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	<title>Vanipedia - User contributions [en]</title>
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		<title>HI/BG पृष्ठभूमि</title>
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		<updated>2021-02-14T10:08:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Created page with &amp;quot;1A &amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&amp;#039;&amp;#039;&amp;#039;Hindi - श्रीमद्‍ भगवद...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यद्यपि भगवद्गीता का व्यापक प्रकाशन और पठन होता रहा है, किन्तु मूलतः यह संस्कृत महाकाव्य महाभारत की एक उपकथा के रूप में प्राप्त है | महाभारत में वर्तमान कलियुग तक की घटनाओं का विवरण मिलता है | इसी युग के प्रारम्भ में आज से लगभग ५,००० वर्ष पूर्व भगवान् श्रीकृष्ण ने अपने मित्र तथा भक्त अर्जुन को भगवद्गीता का उपदेश दिया था |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
उनकी यह वार्ता, जोमानव इतिहास की सबसे महान दार्शनिक तथा धार्मिक वार्ताओं में से एक है, उस महायुद्ध के शुभारम्भ के पूर्व हुई, जो धृतराष्ट्र के सौ पुत्रों तथा उनके चचेरे भाई पाण्डवों के मध्य होने वाला भ्रातृघातक संघर्ष था |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
धृतराष्ट्र तथा पाण्डु भाई-भाई थे जिनका जन्म कुरुवंश में हुआ था और वे राजा भरत के वंशज थे, जिनके नाम पर ही महाभारत नाम पड़ा | चूँकि बड़ा भाई धृतराष्ट्र जन्म से अंधा था, अतेव राजसिंहासन उसे न मिलकर छोटे भाई पाण्डु कोमिला|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
तथापि धृतराष्ट्र के पुत्र, विशेषतः सबसे बड़ा पुत्र दुर्योधन पाण्डवों से घृणा और ईर्ष्या करता था | अन्धा तथा दुर्बलहृदय धृतराष्ट्र पाण्डुपुत्रों के स्थान पर अपने पुत्रों को राज्य का उत्तराधिकारी बनाना चाहता था | इस तरह धृतराष्ट्र की सहमति से दुर्योधन ने पाण्डु के युवा पुत्रों की हत्या करने का षड्यन्त्र रचा| पाँचों पाण्डव अपने चाचा विदुर तथा अपने ममेरे भाई भगवान् कृष्ण के संरक्षण में रहने के कारण अनेक प्राणघातक आक्रमणों के बाद भी अपने प्राणों को सुरक्षित रख पाये |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान् कृष्ण कोई सामान्य व्यक्ति नहीं, अपितु ईश्र्वर हैं जिन्होंने इस धराधाम में अवतार लिया था और अब एक समकालीन राजकुमार होने का अभिनय कर रहे थे | वे पाण्डु की पत्नी कुन्ती या पृथा, पाण्डवों की माता के भतीजे थे | इस तरह सम्बन्धी के रूप में तथा धर्म के शाश्र्वत पालक होने के कारण वे धर्मपरायण पाण्डुपुत्रों का पक्ष लेते रहे और उनकी रक्षा करते रहे |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु अन्ततः चतुर दुर्योधन ने पाण्डवों को जुआ खेलने के लिए ललकारा | उस निर्णायक स्पर्धा में दुर्योधन तथा उसके भाइयों ने पाण्डवों की सती पत्नी द्रौपदी पर अधिकार प्राप्त क्र लिया और फिर उसे राजाओं तथा राजकुमारों की सभा के मध्य निर्वस्त्र करने का प्रयास किया | कृष्ण के दिव्य हस्तक्षेप से उसकी रक्षा हो सकी | उस द्यूतक्रीड़ा में छल के प्रयोग के कारण पाण्डव हार गए ततः उन्हें अपने राज्य से वंचित होना पड़ा और तेरह वर्ष तक वनवास के लिए जाना पड़ा |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वनवास से लौटकर पाण्डवों ने धर्मसम्मत रूप से दुर्योधन से अपना राज्य माँगा, किन्तु उसने देने से इनकार कर दिया | क्षत्रियों के शास्त्रोनुमोदित कर्त्तव्य को पूर्ण करने के लिए पाँचों पाण्डवों ने अन्त में अपना पूरा राज्य नमाँगकर केवल पाँच गाँवों की माँग राखी, किन्तु दुर्योधन सुई की नोक भर भी भूमि देने के लिए सहमत नहीं हुआ |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अभी तक तो पाण्डव सहनशील बने रहे, लेकिन अब उनके लिए युद्ध करना अवश्यम्भावी हो गया |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विश्र्वभर के राजकुमारों में से कुछ धृतराष्ट्र के पुत्रों के पक्ष में थे, तो कुछ पाण्डवों के पक्षमें | उस समय कृष्ण स्वयं पाण्डवों के संदेशवाहक बनकर शान्ति का सन्देश लेकर धृतराष्ट्र की राजसभा में गये| जब उनकी याचना अस्वीकृतहो गई, तो युद्ध निश्चित था |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत्यन्त सच्चरित्र पाँचों पाण्डवों ने कृष्ण को पूर्ण पुरुषोत्तम भगवान् के रूप में स्वीकार क्र लिया था, किन्तु धृतराष्ट्र के दुष्ट पुत्र उन्हें नहीं समझ पाये थे | तथापि कृष्ण ने विपक्षियों की इच्छानुसार ही युद्ध में सम्मिलित होनेका प्रस्ताव रखा | ईश्र्वर के रूप में वे युद्ध नहीं करना चाहते थे, किन्तु जो भी उनकी सेना का उपयोग करना चाहे, कर सकता था | प्रतिबन्ध यह था कि एक ओर कृष्ण की सम्पूर्ण सेना होगी तथा दूसरी ओर वे स्वयं – एक परामर्शदाता तथा सहायक के रूप में उपस्थित रहेंगे| राजनीति के कुशल दुर्योधन ने आतुरता से कृष्ण की सेना झपट ली, जबकि पाण्डवों ने कृष्ण को उतनी ही आतुरता से ग्रहण किया |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार कृष्ण अर्जुन के सारथी अबने और उन्होंने उस सुप्रसिद्ध धनुर्धर का रथ हाँकना स्वीकार किया | इस तरह हम उस बिन्दु तक पहुँच जाते हैं जहाँ सेभगवद्गीताका शुभारम्भ होता है – दोनों ओर से सेनाएँ युद्ध के लिए तैयार खड़ी हैं और धृतराष्ट्र अपने सचिव सञ्जय से पूछ रहा है कि उन सेनाओं ने क्या किया ?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस तरह सारी पृष्ठभूमि तैयार है | आवश्यकता है केवल इस अनुवाद तथा भाष्य के विषय में संक्षिप्त टिप्पणी की|&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीताके अंग्रेजी अनुवादकों में यह सामान्य प्रवृत्ति पाई गई है कि वे अपनी विचारधारा तथा दर्शन को स्थान देने के लिए कृष्ण नामक व्यक्ति को टाक पर रख देते हैं | वे महाभारत के इतिहास को असंगत पौराणिक कथा मानते हैं तथा कृष्ण को किसी अज्ञात प्रतिभाशाली व्यक्ति के विचारों को पद्य रूप में प्रस्तुत करने का निमित्त बनाते हैं अथवा श्रेष्ठतम संदर्भ में कृष्ण को एक गौण ऐतिहासिक पुरुष बना दिया जाता है | किन्तु साक्षात् कृष्णभगवद्गीता के लक्ष्य तथा विषयवस्तु दोनों हैं जैसा किगीता स्वयं अपने विषय में कहती है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः यह अनुवाद तथा इसी के साथ संलग्न भाष्य पाठक को कृष्ण की ओर निर्देशित करता था, उनसे दूर नहीं ले जाता | इस दृष्टि से भगवद्गीतायथारूप अनुपम है | साथ ही इसकी सबसे बड़ी विशेषता यह है कि इस तरह यह पूर्णतया ग्राह्य तथा सांगत बन जाती है | चूँकिगीता के वक्ता एवं उसी के साथ चरम लक्ष्य भी कृष्ण हैं अतेवयही एकमात्र ऐसा अनुवाद है जो इस महान शास्त्र को यथार्थ रूप में प्रस्तुत कर्ता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
– प्रकाशक&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.25&amp;diff=539995</id>
		<title>HI/BG 5.25</title>
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		<updated>2021-01-28T09:55:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 5|H25]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 5| अध्याय ५: कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 5.24| BG 5.24]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 5.24|BG 5.24]] - [[HI/BG 5.26|BG 5.26]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 5.26| BG 5.26]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 25 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।&lt;br /&gt;
:छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥२५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
लभन्ते—प्राह्रश्वत करते हैं; ब्रह्म-निर्वाणम्—मुक्ति; ऋषय:—अन्तर से क्रियाशील रहने वाले; क्षीण-कल्मषा:—समस्त पापों से रहित; छिन्न—निवृत्त होकर; द्वैधा:—द्वैत से; यत-आत्मान:—आत्म-साक्षात्कार में निरत; सर्व-भूत—समस्त जीवों के; हिते—कल्याण में; रता:—लगे हुए।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो लोग संशय से उत्पन्न होने वाले द्वैत से परे हैं, जिनके मन आत्म-साक्षात्कार में रत हैं, जो समस्त जीवों के कल्याणकार्य करने में सदैव व्यस्त रहते हैं और जो समस्त पापों से रहित हैं, वे ब्रह्मनिर्वाण (मुक्ति) को प्राप्त होते हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
केवल वही व्यक्ति सभी जीवों के कल्याणकार्य में रत कहा जाएगा जो पूर्णतया कृष्णभावनाभावित है | जब व्यक्ति को यह वास्तविक ज्ञान हो जाता है कि कृष्ण ही सभी वस्तुओं के उद्गम हैं तब वह जो भी कर्म करता है सबों के हित को ध्यान में रखकर करता है | परमभोक्ता, परमनियन्ता तथा परमसखा कृष्ण को भूल जाना मानवता के क्लेशों का कारण है | अतः समग्र मानवता के लिए कार्य करना सबसे बड़ा कल्याणकार्य है | कोई भी मनुष्य ऐसे श्रेष्ठ कार्य में तब तक नहीं लग पाता जब तक वह स्वयं मुक्त न हो | कृष्णभावनाभावित मनुष्य के हृदय में कृष्ण की सर्वोच्चता पर बिलकुल संदेह नहीं रहता | वह इसीलिए सन्देह नहीं करता क्योंकि वह समस्त पापों से रहित होता है | ऐसा है – यह दैवी प्रेम |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो व्यक्ति मानव समाज का भौतिक कल्याण करने में ही व्यस्त रहता है वह वास्तव में किसी की भी सहायता नहीं कर सकता | शरीर तथा मन की क्षणिक खुशी सन्तोषजनक नहीं होती | जीवन-संघर्ष में कठिनाइयों का वास्तविक कारण मनुष्य द्वारा परमेश्र्वर से अपने सम्बन्ध की विस्मृति में ढूँढा जा सकता है | जब मनुष्य कृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध के प्रति सचेष्ट रहता है जो वह वास्तव में मुक्तात्मा होता है, भले ही वह भौतिक शरीर के जाल में फँसा हो |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.78&amp;diff=492061</id>
		<title>HI/BG 18.78</title>
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		<updated>2020-08-18T10:04:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H78]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 18| अध्याय १८: उपसंहार – संन्यास की सिद्धि]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 18.77| BG 18.77]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 18.77|BG 18.77]] - [[HI/BG 1.1|BG 1.1]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 1.1| BG 1.1]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 78 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:यत्र योगेश्वरः कृष्णो यत्र पार्थो धनुर्धरः ।&lt;br /&gt;
:तत्र श्रीर्विजयो भूतिर्ध्रुवा नीतिर्मतिर्मम ॥७८॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यत्र—जहाँ; योग-ईश्वर:—योग के स्वामी; कृष्ण:—भगवान् कृष्ण; यत्र—जहाँ; पार्थ:—पृथापुत्र; धनु:-धर:—धनुषधारी; तत्र—वहाँ; श्री:—ऐश्वर्य; विजय:—जीत; भूति:—विलक्षण शक्ति; ध्रुवा—निश्चित; नीति:—नीति; मति: मम—मेरा मत।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जहाँ योगेश्र्वर कृष्ण है और जहाँ परम धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीँ ऐश्र्वर्य, विजय, अलौकिक शक्ति तथा नीति भी निश्चित रूप से रहती है | ऐसा मेरा मत है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवद्गीता का शुभारम्भ धृतराष्ट्र की जिज्ञासा से हुआ | वह भीष्म, द्रोण तथा कर्ण जैसे महारथियों की सहायता से अपने पुत्रों की विजय के प्रति आशावान था | उसे आशा थी कि विजय उसके पक्ष में होगी | लेकिन युद्धक्षेत्र के दृश्य का वर्णन करने के बाद संजय ने राजा से कहा &amp;quot;आप अपनी विजय की बात सोच रहें हैं, लेकिन मेरा मत है कि जहाँ कृष्ण तथा अर्जुन उपस्थित हैं, वहीँ सम्पूर्ण श्री होगी |&amp;quot; उसने प्रत्यक्ष पुष्टि की कि धृतराष्ट्र को अपने पक्ष की विजय की आशा नहीं रखनी चाहिए | विजय तो अर्जुन के पक्ष की निश्चित है, क्योंकि उसमें कृष्ण हैं | श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के सारथी का पद स्वीकार करना एक ऐश्र्वर्य का प्रदर्शन था | कृष्ण समस्त ऐश्र्वर्यों से पूर्ण हैं और इनमें से वैराग्य एक है | ऐसे वैराग्य के भी अनेक उदाहरण हैं, क्योंकि कृष्ण वैराग्य के भी ईश्र्वर हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युद्ध तो वास्तव में दुर्योधन तथा युधिष्ठिर के बीच था | अर्जुन अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की ओर से लड़ रहा था | चूँकि कृष्ण तथा अर्जुन युधिष्ठिर की ओर थे अतएव युधिष्ठिर की विजय ध्रुव थी | युद्ध को यह निर्णय करना था कि संसार पर शासन कौन करेगा | संजय ने भविष्यवाणी की कि सत्ता युधिष्ठिर के हाथ में चली जाएगी | यहाँ पर इसकी भी भविष्यवाणी हुई है कि इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद युधिष्ठिर उत्तरोत्तर समृद्धि करेंगे, क्योंकि वे न केवल पुण्यात्मा तथा पवित्रात्मा थे, अपितु वे कठोर नीतिवादी थे | उन्होंने जीवन भर कभी असत्य भाषण नहीं किया था |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसे अनेक अल्पज्ञ व्यक्ति हैं, जो भगवद्गीता को युद्धस्थल में दो मित्रों की वार्ता के रूप में ग्रहण करते हैं | लेकिन इससे ऐसा ग्रंथ कभी शास्त्र नहीं बन सकता | कुछ लोग विरोध कर सकते हैं कि कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने के लिए उकसाया, जो अनैतिक है, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि भगवद्गीता नीति का परम आदेश है | यह नीति विषयक आदेश नवें अध्याय के चौंतीसवें श्लोक में है – मन्मना भव मद्भक्तः| मनुष्य को कृष्ण का भक्त बनना चाहिए और सारे धर्मों का सार है – कृष्ण की शरणागति (सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज) | भगवद्गीता का आदेश धर्म तथा नीति की परम विधि है | अन्य सारी विधियाँ भले ही शुद्ध करने वाली तथा इस विधि तक ले जाने वाली हों, लेकिन गीता का अन्तिम सन्देश समस्त नीतियों तथा धर्मों का सार वचन है – कृष्ण की शरण ग्रहण करो या कृष्ण को आत्मसमर्पण करो | यह अठारहवें अध्याय का मत है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीता से हम यह समझ सकते हैं कि ज्ञान तथा ध्यान द्वारा अपनी अनुभूति एक विधि है, लेकिन कृष्ण की शरणागति सर्वोच्च सिद्धि है | यह भगवद्गीता के उपदेशों का सार है | वर्णाश्रम धर्म के अनुसार अनुष्ठानों (कर्मकाण्ड) का मार्ग, ज्ञान का गुह्य मार्ग हो सकता है | लेकिन धर्म के अनुष्ठान के गुह्य होने पर भी ध्यान तथा ज्ञान गुह्यतर हैं तथा पूर्ण कृष्णभावनाभावित होकर भक्ति में कृष्ण की शरणागति गुह्यतम उपदेश है | यही अठारहवें अध्याय का सार है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीता की अन्य विशेषता यह है कि वास्तविक सत्य भगवान् कृष्ण हैं | परम सत्य की अनुभूति तीन रूपों में होती है – निर्गुण ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा भगवान् श्रीकृष्ण | परम सत्य के पूर्ण ज्ञान का अर्थ है, कृष्ण का पूर्ण ज्ञान | यदि कोई कृष्ण को जान लेता है तो ज्ञान के सारे विभाग इसी ज्ञान के अंश हैं | कृष्ण दिव्य हैं क्योंकि वे अपनी नित्य अन्तरंगा शक्ति में स्थित रहते हैं | जीव उनकी शक्ति से प्रकट हैं और दो श्रेणी के होते हैं – नित्यबद्ध तथा नित्यमुक्त | ऐसे जीवों की संख्या असंख्य है और वे सब कृष्ण के मूल अंश माने जाते हैं | भौतिक शक्ति २४ प्रकार से प्रकट होती है | सृष्टि शाश्र्वत काल द्वारा प्रभावित है और बहिरंगाशक्ति द्वारा इसका सृजन तथा संहार होता है | यह दृश्य जगत पुनःपुनः प्रकट तथा अप्रकट होता रहता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीता में पाँच प्रमुख विषयों की व्याख्या की गई है – भगवान्, भौतिक प्रकृति, जीव, शाश्र्वतकाल तथा सभी प्रकार के कर्म | सब कुछ भगवान् कृष्ण पर आश्रित है | परमसत्यत की सभी धारणाएँ – निराकार ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा अन्य दिव्य अनुभूतियाँ – भगवान् के ज्ञान की कोटि में सन्निहित हैं | यद्यपि ऊपर से भगवान्, जीव, प्रकृति तथा काल भिन्न प्रतीत होते हैं, लेकिन ब्रह्म से कुछ भी भिन्न नहीं है | लेकिन ब्रह्म सदैव समस्त वस्तुओं से भिन्न है | भगवान् चैतन्य का दर्शन है &amp;quot;अचिन्त्यभेदाभेद&amp;quot; | यह दर्शन पद्धति परमसत्य के पूर्णज्ञान से युक्त है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीव अपने मूलरूप में शुद्ध आत्मा है | वह परमात्मा का एक परमाणु मात्र है | इस प्रकार भगवान् कृष्ण की उपमा सूर्य से दी जा सकती है और जीवों की सूर्यप्रकाश से | चूँकि सारे जीव कृष्ण की तटस्था शक्ति हैं, अतएव उनका संसर्ग भौतिक शक्ति (अपरा) या आध्यात्मिक शक्ति (परा) से होता है | दूसरे शब्दों में, जीव भगवान् की पराशक्ति से है, अतएव उसमें किंचित् स्वतन्त्रता रहती है | इस स्वतन्त्रता के सदुपयोग से ही वह कृष्ण के प्रत्यक्ष आदेश के अन्तर्गत आता है | इस प्रकार वह ह्लादिनी शक्ति की अपनी सामान्य दशा को प्राप्त होता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय &amp;quot;उपसंहार-संन्यास की सिद्धि&amp;quot; का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.78&amp;diff=492059</id>
		<title>HI/BG 18.78</title>
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		<updated>2020-08-18T10:04:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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:&#039;&#039;j&#039;&#039;&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यत्र—जहाँ; योग-ईश्वर:—योग के स्वामी; कृष्ण:—भगवान् कृष्ण; यत्र—जहाँ; पार्थ:—पृथापुत्र; धनु:-धर:—धनुषधारी; तत्र—वहाँ; श्री:—ऐश्वर्य; विजय:—जीत; भूति:—विलक्षण शक्ति; ध्रुवा—निश्चित; नीति:—नीति; मति: मम—मेरा मत।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जहाँ योगेश्र्वर कृष्ण है और जहाँ परम धनुर्धर अर्जुन हैं, वहीँ ऐश्र्वर्य, विजय, अलौकिक शक्ति तथा नीति भी निश्चित रूप से रहती है | ऐसा मेरा मत है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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भगवद्गीता का शुभारम्भ धृतराष्ट्र की जिज्ञासा से हुआ | वह भीष्म, द्रोण तथा कर्ण जैसे महारथियों की सहायता से अपने पुत्रों की विजय के प्रति आशावान था | उसे आशा थी कि विजय उसके पक्ष में होगी | लेकिन युद्धक्षेत्र के दृश्य का वर्णन करने के बाद संजय ने राजा से कहा &amp;quot;आप अपनी विजय की बात सोच रहें हैं, लेकिन मेरा मत है कि जहाँ कृष्ण तथा अर्जुन उपस्थित हैं, वहीँ सम्पूर्ण श्री होगी |&amp;quot; उसने प्रत्यक्ष पुष्टि की कि धृतराष्ट्र को अपने पक्ष की विजय की आशा नहीं रखनी चाहिए | विजय तो अर्जुन के पक्ष की निश्चित है, क्योंकि उसमें कृष्ण हैं | श्रीकृष्ण द्वारा अर्जुन के सारथी का पद स्वीकार करना एक ऐश्र्वर्य का प्रदर्शन था | कृष्ण समस्त ऐश्र्वर्यों से पूर्ण हैं और इनमें से वैराग्य एक है | ऐसे वैराग्य के भी अनेक उदाहरण हैं, क्योंकि कृष्ण वैराग्य के भी ईश्र्वर हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
युद्ध तो वास्तव में दुर्योधन तथा युधिष्ठिर के बीच था | अर्जुन अपने ज्येष्ठ भ्राता युधिष्ठिर की ओर से लड़ रहा था | चूँकि कृष्ण तथा अर्जुन युधिष्ठिर की ओर थे अतएव युधिष्ठिर की विजय ध्रुव थी | युद्ध को यह निर्णय करना था कि संसार पर शासन कौन करेगा | संजय ने भविष्यवाणी की कि सत्ता युधिष्ठिर के हाथ में चली जाएगी | यहाँ पर इसकी भी भविष्यवाणी हुई है कि इस युद्ध में विजय प्राप्त करने के बाद युधिष्ठिर उत्तरोत्तर समृद्धि करेंगे, क्योंकि वे न केवल पुण्यात्मा तथा पवित्रात्मा थे, अपितु वे कठोर नीतिवादी थे | उन्होंने जीवन भर कभी असत्य भाषण नहीं किया था |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसे अनेक अल्पज्ञ व्यक्ति हैं, जो भगवद्गीता को युद्धस्थल में दो मित्रों की वार्ता के रूप में ग्रहण करते हैं | लेकिन इससे ऐसा ग्रंथ कभी शास्त्र नहीं बन सकता | कुछ लोग विरोध कर सकते हैं कि कृष्ण ने अर्जुन को युद्ध करने के लिए उकसाया, जो अनैतिक है, लेकिन वास्तविकता तो यह है कि भगवद्गीता नीति का परम आदेश है | यह नीति विषयक आदेश नवें अध्याय के चौंतीसवें श्लोक में है – मन्मना भव मद्भक्तः| मनुष्य को कृष्ण का भक्त बनना चाहिए और सारे धर्मों का सार है – कृष्ण की शरणागति (सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज) | भगवद्गीता का आदेश धर्म तथा नीति की परम विधि है | अन्य सारी विधियाँ भले ही शुद्ध करने वाली तथा इस विधि तक ले जाने वाली हों, लेकिन गीता का अन्तिम सन्देश समस्त नीतियों तथा धर्मों का सार वचन है – कृष्ण की शरण ग्रहण करो या कृष्ण को आत्मसमर्पण करो | यह अठारहवें अध्याय का मत है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीता से हम यह समझ सकते हैं कि ज्ञान तथा ध्यान द्वारा अपनी अनुभूति एक विधि है, लेकिन कृष्ण की शरणागति सर्वोच्च सिद्धि है | यह भगवद्गीता के उपदेशों का सार है | वर्णाश्रम धर्म के अनुसार अनुष्ठानों (कर्मकाण्ड) का मार्ग, ज्ञान का गुह्य मार्ग हो सकता है | लेकिन धर्म के अनुष्ठान के गुह्य होने पर भी ध्यान तथा ज्ञान गुह्यतर हैं तथा पूर्ण कृष्णभावनाभावित होकर भक्ति में कृष्ण की शरणागति गुह्यतम उपदेश है | यही अठारहवें अध्याय का सार है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीता की अन्य विशेषता यह है कि वास्तविक सत्य भगवान् कृष्ण हैं | परम सत्य की अनुभूति तीन रूपों में होती है – निर्गुण ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा भगवान् श्रीकृष्ण | परम सत्य के पूर्ण ज्ञान का अर्थ है, कृष्ण का पूर्ण ज्ञान | यदि कोई कृष्ण को जान लेता है तो ज्ञान के सारे विभाग इसी ज्ञान के अंश हैं | कृष्ण दिव्य हैं क्योंकि वे अपनी नित्य अन्तरंगा शक्ति में स्थित रहते हैं | जीव उनकी शक्ति से प्रकट हैं और दो श्रेणी के होते हैं – नित्यबद्ध तथा नित्यमुक्त | ऐसे जीवों की संख्या असंख्य है और वे सब कृष्ण के मूल अंश माने जाते हैं | भौतिक शक्ति २४ प्रकार से प्रकट होती है | सृष्टि शाश्र्वत काल द्वारा प्रभावित है और बहिरंगाशक्ति द्वारा इसका सृजन तथा संहार होता है | यह दृश्य जगत पुनःपुनः प्रकट तथा अप्रकट होता रहता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीता में पाँच प्रमुख विषयों की व्याख्या की गई है – भगवान्, भौतिक प्रकृति, जीव, शाश्र्वतकाल तथा सभी प्रकार के कर्म | सब कुछ भगवान् कृष्ण पर आश्रित है | परमसत्यत की सभी धारणाएँ – निराकार ब्रह्म, अन्तर्यामी परमात्मा तथा अन्य दिव्य अनुभूतियाँ – भगवान् के ज्ञान की कोटि में सन्निहित हैं | यद्यपि ऊपर से भगवान्, जीव, प्रकृति तथा काल भिन्न प्रतीत होते हैं, लेकिन ब्रह्म से कुछ भी भिन्न नहीं है | लेकिन ब्रह्म सदैव समस्त वस्तुओं से भिन्न है | भगवान् चैतन्य का दर्शन है &amp;quot;अचिन्त्यभेदाभेद&amp;quot; | यह दर्शन पद्धति परमसत्य के पूर्णज्ञान से युक्त है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जीव अपने मूलरूप में शुद्ध आत्मा है | वह परमात्मा का एक परमाणु मात्र है | इस प्रकार भगवान् कृष्ण की उपमा सूर्य से दी जा सकती है और जीवों की सूर्यप्रकाश से | चूँकि सारे जीव कृष्ण की तटस्था शक्ति हैं, अतएव उनका संसर्ग भौतिक शक्ति (अपरा) या आध्यात्मिक शक्ति (परा) से होता है | दूसरे शब्दों में, जीव भगवान् की पराशक्ति से है, अतएव उसमें किंचित् स्वतन्त्रता रहती है | इस स्वतन्त्रता के सदुपयोग से ही वह कृष्ण के प्रत्यक्ष आदेश के अन्तर्गत आता है | इस प्रकार वह ह्लादिनी शक्ति की अपनी सामान्य दशा को प्राप्त होता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के अठारहवें अध्याय “उपसंहार-संन्यास की सिद्धि” का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.77&amp;diff=492058</id>
		<title>HI/BG 18.77</title>
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		<updated>2020-08-18T10:02:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 77 ====&lt;br /&gt;
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:तच्च संस्मृत्य संस्मृत्य रूपमत्यद्भुतं हरेः ।&lt;br /&gt;
:विस्मयो मे महान् राजन्हृष्यामि च पुनः पुनः ॥७७॥&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
तत्—उस; च—भी; संस्मृत्य—स्मरण करके; संस्मृत्य—स्मरण करके; रूपम्—स्वरूप को; अति—अत्यधिक; अद्भुतम्—अद्भुत; हरे:—भगवान् कृष्ण के; विस्मय:—आश्चर्य; मे—मेरा; महान्—महान; राजन्—हे राजा; हृष्यामि—हॢषत हो रहा हूँ; च—भी; पुन: पुन:—फिर-फिर, बारम्बार।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे राजन्! भगवान् कृष्ण के अद्भुत रूप का स्मरण करते ही मैं अधिकाधिक आश्चर्यचकित होता हूँ और पुनःपुनः हर्षित होता हूँ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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ऐसा प्रतीत होता है कि व्यास की कृपा से संजय ने भी अर्जुन को दिखाये गये कृष्ण के विराट रूप को देखा था | निस्सन्देह यह कहा जाता है कि इसके पूर्व भगवान् कृष्ण ने कभी ऐसा रूप प्रकट नहीं किया था | यह केवल अर्जुन को दिखाया गया था, लेकिन उस समय कुछ महान भक्त भी उसे देख सके तथा व्यास उनमें से एक थे | वे भगवान् के परम भक्तों में से हैं और कृष्ण के शक्त्यावेश अवतार माने जाते हैं | व्यास ने इसे अपने शिष्य संजय के समक्ष प्रकट किया जिन्होंने अर्जुन को प्रदर्शित किये गये कृष्ण के उस अद्भुत रूप को स्मरण रखा और वे बारम्बार उसका आनन्द उठा रहे थे |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.77&amp;diff=492057</id>
		<title>HI/BG 18.77</title>
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		<updated>2020-08-18T10:01:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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==== श्लोक 77 ====&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
तत्—उस; च—भी; संस्मृत्य—स्मरण करके; संस्मृत्य—स्मरण करके; रूपम्—स्वरूप को; अति—अत्यधिक; अद्भुतम्—अद्भुत; हरे:—भगवान् कृष्ण के; विस्मय:—आश्चर्य; मे—मेरा; महान्—महान; राजन्—हे राजा; हृष्यामि—हॢषत हो रहा हूँ; च—भी; पुन: पुन:—फिर-फिर, बारम्बार।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे राजन्! भगवान् कृष्ण के अद्भुत रूप का स्मरण करते ही मैं अधिकाधिक आश्चर्यचकित होता हूँ और पुनःपुनः हर्षित होता हूँ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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ऐसा प्रतीत होता है कि व्यास की कृपा से संजय ने भी अर्जुन को दिखाये गये कृष्ण के विराट रूप को देखा था | निस्सन्देह यह कहा जाता है कि इसके पूर्व भगवान् कृष्ण ने कभी ऐसा रूप प्रकट नहीं किया था | यह केवल अर्जुन को दिखाया गया था, लेकिन उस समय कुछ महान भक्त भी उसे देख सके तथा व्यास उनमें से एक थे | वे भगवान् के परम भक्तों में से हैं और कृष्ण के शक्त्यावेश अवतार माने जाते हैं | व्यास ने इसे अपने शिष्य संजय के समक्ष प्रकट किया जिन्होंने अर्जुन को प्रदर्शित किये गये कृष्ण के उस अद्भुत रूप को स्मरण रखा और वे बारम्बार उसका आनन्द उठा रहे थे |&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.76&amp;diff=492056</id>
		<title>HI/BG 18.76</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.76&amp;diff=492056"/>
		<updated>2020-08-18T10:00:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 76 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:राजन्संस्मृत्य संस्मृत्य संवादमिममद्भुतम् ।&lt;br /&gt;
:केशवार्जुनयोः पुण्यं हृष्यामि च मुहुर्मुहुः ॥७६॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
राजन्—हे राजा; संस्मृत्य—स्मरण करके; संस्मृत्य—स्मरण करके; संवादम्—वार्ता को; इमम्—इस; अद्भुतम्—आश्चर्यजनक; केशव—भगवान् कृष्ण; अर्जुनयो:—तथा अर्जुन की; पुण्यम्—पवित्र; हृष्यामि—हॢषत होता हूँ; च—भी; मुहु: मुहु:—बारम्बार।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे राजन्! जब मैं कृष्ण तथा अर्जुन के मध्य हुई इस आश्चर्यजनक तथा पवित्र वार्ता का बारम्बार स्मरण करता हूँ, तो प्रति क्षण आह्लाद से गद्गद् हो उठता हूँ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवद्गीता का ज्ञान इतना दिव्य है कि जो भी अर्जुन तथा कृष्ण के संवाद को जान लेता है, वह पुण्यत्मा बन जाता है और इस वार्तालाप को भूल नहीं सकता | आध्यात्मिक जीवन की यह दिव्य स्थिति है | दूसरे शब्दों में, जब कोई गीता को सही स्त्रोत से अर्थात् प्रत्यक्षतः कृष्ण से सुनता है, तो उसे पूर्ण कृष्णभावनामृत प्राप्त होता है | कृष्णभावनामृत का फल यह होता है कि वह अत्यधिक प्रबद्ध हो उठता है और जीवन का भोग आनन्द सहित कुछ काल तक नहीं, अपितु प्रत्येक क्षण करता है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 18.75| BG 18.75]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 18.75|BG 18.75]] - [[HI/BG 18.77|BG 18.77]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 18.77| BG 18.77]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.76&amp;diff=492055</id>
		<title>HI/BG 18.76</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.76&amp;diff=492055"/>
		<updated>2020-08-18T10:00:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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:&#039;&#039;k&#039;&#039;&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
राजन्—हे राजा; संस्मृत्य—स्मरण करके; संस्मृत्य—स्मरण करके; संवादम्—वार्ता को; इमम्—इस; अद्भुतम्—आश्चर्यजनक; केशव—भगवान् कृष्ण; अर्जुनयो:—तथा अर्जुन की; पुण्यम्—पवित्र; हृष्यामि—हॢषत होता हूँ; च—भी; मुहु: मुहु:—बारम्बार।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे राजन्! जब मैं कृष्ण तथा अर्जुन के मध्य हुई इस आश्चर्यजनक तथा पवित्र वार्ता का बारम्बार स्मरण करता हूँ, तो प्रति क्षण आह्लाद से गद्गद् हो उठता हूँ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवद्गीता का ज्ञान इतना दिव्य है कि जो भी अर्जुन तथा कृष्ण के संवाद को जान लेता है, वह पुण्यत्मा बन जाता है और इस वार्तालाप को भूल नहीं सकता | आध्यात्मिक जीवन की यह दिव्य स्थिति है | दूसरे शब्दों में, जब कोई गीता को सही स्त्रोत से अर्थात् प्रत्यक्षतः कृष्ण से सुनता है, तो उसे पूर्ण कृष्णभावनामृत प्राप्त होता है | कृष्णभावनामृत का फल यह होता है कि वह अत्यधिक प्रबद्ध हो उठता है और जीवन का भोग आनन्द सहित कुछ काल तक नहीं, अपितु प्रत्येक क्षण करता है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.75&amp;diff=492054</id>
		<title>HI/BG 18.75</title>
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		<updated>2020-08-18T09:58:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 75 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:व्यासप्रसादाच्छ्रुतवानेतद्गुह्यमहं परम् ।&lt;br /&gt;
:योगं योगेश्वरात्कृष्णात्साक्षात्कथयतः स्वयम् ॥७५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
व्यास-प्रसादात्—व्यासदेव की कृपा से; श्रुतवान्—सुना है; एतत्—इस; गुह्यम्—गोपनीय; अहम्—मैंने; परम्—परम; योगम्—योग को; योग-ईश्वरात्—योग के स्वामी; कृष्णात्—कृष्ण से; साक्षात्—साक्षात्; कथयत:—कहते हुए; स्वयम्—स्वयं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
व्यास की कृपा से मैंने ये परम गुह्य बातें साक्षात् योगेश्वर कृष्ण के मुख से अर्जुन के प्रति कही जाती हुई सुनीं ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
व्यास संजय के गुरु थे और संजय स्वीकार करते हैं कि व्यास की कृपा से ही वे भगवान् को समझ सके । इसका अर्थ यह हुआ कि गुरु के माध्यम से ही कृपा को समझना चाहिए, प्रत्यक्ष रूप से नहीं । गुरु स्वच्छ माध्यम है, यद्यपि अनुभव फिर भी प्रत्यक्ष ही होता है । गुरु-परम्परा का यही रहस्य है । जब गुरु प्रामाणिक हो तो भगवद्गीता का प्रत्यक्ष श्रवण किया जा सकता है,जैसा अर्जुन ने किया । संसार भर में अनेक योगी हैं, लेकिन कृष्ण योगेश्र्वर हैं | उन्होंने भगवद्गीता में स्पष्ट उपदेश दिया है, &amp;quot;मेरी शरण में आओ | जो ऐसा करता है वह सर्वोच्च योगी है |&amp;quot; छठे अध्याय के अन्तिम श्लोक में इसकी पुष्टि हुई है – योगिनाम् अपि सर्वेषाम् |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
नारद कृष्ण के शिष्य हैं और व्यास के गुरु | अतएव व्यास अर्जुन के ही समान प्रामाणिक हैं, क्योंकि वे गुरु-परम्परा में आते हैं और संजय व्यासदेव के शिष्य हैं | अतएव व्यास की कृपा से संजय की इन्द्रियाँ विमल हो सकीं और वे कृष्ण का साक्षात् दर्शन कर सके तथा उनकी वार्ता सुन सके | जो व्यक्ति कृष्ण का प्रत्यक्ष दर्शन करता है, वह इस गुह्यज्ञान को समझ सकता है | यदि वह गुरु-परम्परा में नहीं होता तो वह कृष्ण की वार्ता नहीं सुन सकता | अतएव उसका ज्ञान सदैव अधुरा रहता है, विशेषतया जहाँ तक भगवद्गीता समझने का प्रश्न है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीता में योग की समस्त पद्धतियों का – कर्मयोग, ज्ञानयोग तथा भक्तियोग का वर्णन हुआ है | श्रीकृष्ण इन समस्त योगों के स्वामी हैं | लेकिन यह समझ लेना चाहिए कि जिस तरह अर्जुन कृष्ण को प्रत्यक्षतः समझ सकने के लिए भाग्यशाली था, उसी प्रकार व्यासदेव की कृपा से संजय भी कृष्ण को साक्षात् सुनने में समर्थ हो सका | वस्तुतः कृष्ण से प्रत्यक्षतः सुनने एवं व्यास जैसे गुरु के माध्यम से प्रत्यक्ष सुनने में कोई अन्तर नहीं है | गुरु भी व्यासदेव का प्रतिनिधि होता है | अतएव वैदिक पद्धति के अनुसार अपने गुरु के जन्मदिन पर शिष्यगण व्यास पूजा नामक उत्सव रचाते हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.75&amp;diff=492052</id>
		<title>HI/BG 18.75</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.75&amp;diff=492052"/>
		<updated>2020-08-18T09:57:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H75]]&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 75 ====&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
व्यास-प्रसादात्—व्यासदेव की कृपा से; श्रुतवान्—सुना है; एतत्—इस; गुह्यम्—गोपनीय; अहम्—मैंने; परम्—परम; योगम्—योग को; योग-ईश्वरात्—योग के स्वामी; कृष्णात्—कृष्ण से; साक्षात्—साक्षात्; कथयत:—कहते हुए; स्वयम्—स्वयं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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निर्दिष्ट कर्तव्यों को कभी नहीं त्यागना चाहिए । यदि कोई मोहवश अपने नियत कर्मों का परित्याग कर देता है, तो ऐसे त्याग को तामसी कहा जाता है ।&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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जो कार्य भौतिक तुष्टि के लिए किया जाता है, उसे अवश्य ही त्याग दे, लेकिन जिन कार्यों से आध्यात्मिक उन्नति हो, यथा भगवान् के लिए भोजन बनाना, भगवान् को भोग अर्पित करना, फिर प्रसाद ग्रहण करना, उसकी संस्तुति की जाती है । कहा जाता है कि संन्यासी को अपने लिए भोजन नहीं बनाना चाहिए । लेकिन अपने लिए भोजन पकाना भले ही वर्जित हो, परमेश्र्वर के लिए भोजन पकाना वर्जित नहीं है । इसी प्रकार अपने शिष्य की कृष्णभावनामृत में प्रगति करने में सहायक बनने के लिए संन्यासी विवाह-यज्ञ सम्पन्न करा सकता है । यदि कोई ऐसे कार्यों का परित्याग कर देता है, तो यह समझना चाहिए कि वह तमोगुण के अधीन है ।&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.74&amp;diff=492051</id>
		<title>HI/BG 18.74</title>
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		<updated>2020-08-18T09:56:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
==== श्लोक 74 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:सञ्जय उवाच&lt;br /&gt;
:इत्यहं वासुदेवस्य पार्थस्य च महात्मनः ।&lt;br /&gt;
:संवादमिममश्रौषमद्भुतं रोमहर्षणम् ॥७४॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सञ्जय: उवाच—संजय ने कहा; इति—इस प्रकार; अहम्—मैं; वासुदेवस्य—कृष्ण का; पार्थस्य—तथा अर्जुन का; च—भी; महा-आत्मन:—महात्माओं का; संवादम्—वार्ता; इमम्—यह; अश्रौषम्—सुनी है; अद्भुतम्—अद्भुत; रोम-हर्षणम्—रोंगटे खड़े करने वाली।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
संजय ने कहा – इस प्रकार मैंने कृष्ण तथा अर्जुन इन दोनों महापुरुषों की वार्ता सुनी | और यह सन्देश इतना अद्भुत है कि मेरे शरीर में रोमाञ्च हो रहा है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवद्गीता के प्रारम्भ में धृतराष्ट्र ने अपने मन्त्री संजय से पूछा था &amp;quot;कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में क्या हुआ?&amp;quot; गुरु व्यासदेव की कृपा से संजय के हृदय में सारी घटना स्फुरित हुई थी | इस प्रकार उसने युद्धस्थल की विषय वस्तु कह सुनाई थी | यह वार्ता आश्चर्यप्रद थी, क्योंकि इसके पूर्व दो महापुरुषों के बीच ऐसी महत्त्वपूर्ण वार्ता कभी नहीं हुई थी और न भविष्य में पुनः होगी | यह वार्ता इसलिए आश्चर्यप्रद थी, क्योंकि भगवान् भी अपने तथा अपनी शक्तियों के विषय में जीवात्मा अर्जुन से वर्णन कर रहे थे, जो परम भगवद्भक्त था | यदि हम कृष्ण को समझने के लिए अर्जुन का अनुसरण करें तो हमारा जीवन सुखी तथा सफल हो जाए | संजय ने इसका अनुभव किया और जैसे-जैसे उसकी समझ में आता गया उसने यह वार्ता धृतराष्ट्र से कह सुनाई | अब यह निष्कर्ष निकला कि जहाँ-जहाँ कृष्ण तथा अर्जुन हैं, वहीं-वहीं विजय होती है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.74&amp;diff=492050</id>
		<title>HI/BG 18.74</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.74&amp;diff=492050"/>
		<updated>2020-08-18T09:55:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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==== श्लोक 74 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सञ्जय: उवाच—संजय ने कहा; इति—इस प्रकार; अहम्—मैं; वासुदेवस्य—कृष्ण का; पार्थस्य—तथा अर्जुन का; च—भी; महा-आत्मन:—महात्माओं का; संवादम्—वार्ता; इमम्—यह; अश्रौषम्—सुनी है; अद्भुतम्—अद्भुत; रोम-हर्षणम्—रोंगटे खड़े करने वाली।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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संजय ने कहा – इस प्रकार मैंने कृष्ण तथा अर्जुन इन दोनों महापुरुषों की वार्ता सुनी | और यह सन्देश इतना अद्भुत है कि मेरे शरीर में रोमाञ्च हो रहा है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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भगवद्गीता के प्रारम्भ में धृतराष्ट्र ने अपने मन्त्री संजय से पूछा था &amp;quot;कुरुक्षेत्र के युद्धस्थल में क्या हुआ?&amp;quot; गुरु व्यासदेव की कृपा से संजय के हृदय में सारी घटना स्फुरित हुई थी | इस प्रकार उसने युद्धस्थल की विषय वस्तु कह सुनाई थी | यह वार्ता आश्चर्यप्रद थी, क्योंकि इसके पूर्व दो महापुरुषों के बीच ऐसी महत्त्वपूर्ण वार्ता कभी नहीं हुई थी और न भविष्य में पुनः होगी | यह वार्ता इसलिए आश्चर्यप्रद थी, क्योंकि भगवान् भी अपने तथा अपनी शक्तियों के विषय में जीवात्मा अर्जुन से वर्णन कर रहे थे, जो परम भगवद्भक्त था | यदि हम कृष्ण को समझने के लिए अर्जुन का अनुसरण करें तो हमारा जीवन सुखी तथा सफल हो जाए | संजय ने इसका अनुभव किया और जैसे-जैसे उसकी समझ में आता गया उसने यह वार्ता धृतराष्ट्र से कह सुनाई | अब यह निष्कर्ष निकला कि जहाँ-जहाँ कृष्ण तथा अर्जुन हैं, वहीं-वहीं विजय होती है |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.73&amp;diff=492049</id>
		<title>HI/BG 18.73</title>
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		<updated>2020-08-18T09:54:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 73 ====&lt;br /&gt;
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:अर्जुन उवाच&lt;br /&gt;
:नष्टो मोहः स्मृतिर्लब्धा त्वत्प्रसादान्मयाच्युत ।&lt;br /&gt;
:स्थितोऽस्मि गतसन्देहः करिष्ये वचनं तव ॥७३॥&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्जुन: उवाच—अर्जुन ने कहा; नष्ट:—दूर हुआ; मोह:—मोह; स्मृति:—स्मरण शक्ति; लब्धा—पुन: प्राह्रश्वत हुई; त्वत्-प्रसादात्—आपकी कृपा से; मया—मेरे द्वारा; अच्युत—हे अच्युत कृष्ण; स्थित:—स्थित; अस्मि—हूँ; गत—दूर हुए; सन्देह:—सारे संशय; करिष्ये—पूरा करूँगा; वचनम्—आदेश को; तव—तुम्हारे।&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण, हे अच्युत! अब मेरा मोह दूर हो गया | आपके अनुग्रह से मुझे मेरी स्मरण शक्ति वापस मिल गई | अब मैं संशयरहित तथा दृढ़ हूँ और आपके आदेशानुसार कर्म करने के लिए उद्यत हूँ |&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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जीव जिसका प्रतिनिधित्व अर्जुन कर रहा है, उसका स्वरूप यह है कि वह परमेश्र्वर के आदेशानुसार कर्म करे | वह आत्मानुशासन (संयम) के लिए बना है | श्रीचैतन्य महाप्रभु का कहना है कि जीव का स्वरूप परमेश्र्वर के नित्य दास के रूप में है | इस नियम को भूल जाने के कारण जीव प्रकृति द्वारा बद्ध हो जाता है | लेकिन परमेश्र्वर की सेवा करने से वह ईश्र्वर का मुक्त दास बनता है | जीव का स्वरूप सेवक के रूप में हैं | उसे माया या परमेश्र्वर में से किसी एक की सेवा करनी होती है | यदि वह परमेश्र्वर की सेवा करता है, तो वह अपनी सामान्य स्थिति में रहता है | लेकिन यदि वह बाह्यशक्ति माया की सेवा करना पसन्द करता है, तो वह निश्चित रूप से बन्धन में पड़ जाता है | इस भौतिक जगत् में जीव मोहवश सेवा कर रहा है | वह काम तथा इच्छाओं से बँधा हुआ है, फिर भी वह अपने को जगत् का स्वामी मानता है | यही मोह कहलाता है | मुक्त होने पर पुरुष का मोह दूर हो जाता है और वह स्वेच्छा से भगवान् की इच्छानुसार कर्म करने के लिए परमेश्र्वर की शरण ग्रहण करता है | जीव को फाँसने का माया का अन्तिम पाश यह धारणा है कि वह ईश्र्वर है | जीव सोचता है कि अब वह बद्धजीव नहीं रहा, अब तो वह ईश्र्वर है | वह इतना मुर्ख होता है कि वह यह नहीं सोच पाता कि यदि वह ईश्र्वर होता तो इतना संशयग्रस्त क्यों रहता | वह इस पर विचार नहीं करता | इसलिए यही माया का अन्तिम पाश होता है | वस्तुतः माया से मुक्त होना भगवान् श्रीकृष्ण को समझना है और उनके आदेशानुसार कर्म करने के लिए सहमत होना है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस श्लोक में मोह शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | मोह ज्ञान का विरोधी होता है | वास्तविक ज्ञान तो यह समझना है कि प्रत्येक जीव भगवान् का शाश्र्वत सेवक है | लेकिन जीव अपने को इस स्थिति में न समझकर सोचता है कि वह सेवक नहीं, अपितु इस जगत् का स्वामी है , क्योंकि वह प्रकृति पर प्रभुत्व जताना चाहता है | यह मोह भगवत्कृपा से या शुद्ध भक्त की कृपा से जीता जा सकता है | इस मोह के दूर होने पर मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करने के लिए राजी हो जाता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृष्ण के आदेशानुसार कर्म करना कृष्णभावनामृत है | बद्धजीव माया द्वारा मोहित होने के कारण यह नहीं जान पाता कि परमेश्र्वर स्वामी हैं, जो ज्ञानमय हैं और सर्वसम्पत्तिवान हैं | वे अपने भक्तों को जो कुछ चाहे दे सकते हैं | वे सब के मित्र हैं और भक्तों पर विशेष कृपालु रहते हैं | वे प्रकृति तथा समस्त जीवों के अधीक्षक हैं | वे अक्षय काल के नियन्त्रक हैं और समस्त ऐश्र्वर्यों एवं शक्तियों से पूर्ण हैं | भगवान् भक्त को आत्मसमर्पण भी कर सकते हैं | जो उन्हें नहीं जानता वह मोह के वश में है, वह भक्त नहीं बल्कि माया का सेवक बन जाता है | लेकिन अर्जुन भगवान् से भगवद्गीता सुनकर समस्त मोह से मुक्त हो गया | वह यह समझ गया कि कृष्ण केवल उसके मित्र ही नहीं बल्कि भगवान् हैं और वह कृष्ण को वास्तव में समझ गया | अतएव भगवद्गीता का पाठ करने का अर्थ है कृष्ण को वास्तविकता के साथ जानना | जब व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान होता है , तो वह स्वभावतः कृष्ण को आत्मसमर्पण करता है | जब अर्जुन समझ गया कि यह तो जनसंख्या की अनावश्यक वृद्धि को कम करने के लिए कृष्ण की योजना थी, तो उसने कृष्ण की इच्छानुसार युद्ध करना स्वीकार कर लिया | उसने पुनः भगवान् के आदेशानुसार युद्ध करने के लिए अपना धनुष-बाण ग्रहण कर लिया |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.73&amp;diff=492048</id>
		<title>HI/BG 18.73</title>
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		<updated>2020-08-18T09:54:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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==== श्लोक 73 ====&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
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अर्जुन: उवाच—अर्जुन ने कहा; नष्ट:—दूर हुआ; मोह:—मोह; स्मृति:—स्मरण शक्ति; लब्धा—पुन: प्राह्रश्वत हुई; त्वत्-प्रसादात्—आपकी कृपा से; मया—मेरे द्वारा; अच्युत—हे अच्युत कृष्ण; स्थित:—स्थित; अस्मि—हूँ; गत—दूर हुए; सन्देह:—सारे संशय; करिष्ये—पूरा करूँगा; वचनम्—आदेश को; तव—तुम्हारे।&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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अर्जुन ने कहा – हे कृष्ण, हे अच्युत! अब मेरा मोह दूर हो गया | आपके अनुग्रह से मुझे मेरी स्मरण शक्ति वापस मिल गई | अब मैं संशयरहित तथा दृढ़ हूँ और आपके आदेशानुसार कर्म करने के लिए उद्यत हूँ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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जीव जिसका प्रतिनिधित्व अर्जुन कर रहा है, उसका स्वरूप यह है कि वह परमेश्र्वर के आदेशानुसार कर्म करे | वह आत्मानुशासन (संयम) के लिए बना है | श्रीचैतन्य महाप्रभु का कहना है कि जीव का स्वरूप परमेश्र्वर के नित्य दास के रूप में है | इस नियम को भूल जाने के कारण जीव प्रकृति द्वारा बद्ध हो जाता है | लेकिन परमेश्र्वर की सेवा करने से वह ईश्र्वर का मुक्त दास बनता है | जीव का स्वरूप सेवक के रूप में हैं | उसे माया या परमेश्र्वर में से किसी एक की सेवा करनी होती है | यदि वह परमेश्र्वर की सेवा करता है, तो वह अपनी सामान्य स्थिति में रहता है | लेकिन यदि वह बाह्यशक्ति माया की सेवा करना पसन्द करता है, तो वह निश्चित रूप से बन्धन में पड़ जाता है | इस भौतिक जगत् में जीव मोहवश सेवा कर रहा है | वह काम तथा इच्छाओं से बँधा हुआ है, फिर भी वह अपने को जगत् का स्वामी मानता है | यही मोह कहलाता है | मुक्त होने पर पुरुष का मोह दूर हो जाता है और वह स्वेच्छा से भगवान् की इच्छानुसार कर्म करने के लिए परमेश्र्वर की शरण ग्रहण करता है | जीव को फाँसने का माया का अन्तिम पाश यह धारणा है कि वह ईश्र्वर है | जीव सोचता है कि अब वह बद्धजीव नहीं रहा, अब तो वह ईश्र्वर है | वह इतना मुर्ख होता है कि वह यह नहीं सोच पाता कि यदि वह ईश्र्वर होता तो इतना संशयग्रस्त क्यों रहता | वह इस पर विचार नहीं करता | इसलिए यही माया का अन्तिम पाश होता है | वस्तुतः माया से मुक्त होना भगवान् श्रीकृष्ण को समझना है और उनके आदेशानुसार कर्म करने के लिए सहमत होना है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस श्लोक में मोह शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | मोह ज्ञान का विरोधी होता है | वास्तविक ज्ञान तो यह समझना है कि प्रत्येक जीव भगवान् का शाश्र्वत सेवक है | लेकिन जीव अपने को इस स्थिति में न समझकर सोचता है कि वह सेवक नहीं, अपितु इस जगत् का स्वामी है , क्योंकि वह प्रकृति पर प्रभुत्व जताना चाहता है | यह मोह भगवत्कृपा से या शुद्ध भक्त की कृपा से जीता जा सकता है | इस मोह के दूर होने पर मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करने के लिए राजी हो जाता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृष्ण के आदेशानुसार कर्म करना कृष्णभावनामृत है | बद्धजीव माया द्वारा मोहित होने के कारण यह नहीं जान पाता कि परमेश्र्वर स्वामी हैं, जो ज्ञानमय हैं और सर्वसम्पत्तिवान हैं | वे अपने भक्तों को जो कुछ चाहे दे सकते हैं | वे सब के मित्र हैं और भक्तों पर विशेष कृपालु रहते हैं | वे प्रकृति तथा समस्त जीवों के अधीक्षक हैं | वे अक्षय काल के नियन्त्रक हैं और समस्त ऐश्र्वर्यों एवं शक्तियों से पूर्ण हैं | भगवान् भक्त को आत्मसमर्पण भी कर सकते हैं | जो उन्हें नहीं जानता वह मोह के वश में है, वह भक्त नहीं बल्कि माया का सेवक बन जाता है | लेकिन अर्जुन भगवान् से भगवद्गीता सुनकर समस्त मोह से मुक्त हो गया | वह यह समझ गया कि कृष्ण केवल उसके मित्र ही नहीं बल्कि भगवान् हैं और वह कृष्ण को वास्तव में समझ गया | अतएव भगवद्गीता का पाठ करने का अर्थ है कृष्ण को वास्तविकता के साथ जानना | जब व्यक्ति को पूर्ण ज्ञान होता है , तो वह स्वभावतः कृष्ण को आत्मसमर्पण करता है | जब अर्जुन समझ गया कि यह तो जनसंख्या की अनावश्यक वृद्धि को कम करने के लिए कृष्ण की योजना थी, तो उसने कृष्ण की इच्छानुसार युद्ध करना स्वीकार कर लिया | उसने पुनः भगवान् के आदेशानुसार युद्ध करने के लिए अपना धनुष-बाण ग्रहण कर लिया |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.72&amp;diff=492047</id>
		<title>HI/BG 18.72</title>
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		<updated>2020-08-18T09:53:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 72 ====&lt;br /&gt;
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:कच्चिदेतच्छ्रुतं पार्थ त्वयैकाग्रेण चेतसा ।&lt;br /&gt;
:कच्चिदज्ञानसम्मोहः प्रनष्टस्ते धनञ्जय ॥७२॥&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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कच्चित्—क्या; एतत्—यह; श्रुतम्—सुना गया; पार्थ—हे पृथापुत्र; त्वया—तुम्हारे द्वारा; एक-अग्रेण—एकाग्र; चेतसा—मन से; कच्चित्—क्या; अज्ञान—अज्ञान का; सम्मोह:—मोह, भ्रम; प्रणष्ट:—दूर हो गया; ते—तुम्हारा; धनञ्जय—हे सम्पत्ति के विजेता (अर्जुन)।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे पृथापुत्र! हे धनञ्जय! क्या तुमने इसे (इस शास्त्र को) एकाग्र चित्त होकर सुना? और क्या अब तुम्हारा अज्ञान तथा मोह दूर हो गया है ?&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
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भगवान् अर्जुन के गुरु का काम कर रहे थे | अतएव यह उनका धर्म था कि अर्जुन से पूछते कि उसने पूरी भगवद्गीता ढंग से समझ ली है या नहीं | यदि नहीं समझी है, तो भगवान् उसे फिर से किसी अंश विशेष या पूरी भगवद्गीता बताने को तैयार हैं | वस्तुतः जो भी व्यक्ति कृष्ण जैसे प्रामाणिक गुरु या उनके प्रतिनिधि से भगवद्गीता सुनता है, उसका सारा अज्ञान दूर हो जाता है | भगवद्गीता कोई सामान्य ग्रंथ नहीं, जिसे किसी कवि या उपन्यासकार ने लिखा हो, इसे साक्षात् भगवान् ने कहा है | जो भाग्यशाली व्यक्ति इन उपदेशों को कृष्ण से या उनके किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक प्रतिनिधि से सुनता है, वह अवश्य ही मुक्त पुरुष बनकर अज्ञान के अंधकार को पार कर लेता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.72&amp;diff=492046</id>
		<title>HI/BG 18.72</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.72&amp;diff=492046"/>
		<updated>2020-08-18T09:53:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H72]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 18| अध्याय १८: उपसंहार – संन्यास की सिद्धि]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 72 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
कच्चित्—क्या; एतत्—यह; श्रुतम्—सुना गया; पार्थ—हे पृथापुत्र; त्वया—तुम्हारे द्वारा; एक-अग्रेण—एकाग्र; चेतसा—मन से; कच्चित्—क्या; अज्ञान—अज्ञान का; सम्मोह:—मोह, भ्रम; प्रणष्ट:—दूर हो गया; ते—तुम्हारा; धनञ्जय—हे सम्पत्ति के विजेता (अर्जुन)।&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे पृथापुत्र! हे धनञ्जय! क्या तुमने इसे (इस शास्त्र को) एकाग्र चित्त होकर सुना? और क्या अब तुम्हारा अज्ञान तथा मोह दूर हो गया है ?&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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भगवान् अर्जुन के गुरु का काम कर रहे थे | अतएव यह उनका धर्म था कि अर्जुन से पूछते कि उसने पूरी भगवद्गीता ढंग से समझ ली है या नहीं | यदि नहीं समझी है, तो भगवान् उसे फिर से किसी अंश विशेष या पूरी भगवद्गीता बताने को तैयार हैं | वस्तुतः जो भी व्यक्ति कृष्ण जैसे प्रामाणिक गुरु या उनके प्रतिनिधि से भगवद्गीता सुनता है, उसका सारा अज्ञान दूर हो जाता है | भगवद्गीता कोई सामान्य ग्रंथ नहीं, जिसे किसी कवि या उपन्यासकार ने लिखा हो, इसे साक्षात् भगवान् ने कहा है | जो भाग्यशाली व्यक्ति इन उपदेशों को कृष्ण से या उनके किसी प्रामाणिक आध्यात्मिक प्रतिनिधि से सुनता है, वह अवश्य ही मुक्त पुरुष बनकर अज्ञान के अंधकार को पार कर लेता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.71&amp;diff=492045</id>
		<title>HI/BG 18.71</title>
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		<updated>2020-08-18T09:52:39Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H71]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 18| अध्याय १८: उपसंहार – संन्यास की सिद्धि]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== श्लोक 71 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:श्रद्धावाननसूयश्च शृणुयादपि यो नरः ।&lt;br /&gt;
:सोऽपि मुक्तः शुभाँल्लोकान्प्राप्नुयात्पुण्यकर्मणाम् ॥७१॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रद्धा-वान्—श्रद्धालु; अनसूय:—द्वेषरहित; च—तथा; शृणुयात्—सुनता है; अपि—निश्चय ही; य:—जो; नर:—मनुष्य; स:—वह; अपि—भी; मुक्त:—मुक्त होकर; शुभान्—शुभ; लोकान्—लोकों को; प्राह्रश्वनुयात्—प्राह्रश्वत करता है; पुण्य-कर्मणाम्—पुण्यात्माओं का।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
और जो श्रद्धा समेत और द्वेषरहित होकर इसे सुनता है, वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है और उन शुभ लोकों को प्राप्त होता है, जहाँ पुण्यात्माएँ निवास करती हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस अध्याय के ६७वें श्लोक में भगवान् ने स्पष्टतः मना किया है कि जो लोग उनसे द्वेष रखते हैं उन्हें गीता न सुनाई जाए | भगवद्गीता केवल भक्तों के लिए है | लेकिन ऐसा होता है कि कभी-कभी भगवद्भक्त आम कक्षा में प्रवचन करता है और उस कक्षा में सारे छात्रों के भक्त होने की अपेक्षा नहीं की जाती | तो फिर ऐसे लोग खुली कक्षा क्यों चलाते हैं ? यहाँ यह बताया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति भक्त नहीं होता, फिर भी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो कृष्ण से द्वेष नहीं रखते | उन्हें कृष्ण पर परमेश्र्वर रूप में श्रद्धा रहती है | यदि ऐसे लोग भगवान् के बारे में किसी प्रामाणिक भक्त से सुनते हैं, तो वे अपने पापों से तुरन्त मुक्त हो जाते हैं और ऐसे लोक को प्राप्त होते हैं, जहाँ पुण्यात्माएँ वास करती हैं | अतएव भगवद्गीता के श्रवण मात्र से ऐसे व्यक्ति को भी पुण्यकर्मों का फल प्राप्त हो जाता है, जो अपने को शुद्ध भक्त बनाने का प्रयत्न नहीं करता | इस प्रकार भगवद्भक्त हर एक व्यक्ति के लिए अवसर प्रदान करता है कि वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान् का भक्त बने |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामान्यतया जो लोग पापों से मुक्त हैं, जो पुण्यात्मा हैं, वे अत्यन्त सरलता से कृष्णभावनामृत को ग्रहण कर लेते हैं | यहाँ पर पुण्यकर्मणाम् शब्द अत्यन्त सार्थक है | यह वैदिक साहित्य में वर्णित अश्र्वमेव यज्ञ जैसे महान यज्ञों का सूचक है | जो भक्ति का आचरण करने वाले पुण्यात्मा हैं, किन्तु शुद्ध नहीं होते, वे ध्रुवलोक को प्राप्त होते हैं, जहाँ ध्रुव महाराज की अध्यक्षता है | वे भगवान् के महान भक्त हैं और उनका अपना विशेष लोक है, जो ध्रुव तारा या ध्रुवलोक कहलाता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.71&amp;diff=492044</id>
		<title>HI/BG 18.71</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.71&amp;diff=492044"/>
		<updated>2020-08-18T09:52:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H71]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 18| अध्याय १८: उपसंहार – संन्यास की सिद्धि]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 71 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:&#039;&#039;j&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रद्धा-वान्—श्रद्धालु; अनसूय:—द्वेषरहित; च—तथा; शृणुयात्—सुनता है; अपि—निश्चय ही; य:—जो; नर:—मनुष्य; स:—वह; अपि—भी; मुक्त:—मुक्त होकर; शुभान्—शुभ; लोकान्—लोकों को; प्राह्रश्वनुयात्—प्राह्रश्वत करता है; पुण्य-कर्मणाम्—पुण्यात्माओं का।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
और जो श्रद्धा समेत और द्वेषरहित होकर इसे सुनता है, वह सारे पापों से मुक्त हो जाता है और उन शुभ लोकों को प्राप्त होता है, जहाँ पुण्यात्माएँ निवास करती हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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इस अध्याय के ६७वें श्लोक में भगवान् ने स्पष्टतः मना किया है कि जो लोग उनसे द्वेष रखते हैं उन्हें गीता न सुनाई जाए | भगवद्गीता केवल भक्तों के लिए है | लेकिन ऐसा होता है कि कभी-कभी भगवद्भक्त आम कक्षा में प्रवचन करता है और उस कक्षा में सारे छात्रों के भक्त होने की अपेक्षा नहीं की जाती | तो फिर ऐसे लोग खुली कक्षा क्यों चलाते हैं ? यहाँ यह बताया गया है कि प्रत्येक व्यक्ति भक्त नहीं होता, फिर भी बहुत से लोग ऐसे हैं, जो कृष्ण से द्वेष नहीं रखते | उन्हें कृष्ण पर परमेश्र्वर रूप में श्रद्धा रहती है | यदि ऐसे लोग भगवान् के बारे में किसी प्रामाणिक भक्त से सुनते हैं, तो वे अपने पापों से तुरन्त मुक्त हो जाते हैं और ऐसे लोक को प्राप्त होते हैं, जहाँ पुण्यात्माएँ वास करती हैं | अतएव भगवद्गीता के श्रवण मात्र से ऐसे व्यक्ति को भी पुण्यकर्मों का फल प्राप्त हो जाता है, जो अपने को शुद्ध भक्त बनाने का प्रयत्न नहीं करता | इस प्रकार भगवद्भक्त हर एक व्यक्ति के लिए अवसर प्रदान करता है कि वह समस्त पापों से मुक्त होकर भगवान् का भक्त बने |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सामान्यतया जो लोग पापों से मुक्त हैं, जो पुण्यात्मा हैं, वे अत्यन्त सरलता से कृष्णभावनामृत को ग्रहण कर लेते हैं | यहाँ पर पुण्यकर्मणाम् शब्द अत्यन्त सार्थक है | यह वैदिक साहित्य में वर्णित अश्र्वमेव यज्ञ जैसे महान यज्ञों का सूचक है | जो भक्ति का आचरण करने वाले पुण्यात्मा हैं, किन्तु शुद्ध नहीं होते, वे ध्रुवलोक को प्राप्त होते हैं, जहाँ ध्रुव महाराज की अध्यक्षता है | वे भगवान् के महान भक्त हैं और उनका अपना विशेष लोक है, जो ध्रुव तारा या ध्रुवलोक कहलाता है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 18.70| BG 18.70]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 18.70|BG 18.70]] - [[HI/BG 18.72|BG 18.72]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 18.72| BG 18.72]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.70&amp;diff=492043</id>
		<title>HI/BG 18.70</title>
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		<updated>2020-08-18T09:51:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 70 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:अध्येष्यते च य इमं धर्म्यं संवादमावयोः ।&lt;br /&gt;
:ज्ञानयज्ञेन तेनाहमिष्टः स्यामिति मे मतिः ॥७०॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अध्येष्यते—अध्ययन या पाठ करेगा; च—भी; य:—जो; इमम्—इस; धम्र्यम्—पवित्र; संवादम्—वार्तालाप या संवाद को; आवयो:—हम दोनों के; ज्ञान—ज्ञान रूपी; यज्ञेन—यज्ञ से; तेन—उसके द्वारा; अहम्—मैं; इष्ट:—पूजित; स्याम्—होऊँगा; इति—इस प्रकार; मे—मेरा; मति:—मत।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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और मैं घोषित करता हूँ कि जो हमारे इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि से मेरी पूजा करता है |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.70&amp;diff=492042</id>
		<title>HI/BG 18.70</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.70&amp;diff=492042"/>
		<updated>2020-08-18T09:51:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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==== श्लोक 70 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:&#039;&#039;k&#039;&#039;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अध्येष्यते—अध्ययन या पाठ करेगा; च—भी; य:—जो; इमम्—इस; धम्र्यम्—पवित्र; संवादम्—वार्तालाप या संवाद को; आवयो:—हम दोनों के; ज्ञान—ज्ञान रूपी; यज्ञेन—यज्ञ से; तेन—उसके द्वारा; अहम्—मैं; इष्ट:—पूजित; स्याम्—होऊँगा; इति—इस प्रकार; मे—मेरा; मति:—मत।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
और मैं घोषित करता हूँ कि जो हमारे इस पवित्र संवाद का अध्ययन करता है, वह अपनी बुद्धि से मेरी पूजा करता है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.69&amp;diff=492041</id>
		<title>HI/BG 18.69</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.69&amp;diff=492041"/>
		<updated>2020-08-18T09:50:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H69]]&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 69 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:न च तस्मान्मनुष्येषु कश्चिन्मे प्रियकृत्तमः ।&lt;br /&gt;
:भविता न च मे तस्मादन्यः प्रियतरो भुवि ॥६९॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
न—कभी नहीं; च—तथा; तस्मात्—उसकी अपेक्षा; मनुष्येषु—मनुष्यों में; कश्चित्—कोई; मे—मुझको; प्रिय-कृत्-तम:—अत्यन्त प्रिय; भविता—होगा; न—न तो; च—तथा; मे—मुझको; तस्मात्—उसकी अपेक्षा, उससे; अन्य:—कोई दूसरा; प्रिय-तर:—अधिक प्रिय; भुवि—इस संसार में।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस संसार में उसकी अपेक्षा कोई अन्य सेवक न तो मुझे अधिक प्रिय है और न कभी होगा |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.69&amp;diff=492040</id>
		<title>HI/BG 18.69</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.69&amp;diff=492040"/>
		<updated>2020-08-18T09:50:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H69]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 18| अध्याय १८: उपसंहार – संन्यास की सिद्धि]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 69 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:&#039;&#039;j&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
न—कभी नहीं; च—तथा; तस्मात्—उसकी अपेक्षा; मनुष्येषु—मनुष्यों में; कश्चित्—कोई; मे—मुझको; प्रिय-कृत्-तम:—अत्यन्त प्रिय; भविता—होगा; न—न तो; च—तथा; मे—मुझको; तस्मात्—उसकी अपेक्षा, उससे; अन्य:—कोई दूसरा; प्रिय-तर:—अधिक प्रिय; भुवि—इस संसार में।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस संसार में उसकी अपेक्षा कोई अन्य सेवक न तो मुझे अधिक प्रिय है और न कभी होगा |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 18.68| BG 18.68]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 18.68|BG 18.68]] - [[HI/BG 18.70|BG 18.70]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 18.70| BG 18.70]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.68&amp;diff=492039</id>
		<title>HI/BG 18.68</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.68&amp;diff=492039"/>
		<updated>2020-08-18T09:49:36Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H68]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 18| अध्याय १८: उपसंहार – संन्यास की सिद्धि]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 68 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:य इदं परमं गुह्यं मद्भक्तेष्वभिधास्यति ।&lt;br /&gt;
:भक्तिं मयि परां कृत्वा मामेवैष्यत्यसंशयः ॥६८॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
य:—जो; इदम्—इस; परमम्—अत्यन्त; गुह्यम्—रहस्य को; मत्—मेरे; भक्तेषु—भक्तों में से; अभिधास्यति—कहता है; भक्तिम्—भक्ति को; मयि—मुझको; पराम्—दिव्य; कृत्वा—करके; माम्—मुझको; एव—निश्चय ही; एष्यति—प्राह्रश्वत होता है; असंशय:—इसमें कोई सन्देह नहीं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो व्यक्ति भक्तों को यह परम रहस्य बताता है, वह शुद्ध भक्ति को प्राप्त करेगा और अन्त में वह मेरे पास वापस आएगा |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सामान्यतः यह उपदेश दिया जाता है कि केवल भक्तों के बीच में भगवद्गीता की विवेचना की जाय, क्योंकि जो लोग भक्त नहीं हैं, वे न तो कृष्ण को समझेंगे, न ही भगवद्गीता को | जो लोग कृष्ण को तथा भगवद्गीता को यथारूप में स्वीकार नहीं करते,उन्हें मनमाने ढंग से भगवद्गीता की व्याख्या करने का प्रयत्न करने का अपराध मोल नहीं लेना चाहिए | भगवद्गीता की विवेचना उन्हीं से की जाय, जो कृष्ण को भगवान् के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हों | यह एकमात्र भक्तों का विषय है, दार्शनिक चिन्तकों का नहीं, लेकिन जो कोई भगवद्गीता को यथारूप में प्रस्तुत करने का सच्चे मन से प्रयास करता है, वह भक्ति के कार्यकलापों में प्रगति करता है और शुद्ध भक्तिमय जीवन को प्राप्त होता है | ऐसी शुद्धभक्ति के फलस्वरूप उसका भगवद्धाम जानाध्रुव है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.68&amp;diff=492038</id>
		<title>HI/BG 18.68</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.68&amp;diff=492038"/>
		<updated>2020-08-18T09:49:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H68]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 18| अध्याय १८: उपसंहार – संन्यास की सिद्धि]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 68 ====&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
य:—जो; इदम्—इस; परमम्—अत्यन्त; गुह्यम्—रहस्य को; मत्—मेरे; भक्तेषु—भक्तों में से; अभिधास्यति—कहता है; भक्तिम्—भक्ति को; मयि—मुझको; पराम्—दिव्य; कृत्वा—करके; माम्—मुझको; एव—निश्चय ही; एष्यति—प्राह्रश्वत होता है; असंशय:—इसमें कोई सन्देह नहीं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो व्यक्ति भक्तों को यह परम रहस्य बताता है, वह शुद्ध भक्ति को प्राप्त करेगा और अन्त में वह मेरे पास वापस आएगा |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सामान्यतः यह उपदेश दिया जाता है कि केवल भक्तों के बीच में भगवद्गीता की विवेचना की जाय, क्योंकि जो लोग भक्त नहीं हैं, वे न तो कृष्ण को समझेंगे, न ही भगवद्गीता को | जो लोग कृष्ण को तथा भगवद्गीता को यथारूप में स्वीकार नहीं करते,उन्हें मनमाने ढंग से भगवद्गीता की व्याख्या करने का प्रयत्न करने का अपराध मोल नहीं लेना चाहिए | भगवद्गीता की विवेचना उन्हीं से की जाय, जो कृष्ण को भगवान् के रूप में स्वीकार करने के लिए तैयार हों | यह एकमात्र भक्तों का विषय है, दार्शनिक चिन्तकों का नहीं, लेकिन जो कोई भगवद्गीता को यथारूप में प्रस्तुत करने का सच्चे मन से प्रयास करता है, वह भक्ति के कार्यकलापों में प्रगति करता है और शुद्ध भक्तिमय जीवन को प्राप्त होता है | ऐसी शुद्धभक्ति के फलस्वरूप उसका भगवद्धाम जानाध्रुव है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.67&amp;diff=492037</id>
		<title>HI/BG 18.67</title>
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		<updated>2020-08-18T09:48:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 67 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:इदं ते नातपस्काय नाभक्ताय कदाचन ।&lt;br /&gt;
:न चाशुश्रूषवे वाच्यं न च मां योऽभ्यसूयति ॥६७॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इदम्—यह; ते—तुम्हारे द्वारा; न—कभी नहीं; अतपस्काय—असंयमी के लिए; न—कभी नहीं; अभक्ताय—अभक्त के लिए; कदाचन—किसी समय; न—कभी नहीं; च—भी; अशुश्रूषवे—जो भक्ति में रत नहीं है; वाच्यम्—कहने के लिए; न—कभी नहीं; च—भी; माम्—मेरे प्रति; य:—जो; अभ्यसूयति—द्वेष करता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यह गुह्यज्ञान उनको कभी भी न बताया जाय जो न तो संयमी हैं, न एकनिष्ठ, न भक्ति में रत हैं, न ही उसे जो मुझसे द्वेष करता हो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जिन लोगों ने तपस्यामय धार्मिक अनुष्ठान नहीं किये, जिन्होंने कृष्णभावनामृत में भक्ति का कभी प्रयत्न नहीं किया, जिन्होंने किसी शुद्धभक्त की सेवा नहीं की तथा विशेषतया जो लोग कृष्ण को केवल ऐतिहासिक पुरुष मानते हैं, या जो कृष्ण की महानता से द्वेष रखते हैं, उन्हें यह परम गुह्यज्ञान नहीं बताना चाहिए | लेकिन कभी-कभी यह देखा जाता है कि कृष्ण से द्वेष रखने वाले आसुरी पुरुष भीकृष्ण की पूजा भिन्न प्रकार से करते हैं और व्यवसाय चलाने के लिए भगवद्गीता का प्रवचन करने का धंधा अपना लेते हैं |लेकिन जो सचमुच कृष्ण को जानने का इच्छुक हो उसे भगवद्गीता के ऐसे भाष्यों से बचना चाहिए | वास्तव में कामी लोग भगवद्गीता के प्रयोजन को नहीं समझ पाते | यदि कोई कामी भी न हो और वैदिक शास्त्रों द्वारा आदिष्ट नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करता हो, लेकिन यदि वह भक्त नहीं है, तो वह कृष्ण को नहीं समझ सकता | और यदि वह अपने को कृष्णभक्त बताता है, लेकिन कृष्णभावनाभावित कार्यकलापों में रत नहीं रहता, तब भी वह कृष्ण को नहीं समझ पाता | ऐसे बहुत से लोग हैं, जो भगवान् से इसलिए द्वेष रखते हैं, क्योंकि उन्होंनेभगवद्गीता में कहा है कि वे परम हैं और कोई न तो उनसे बढ़कर, न उनके समान है | ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं, जो कृष्ण से द्वेषरखते हैं | ऐसे लोगों को भगवद्गीता नहीं सुनाना चाहिए, क्योंकि वे उसे समझ नहीं पाते | श्रद्धाविहीन लोग भगवद्गीतातथा कृष्ण को नहीं समझ पाएँगे | शुद्धभक्त से कृष्ण को समझे बिना किसी को भगवद्गीता की टीका करने का साहस नहीं करना चाहिए |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 18.66| BG 18.66]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 18.66|BG 18.66]] - [[HI/BG 18.68|BG 18.68]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 18.68| BG 18.68]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.67&amp;diff=492036</id>
		<title>HI/BG 18.67</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.67&amp;diff=492036"/>
		<updated>2020-08-18T09:48:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H67]]&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 18.66| BG 18.66]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 18.66|BG 18.66]] - [[HI/BG 18.68|BG 18.68]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 18.68| BG 18.68]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 67 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;verse&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:&#039;&#039;j&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इदम्—यह; ते—तुम्हारे द्वारा; न—कभी नहीं; अतपस्काय—असंयमी के लिए; न—कभी नहीं; अभक्ताय—अभक्त के लिए; कदाचन—किसी समय; न—कभी नहीं; च—भी; अशुश्रूषवे—जो भक्ति में रत नहीं है; वाच्यम्—कहने के लिए; न—कभी नहीं; च—भी; माम्—मेरे प्रति; य:—जो; अभ्यसूयति—द्वेष करता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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यह गुह्यज्ञान उनको कभी भी न बताया जाय जो न तो संयमी हैं, न एकनिष्ठ, न भक्ति में रत हैं, न ही उसे जो मुझसे द्वेष करता हो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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जिन लोगों ने तपस्यामय धार्मिक अनुष्ठान नहीं किये, जिन्होंने कृष्णभावनामृत में भक्ति का कभी प्रयत्न नहीं किया, जिन्होंने किसी शुद्धभक्त की सेवा नहीं की तथा विशेषतया जो लोग कृष्ण को केवल ऐतिहासिक पुरुष मानते हैं, या जो कृष्ण की महानता से द्वेष रखते हैं, उन्हें यह परम गुह्यज्ञान नहीं बताना चाहिए | लेकिन कभी-कभी यह देखा जाता है कि कृष्ण से द्वेष रखने वाले आसुरी पुरुष भीकृष्ण की पूजा भिन्न प्रकार से करते हैं और व्यवसाय चलाने के लिए भगवद्गीता का प्रवचन करने का धंधा अपना लेते हैं |लेकिन जो सचमुच कृष्ण को जानने का इच्छुक हो उसे भगवद्गीता के ऐसे भाष्यों से बचना चाहिए | वास्तव में कामी लोग भगवद्गीता के प्रयोजन को नहीं समझ पाते | यदि कोई कामी भी न हो और वैदिक शास्त्रों द्वारा आदिष्ट नियमों का दृढ़तापूर्वक पालन करता हो, लेकिन यदि वह भक्त नहीं है, तो वह कृष्ण को नहीं समझ सकता | और यदि वह अपने को कृष्णभक्त बताता है, लेकिन कृष्णभावनाभावित कार्यकलापों में रत नहीं रहता, तब भी वह कृष्ण को नहीं समझ पाता | ऐसे बहुत से लोग हैं, जो भगवान् से इसलिए द्वेष रखते हैं, क्योंकि उन्होंनेभगवद्गीता में कहा है कि वे परम हैं और कोई न तो उनसे बढ़कर, न उनके समान है | ऐसे बहुत से व्यक्ति हैं, जो कृष्ण से द्वेषरखते हैं | ऐसे लोगों को भगवद्गीता नहीं सुनाना चाहिए, क्योंकि वे उसे समझ नहीं पाते | श्रद्धाविहीन लोग भगवद्गीतातथा कृष्ण को नहीं समझ पाएँगे | शुद्धभक्त से कृष्ण को समझे बिना किसी को भगवद्गीता की टीका करने का साहस नहीं करना चाहिए |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.66&amp;diff=492035</id>
		<title>HI/BG 18.66</title>
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		<updated>2020-08-18T09:47:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 66 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:सर्वधर्मान्परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज ।&lt;br /&gt;
:अहं त्वा सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ॥६६॥&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सर्व-धर्मान्—समस्त प्रकार के धर्म; परित्यज्य—त्यागकर; माम्—मेरी; एकम्—एकमात्र; शरणम्—शरण में; व्रज—जाओ; अहम्—मैं; त्वाम्—तुमको; सर्व—समस्त; पापेभ्य:—पापों से; मोक्षयिष्यामि—उद्धार करूँगा; मा—मत; शुच:—चिन्ता करो।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ । मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा । डरो मत ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान् ने अनेक प्रकार के ज्ञान तथा धर्म की विधियाँ बताई हैं – परब्रह्म का ज्ञान, परमात्मा का ज्ञान, अनेक प्रकार के आश्रमों तथा वर्णों का ज्ञान, संन्यास का ज्ञान, अनासक्ति, इन्द्रिय तथा मन का संयम, ध्यान आदि का ज्ञान । उन्होंने अनेक प्रकार से नाना प्रकार के धर्मों का वर्णन किया है । अब, भगवद्गीता का सार प्रस्तुत करते हुए भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! अभी तक बताई गई सारी विधियों का परित्याग करके, अब केवल मेरी शरण में आओ । इस शरणागति से वह समस्त पापों से बच जाएगा, क्योंकि भगवान् स्वयं उसकी रक्षा का वचन दे रहे हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातवें अध्याय में यह कहा गया था कि वही कृष्ण की पूजा कर सकता है, जो सारे पापों से मुक्त हो गया हो । इस प्रकार कोई यह सोच सकता है कि समस्त पापों से मुक्त हुए बिना कोई शरणागति नहीं पा सकता है । ऐसे सन्देह के लिए यहाँ यह कहा गया है कि कोई समस्त पापों ऐ मुक्त न भी हो तो केवल श्री कृष्ण के शरणागत होने पर स्वतः मुक्त कर दिया जाता है । पापों से मुक्त होने के लिए कठोर प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं है । मनुष्य को बिना झिझक के कृष्ण को समस्त जीवों के रक्षक के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए । उसे चाहिए कि श्रद्धा तथा प्रेम से उनकी शरण ग्रहण करे ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
हरि भक्ति विलास में (११.६७६) कृष्ण की शरण ग्रहण करने की विधि का वर्णन हुआ है –&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनुकूल्यस्य सङकल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्षिष्यतीति विश्र्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आत्मनिक्षेप कार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्तियोग के अनुसार मनुष्य हो वही धर्म स्वीकार करना चाहिए, जिससे अन्ततः भगवद्भक्ति हो सके | समाज में अपनी स्थिति के अनुसार कोई एक विशेष कर्म कर सकता है, लेकिन यदि अपना कर्म करने से कोई कृष्णभावनामृत तक नहीं पहुँच पाता,तो उसके सारे कार्यकलाप व्यर्थ हो जाते हैं | जिस कर्म से कृष्णभावनामृत की पूर्णावस्था न प्राप्त हो सके उससे बचना चाहिए | मनुष्य को विश्र्वास होना चाहिए कि कृष्ण समस्त परिस्थितियों में उसकी सभी कठिनाइयों से रक्षा करेंगे | इसके विषय में सोचने की कोई आवश्यकता नहीं कि जीवन-निर्वाह कैसे होगा? कृष्ण इसको सँभालेंगे | मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आप को निस्सहाय माने और अपने जीवन की प्रगति के लिए कृष्ण को ही अवलम्ब समझे | पूर्ण कृष्णभावनामृत होकर भगवद्भक्ति में प्रवृत्त होते ही वह प्रकृति के समस्त कल्मष से मुक्त हो जाता है | धर्म की विविध विधियाँ हैं और ज्ञान, ध्यानयोग आदि जैसे शुद्ध करने वाले अनुष्ठान हैं, लेकिन जो कृष्ण के शरणागत हो जाता है, उसे इतने सारे अनुष्ठानों के पालन की आवश्यकता नहीं रह जाती | कृष्ण की शरण में जाने मात्र से वह व्यर्थ समय गँवाने से बच जाएगा | इस प्रकार वह तुरन्त सारी उन्नति कर सकता है और समस्त पापों से मुक्त हो सकता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण की सुन्दर छवि के प्रति मनुष्य को आकृष्ट होना चाहिए | उनका नाम कृष्ण इसीलिए पड़ा, क्योंकि वे सर्वाकर्षक हैं | जो व्यक्ति कृष्ण की सुन्दर, सर्वशक्तिमान छवि से आकृष्ट होता है, वह भाग्यशाली है | अध्यात्मवादी कई प्रकार के होते हैं – कुछ निर्गुण ब्रह्म के प्रति आकृष्ट होते हैं, कुछ परमात्मा के प्रति लेकिन जो भगवान् के साकार रूप के प्रति आकृष्ट होता है और इससे भी बढ़कर जो साक्षात् भगवान् कृष्ण के प्रति आकृष्ट होता है, वह सर्वोच्च योगी है | दूसरे शब्दों में, अनन्यभाव से कृष्ण की भक्ति गुह्यतम ज्ञान है और सम्पूर्ण गीता का यही सार है | कर्मयोगी, दार्शनिक, योगी तथा भक्त सभी अध्यात्मवादी कहलाते हैं, लेकिन इनमें से शुद्धभक्त ही सर्वश्रेष्ठ है | यहाँ पर मा शुचः (मत डरो, मत झिझको, मत चिन्ता करो) विशिष्ट शब्दों का प्रयोग अत्यन्तसार्थक है | मनुष्य को यह चिन्ता होती है कि वह किस प्रकार सारे धर्मों को त्यागे और एकमात्र कृष्ण की शरण में जाए,लेकिन ऐसी चिन्ता व्यर्थ है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.66&amp;diff=492034</id>
		<title>HI/BG 18.66</title>
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		<updated>2020-08-18T09:46:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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==== श्लोक 66 ====&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
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सर्व-धर्मान्—समस्त प्रकार के धर्म; परित्यज्य—त्यागकर; माम्—मेरी; एकम्—एकमात्र; शरणम्—शरण में; व्रज—जाओ; अहम्—मैं; त्वाम्—तुमको; सर्व—समस्त; पापेभ्य:—पापों से; मोक्षयिष्यामि—उद्धार करूँगा; मा—मत; शुच:—चिन्ता करो।&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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समस्त प्रकार के धर्मों का परित्याग करो और मेरी शरण में आओ । मैं समस्त पापों से तुम्हारा उद्धार कर दूँगा । डरो मत ।&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
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भगवान् ने अनेक प्रकार के ज्ञान तथा धर्म की विधियाँ बताई हैं – परब्रह्म का ज्ञान, परमात्मा का ज्ञान, अनेक प्रकार के आश्रमों तथा वर्णों का ज्ञान, संन्यास का ज्ञान, अनासक्ति, इन्द्रिय तथा मन का संयम, ध्यान आदि का ज्ञान । उन्होंने अनेक प्रकार से नाना प्रकार के धर्मों का वर्णन किया है । अब, भगवद्गीता का सार प्रस्तुत करते हुए भगवान् कहते हैं कि हे अर्जुन! अभी तक बताई गई सारी विधियों का परित्याग करके, अब केवल मेरी शरण में आओ । इस शरणागति से वह समस्त पापों से बच जाएगा, क्योंकि भगवान् स्वयं उसकी रक्षा का वचन दे रहे हैं ।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सातवें अध्याय में यह कहा गया था कि वही कृष्ण की पूजा कर सकता है, जो सारे पापों से मुक्त हो गया हो । इस प्रकार कोई यह सोच सकता है कि समस्त पापों से मुक्त हुए बिना कोई शरणागति नहीं पा सकता है । ऐसे सन्देह के लिए यहाँ यह कहा गया है कि कोई समस्त पापों ऐ मुक्त न भी हो तो केवल श्री कृष्ण के शरणागत होने पर स्वतः मुक्त कर दिया जाता है । पापों से मुक्त होने के लिए कठोर प्रयास करने की कोई आवश्यकता नहीं है । मनुष्य को बिना झिझक के कृष्ण को समस्त जीवों के रक्षक के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए । उसे चाहिए कि श्रद्धा तथा प्रेम से उनकी शरण ग्रहण करे ।&lt;br /&gt;
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हरि भक्ति विलास में (११.६७६) कृष्ण की शरण ग्रहण करने की विधि का वर्णन हुआ है –&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनुकूल्यस्य सङकल्पः प्रातिकूल्यस्य वर्जनम् |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
रक्षिष्यतीति विश्र्वासो गोप्तृत्वे वरणं तथा |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आत्मनिक्षेप कार्पण्ये षड्विधा शरणागतिः ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भक्तियोग के अनुसार मनुष्य हो वही धर्म स्वीकार करना चाहिए, जिससे अन्ततः भगवद्भक्ति हो सके | समाज में अपनी स्थिति के अनुसार कोई एक विशेष कर्म कर सकता है, लेकिन यदि अपना कर्म करने से कोई कृष्णभावनामृत तक नहीं पहुँच पाता,तो उसके सारे कार्यकलाप व्यर्थ हो जाते हैं | जिस कर्म से कृष्णभावनामृत की पूर्णावस्था न प्राप्त हो सके उससे बचना चाहिए | मनुष्य को विश्र्वास होना चाहिए कि कृष्ण समस्त परिस्थितियों में उसकी सभी कठिनाइयों से रक्षा करेंगे | इसके विषय में सोचने की कोई आवश्यकता नहीं कि जीवन-निर्वाह कैसे होगा? कृष्ण इसको सँभालेंगे | मनुष्य को चाहिए कि वह अपने आप को निस्सहाय माने और अपने जीवन की प्रगति के लिए कृष्ण को ही अवलम्ब समझे | पूर्ण कृष्णभावनामृत होकर भगवद्भक्ति में प्रवृत्त होते ही वह प्रकृति के समस्त कल्मष से मुक्त हो जाता है | धर्म की विविध विधियाँ हैं और ज्ञान, ध्यानयोग आदि जैसे शुद्ध करने वाले अनुष्ठान हैं, लेकिन जो कृष्ण के शरणागत हो जाता है, उसे इतने सारे अनुष्ठानों के पालन की आवश्यकता नहीं रह जाती | कृष्ण की शरण में जाने मात्र से वह व्यर्थ समय गँवाने से बच जाएगा | इस प्रकार वह तुरन्त सारी उन्नति कर सकता है और समस्त पापों से मुक्त हो सकता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीकृष्ण की सुन्दर छवि के प्रति मनुष्य को आकृष्ट होना चाहिए | उनका नाम कृष्ण इसीलिए पड़ा, क्योंकि वे सर्वाकर्षक हैं | जो व्यक्ति कृष्ण की सुन्दर, सर्वशक्तिमान छवि से आकृष्ट होता है, वह भाग्यशाली है | अध्यात्मवादी कई प्रकार के होते हैं – कुछ निर्गुण ब्रह्म के प्रति आकृष्ट होते हैं, कुछ परमात्मा के प्रति लेकिन जो भगवान् के साकार रूप के प्रति आकृष्ट होता है और इससे भी बढ़कर जो साक्षात् भगवान् कृष्ण के प्रति आकृष्ट होता है, वह सर्वोच्च योगी है | दूसरे शब्दों में, अनन्यभाव से कृष्ण की भक्ति गुह्यतम ज्ञान है और सम्पूर्ण गीता का यही सार है | कर्मयोगी, दार्शनिक, योगी तथा भक्त सभी अध्यात्मवादी कहलाते हैं, लेकिन इनमें से शुद्धभक्त ही सर्वश्रेष्ठ है | यहाँ पर मा शुचः (मत डरो, मत झिझको, मत चिन्ता करो) विशिष्ट शब्दों का प्रयोग अत्यन्तसार्थक है | मनुष्य को यह चिन्ता होती है कि वह किस प्रकार सारे धर्मों को त्यागे और एकमात्र कृष्ण की शरण में जाए,लेकिन ऐसी चिन्ता व्यर्थ है |&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.65&amp;diff=492033</id>
		<title>HI/BG 18.65</title>
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		<updated>2020-08-18T09:45:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 65 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:मन्मना भव मद्भक्तो मद्याजी मां नमस्कुरु ।&lt;br /&gt;
:मामेवैष्यसि सत्यं ते प्रतिजाने प्रियोऽसि मे ॥६५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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मत्-मना:—मेरे विषय में सोचते हुए; भव—होओ; मत्-भक्त:—मेरा भक्त; मत्याजी—मेरा पूजक; माम्—मुझको; नमस्कुरु—नमस्कार करो; माम्—मेरे पास; एव—ही; एष्यसि—आओगे; सत्यम्—सच-सच; ते—तुमसे; प्रतिजाने—वायदा या प्रतिज्ञा करता हूँ; प्रिय:—प्रिय; असि—हो; मे—मुझको।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो | इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे | मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे परम प्रियमित्र हो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
ज्ञान का गुह्यतम अंश है कि मनुष्य कृष्ण का शुद्ध भक्त बने, सदैव उन्हीं का चिन्तन करे और उन्हीं के लिए कर्म करे | व्यावसायिक ध्यानी बनना कठिन नहीं | जीवन को इस प्रकार ढालना चाहिए कि कृष्ण का चिन्तन करने का सदा अवसर प्राप्त हो | मनुष्य इस प्रकार कर्म करे कि उसके सारे नित्य कर्म कृष्ण के लिए हों | वह अपने जीवन को इस प्रकार व्यवस्थित करे कि चौबीसों घण्टे कृष्ण का ही चिन्तन करता रहे और भगवान् की प्रतिज्ञा है कि जो इस प्रकार कृष्णभावनामाय होगा, वह निश्चित रूप से कृष्णधाम को जाएगा जहाँ वह साक्षात् कृष्ण के सान्निध्य में रहेगा | यह गुह्यतम ज्ञान अर्जुन को इसीलिए बताया गया, क्योंकि वह कृष्ण का प्रिय मित्र (सखा) है | जो कोई भी अर्जुन के पथ का अनुसरण करता है, वह कृष्ण का प्रिय सखा बनकर अर्जुन जैसी ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है |&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
ये शब्द इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य को अपना मन उस कृष्ण पर एकाग्र करना चाहिए जो दोनों हाथों में वंशीधारण किये, सुन्दर मुखवाले तथा अपने बालों में मोर पंख धारण किये हुए साँवले बालक के रूप में हैं | कृष्ण का वर्णन ब्रह्मसंहिता तथा अन्य ग्रथों में पाया जाता है | मनुष्य को परम ईश्र्वर के आदि रूप कृष्ण पर अपने मन को एकाग्र करना चाहिए | उसे अपने मन को भगवान् के अन्य रूपों की ओर नहीं मोड़ना चाहिए | भगवान् के नाना रूप हैं, यथा विष्णु, नारायण,राम, वराह आदि | किन्तु भक्त को चाहिए कि अपने मन को उस एक रूप पर केन्द्रित करे जो अर्जुन के समक्ष था | कृष्ण के रूप पर मन की यह एकाग्रता ज्ञान का गुह्यतम अंश है जिसका प्रकटीकरण अर्जुन के लिए किया गया, क्योंकि वह कृष्ण का अत्यन्त प्रिय सखा है |&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.65&amp;diff=492032</id>
		<title>HI/BG 18.65</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.65&amp;diff=492032"/>
		<updated>2020-08-18T09:45:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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==== श्लोक 65 ====&lt;br /&gt;
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:&#039;&#039;j&#039;&#039;&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मत्-मना:—मेरे विषय में सोचते हुए; भव—होओ; मत्-भक्त:—मेरा भक्त; मत्याजी—मेरा पूजक; माम्—मुझको; नमस्कुरु—नमस्कार करो; माम्—मेरे पास; एव—ही; एष्यसि—आओगे; सत्यम्—सच-सच; ते—तुमसे; प्रतिजाने—वायदा या प्रतिज्ञा करता हूँ; प्रिय:—प्रिय; असि—हो; मे—मुझको।&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सदैव मेरा चिन्तन करो, मेरे भक्त बनो, मेरी पूजा करो और मुझे नमस्कार करो | इस प्रकार तुम निश्चित रूप से मेरे पास आओगे | मैं तुम्हें वचन देता हूँ, क्योंकि तुम मेरे परम प्रियमित्र हो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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ज्ञान का गुह्यतम अंश है कि मनुष्य कृष्ण का शुद्ध भक्त बने, सदैव उन्हीं का चिन्तन करे और उन्हीं के लिए कर्म करे | व्यावसायिक ध्यानी बनना कठिन नहीं | जीवन को इस प्रकार ढालना चाहिए कि कृष्ण का चिन्तन करने का सदा अवसर प्राप्त हो | मनुष्य इस प्रकार कर्म करे कि उसके सारे नित्य कर्म कृष्ण के लिए हों | वह अपने जीवन को इस प्रकार व्यवस्थित करे कि चौबीसों घण्टे कृष्ण का ही चिन्तन करता रहे और भगवान् की प्रतिज्ञा है कि जो इस प्रकार कृष्णभावनामाय होगा, वह निश्चित रूप से कृष्णधाम को जाएगा जहाँ वह साक्षात् कृष्ण के सान्निध्य में रहेगा | यह गुह्यतम ज्ञान अर्जुन को इसीलिए बताया गया, क्योंकि वह कृष्ण का प्रिय मित्र (सखा) है | जो कोई भी अर्जुन के पथ का अनुसरण करता है, वह कृष्ण का प्रिय सखा बनकर अर्जुन जैसी ही सिद्धि प्राप्त कर सकता है |&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
ये शब्द इस बात पर बल देते हैं कि मनुष्य को अपना मन उस कृष्ण पर एकाग्र करना चाहिए जो दोनों हाथों में वंशीधारण किये, सुन्दर मुखवाले तथा अपने बालों में मोर पंख धारण किये हुए साँवले बालक के रूप में हैं | कृष्ण का वर्णन ब्रह्मसंहिता तथा अन्य ग्रथों में पाया जाता है | मनुष्य को परम ईश्र्वर के आदि रूप कृष्ण पर अपने मन को एकाग्र करना चाहिए | उसे अपने मन को भगवान् के अन्य रूपों की ओर नहीं मोड़ना चाहिए | भगवान् के नाना रूप हैं, यथा विष्णु, नारायण,राम, वराह आदि | किन्तु भक्त को चाहिए कि अपने मन को उस एक रूप पर केन्द्रित करे जो अर्जुन के समक्ष था | कृष्ण के रूप पर मन की यह एकाग्रता ज्ञान का गुह्यतम अंश है जिसका प्रकटीकरण अर्जुन के लिए किया गया, क्योंकि वह कृष्ण का अत्यन्त प्रिय सखा है |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.64&amp;diff=492031</id>
		<title>HI/BG 18.64</title>
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		<updated>2020-08-18T09:44:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 64 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:सर्वगुह्यतमं भूयः शृणु मे परमं वचः ।&lt;br /&gt;
:इष्टोऽसि मे दृढमिति ततो वक्ष्यामि ते हितम् ॥६४॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सर्व-गुह्य-तमम्—सबों में अत्यन्त गुह्य; भूय:—पुन:; शृणु—सुनो; मे—मुझसे; परमम्—परम; वच:—आदेश; इष्ट: असि—तुम प्रिय हो; मे—मेरे, मुझको; ²ढम्—अत्यन्त; इति—इस प्रकार; तत:—अतएव; वक्ष्यामि—कह रहा हूँ; ते—तुम्हारे; हितम्—लाभ के लिए।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चूँकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो, अतएव मैं तुम्हें अपना परम आदेश, जो सर्वाधिक गुह्यज्ञान है, बता रहा हूँ |इसे अपने हित के लिए सुनो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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अर्जुन को गुह्यज्ञान (ब्रह्मज्ञान) तथा गुह्यतरज्ञान (परमात्मा ज्ञान) प्रदान करने के बाद भगवान् अब उसे गुह्यतमज्ञान प्रदान करने जा रहे हैं – यह है भगवान् के शरणागत होने का ज्ञान | नवें अध्याय में उन्होंने कहा था – मन्मनाः – सदैवमेरा चिन्तन करो | उसी आदेश को यहाँ पर भगवद्गीता के सार के रूप में जोर देने के लिए दुहराया जा रहा है, यह सार सामान्यजन की समझ में नहीं आता | लेकिन जो कृष्ण को सचमुच अत्यन्त प्रिय है, कृष्ण का शुद्धभक्त है, वह समझ लेता है | सारे वैदिक साहित्य में यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आदेश है | इस प्रसंग में जो कुछ कृष्ण कहते हैं,वह ज्ञान का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंश है और इसका पालन न केवल अर्जुन द्वारा होना चाहिए, अपितु समस्त जीवों द्वारा होना चाहिए |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.64&amp;diff=492030</id>
		<title>HI/BG 18.64</title>
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		<updated>2020-08-18T09:44:07Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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==== श्लोक 64 ====&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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सर्व-गुह्य-तमम्—सबों में अत्यन्त गुह्य; भूय:—पुन:; शृणु—सुनो; मे—मुझसे; परमम्—परम; वच:—आदेश; इष्ट: असि—तुम प्रिय हो; मे—मेरे, मुझको; ²ढम्—अत्यन्त; इति—इस प्रकार; तत:—अतएव; वक्ष्यामि—कह रहा हूँ; ते—तुम्हारे; हितम्—लाभ के लिए।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चूँकि तुम मेरे अत्यन्त प्रिय मित्र हो, अतएव मैं तुम्हें अपना परम आदेश, जो सर्वाधिक गुह्यज्ञान है, बता रहा हूँ |इसे अपने हित के लिए सुनो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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अर्जुन को गुह्यज्ञान (ब्रह्मज्ञान) तथा गुह्यतरज्ञान (परमात्मा ज्ञान) प्रदान करने के बाद भगवान् अब उसे गुह्यतमज्ञान प्रदान करने जा रहे हैं – यह है भगवान् के शरणागत होने का ज्ञान | नवें अध्याय में उन्होंने कहा था – मन्मनाः – सदैवमेरा चिन्तन करो | उसी आदेश को यहाँ पर भगवद्गीता के सार के रूप में जोर देने के लिए दुहराया जा रहा है, यह सार सामान्यजन की समझ में नहीं आता | लेकिन जो कृष्ण को सचमुच अत्यन्त प्रिय है, कृष्ण का शुद्धभक्त है, वह समझ लेता है | सारे वैदिक साहित्य में यह सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण आदेश है | इस प्रसंग में जो कुछ कृष्ण कहते हैं,वह ज्ञान का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण अंश है और इसका पालन न केवल अर्जुन द्वारा होना चाहिए, अपितु समस्त जीवों द्वारा होना चाहिए |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.63&amp;diff=492029</id>
		<title>HI/BG 18.63</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.63&amp;diff=492029"/>
		<updated>2020-08-18T09:43:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 63 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:इति ते ज्ञानमाख्यातं गुह्याद्गुह्यतरं मया ।&lt;br /&gt;
:विमृश्यैतदशेषेण यथेच्छसि तथा कुरु ॥६३॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इति—इस प्रकार; ते—तुमको; ज्ञानम्—ज्ञान; आख्यातम्—वर्णन किया गया; गुह्यात्—गुह्य से; गुह्य-तरम्—अधिक गुह्य; मया—मेरे द्वारा; विमृश्य—मनन करके; एतत्—इस; अशेषेण—पूर्णतया; यथा—जैसी; इच्छसि—इच्छा हो; तथा—वैसा ही; कुरु—करो।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्यतर ज्ञान बतला दिया | इस पर पूरी तरह से मनन करो और तब जो चाहे सो करो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान् ने पहले ही अर्जुन को ब्रहभूत ज्ञान बतला दिया है | जो इस ब्रहभूत अवस्था में होता है, वह प्रसन्न रहता है,न तो वह शोक करता है, न किसी वस्तु की कामना करता है | ऐसा गुह्यज्ञान के कारण होता है | कृष्ण परमात्मा का ज्ञान भी प्रकट करते हैं | यह ब्रह्मज्ञान भी है, लेकिन यह उससे श्रेष्ठ है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ पर यथेच्छसि तथा कुरु – जैसे इच्छा हो वैसा करो – यह सूचित करता है कि ईश्र्वर जीव की यत्किंचित स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करता | भगवद्गीता में भगवान् ने सभी प्रकार से यह बतलाया है कि कोई अपनी जीवन दशा को किस प्रकार अच्छी बना सकता है | अर्जुन को उनका सर्वश्रेष्ठ उपदेश यह है कि हृदय में आसीन परमात्मा की शरणागत हुआ जाए | सही विवेक से मनुष्यको परमात्मा के आदेशानुसार कर्म करने के लिए तैयार होना चाहिए | इससे मनुष्य निरन्तर कृष्णभावनामृत में स्थित हो सकेगा,जो मानव जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है | अर्जुन को भगवान् प्रत्यक्षतः युद्ध करने का आदेश दे रहे हैं | शरणागत होने के पूर्व जहाँ तक बुद्धि काम करे मनुष्य को इस विषय पर मनन करने की छूट मिली है और भगवान् के आदेश को स्वीकार करने की यहीसर्वोत्तम विधि है | ऐसा आदेश कृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधिस्वरूप गुरु के माध्यम से भी प्राप्त होता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.63&amp;diff=492028</id>
		<title>HI/BG 18.63</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.63&amp;diff=492028"/>
		<updated>2020-08-18T09:43:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 63 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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इति—इस प्रकार; ते—तुमको; ज्ञानम्—ज्ञान; आख्यातम्—वर्णन किया गया; गुह्यात्—गुह्य से; गुह्य-तरम्—अधिक गुह्य; मया—मेरे द्वारा; विमृश्य—मनन करके; एतत्—इस; अशेषेण—पूर्णतया; यथा—जैसी; इच्छसि—इच्छा हो; तथा—वैसा ही; कुरु—करो।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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इस प्रकार मैंने तुम्हें गुह्यतर ज्ञान बतला दिया | इस पर पूरी तरह से मनन करो और तब जो चाहे सो करो |&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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भगवान् ने पहले ही अर्जुन को ब्रहभूत ज्ञान बतला दिया है | जो इस ब्रहभूत अवस्था में होता है, वह प्रसन्न रहता है,न तो वह शोक करता है, न किसी वस्तु की कामना करता है | ऐसा गुह्यज्ञान के कारण होता है | कृष्ण परमात्मा का ज्ञान भी प्रकट करते हैं | यह ब्रह्मज्ञान भी है, लेकिन यह उससे श्रेष्ठ है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यहाँ पर यथेच्छसि तथा कुरु – जैसे इच्छा हो वैसा करो – यह सूचित करता है कि ईश्र्वर जीव की यत्किंचित स्वतन्त्रता में हस्तक्षेप नहीं करता | भगवद्गीता में भगवान् ने सभी प्रकार से यह बतलाया है कि कोई अपनी जीवन दशा को किस प्रकार अच्छी बना सकता है | अर्जुन को उनका सर्वश्रेष्ठ उपदेश यह है कि हृदय में आसीन परमात्मा की शरणागत हुआ जाए | सही विवेक से मनुष्यको परमात्मा के आदेशानुसार कर्म करने के लिए तैयार होना चाहिए | इससे मनुष्य निरन्तर कृष्णभावनामृत में स्थित हो सकेगा,जो मानव जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है | अर्जुन को भगवान् प्रत्यक्षतः युद्ध करने का आदेश दे रहे हैं | शरणागत होने के पूर्व जहाँ तक बुद्धि काम करे मनुष्य को इस विषय पर मनन करने की छूट मिली है और भगवान् के आदेश को स्वीकार करने की यहीसर्वोत्तम विधि है | ऐसा आदेश कृष्ण के प्रामाणिक प्रतिनिधिस्वरूप गुरु के माध्यम से भी प्राप्त होता है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
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		<title>HI/BG 18.62</title>
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		<updated>2020-08-18T09:42:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 18| अध्याय १८: उपसंहार – संन्यास की सिद्धि]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 62 ====&lt;br /&gt;
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:तमेव शरणं गच्छ सर्वभावेन भारत ।&lt;br /&gt;
:तत्प्रसादात्परां शान्तिं स्थानं प्राप्स्यसि शाश्वतम् ॥६२॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
तम्—उसकी; एव—निश्चय ही; शरणम् गच्छ—शरण में जाओ; सर्व-भावेन—सभी प्रकार से; भारत—हे भरतपुत्र; तत्-प्रसादात्—उसकी कृपा से; पराम्—दिव्य; शान्तिम्—शान्ति को; स्थानम्—धाम को; प्राह्रश्वस्यसि—प्राह्रश्वत करोगे; शाश्वतम्—शाश्वत।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे भारत! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ | उसकी कृपा से तुम परम शान्ति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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अतएव जीव को चाहिए कि प्रत्येक हृदय में स्थित भगवान् की शरण ले | इससे इस संसार के समस्त प्रकार के दुखों से छुटकारा मिल जाएगा | ऐसी शरण पाने से मनुष्य न केवल इस जीवन के सारे कष्टों से छुटकारा पा सकेगा, अपितु अन्त में वह परमेश्र्वर के पास पहुँच जाएगा | वैदिक साहित्य में (ऋग्वेद १.२२.२०) दिव्य जगत् तद्बिष्णोः परमं पदम् के रूप में वर्णित है |चूँकि सारी सृष्टि ईश्र्वर का राज्य है, अतएव इसकी प्रत्येक भौतिक वास्तु वास्तव में आध्यात्मिक है, लेकिन परमं पदम् विशेषतया नित्यधाम को बताता है,जो आध्यात्मिक आकाश या वैकुण्ठ कहलाता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है – सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः – भगवान् प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं |अतएव इस कथन कि मनुष्य अन्तःस्थित परमात्मा की शरण ले, का अर्थ है कि वह भगवान् कृष्ण की शरण ले | कृष्ण को पहले ही अर्जुन ने परम स्वीकार कर लिया है | दसवें अध्याय में उन्हें परम ब्रह्म परम धाम के रूप में स्वीकार किया जा चुका है |अर्जुन ने कृष्ण को भगवान् तथा समस्त जीवों के परम धाम के रूप में स्वीकार कर रखा है, इसलिए नहीं कि यह उसका निजी अनुभव है, वरन् इसलिए भी कि नारद, असित, देवल, व्यास जैसे महापुरुष इसके प्रमाण हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
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		<title>HI/BG 18.62</title>
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		<updated>2020-08-18T09:41:44Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
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तम्—उसकी; एव—निश्चय ही; शरणम् गच्छ—शरण में जाओ; सर्व-भावेन—सभी प्रकार से; भारत—हे भरतपुत्र; तत्-प्रसादात्—उसकी कृपा से; पराम्—दिव्य; शान्तिम्—शान्ति को; स्थानम्—धाम को; प्राह्रश्वस्यसि—प्राह्रश्वत करोगे; शाश्वतम्—शाश्वत।&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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हे भारत! सब प्रकार से उसी की शरण में जाओ | उसकी कृपा से तुम परम शान्ति को तथा परम नित्यधाम को प्राप्त करोगे |&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
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अतएव जीव को चाहिए कि प्रत्येक हृदय में स्थित भगवान् की शरण ले | इससे इस संसार के समस्त प्रकार के दुखों से छुटकारा मिल जाएगा | ऐसी शरण पाने से मनुष्य न केवल इस जीवन के सारे कष्टों से छुटकारा पा सकेगा, अपितु अन्त में वह परमेश्र्वर के पास पहुँच जाएगा | वैदिक साहित्य में (ऋग्वेद १.२२.२०) दिव्य जगत् तद्बिष्णोः परमं पदम् के रूप में वर्णित है |चूँकि सारी सृष्टि ईश्र्वर का राज्य है, अतएव इसकी प्रत्येक भौतिक वास्तु वास्तव में आध्यात्मिक है, लेकिन परमं पदम् विशेषतया नित्यधाम को बताता है,जो आध्यात्मिक आकाश या वैकुण्ठ कहलाता है |&lt;br /&gt;
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भगवद्गीता के पन्द्रहवें अध्याय में कहा गया है – सर्वस्य चाहं हृदि सन्निविष्टः – भगवान् प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं |अतएव इस कथन कि मनुष्य अन्तःस्थित परमात्मा की शरण ले, का अर्थ है कि वह भगवान् कृष्ण की शरण ले | कृष्ण को पहले ही अर्जुन ने परम स्वीकार कर लिया है | दसवें अध्याय में उन्हें परम ब्रह्म परम धाम के रूप में स्वीकार किया जा चुका है |अर्जुन ने कृष्ण को भगवान् तथा समस्त जीवों के परम धाम के रूप में स्वीकार कर रखा है, इसलिए नहीं कि यह उसका निजी अनुभव है, वरन् इसलिए भी कि नारद, असित, देवल, व्यास जैसे महापुरुष इसके प्रमाण हैं |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
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		<title>HI/BG 18.61</title>
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		<updated>2020-08-18T09:40:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 61 ====&lt;br /&gt;
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:ईश्वरः सर्वभूतानां हृद्देशेऽर्जुन तिष्ठति ।&lt;br /&gt;
:भ्रामयन्सर्वभूतानि यन्त्रारूढानि मायया ॥६१॥&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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ईश्वर:—भगवान्; सर्व-भूतानाम्—समस्त जीवों के; हृत्-देशे—हृदय में; अर्जुन—हे अर्जुन; तिष्ठति—वास करता है; भ्रामयन्—भ्रमण करने के लिए बाध्य करता हुआ; सर्व-भूतानि—समस्त जीवों को; यन्त्र—यन्त्र में; आरूढानि—सवार, चढ़े हुए; मायया—भौतिक शक्ति के वशीभूत होकर।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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हे अर्जुन! परमेश्र्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं और भौतिक शक्ति से निर्मित यन्त्र में सवार की भाँति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा (भरमा) रहे हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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अर्जुन परम ज्ञाता न था और लड़ने या न लड़ने का उसका निर्णय उसके क्षुद्र विवेक तक सीमित था | भगवान् कृष्ण ने उपदेश दिया कि जीवात्मा (व्यक्ति) ही सर्वेसर्वा नहीं है | भगवान् या स्वयं कृष्ण अन्तर्यामी परमात्मा रूप में हृदय में स्थित होकर जीव को निर्देश देते हैं | शरीर-परिवर्तन होते ही जीव अपने विगत कर्मों को भूल जाता है, लेकिन परमात्मा जो भूत, वर्तमान तथा भविष्य का ज्ञाता है, उसके समस्त कार्यों का साक्षी रहता है | अतएव जीवों के सभी कार्यों का संचालन इसी परमात्मा द्वारा होता है | जीव जितना योग्य होता है उतना ही पाता है और उस भौतिक शरीर द्वारा वहन किया जाता है, जो परमात्मा के निर्देश में भौतिक शक्ति द्वारा उत्पन्न किया जाता है | ज्योंही जीव को किसी विशेष प्रकार के शरीर में स्थापित कर दिया जाता है, वह शारीरिक अवस्था के अन्तर्गत कार्य करना प्रारम्भ कर देता है | अत्यधिक तेज मोटरकार में बैठा व्यक्ति कम तेज कार में बैठे व्यक्ति से अधिक तेज जाता है, भले ही जीव अर्थात् चालक एक ही क्यों न हो | इसी प्रकार परमात्मा के आदेश से भौतिक प्रकृति एक विशेष प्रकार के जीव के लिए एक विशेष शरीर का निर्माण करती है, जिससे वह अपनी पूर्व इच्छाओं के अनुसार कर्म कर सके | जीव स्वतन्त्र नहीं होता | मनुष्य हो यह नहीं सोचना चाहिए कि वह भगवान् से स्वतन्त्र है | व्यक्ति तो सदैव भगवान् के नियन्त्रण में रहता है | अतएव उसका कर्तव्य है कि वह शरणागत हो और अगले श्लोक का यही आदेश है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.61&amp;diff=492024</id>
		<title>HI/BG 18.61</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.61&amp;diff=492024"/>
		<updated>2020-08-18T09:40:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H61]]&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 61 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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ईश्वर:—भगवान्; सर्व-भूतानाम्—समस्त जीवों के; हृत्-देशे—हृदय में; अर्जुन—हे अर्जुन; तिष्ठति—वास करता है; भ्रामयन्—भ्रमण करने के लिए बाध्य करता हुआ; सर्व-भूतानि—समस्त जीवों को; यन्त्र—यन्त्र में; आरूढानि—सवार, चढ़े हुए; मायया—भौतिक शक्ति के वशीभूत होकर।&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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हे अर्जुन! परमेश्र्वर प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित हैं और भौतिक शक्ति से निर्मित यन्त्र में सवार की भाँति बैठे समस्त जीवों को अपनी माया से घुमा (भरमा) रहे हैं |&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
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अर्जुन परम ज्ञाता न था और लड़ने या न लड़ने का उसका निर्णय उसके क्षुद्र विवेक तक सीमित था | भगवान् कृष्ण ने उपदेश दिया कि जीवात्मा (व्यक्ति) ही सर्वेसर्वा नहीं है | भगवान् या स्वयं कृष्ण अन्तर्यामी परमात्मा रूप में हृदय में स्थित होकर जीव को निर्देश देते हैं | शरीर-परिवर्तन होते ही जीव अपने विगत कर्मों को भूल जाता है, लेकिन परमात्मा जो भूत, वर्तमान तथा भविष्य का ज्ञाता है, उसके समस्त कार्यों का साक्षी रहता है | अतएव जीवों के सभी कार्यों का संचालन इसी परमात्मा द्वारा होता है | जीव जितना योग्य होता है उतना ही पाता है और उस भौतिक शरीर द्वारा वहन किया जाता है, जो परमात्मा के निर्देश में भौतिक शक्ति द्वारा उत्पन्न किया जाता है | ज्योंही जीव को किसी विशेष प्रकार के शरीर में स्थापित कर दिया जाता है, वह शारीरिक अवस्था के अन्तर्गत कार्य करना प्रारम्भ कर देता है | अत्यधिक तेज मोटरकार में बैठा व्यक्ति कम तेज कार में बैठे व्यक्ति से अधिक तेज जाता है, भले ही जीव अर्थात् चालक एक ही क्यों न हो | इसी प्रकार परमात्मा के आदेश से भौतिक प्रकृति एक विशेष प्रकार के जीव के लिए एक विशेष शरीर का निर्माण करती है, जिससे वह अपनी पूर्व इच्छाओं के अनुसार कर्म कर सके | जीव स्वतन्त्र नहीं होता | मनुष्य हो यह नहीं सोचना चाहिए कि वह भगवान् से स्वतन्त्र है | व्यक्ति तो सदैव भगवान् के नियन्त्रण में रहता है | अतएव उसका कर्तव्य है कि वह शरणागत हो और अगले श्लोक का यही आदेश है |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.60&amp;diff=492023</id>
		<title>HI/BG 18.60</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.60&amp;diff=492023"/>
		<updated>2020-08-18T08:07:23Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H60]]&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 60 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:स्वभावजेन कौन्तेय निबद्धः स्वेन कर्मणा ।&lt;br /&gt;
:कर्तुं नेच्छसि यन्मोहात्करिष्यस्यवशोपि तत् ॥६०॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्वभाव-जेन—अपने स्वभाव से उत्पन्न; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; निबद्ध:—बद्ध; स्वेन—तुम अपने; कर्मणा—कार्यकलापों से; कर्तुम्—करने के लिए; न—नहीं; इच्छसि—इच्छा करते हो; यत्—जो; मोहात्—मोह से; करिष्यसि—करोगे; अवश:—अनिच्छा से; अपि—भी; तत्—वह।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस समय तुम मोहवश मेरे निर्देशानुसार कर्म करने से मना कर रहे हो । लेकिन हे कुन्तीपुत्र! तुम अपने ही स्वभाव से उत्पन्न कर्म द्वारा बाध्य होकर वही सब करोगे ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यदि कोई परमेश्र्वर के निर्देशानुसार कर्म करने से मना करता है, तो वह उन गुणों द्वारा कर्म करने के लिए बाध्य होता है, जिनमें वह स्थित होता है । प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के विशेष संयोग के वशीभूत है और तदानुसार कर्म करता है | किन्तु जो स्वेच्छा से परमेश्र्वर के निर्देशानुसार कार्यरत रहता है, वही गौरवान्वित होता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.60&amp;diff=492022</id>
		<title>HI/BG 18.60</title>
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		<updated>2020-08-18T08:06:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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==== श्लोक 60 ====&lt;br /&gt;
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:&#039;&#039;j&#039;&#039;&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
स्वभाव-जेन—अपने स्वभाव से उत्पन्न; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; निबद्ध:—बद्ध; स्वेन—तुम अपने; कर्मणा—कार्यकलापों से; कर्तुम्—करने के लिए; न—नहीं; इच्छसि—इच्छा करते हो; यत्—जो; मोहात्—मोह से; करिष्यसि—करोगे; अवश:—अनिच्छा से; अपि—भी; तत्—वह।&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस समय तुम मोहवश मेरे निर्देशानुसार कर्म करने से मना कर रहे हो । लेकिन हे कुन्तीपुत्र! तुम अपने ही स्वभाव से उत्पन्न कर्म द्वारा बाध्य होकर वही सब करोगे ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यदि कोई परमेश्र्वर के निर्देशानुसार कर्म करने से मना करता है, तो वह उन गुणों द्वारा कर्म करने के लिए बाध्य होता है, जिनमें वह स्थित होता है । प्रत्येक व्यक्ति प्रकृति के गुणों के विशेष संयोग के वशीभूत है और तदानुसार कर्म करता है | किन्तु जो स्वेच्छा से परमेश्र्वर के निर्देशानुसार कार्यरत रहता है, वही गौरवान्वित होता है |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.59&amp;diff=492021</id>
		<title>HI/BG 18.59</title>
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		<updated>2020-08-18T08:06:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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==== श्लोक 59 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:यदहंकारमाश्रित्य न योत्स्य इति मन्यसे ।&lt;br /&gt;
:मिथ्यैष व्यवसायस्ते प्रकृतिस्त्वां नियोक्ष्यति ॥५९॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यत्—यदि; अहङ्कारम्—मिथ्या अहंकार की; आश्रित्य—शरण लेकर; न योत्स्ये—मैं नहीं लड़ूँगा; इति—इस प्रकार; मन्यसे—तुम सोचते हो; मिथ्या एष:—तो यह सब झूठ है; व्यवसाय:—संकल्प; ते—तुम्हारा; प्रकृति:—भौतिक प्रकृति; त्वाम्—तुमको; नियोक्ष्यति—लगा लेगी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यदि तुम मेरे निर्देशानुसार कर्म नहीं करते और युद्ध में प्रवृत्त नहीं होते हो, तो तुम कुमार्ग पर जाओगे । तुम्हें अपने स्वभाव वश युद्ध में लगना पड़ेगा ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्जुन एक सैनिक था और क्षत्रिय स्वभाव लेकर जन्मा था । अतएव उसका स्वाभाविक कर्तव्य था कि वह युद्ध करे । लेकिन मिथ्या अहंकारवश वह डर रहा था कि अपने गुरु, पितामह तथा मित्रों का वध करके वह पाप का भागी होगा । वास्तव में वह अपने को अपने कर्मों का स्वामी जान रहा था, मानो वही ऐसे कर्मों के अच्छे-बुरे फलों का निर्देशन कर रहा हो । वह भूल गया कि वहाँ पर साक्षात् भगवान् उपस्थित हैं और उसे युद्ध करने का आदेश दे रहे हैं । यही है बद्धजीव की विस्मृति । परम पुरुष निर्देश देते हैं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है और मनुष्य को जीवन-सिद्धि प्राप्त करने के लिए केवल कृष्ण भावना मृत में कर्म करना है । कोई भी अपने भाग्य का निर्णय ऐसे नहीं कर सकता जैसे भगवान् कर सकते हैं । अतएव सर्वोत्तम मार्ग यही है कि परमेश्र्वर से निर्देश प्राप्त करके कर्म किया जाय । भगवान् या भगवान् के प्रतिनिधि स्वरूप गुरु के आदेश की वह कभी उपेक्षा न करे । भगवान् के आदेश को बिना किसी हिचक के पूरा करने के लिए वह कर्म करे – इससे सभी परिस्थियों में सुरक्षित रहा जा सकेगा ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.59&amp;diff=492020</id>
		<title>HI/BG 18.59</title>
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		<updated>2020-08-18T08:05:47Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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==== श्लोक 59 ====&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यत्—यदि; अहङ्कारम्—मिथ्या अहंकार की; आश्रित्य—शरण लेकर; न योत्स्ये—मैं नहीं लड़ूँगा; इति—इस प्रकार; मन्यसे—तुम सोचते हो; मिथ्या एष:—तो यह सब झूठ है; व्यवसाय:—संकल्प; ते—तुम्हारा; प्रकृति:—भौतिक प्रकृति; त्वाम्—तुमको; नियोक्ष्यति—लगा लेगी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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यदि तुम मेरे निर्देशानुसार कर्म नहीं करते और युद्ध में प्रवृत्त नहीं होते हो, तो तुम कुमार्ग पर जाओगे । तुम्हें अपने स्वभाव वश युद्ध में लगना पड़ेगा ।&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
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अर्जुन एक सैनिक था और क्षत्रिय स्वभाव लेकर जन्मा था । अतएव उसका स्वाभाविक कर्तव्य था कि वह युद्ध करे । लेकिन मिथ्या अहंकारवश वह डर रहा था कि अपने गुरु, पितामह तथा मित्रों का वध करके वह पाप का भागी होगा । वास्तव में वह अपने को अपने कर्मों का स्वामी जान रहा था, मानो वही ऐसे कर्मों के अच्छे-बुरे फलों का निर्देशन कर रहा हो । वह भूल गया कि वहाँ पर साक्षात् भगवान् उपस्थित हैं और उसे युद्ध करने का आदेश दे रहे हैं । यही है बद्धजीव की विस्मृति । परम पुरुष निर्देश देते हैं कि क्या अच्छा है और क्या बुरा है और मनुष्य को जीवन-सिद्धि प्राप्त करने के लिए केवल कृष्ण भावना मृत में कर्म करना है । कोई भी अपने भाग्य का निर्णय ऐसे नहीं कर सकता जैसे भगवान् कर सकते हैं । अतएव सर्वोत्तम मार्ग यही है कि परमेश्र्वर से निर्देश प्राप्त करके कर्म किया जाय । भगवान् या भगवान् के प्रतिनिधि स्वरूप गुरु के आदेश की वह कभी उपेक्षा न करे । भगवान् के आदेश को बिना किसी हिचक के पूरा करने के लिए वह कर्म करे – इससे सभी परिस्थियों में सुरक्षित रहा जा सकेगा ।&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.58&amp;diff=492019</id>
		<title>HI/BG 18.58</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.58&amp;diff=492019"/>
		<updated>2020-08-18T08:04:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 58 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:मच्चित्तः सर्वदुर्गाणि मत्प्रसादात्तरिष्यसि ।&lt;br /&gt;
:अथ चेत्त्वमहंकारान्न श्रोष्यसि विनङ्क्ष्यसि ॥५८॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मत्—मेरी; चित्त:—चेतना में; सर्व—सारी; दुर्गाणि—बाधाओं को; मत्-प्रसादात्—मेरी कृपा से; तरिष्यसि—तुम पार कर सकोगे; अथ—लेकिन; चेत्—यदि; त्वम्—तुम; अहङ्कारात्—मिथ्या अहंकार से; न श्रोष्यसि—नहीं सुनते हो; विनङ्क्ष्यसि—नष्ट हो जाओगे।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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यदि तुम मुझसे भावनाभावित होगे, तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघ जाओगे | लेकिन यदि तुम मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम विनष्ट हो जाओगे |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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पूर्ण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने अस्तित्व के लिए कर्तव्य करने के विषय में आवश्यकता से अधिक उद्विग्न नहीं रहता | जो मुर्ख है, वह समस्त चिन्ताओं से मुक्त कैसे रहे, इस बात को वह समझ नहीं सकता | जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, भगवान् कृष्ण उसके घनिष्ट मित्र बन जाते हैं | वे सदैव अपने मित्र की सुविधा का ध्यान रखते हैं और जो मित्र चौबीसों घंटे उन्हें प्रसन्न करने के लिए निष्ठापूर्वक कार्य में लगा रहता है, वे उसको आत्मदान कर देते हैं | अतएव किसी को देहात्मबुद्धि के मिथ्या अह्नाकार में नहीं बह जाना चाहिए | उसे झूठे ही यह नहीं सोचना चाहिए कि वह प्रकृति के नियमों से स्वतन्त्र है, या कर्म करने के लिए मुक्त है | वह पहले से कठोर भौतिक नियमों के अधीन है | लेकिन जैसे ही वह कृष्णभावनाभावित होकर कर्म करता है, तो वह भौतिक दुश्चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है | मनुष्य को यह भलीभाँति जान लेना चाहिए कि जो कृष्णभावनामृत में सक्रिय नहीं है, वह जन्म-मृत्यु रूपी सागर के भंवर में पड़कर अपना विनाश कर रहा है | कोई भी बद्धजीव यह सही सही नहीं जानता कि क्या करना है और क्या नहीं करना है, लेकिन जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित होकर कर्म अन्तर से करता है, वह कर्म करने के लिए मुक्त है, क्योंकि प्रत्येक किया हुआ कर्म कृष्ण द्वारा प्रेरित तथा गुरु द्वारा पुष्ट होता है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.58&amp;diff=492018</id>
		<title>HI/BG 18.58</title>
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		<updated>2020-08-18T08:04:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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==== श्लोक 58 ====&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मत्—मेरी; चित्त:—चेतना में; सर्व—सारी; दुर्गाणि—बाधाओं को; मत्-प्रसादात्—मेरी कृपा से; तरिष्यसि—तुम पार कर सकोगे; अथ—लेकिन; चेत्—यदि; त्वम्—तुम; अहङ्कारात्—मिथ्या अहंकार से; न श्रोष्यसि—नहीं सुनते हो; विनङ्क्ष्यसि—नष्ट हो जाओगे।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यदि तुम मुझसे भावनाभावित होगे, तो मेरी कृपा से तुम बद्ध जीवन के सारे अवरोधों को लाँघ जाओगे | लेकिन यदि तुम मिथ्या अहंकारवश ऐसी चेतना में कर्म नहीं करोगे और मेरी बात नहीं सुनोगे, तो तुम विनष्ट हो जाओगे |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
पूर्ण कृष्णभावनाभावित व्यक्ति अपने अस्तित्व के लिए कर्तव्य करने के विषय में आवश्यकता से अधिक उद्विग्न नहीं रहता | जो मुर्ख है, वह समस्त चिन्ताओं से मुक्त कैसे रहे, इस बात को वह समझ नहीं सकता | जो व्यक्ति कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, भगवान् कृष्ण उसके घनिष्ट मित्र बन जाते हैं | वे सदैव अपने मित्र की सुविधा का ध्यान रखते हैं और जो मित्र चौबीसों घंटे उन्हें प्रसन्न करने के लिए निष्ठापूर्वक कार्य में लगा रहता है, वे उसको आत्मदान कर देते हैं | अतएव किसी को देहात्मबुद्धि के मिथ्या अह्नाकार में नहीं बह जाना चाहिए | उसे झूठे ही यह नहीं सोचना चाहिए कि वह प्रकृति के नियमों से स्वतन्त्र है, या कर्म करने के लिए मुक्त है | वह पहले से कठोर भौतिक नियमों के अधीन है | लेकिन जैसे ही वह कृष्णभावनाभावित होकर कर्म करता है, तो वह भौतिक दुश्चिन्ताओं से मुक्त हो जाता है | मनुष्य को यह भलीभाँति जान लेना चाहिए कि जो कृष्णभावनामृत में सक्रिय नहीं है, वह जन्म-मृत्यु रूपी सागर के भंवर में पड़कर अपना विनाश कर रहा है | कोई भी बद्धजीव यह सही सही नहीं जानता कि क्या करना है और क्या नहीं करना है, लेकिन जो व्यक्ति कृष्णभावनाभावित होकर कर्म अन्तर से करता है, वह कर्म करने के लिए मुक्त है, क्योंकि प्रत्येक किया हुआ कर्म कृष्ण द्वारा प्रेरित तथा गुरु द्वारा पुष्ट होता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.57&amp;diff=492017</id>
		<title>HI/BG 18.57</title>
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		<updated>2020-08-18T08:03:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 57 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:चेतसा सर्वकर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।&lt;br /&gt;
:बुद्धियोगमुपाश्रित्य मच्चित्तः सततं भव ॥५७॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चेतसा—बुद्धि से; सर्व-कर्माणि—समस्त प्रकार के कार्य; मयि—मुझ में; सन्न्यस्य—त्यागकर; मत्-पर:—मेरे संरक्षण में; बुद्धि-योगम्—भक्ति के कार्यों की; उपाश्रित्य—शरण लेकर; मत्-चित्त:—मेरी चेतना में; सततम्—चौबीसों घंटे; भव—होओ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सारे कार्यों के लिए मुझ पर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो | ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, तो वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म नहीं करता | उसे चाहिए कि वह सेवक की भाँति परमेश्र्वर के निर्देशानुसार कर्म करे | सेवक को स्वतंत्रता नहीं रहती | वह केवल अपने स्वामी के आदेश पर कार्य करता है, उस पर लाभ-हानि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता | वह भगवान् के आदेशानुसार अपने कर्तव्य का सच्चे दिल से पालन करता है | अब कोई यह तर्क दे सकता है कि अर्जुन कृष्ण के व्यक्तिगत निर्देशानुसार कार्य कर रहा थे, लेकिन जब कृष्ण उपस्थित न हों तो कोई किस तरह कार्य करें? यदि कोई इस पुस्तक में दिए गये कृष्ण के निर्देश के अनुसार तथा कृष्ण के प्रतिनिधि के मार्गदर्शन में कार्य करता है, तो उसका फल वैसा ही होगा | इस श्लोक में मत्परः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | यह सूचित करता है कि मनुष्य जीवन में कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए कृष्णभावनाभावित होकर कार्य करने के अतिरिक्त अन्य कोई लक्ष्य नहीं होता | जब वह इस प्रकार कार्य कर रहा हो तो उसे केवल कृष्ण का ही चिन्तन इस प्रकार से करना चाहिए – &amp;quot;कृष्ण ने मुझे इस विशेष कार्य को पूरा करने के लिए नियुक्त किया है |&amp;quot; और इस तरह कार्य करते हुए उसे स्वाभाविक रूप से कृष्ण का चिन्तन हो आता है | यही पूर्ण कृष्णभावनामृत है | किन्तु यह ध्यान रहे कि मनमाना कर्म करके उसका फल परमेश्र्वर को अर्पित न किया जाय | इस प्रकार का कार्य कृष्णभावनामृत की भक्ति में नहीं आता | मनुष्य को चाहिए कि कृष्ण के आदेशानुसार कर्म करे | यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है | कृष्ण का यह आदेश गुरु-परम्परा द्वारा प्रमाणिक गुरु से प्राप्त होता है | अतएव गुरु के आदेश को जीवन का मूल कर्तव्य समझना चाहिए | यदि किसी को प्रमाणिक गुरु प्राप्त हो जाता है और वह निर्देशानुसार कार्य करता है, तो कृष्णभावनामाय जीवन की सिद्धि सुनिश्र्चित है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.57&amp;diff=492016</id>
		<title>HI/BG 18.57</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.57&amp;diff=492016"/>
		<updated>2020-08-18T08:03:06Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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==== श्लोक 57 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;verse&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चेतसा—बुद्धि से; सर्व-कर्माणि—समस्त प्रकार के कार्य; मयि—मुझ में; सन्न्यस्य—त्यागकर; मत्-पर:—मेरे संरक्षण में; बुद्धि-योगम्—भक्ति के कार्यों की; उपाश्रित्य—शरण लेकर; मत्-चित्त:—मेरी चेतना में; सततम्—चौबीसों घंटे; भव—होओ।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सारे कार्यों के लिए मुझ पर निर्भर रहो और मेरे संरक्षण में सदा कर्म करो | ऐसी भक्ति में मेरे प्रति पूर्णतया सचेत रहो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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जब मनुष्य कृष्णभावनामृत में कर्म करता है, तो वह संसार के स्वामी के रूप में कर्म नहीं करता | उसे चाहिए कि वह सेवक की भाँति परमेश्र्वर के निर्देशानुसार कर्म करे | सेवक को स्वतंत्रता नहीं रहती | वह केवल अपने स्वामी के आदेश पर कार्य करता है, उस पर लाभ-हानि का कोई प्रभाव नहीं पड़ता | वह भगवान् के आदेशानुसार अपने कर्तव्य का सच्चे दिल से पालन करता है | अब कोई यह तर्क दे सकता है कि अर्जुन कृष्ण के व्यक्तिगत निर्देशानुसार कार्य कर रहा थे, लेकिन जब कृष्ण उपस्थित न हों तो कोई किस तरह कार्य करें? यदि कोई इस पुस्तक में दिए गये कृष्ण के निर्देश के अनुसार तथा कृष्ण के प्रतिनिधि के मार्गदर्शन में कार्य करता है, तो उसका फल वैसा ही होगा | इस श्लोक में मत्परः शब्द अत्यन्त महत्त्वपूर्ण है | यह सूचित करता है कि मनुष्य जीवन में कृष्ण को प्रसन्न करने के लिए कृष्णभावनाभावित होकर कार्य करने के अतिरिक्त अन्य कोई लक्ष्य नहीं होता | जब वह इस प्रकार कार्य कर रहा हो तो उसे केवल कृष्ण का ही चिन्तन इस प्रकार से करना चाहिए – &amp;quot;कृष्ण ने मुझे इस विशेष कार्य को पूरा करने के लिए नियुक्त किया है |&amp;quot; और इस तरह कार्य करते हुए उसे स्वाभाविक रूप से कृष्ण का चिन्तन हो आता है | यही पूर्ण कृष्णभावनामृत है | किन्तु यह ध्यान रहे कि मनमाना कर्म करके उसका फल परमेश्र्वर को अर्पित न किया जाय | इस प्रकार का कार्य कृष्णभावनामृत की भक्ति में नहीं आता | मनुष्य को चाहिए कि कृष्ण के आदेशानुसार कर्म करे | यह अत्यन्त महत्त्वपूर्ण बात है | कृष्ण का यह आदेश गुरु-परम्परा द्वारा प्रमाणिक गुरु से प्राप्त होता है | अतएव गुरु के आदेश को जीवन का मूल कर्तव्य समझना चाहिए | यदि किसी को प्रमाणिक गुरु प्राप्त हो जाता है और वह निर्देशानुसार कार्य करता है, तो कृष्णभावनामाय जीवन की सिद्धि सुनिश्र्चित है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.56&amp;diff=492015</id>
		<title>HI/BG 18.56</title>
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		<updated>2020-08-18T08:01:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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&lt;br /&gt;
==== श्लोक 56 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:सर्वकर्माण्यपि सदा कुर्वाणो मद्व्यपाश्रयः ।&lt;br /&gt;
:मत्प्रसादादवाप्नोति शाश्वतं पदमव्ययम् ॥५६॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सर्व—समस्त; कर्माणि—कार्यकलाप को; अपि—यद्यपि; सदा—सदैव; कुर्वाण:—करते हुए; मत्-व्यपाश्रय:—मेरे संरक्षण में; मत्-प्रसादात्—मेरी कृपा से; अवाह्रश्वनोति—प्राह्रश्वत करता है; शाश्वतम्—नित्य; पदम्—धाम को; अव्ययम्—अविनाशी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मेरा शुद्ध भक्त मेरे संरक्षण में, समस्त प्रकार के कार्यों में संलग्न रह कर भी मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को प्राप्त होता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मद्-व्यपाश्रयः शब्द का अर्थ है परमेश्र्वर के संरक्षण में | भौतिक कल्मष से रहित होने के लिए शुद्ध भक्त परमेश्र्वर या उनके प्रतिनिधि स्वरूप गुरु के निर्देशन में कर्म करता है | उसके लिए समय की कोई सीमा नहीं है | वह सदा, चौबीसों घंटे, शत प्रतिशत परमेश्र्वर के निर्देशन में कार्यों में संलग्न रहता है | ऐसे भक्त पर जो कृष्णभावनामृत में रत रहता है, भगवान् अत्यधिक दयालु होते हैं | वह समस्त कठिनाइयों के बावजूद अन्ततोगत्वा दिव्यधाम या कृष्णलोक को प्राप्त करता है | वहाँ उसका प्रवेश सुनिश्चित रहता है, इसमें कोई संशय नहीं है | उस परम धाम में कोई परिवर्तन नहीं होता, वहाँ प्रत्येक वस्तु शाश्र्वत, अविनश्र्वर तथा ज्ञानमय होती है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.56&amp;diff=492014</id>
		<title>HI/BG 18.56</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.56&amp;diff=492014"/>
		<updated>2020-08-18T08:01:14Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 18|H56]]&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 56 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सर्व—समस्त; कर्माणि—कार्यकलाप को; अपि—यद्यपि; सदा—सदैव; कुर्वाण:—करते हुए; मत्-व्यपाश्रय:—मेरे संरक्षण में; मत्-प्रसादात्—मेरी कृपा से; अवाह्रश्वनोति—प्राह्रश्वत करता है; शाश्वतम्—नित्य; पदम्—धाम को; अव्ययम्—अविनाशी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मेरा शुद्ध भक्त मेरे संरक्षण में, समस्त प्रकार के कार्यों में संलग्न रह कर भी मेरी कृपा से नित्य तथा अविनाशी धाम को प्राप्त होता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मद्-व्यपाश्रयः शब्द का अर्थ है परमेश्र्वर के संरक्षण में | भौतिक कल्मष से रहित होने के लिए शुद्ध भक्त परमेश्र्वर या उनके प्रतिनिधि स्वरूप गुरु के निर्देशन में कर्म करता है | उसके लिए समय की कोई सीमा नहीं है | वह सदा, चौबीसों घंटे, शत प्रतिशत परमेश्र्वर के निर्देशन में कार्यों में संलग्न रहता है | ऐसे भक्त पर जो कृष्णभावनामृत में रत रहता है, भगवान् अत्यधिक दयालु होते हैं | वह समस्त कठिनाइयों के बावजूद अन्ततोगत्वा दिव्यधाम या कृष्णलोक को प्राप्त करता है | वहाँ उसका प्रवेश सुनिश्चित रहता है, इसमें कोई संशय नहीं है | उस परम धाम में कोई परिवर्तन नहीं होता, वहाँ प्रत्येक वस्तु शाश्र्वत, अविनश्र्वर तथा ज्ञानमय होती है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.55&amp;diff=492011</id>
		<title>HI/BG 18.55</title>
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		<updated>2020-08-18T07:55:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: Bhagavad-gita Compile Form edit&lt;/p&gt;
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:&#039;&#039;j&#039;&#039;&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
भक्त्या—शुद्ध भक्ति से; माम्—मुझको; अभिजानाति—जान सकता है; यावान्—जितना; य: च अस्मि—जैसा मैं हूँ; तत्त्वत:—सत्यत:; तत:—तत्पश्चात्; माम्—मुझको; तत्त्वत:—सत्यत:; ज्ञात्वा—जानकर; विशते—प्रवेश करता है; तत्-अनन्तरम्—तत्पश्चात्।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
केवल भक्ति से मुझ भगवान् को यथारूप में जाना जा सकता है | जब मनुष्य ऐसी भक्ति से मेरे पूर्ण भावनामृत में होता है, तो वह वैकुण्ठ जगत् में प्रवेश कर सकता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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भगवान् श्रीकृष्ण तथा उनके स्वांशों को न तो मनोधर्म द्वारा जाना जा सकता है, न ही अभक्तगण उन्हें समझ पाते हैं | यदि कोई व्यक्ति भगवान् को समझना चाहता है, तो उसे शुद्ध भक्त के पथप्रदर्शन में शुद्ध भक्ति ग्रहण करनी होती है, अन्यथा भगवान् सम्बन्धी सत्य (तत्त्व) उससे सदा छिपा रहेगा | जैसा कि भगवद्गीता (७.२५) कहा जा चुका है – नाहं प्रकाशः सर्वस्य– मैं सबों के समक्ष प्रकाशित नहीं होता | केवल पाण्डित्य या मनोधर्म द्वारा ईश्र्वर को नहीं समझा जा सकता | कृष्ण को केवल वही समझ पाता है, जो कृष्णभावनामृत तथा भक्ति में तत्पर रहता है | इसमें विश्वविद्यालय की उपाधियाँ सहायक नहीं होती हैं |&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
जो व्यक्ति कृष्ण विज्ञान (तत्त्व) से पूर्णतया अवगत है, वही वैकुण्ठजगत् या कृष्ण के धाम में प्रवेश कर सकता है | ब्रह्मभूत होने का अर्थ यह नहीं है कि वह अपना स्वरूप खो बैठता है | भक्ति तो रहती ही है और जब तक भक्ति का अस्तित्व रहता है, तब तक ईश्र्वर, भक्त तथा भक्ति की विधि रहती है | ऐसे ज्ञान का नाश मुक्ति के बाद भी नहीं होता | मुक्ति का अर्थ देहात्मबुद्धि से मुक्ति प्राप्त करना है | आध्यात्मिक जीवन में वैसा ही अन्तर, वही व्यक्तित्व (स्वरूप) बना रहता है, लेकिन शुद्ध कृष्णभावनामृत में ही विशते शब्द का अर्थ है &amp;quot;मुझमें प्रवेश करता है|&amp;quot; भ्रमवश यह नहीं सोचना चाहिए कि यह शब्द अद्वैतवाद का पोषक है और मनुष्य निर्गुण ब्रह्म से एकाकार हो जाता है | ऐसा नहीं है |विशते का तात्पर्य है कि मनुष्य अपने व्यक्तित्व सहित भगवान् के धाम में, भगवान् की संगति करने तथा उनकी सेवा करने के लिए प्रवेश कर सकता है | उदाहरणार्थ, एक हरा पक्षी (शुक) हरे वृक्ष में इसलिए प्रवेश नहीं करता कि वह वृक्ष से तदाकार (लीन) हो जाय, अपितु वह वृक्ष के फलों का भोग करने के लिए प्रवेश करता है | निर्विशेषवादी सामान्यतया समुद्र में गिरने वाली तथा समुद्र से मिलने वाली नदी का दृष्टान्त प्रस्तुत करते हैं | यह निर्विशेषवादियों के लिए आनन्द का विषय हो सकता है, लेकिन साकारवादी अपने व्यक्तित्व को उसी प्रकार बनाये रखना चाहता है, जिस प्रकार समुद्र में एक जलचर प्राणी | यदि हम समुद्र की गहराई में प्रवेश करें तो हमें अनेकानेक जीव मिलते हैं | केवल समुद्र की ऊपरी जानकारी पर्याप्त नहीं है, समुद्र की गहराई में रहने वाले जलचर प्राणियों की भी जानकारी रखना आवश्यक है |&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
भक्त अपनी शुद्ध भक्ति के कारण परमेश्र्वर के दिव्य गुणों तथा ऐश्र्वर्यों को यथार्थ रूप में जान सकता है | जैसा कि ग्याहरवें अध्याय में कहा जा चुका है, केवल भक्ति द्वारा इसे समझा जा सकता है | इसी की पुष्टि यहाँ भी हुई है | मनुष्य भक्ति द्वारा भगवान् को समझ सकता है और उनके धाम में प्रवेश कर सकता है |&lt;br /&gt;
.&lt;br /&gt;
भौतिक बुद्धि से मुक्ति की अवस्था – ब्रह्मभूत अवस्था – को प्राप्त कर लेने के बाद भगवान् के विषय में श्रवण करने से भक्ति का शुभारम्भ होता है | जब कोई परमेश्र्वर के विषय में श्रवण करता है, तो स्वतः ब्रह्मभूत अवस्था का उदय होता है और भौतिक कल्मष – यथा लोभ तथा काम – का विलोप हो जाता है | ज्यों-ज्यों भक्त के हृदय से काम तथा इच्छाएँ विलुप्त होती जाती हैं, त्यों-त्यों वह भगवद्भक्ति के प्रति अधिक आसक्त होता जाता है और इस तरह वह भौतिक कल्मष से मुक्त हो जाता है | जीवन की उस स्थिति में वह भगवान् को समझ सकता है | श्रीमद्भागवत में भी इसका कथन हुआ है | मुक्ति के बाद भक्तियोग चलता रहता है | इसकी पुष्टि वेदान्तसूत्र से (4.१.१२) होती है – आप्रायणात् तत्रापि हि दृष्टम्| इसका अर्थ है कि मुक्ति के बाद भक्तियोग चलता रहता है | श्रीमद्भागवत में वास्तविक भक्तिमयी मुक्ति की जो परिभाषा दी गई है उसके अनुसार यह जीव का अपने स्वरूप या अपनी निजी स्वाभाविक स्थिति में पुनःप्रतिष्ठापित हो जाना है | स्वाभाविक स्थिति की व्याख्या पहले ही की जा चुकी है – प्रत्येक जीव परमेश्र्वर का अंश है, अतएव उसकी स्वाभाविक स्थिति सेवा करने की है | मुक्ति के बाद यह सेवा कभी रूकती नहीं | वास्तविक मुक्ति तो देहात्मबुद्धि की भ्रान्त धारणा से मुक्त होना है |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_18.54&amp;diff=492010</id>
		<title>HI/BG 18.54</title>
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		<updated>2020-08-18T07:53:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Harshita: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 54 ====&lt;br /&gt;
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:ब्रह्मभूतः प्रसन्नात्मा न शोचति न काङ्क्षति ।&lt;br /&gt;
:समः सर्वेषु भूतेषु मद्भक्तिं लभते पराम् ॥५४॥&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
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ब्रह्म-भूत:—ब्रह्म से तदाकार होकर; प्रसन्न-आत्मा—पूर्णतया प्रमुदित; न—कभी नहीं; शोचति—खेद करता है; न—कभी नहीं; काङ्क्षति—इच्छा करता है; सम:—समान भाव से; सर्वेषु—समस्त; भूतेषु—जीवों पर; मत्-भक्तिम्—मेरी भक्ति को; लभते—प्राह्रश्वत करता है; पराम्—दिव्य।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
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इस प्रकार जो दिव्य पद पर स्थित है, वह तुरन्त परब्रह्म का अनुभव करता है और पूर्णतया प्रसन्न हो जाता है | वह न तो कभी शोक करता है, न किसी वस्तु की कामना करता है | वह प्रत्येक जीव पर समभाव रखता है | उस अवस्था में वह मेरी शुद्ध भक्ति को प्राप्त करता है |&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
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निर्विशेषवादी के लिए ब्रह्मभूत अवस्था प्राप्त करना अर्थात् ब्रह्म से तदाकार होना परम लक्ष्य होता है | लेकिन साकारवादी शुद्धभक्त को इससे भी आगे चलकर शुद्ध भक्ति में प्रवृत्त होना होता है | इसका अर्थ हुआ कि जो भगवद्भक्ति में रत है, वह पहले ही मुक्ति की अवस्था, जिसे ब्रह्मभूत या ब्रह्म से तादात्मय कहते हैं, प्राप्त कर चुका होता है | परमेश्र्वर या परब्रह्म से तदाकार हुए बिना कोई उनकी सेवा नहीं कर सकता | परम ज्ञान होने पर सेव्य तथा सेवक में कोई अन्तर नहीं कर सकता, फिर भी उच्चतर आध्यात्मिक दृष्टि से अन्तर तो रहता ही है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
देहात्मबुद्धि के अन्तर्गत, जब कोई इन्द्रियतृप्ति के लिए कर्म करता है, तो दुख का भागी होता है, लेकिन परम जगत् में शुद्ध भक्ति में रत रहने पर कोई दुख नहीं रह जाता | कृष्णभावनाभावित भक्त को न तो किसी प्रकार का शोक होता है, न आकांक्षा होती है | चूँकि ईश्र्वर पूर्ण है, अतएव ईश्र्वर में सेवारत जीव भी कृष्णभावना में रहकर अपने में पूर्ण रहता है | वह ऐसी नदी के तुल्य है, जिसके जल की सारी गंदगी साफ कर दी गई है | चूँकि शुद्ध भक्त में कृष्ण के अतिरिक्त कोई विचार ही नहीं उठते, अतएव वह प्रसन्न रहता है | वह न तो किसी भौतिक क्षति पर शोक करता है, न किसी लाभ की आकांक्षा करता है, क्योंकि वह भगवद्भक्ति से पूर्ण होता है | वह किसी भौतिक भोग की आकांक्षा नहीं करता, क्योंकि वह जानता है कि प्रत्येक जीव भगवान् का अंश है, अतएव वह उनका नित्य दास है | वह भौतिक जगत में न तो किसी को अपने से उच्च देखता है और न किसी को निम्न | ये उच्च तथा निम्न पद क्षणभंगुर हैं और भक्त को क्षणभंगुर प्राकट्य तथा तिरोधान से कुछ लेना-देना नहीं रहता | उसके लिए पत्थर तथा सोना बराबर होते हैं | यह ब्रह्मभूत अवस्था है, जिसे शुद्ध भक्त सरलता से प्राप्त कर लेता है | उस अवस्था में परब्रह्म से तादात्मय और अपने अस्तित्व का विलय नरकीय बन जाता है, स्वर्ग प्राप्त करने का विचार मृगतृष्णा लगता है और इन्द्रियाँ विषदंतविहीन सर्प की भाँति प्रतीत होती है | जिस प्रकार विषदंतविहीन सर्प से कोई भय नहीं रह जाता उसी प्रकार स्वतः संयमित इन्द्रियों से कोई भय नहीं रह जाता | यह संसार उस व्यक्ति के लिए दुखमय है, जो भौतिकता से ग्रस्त है | लेकिन भक्त के लिए समस्त जगत् वैकुण्ठ-तुल्य है | इस ब्रह्माण्ड का महान से महानतम पुरुष भी भक्त के लिए एक क्षुद्र चीटीं से अधिक महत्त्वपूर्ण नहीं होता | ऐसी अवस्था भगवान् चैतन्य की कृपा से ही प्राप्त हो सकती है, जिन्होंने इस युग में शद्ध भक्ति का प्रचार किया |&lt;br /&gt;
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		<author><name>Harshita</name></author>
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