ना के पूरे संघर्ष और UNSECO में कश्मीर समस्या का पूरा सवाल -केवल हड्डियों के इस छोटे अंतर से उत्पन्न हुआ है।  हिंदू मंदिरो में पहले से ही शंख रखा जाता है ,लेकिन जैसे ही एक मुहम्मदन ने एक मंदिर में बैल की हड्डी का टुकड़ा फेंका,वैसे ही पूरी मुसीबत शुरू हो गई, जिसका परिणाम- भारत और पाकिस्तान का विभाजन हुआ था। एक निष्पक्ष सांसारिक छात्र - भारतीय इतिहास के पन्नों  में इस तरह के  मामलों के अनुसंधान कार्य में प्रवेश करने पर ,  निश्चित रूप से वेदों या कुरान या उस बाइबिल के शब्दों के प्रति- अप्रतिबंधित आज्ञाकारिता को  जेहाद और धर्मयुद्ध के सभी प्रकार के उपद्रवो का मूल पाएगा। दुर्भागयवर्श, आधुनिक युग के तथाकथित बुद्धिमान व्यक्तियों ने  इन धार्मिक झगड़ों के पश्चात ,धर्मनिरपेक्षता का आश्रय ले लिया है।  यह एक और बक़वास   है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  अतः,वर्तमान युग में वियोजना के प्रक्रिया के लिए सम्मान घटता जा रहा है जबकि आगमनात्‍मक तरीकों के लिए सम्मान बढ़ता जा रहा है, हालांकि हम जानते हैं कि आगमनात्‍मक शोध कि प्रक्रिया सफल नहीं हुई है।  निष्कर्ष यह है कि हमने गुरु से चेला या पिता से पुत्र को सौंपे  वैदिक ज्ञान में अपना विश्वास खो दिया है, हालांकि प्राधिकरण से इस तरह वियोजित ज्ञान प्राप्त करने का तंत्र, ज्ञान के सिद्धता का परिरक्षण निश्चित करता है।  परम सत्य जो हमारी अपूर्ण इंद्रियों की पहुंच से परेह है, इस तरह के आगमनात्‍मक  शोध कार्य से कभी भी नहीं जाना जा सकता है।  अपूर्ण इन्द्रियां भौतिक तत्वों के उत्पाद सूर्य या असंख्य सितारों की दूरी को भी  नहीं माप सकती हैं- तो क्या ऐसी अपूर्ण इंद्रियां मंत्रों में  शोध कर सकती हैं जो की विशुद्ध रूप से आध्यात्मिक मामले है । हमें  वैदिक स्रोत से मंत्रों और शक्ति को स्वीकार करना होगा और सत्य की वास्तविकता तक पहुंचने के लिए केवल अभ्यास और सिद्धांतों का पालन करना होगा।  अपूर्ण इंद्रियों द्वारा अनुसंधान कार्य ,व्यावहारिक रूप से स्थापित सत्य के प्रति  विद्रोह है।  इसलिए हम बृहन्नारदीय पुराणम के वैदिक निषेध को स्वीकार करते हैं। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैंने अपने गत पत्र में इस मंत्र के बारे में उल्लेख कर दिया था और मैं इस बात की पुष्टि करने हेतु निवेदन करता हूँ  कि अगर अल्लाह जैसे विदेशी शब्द भी  उस सर्वोच्च व्यक्तित्व  &amp;quot; कृष्ण &amp;quot; के उद्देश्य से हैं, तो वे  शब्द भी स्वयं भगवान के  भाँति तीव्र व सशक्त  हैं- क्योंकि पूर्ण क्षेत्र अतः, आध्यात्मिक प्रकृति में सब कुछ अभिन्न है क्योंकि वहाँ सब कुछ गुणात्मक रूप से आध्यात्मिक हैं और इसलिए शुद्ध, शाश्वत, मुक्त और परिपूर्ण हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सभी व्यावहारिक उद्देश्यों के लिए यदि हम व्यवस्थित रूप से ईश्वर के पवित्र नाम का जाप करने का उपदेश देते हैं, मुझे लगता है कि कोई भी धार्मिक कट्टरपंथी इस पर आपत्ति नही करेगी।  प्रत्येक मनुष्य में परम सत्य का बोध होता है।  वे सभी धारणाएँ कुछ ठोस आकार में प्रस्तुत किए  जातें हैं ।   इसलिए , यदि मुसल्मान या ईसाई लोग -&amp;quot; राम&amp;quot; और &amp;quot;कृष्ण&amp;quot; के नाम का जाप करने से इनकार करते हैं, तो हम उनसे अल्लाह या भगवान के नाम का जाप करने को कह सकते हैं ।  अतेव , मुझे नही लगता है की भगवान के नाम का  व्यवस्थित तरीके से जप करने में बौद्धो को भी कोई आपत्ति होगी। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 व्यवस्थित तरीके से जप की प्रक्रिया में, दस अलग-अलग अपराधों से बचना पड़ता है, जो की वास्तविकता में दार्शनिक सत्य हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 यदि  भगवान के नाम को इस व्यवस्थित ढंग से जपने से ईर्ष्या, उच्छृंखलता, स्वार्थ, झूठ और आधुनिक युग के गंदे माहौल से बचा जा सकता है, और अगर इस तरह के जप से आत्म-साक्षात्कार की पूरी प्रक्रिया को प्राप्त किया जा सकता है, तो क्या इस सेवा को संयुक्त बल द्वारा पूर्ण करना हमारा कर्तव्य नहीं है ? क्लेश कलाप के इस युग में सफलता हासिल करने के लिए सब कुछ संयुक्त बल से करना जज़रूरी है।  बड़े उद्योगों के समूह के प्रमुख के रूप में, आप मुझसे बेहतर जानते है कि संयुक्त बल और विविध ऊर्जाएं किस प्रकार एक उद्योग को सफल बनाती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 उसी तरह हमें आध्यात्मिक आंदोलन को एक शानदार सफलता बनाने के लिए आदमी, धन, बुद्धि और क्षेत्र कृति जैसे  समाजशास्त्र के विभिन्न बलों को जोड़ना होगा।  यदि हम ऐसा नहीं करते हैं तो हम पूर्ण प्रयोजन हेतु अपने कर्तव्य में असफल रहेंगे।  कोई भी आंशिक सेवा या अस्थायी लाभ हमें पूर्णता की ओर नहीं ले जा सकता है।  इस तरह के अस्थायी लाभ और आंशिक सेवा के पीछे, पूरी दुनिया पागल है और यह हमारा कर्तव्य है कि हम एक अधिकृत आध्यात्मिक आंदोलन द्वारा पूरी तरह से विश्व के चेहरे को बदल दें।  दूसरे दिन  आपके विचारों को सुनकर मैं  बहुत खुश हुआ था और मेरी आशा है की हमारे अगली मुलाकात में  इस विषय पर अपनी अनुभूतियों को प्रस्तुत करूँगा।  आशा है कि आप अच्छे होंगे।  मेरी शुभकामनाओं सहित।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 सादर,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 गोस्वामी अभय चरण भक्तिवेदांत&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
( संपादक- “बैक टू गॉडहेड&amp;quot;)&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
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		<title>HI/640412 - मंगलानंद गौतम को लिखित पत्र, दिल्ली</title>
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		<updated>2021-01-28T01:02:45Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र ज...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१२ अप्रैल, १९६४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री मंगलानंद गौतम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जामा मस्जिद डिस्पेंसरी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली -६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्यारे गौतमजी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दूसरे दिन जब आप अपनी पत्नी के साथ मेरे पास आए, तो आपने कहा कि ऑर्डर बुक और रसीद बुक आपके द्वारा वापस कर दी जाएगी। लेकिन तब से आपने मुझे नहीं देखा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया ऑर्डर बुक और वाहक और उपप्रदाय के लिए रसीद बुक वापस करें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सादर,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/640229_-_%E0%A4%AE%E0%A4%82%E0%A4%97%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=539982</id>
		<title>HI/640229 - मंगलानंद गौतम को लिखित पत्र, दिल्ली</title>
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२९ फरवरी, १९६४&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री मंगला नंद गौतम&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संपादक रास्ट्रपति&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जामा मस्जिद औषधालय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
दिल्ली -६&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके तारीख के पत्र के संदर्भ में कृपया निम्नलिखित पुस्तकें बिक्री  या वापसी के आधार पर वापस करे। कृपया आर्डर पुस्तिका भी प्राप्त करें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
५ प्रतियां श्रीमद-भागवतम वॉल्यूम १ की बिक्री मूल्य रु १६/ -&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(लौटने योग्य यदि एक सप्ताह के भीतर बेचा नहीं जाता है)&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१ कॉपी ऑर्डर बुक नंबर २३ से १० सी&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
 &lt;br /&gt;
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/620601_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%AA%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8&amp;diff=539901</id>
		<title>HI/620601 - श्री पुरी को लिखित पत्र, वृंदावन</title>
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		<updated>2021-01-27T01:12:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र ज...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
०१ जून, १९६२&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय श्री पुरी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कल शाम मैं एक उड़ान यात्रा के लिए वृंदावन आया हूं और मंगलवार ५/६/६२ की सुबह जेल बैठक में भाग लेने के लिए ४/६/६२ को दिल्ली लौटूंगा। मुझे यह देखकर खुशी हुई कि मेरे गुरुवार के व्याख्यान से युवा अपराधियों के मन में कुछ बदलाव आए हैं। यदि व्याख्यान जारी रहे तो मुझे यकीन है कि इन अपराधियों को संत चरित्र में बदल दिया जाएगा। मेरे द्वारा अपनाया गया साधन आध्यात्मिक है और यह किसी भी भौतिक साधन की तुलना में जल्दी काम करता है। यदि आप मुझे जेल के सभी सदस्यों से बात करने का मौका देते हैं, तो मेरे लिए उन्हें आदर्श पात्र में बदलना संभव है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मंगलवार को मेरे अगले व्याख्यान में ५/६/६२ की सुबह, मैं आपसे अनुरोध करुंगा कि आप भी उपस्थित रहें और व्यक्तिगत रूप से देखें कि दिव्य  दवा उन पर किस तरह कार्य कर रही है।  मैं सिर्फ आध्यात्मिक पद्धति को  किसी अन्य भौतिक उपचार के अधिकाधिक प्रभाव की तरह  व्यावहारिक बनाने की कोशिश कर रहा हूं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[पृष्ठ अनुपस्थित]&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/611105_-_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A5_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5_%E0%A4%B0%E0%A5%89%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=539900</id>
		<title>HI/611105 - प्रमथ नाथ रॉय को लिखित पत्र, दिल्ली</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/611105_-_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AE%E0%A4%A5_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%A5_%E0%A4%B0%E0%A5%89%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=539900"/>
		<updated>2021-01-27T01:03:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
०५ नवंबर, १९६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री प्रमथ नाथ रॉय&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१४० / ए राजा दिनुस्टा स्ट्रीट&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कलकत्ता -४&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री चैतन्य चरण दास बाबाजी महाराज के पहले तिरोभावदिवस समारोह होने के अवसर पर तीन रूपों की किताब में छपवाने के लिए श्री चैतन्य महाप्रभु की पांडुलिपि सौंपी गई।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि नहीं छपा है तो पंजीकृत डाक के द्वारा दिल्ली वापस भेजा जाए ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अगर छपी तो वह मुझे यहां वितरण के लिए कम से कम १०० प्रतियां भेजे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/610420_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8B_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=539899</id>
		<title>HI/610420 - श्री नाकानो को लिखित पत्र, दिल्ली</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/610420_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%8B_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=539899"/>
		<updated>2021-01-27T00:56:04Z</updated>

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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
२० अप्रैल, १९६१&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय श्री नैकानो,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे रजिस्टर्ड पत्र की संदर्भ में १८ वाँ तत्काल के पत्र में, मैं आपको सूचित करना चाहता हूँ कि २०/४/६१ को मुझे सरकार से जवाब मिला है जो इस प्रकार है। &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसलिए मैंने आपको आज निम्नलिखित केबल भेजा है जिसमें मैं इसके साथ पुष्टि करने के लिए विनती करता हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैसा कि आपने मेरे लिए एक गहरा प्यार विकसित किया है, मैं आपको जापान ले जाने के लिए मुझे वित्तीय सहायता भेजने के लिए कहने की हिम्मत करता हूं। मुझे लगता है कि आप तुरंत दिल्ली में अपने दूतावास को निर्देश दे सकते हैं कि ज़रुरी करवाई और अपनी ओर से मुझे जापान भेज दें। मैं आपसे और कांग्रेस से मिलने के लिए बहुत ज्यादा उत्सुक महसूस कर रहा हूं ताकि हम आध्यात्मिक साधना के लिए एक ठोस संस्थान का निर्माण कर सकें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं अपने कार्यक्रमों को ठीक करने के लिए केबल द्वारा आपके निर्देश का इंतजार करूंगा।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/551213_-_%E0%A4%86%E0%A4%B0_%E0%A4%8F%E0%A4%A8_%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%8F%E0%A4%AE%E0%A4%8F_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=539898</id>
		<title>HI/551213 - आर एन अग्रवाल एमए को लिखित पत्र, दिल्ली</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/551213_-_%E0%A4%86%E0%A4%B0_%E0%A4%8F%E0%A4%A8_%E0%A4%85%E0%A4%97%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%8F%E0%A4%AE%E0%A4%8F_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%80&amp;diff=539898"/>
		<updated>2021-01-27T00:44:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
१३ दिसंबर, १९५५&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्री आर.एन. अग्रवाल एम.ए.&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
राष्ट्रपति डी.एम. समिति।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
टाउन हॉल, दिल्ली।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय श्री,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पुन: आपके सचिव का पत्र क्रमांक डी.ओ.८०७ / पी.टी. भक्तों का संघ: डी/ २२/११/५५&lt;br /&gt;
उपरोक्त और आपके साथ मेरे बाद के साक्षात्कार के संदर्भ में, मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि अब उद्देश्य और वस्तुओं पर चर्चा करने के लिए शहर में उपरोक्त संघ की प्रारंभिक बैठक आयोजित करने का निर्णय लिया गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
खुद मैं , लाला, गिरधारी लाल और, एडवोकेट बिपिनचंद्र मिश्रा, तीन संयोजक होंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं आपसे अनुरोध करता हूं कि आप इस बैठक की अध्यक्षता करें और मुझे अपनी सुविधानुसार कुछ समय दें, ताकि बैठक को उसी के अनुसार व्यवस्थित किया जा सके।&lt;br /&gt;
इस बैठक में आपकी समिति के सभी सदस्य उपस्थित होंगे। पुरानी दिल्ली के अन्य सम्मानित निवासियों को भी इसे शुरू करने के लिए आमंत्रित किया जाएगा।&lt;br /&gt;
मुझे उम्मीद है कि आप कृपया इसे स्वीकार करेंगे और मुझे अपना निर्णय बताएंगे, ताकि आगे की व्यवस्था हो सके।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका आभारी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.सी.भक्तिवेदांत&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/580728_-_%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%AC%E0%A5%89%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A5%87&amp;diff=539894</id>
		<title>HI/580728 - वेद प्रकाश को लिखित पत्र, बॉम्बे</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/580728_-_%E0%A4%B5%E0%A5%87%E0%A4%A6_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%AC%E0%A5%89%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A5%87&amp;diff=539894"/>
		<updated>2021-01-27T00:28:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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[[File:580728_-_Letter_to_Ved_Prakash_2a.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;वेद प्रकाश को पत्र (Page 2a of 2)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
[[File:580728_-_Letter_to_Ved_Prakash_2b.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;वेद प्रकाश को पत्र (Page 2b of 2)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बॉम्बे कार्यालय &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
९३, नारायण दनोरु मार्ग &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बॉम्बे- ३ &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
  २८/७/५८&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय वेद प्रकाश जी,   &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछले दिन हुए भेंटवार्ता के आधार पर ,मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि हमारे मतभेदों का कारण इस तथ्य पर आधारित है कि विदेशों में हमारी आध्यात्मिक संस्कृति के प्रचार के मामले में आपकी अपनी राय है पर जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं एक श्रेष्ठ अधिकारी और मुक्त व्यक्ति के आदेश द्वारा संचालित हूं । मेरे आध्यात्मिक गुरु ॐ विष्णुपद श्री श्री भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराजा इसे चाहते थे और मै बस बिना किसी व्यक्तिगत सनक के उनकी सेवा करना चाह रहा हूँ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यदि आपने मेरा संयोग दिया होता , तो आपको भी  श्री गुरु के प्रसन्नता हेतु सेवा का अवसर प्राप्त हुआ होता, जो की भगवान के एक आभयंतर प्रतिनिधि है। ईसा मसी जैसे विश्व प्रचारकों के प्रति आपका सम्मान देख - मैं अत्यंत हर्षित हुआ और मै आपमें स्पष्ट रूप से पीड़ित मनुष्य के प्रति सच्चा सेवाभाव देख रहा हूँ।यह आपके लिए एक मौका है और यदि आप चाहें तो इस अवसर का उपयोग अपने और अन्य सभी  के लाभ के लिए उठा सकते है। यह सब काल्पनिक  व आत्म अनुपालन नही है  , सिर्फ़  प्रत्युत तथ्य है । आपके शुध शादर्श को देख  मैने मैंने यह प्रस्ताव आपके समक्ष  रखा था, परंतु अगर आप इंकार करते  हैं, तो मैं कर भी क्या सकता हूँ  ?  स्वयं श्री कृष्ण भगवान भी किसी को विवश नही कर सकते क्योंकि उन्हों ने ही हर जीव को स्वावलंबन प्रदान किया  है। इस मनुष्य देह के अस्थायी होने के बावजूद , इसे  अति उत्कृष्ट तरीक़ों से भगवान की सेवा में लगाया जा सकता है। वह उच्चतम तत्व सब कुछ है, परंतु सब कुछ वह  उच्चतम तत्व नहीं है  । पेट सभी अंगों के लिए खाद्य पदार्थों को पचा सकता है लेकिन शरीर के सभी अंग पेट नहीं हैं।  इस अचिन्त्य भेदाभेद तत्त्व  का प्रचार ,  श्री चैतन्य महाप्रभु ने विश्व के  कल्याण के लिए किया था। इस तत्व के व्यवहारिक प्रचार की ज़िमेद्दारि हमारे कंधों पर है।  अपनी मनमर्जी से इस  तत्व पर विवेचन करना असंभव है। यह एक विज्ञान है जिसे प्रमाणिक सूत्रों से ही समझा जा सकता है। श्री कृष्ण भगवान का शरीर, मानव शरीर के भाँति मास और मज्जे से युक्त नही है और न ही उनकी लीलाएं किसी भी संसारीक्  विद्वान के विवेचन के लिए  हैं। इन सब को समझने के लिए एक  शैली है जो जब तक हमारे पास नहीं होगी, तब तक हमारी ऊर्जा किसी भी आम आदमी के पाखंड में व्यर्थ होती रहेगी। मेरा आपसे इसके बारे में कुछ कहने का मन था लेकिन आपने मेरे सहयोग का खंडन किया है और अब मुझे इसके बारे में कुछ कहने को नहीं है।  मुझे आशा है कि आप अपने अवकाश के समय में इस पर विचार करेंगे और उपकृत करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्यवाद&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका निष्ठापूर्वक, &lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.  सी.  भक्तिवेदांत  स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/530707_-_%E0%A4%8F.%E0%A4%AC%E0%A5%80._%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE,_%E0%A4%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=539637</id>
		<title>HI/530707 - ए.बी. पत्रिका, इलाहाबाद में प्रकाशित पत्र</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/530707_-_%E0%A4%8F.%E0%A4%AC%E0%A5%80._%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE,_%E0%A4%87%E0%A4%B2%E0%A4%BE%E0%A4%B9%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%95%E0%A4%BE%E0%A4%B6%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0&amp;diff=539637"/>
		<updated>2021-01-25T01:14:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - भारत, इलाहाबाद]]&lt;br /&gt;
[[Category:Letters to Media]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रीला प्रभुपाद के पत्र - मूल लिखावट के स्कैन सहित‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎]]&lt;br /&gt;
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[[Category:श्रील प्रभुपाद के पत्र - गुम पृष्ठ या पाठ]]&lt;br /&gt;
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[[File:530707_-_Letter_published_in_the_A.B._Patrika.JPG|608px|thumb|left|&amp;lt;div class=&amp;quot;center&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;ए.बी. पत्रिका में प्रकाशित पत्र (Partial Page 1 of ?)&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जुलाई  ०७, १९५३&lt;br /&gt;
( ए.बी. पत्रिका के &amp;quot;हिंदू मिशनरी&amp;quot; शीर्षक के तहत इलाहाबाद में ०७/०७/१९५६ को छपे पत्र की सच्ची प्रतिलिपि )&lt;br /&gt;
श्रीमान-  तत्कालित  कॉलम २ में प्रकाशित श्री सतीश अस्थाना के पत्र के संदर्भ में, मुझे आपके सम्मानित पेपर के माध्यम से सभी संबंधितों को सूचित करने का सम्मान है कि मिशनरी गतिविधियों के लिए एक संघ नाम और शैली &amp;quot;भक्तों की लीग&amp;quot; के तहत हाल ही में श्री अस्थाना और श्री सीताराम द्वारा सुझाए गए उद्देश्य और वस्तुओं के साथ स्थापित किया गया है।&lt;br /&gt;
उपरोक्त लीग का पंजीकृत कार्यालय झाँसी के सिपरी रोड स्थित विशाल भवन &amp;quot;भारती भवन&amp;quot; में स्थित है। ऐसी सांस्कृतिक गतिविधियों में रुचि रखने वाले सज्जन संस्था के विवरण के साथ मिशन के प्रोस्पेक्टस (हिंदी में या अंग्रेजी में) को संस्थापक सचिव से पूछ सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यह मामला इतना महत्वपूर्ण है कि इसे केवल साधुओं और संन्यासियों द्वारा प्रबंधित करने के लिए (अब) स्थित नहीं किया जा सकता है, लेकिन सभी जिम्मेदार पुरुषों द्वारा इसका ध्यान रखा जाना चाहिए।&lt;br /&gt;
&amp;quot;हिंदू&amp;quot; शब्द भारत की आध्यात्मिक या सांस्कृतिक अवधारणा के अनुसार कुछ हद तक विदेशी है। इस उद्देश्य के लिए प्रयुक्त सटीक शब्द &amp;quot;सनातनम&amp;quot; या शाश्वत है। श्री &amp;quot;भगवद-गीता&amp;quot; हमें यह संदेश देती है कि &amp;quot;सनातन&amp;quot; धर्म केवल &amp;quot;हिंदुओं,&amp;quot; भारतीयों या सभी मानवता के लिए ही नहीं बल्कि पृथ्वी पर सभी जीवित प्राणियों के लिए भी है।&lt;br /&gt;
यह व्याख्या करना गलत है कि वैदिक धर्म( जिसे आमतौर पर &amp;quot;हिंदू धर्म&amp;quot; के रूप में जाना जाता है | ) धर्मांतरण नहीं है। &amp;quot;भगवद-गीता&amp;quot; के अनुसार धर्मांतरण विधि पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान श्रीकृष्ण की  पारलौकिक सेवा की ओर सभी संसारिको का मुंह मोड़ना है, जो प्रक्रिया केवल उन्हें (सांसारिको) को भूतकाल ,  वर्तमान और भविष्य की सभी विपत्तियों से बचा सकती है|&lt;br /&gt;
वर्तमान नास्तिक  सभ्यता को  धर्मिक सभ्यता में परिवर्तित करना है और  इस उद्देश्य के लिए सभी मिशनरी (हिंदू या गैर-हिंदू) जिनके पास वैज्ञानिक धर्मांतरण विधि के संबंध हैं, वे इस &amp;quot;भक्तों की लीग&amp;quot; में शामिल हो सकते हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
( पन्ना  लापता )&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/580728_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%AC%E0%A4%A8%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%9C%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%AC%E0%A5%89%E0%A4%AE%E0%A5%8D%E0%A4%AC%E0%A5%87&amp;diff=539635</id>
		<title>HI/580728 - श्री बनर्जी को लिखित पत्र, बॉम्बे</title>
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		<updated>2021-01-25T00:48:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Sahil: Created page with &amp;quot;Category:HI/1947 से 1964 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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बॉम्बे कार्यालय &lt;br /&gt;
९३, नारायण दनोरु मार्ग &lt;br /&gt;
बॉम्बे- ३ &lt;br /&gt;
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  २८/७/५८&lt;br /&gt;
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मेरे प्रिय वेद प्रकाश जी,   &lt;br /&gt;
पिछले दिन हुए भेंटवार्ता के आधार पर ,मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि हमारे मतभेदों का कारण इस तथ्य पर आधारित है कि विदेशों में हमारी आध्यात्मिक संस्कृति के प्रचार के मामले में आपकी अपनी राय है पर जहाँ तक मेरा सवाल है, मैं एक श्रेष्ठ अधिकारी और मुक्त व्यक्ति के आदेश द्वारा संचालित हूं । मेरे आध्यात्मिक गुरु ॐ विष्णुपद श्री श्री भक्तिसिद्धान्त सरस्वती गोस्वामी महाराजा इसे चाहते थे और मै बस बिना किसी व्यक्तिगत सनक के उनकी सेवा करना चाह रहा हूँ।&lt;br /&gt;
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यदि आपने मेरा संयोग दिया होता , तो आपको भी  श्री गुरु के प्रसन्नता हेतु सेवा का अवसर प्राप्त हुआ होता, जो की भगवान के एक आभयंतर प्रतिनिधि है। ईसा मसी जैसे विश्व प्रचारकों के प्रति आपका सम्मान देख - मैं अत्यंत हर्षित हुआ और मै आपमें स्पष्ट रूप से पीड़ित मनुष्य के प्रति सच्चा सेवाभाव देख रहा हूँ।यह आपके लिए एक मौका है और यदि आप चाहें तो इस अवसर का उपयोग अपने और अन्य सभी  के लाभ के लिए उठा सकते है। यह सब काल्पनिक  व आत्म अनुपालन नही है  , सिर्फ़  प्रत्युत तथ्य है । आपके शुध शादर्श को देख  मैने मैंने यह प्रस्ताव आपके समक्ष  रखा था, परंतु अगर आप इंकार करते  हैं, तो मैं कर भी क्या सकता हूँ  ?  स्वयं श्री कृष्ण भगवान भी किसी को विवश नही कर सकते क्योंकि उन्हों ने ही हर जीव को स्वावलंबन प्रदान किया  है। इस मनुष्य देह के अस्थायी होने के बावजूद , इसे  अति उत्कृष्ट तरीक़ों से भगवान की सेवा में लगाया जा सकता है। वह उच्चतम तत्व सब कुछ है, परंतु सब कुछ वह  उच्चतम तत्व नहीं है  । पेट सभी अंगों के लिए खाद्य पदार्थों को पचा सकता है लेकिन शरीर के सभी अंग पेट नहीं हैं।  इस अचिन्त्य भेदाभेद तत्त्व  का प्रचार ,  श्री चैतन्य महाप्रभु ने विश्व के  कल्याण के लिए किया था। इस तत्व के व्यवहारिक प्रचार की ज़िमेद्दारि हमारे कंधों पर है।  अपनी मनमर्जी से इस  तत्व पर विवेचन करना असंभव है। यह एक विज्ञान है जिसे प्रमाणिक सूत्रों से ही समझा जा सकता है। श्री कृष्ण भगवान का शरीर, मानव शरीर के भाँति मास और मज्जे से युक्त नही है और न ही उनकी लीलाएं किसी भी संसारीक्  विद्वान के विवेचन के लिए  हैं। इन सब को समझने के लिए एक  शैली है जो जब तक हमारे पास नहीं होगी, तब तक हमारी ऊर्जा किसी भी आम आदमी के पाखंड में व्यर्थ होती रहेगी। मेरा आपसे इसके बारे में कुछ कहने का मन था लेकिन आपने मेरे सहयोग का खंडन किया है और अब मुझे इसके बारे में कुछ कहने को नहीं है।  मुझे आशा है कि आप अपने अवकाश के समय में इस पर विचार करेंगे और उपकृत करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धन्यवाद&lt;br /&gt;
आपका निष्ठापूर्वक, &lt;br /&gt;
ए.  सी.  भक्तिवेदांत  स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Sahil</name></author>
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