<?xml version="1.0"?>
<feed xmlns="http://www.w3.org/2005/Atom" xml:lang="en">
	<id>https://dev.vanipedia.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=Dhriti</id>
	<title>Vanipedia - User contributions [en]</title>
	<link rel="self" type="application/atom+xml" href="https://dev.vanipedia.org/w/api.php?action=feedcontributions&amp;feedformat=atom&amp;user=Dhriti"/>
	<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/wiki/Special:Contributions/Dhriti"/>
	<updated>2026-06-12T10:16:23Z</updated>
	<subtitle>User contributions</subtitle>
	<generator>MediaWiki 1.45.3</generator>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=587247</id>
		<title>HI/690617 - जदुरानी को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=587247"/>
		<updated>2022-07-16T11:56:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - जदुरानी दासी को‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690617 - Letter to Jadurani written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690617_-_Letter_to_Jadurany.JPG| जदुरानी को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक जून १७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी प्रिय जदुरानी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। आपके उत्साहवर्धक पत्र के लिए मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं, और मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि हवाई केंद्र में बहुत अच्छा प्रचार कार्य चल रहा है। अब आप ब्रह्मानंद को परेड और अन्य नामजप कार्यक्रमों के अधिक से अधिक फोटो भेजें। अब हमारे अखबार की नीति होगी कि हम अपनी गतिविधियों के ज्यादा से ज्यादा फोटो और लेख छापें। गौरसुंदर के पत्र से मैं समझता हूं कि अब इतने लोगों के घर में रहने में असुविधा हो रही है, इसलिए मुझे लगता है कि आप तुरंत सत्स्वरूप के पास बॉस्टन लौट सकते हैं। मुझे लगता है कि अब आप संकीर्तन गतिविधियों में भाग ले सकते हैं, इसलिए जब आप बॉस्टन लौटेंगे तो आप कभी-कभी संकीर्तन पार्टी में उनके साथ बाहर जा सकते हैं। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि गोविंद दासी ने मेरी बातों का पालन कर खुद को अपनी सभी बीमारियों से ठीक कर लिया, और मैं बहुत उत्साहित हूं। आप दोनों हरे कृष्ण का जाप करें और संकीर्तन पार्टी में शामिल हों, और कोई बीमारी नहीं होगी। महाराज परीक्षित ने कहा था कि भगवान की महिमा का जप मुक्त व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है। इसका अर्थ है कि जप करने से व्यक्ति सभी भौतिक बाधाओं से मुक्त हो जाता है। नामजप से न केवल हमें मुक्ति मिलती है, बल्कि अपनी बद्ध अवस्था में भी हम नामजप की मधुर मधुर ध्वनि सुनना पसंद करते हैं। केवल एक व्यक्ति जो आत्महत्या कर रहा है या जो पशु हत्या का आदी है, ऐसे व्यक्ति इस जप की मिठास का स्वाद नहीं ले सकते। लेकिन अगर वे इस नामजप को अपना लेते हैं, तो भी वे मुक्त हो जाएंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र के लिए पुनः धन्यवाद। मैं आने वाले महीनों में विशेष कृष्ण भावनामृत छुट्टियों की सूची संलग्न कर रहा हूं। मुझे आशा है कि यह आपको बेहतर स्वास्थ्य में मिलेगा।&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=587246</id>
		<title>HI/690617 - जदुरानी को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%9C%E0%A4%A6%E0%A5%81%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=587246"/>
		<updated>2022-07-16T11:55:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - जदुरानी दासी को‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690617 - Letter to Jadurany written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690617_-_Letter_to_Jadurany.JPG| जदुरानी को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक जून १७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी प्रिय जदुरानी,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। आपके उत्साहवर्धक पत्र के लिए मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं, और मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि हवाई केंद्र में बहुत अच्छा प्रचार कार्य चल रहा है। अब आप ब्रह्मानंद को परेड और अन्य नामजप कार्यक्रमों के अधिक से अधिक फोटो भेजें। अब हमारे अखबार की नीति होगी कि हम अपनी गतिविधियों के ज्यादा से ज्यादा फोटो और लेख छापें। गौरसुंदर के पत्र से मैं समझता हूं कि अब इतने लोगों के घर में रहने में असुविधा हो रही है, इसलिए मुझे लगता है कि आप तुरंत सत्स्वरूप के पास बॉस्टन लौट सकते हैं। मुझे लगता है कि अब आप संकीर्तन गतिविधियों में भाग ले सकते हैं, इसलिए जब आप बॉस्टन लौटेंगे तो आप कभी-कभी संकीर्तन पार्टी में उनके साथ बाहर जा सकते हैं। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि गोविंद दासी ने मेरी बातों का पालन कर खुद को अपनी सभी बीमारियों से ठीक कर लिया, और मैं बहुत उत्साहित हूं। आप दोनों हरे कृष्ण का जाप करें और संकीर्तन पार्टी में शामिल हों, और कोई बीमारी नहीं होगी। महाराज परीक्षित ने कहा था कि भगवान की महिमा का जप मुक्त व्यक्तियों द्वारा किया जा सकता है। इसका अर्थ है कि जप करने से व्यक्ति सभी भौतिक बाधाओं से मुक्त हो जाता है। नामजप से न केवल हमें मुक्ति मिलती है, बल्कि अपनी बद्ध अवस्था में भी हम नामजप की मधुर मधुर ध्वनि सुनना पसंद करते हैं। केवल एक व्यक्ति जो आत्महत्या कर रहा है या जो पशु हत्या का आदी है, ऐसे व्यक्ति इस जप की मिठास का स्वाद नहीं ले सकते। लेकिन अगर वे इस नामजप को अपना लेते हैं, तो भी वे मुक्त हो जाएंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र के लिए पुनः धन्यवाद। मैं आने वाले महीनों में विशेष कृष्ण भावनामृत छुट्टियों की सूची संलग्न कर रहा हूं। मुझे आशा है कि यह आपको बेहतर स्वास्थ्य में मिलेगा।&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B0_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=587047</id>
		<title>HI/690617 - हरेर नामा और प्रभावती को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%B9%E0%A4%B0%E0%A5%87%E0%A4%B0_%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%94%E0%A4%B0_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A4%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=587047"/>
		<updated>2022-07-09T07:43:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - हरेर नामा को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - प्रभावती दासी को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - विवाहित दम्पत्तियों को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690617 - Letter to Harer Nama and Prabhavati written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690617_-_Letter_to_ Harer_Nama_and_Prabhavati.JPG| हरेर नामा और प्रभावती को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक जून १७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय हरेर नामा और प्रभावती,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपके जून १०, १९६९ के पत्रों की प्राप्ति हुई है, और मैंने दोनों के विषय को बहुत प्रोत्साहन के साथ नोट किया है। मुझे उन नए लोगों से भी छोटे-छोटे पत्र मिले हैं, जो सैंटा फ़े मंदिर में आपकी मदद करने आए हैं, और हमारे आंदोलन की उनकी अच्छी सराहना करना मेरे लिए बहुत खुशी की बात है। उन्हें बहुत अच्छी तरह से रखें, और जैसा कि आप समझते हैं कि उनमें से एक या सभी दीक्षा के लिए तैयार हैं और उस तरह की इच्छा कर रहे हैं, तो वे अपने जप मालाओं को मेरे पास जाप करने के लिए भेज सकते हैं। आपने मुझे फिर से सैंटे फे मंदिर आने के लिए आमंत्रित किया है और यह विचार अच्छा है, लेकिन वर्तमान में मैं जुलाई के उत्तरार्ध तक लंदन जाने की योजना बना रहा हूं, इसलिए मुझे कोई तत्काल अवसर नहीं दिख रहा है। लंदन से संभवत: मैं लॉस एंजिलस‎ लौटूंगा, तो देखते हैं कि उस समय कोई अवसर होगा या नहीं। आपने जो चित्र भेजे हैं, वे बहुत, बहुत अच्छे हैं, और मुझे आशा है कि आपके मार्गदर्शन में सैंटे फे मंदिर पूरे क्षेत्र में हरे कृष्ण के जाप का प्रसार करेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया अपनी अच्छी पत्नी, प्रभावती, और बहुत अच्छे नए लोगों को मेरा आशीर्वाद दें जो सौभाग्य से कृष्णभावनामृत को अपना रहे हैं, मुझे आशा है कि आप सभी अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=587046</id>
		<title>HI/690617 - हंसदूत को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=587046"/>
		<updated>2022-07-09T07:12:52Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - हंसदूत को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690617 - Letter to Hansadutta written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690617_-_Letter_to_Hansadutta.JPG| हंसदूत को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १७,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय हंसदूत,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपके दिनांक जून ७, १९६९ और जून ११, १९६९ के पत्रों की प्राप्ति की पावती देता हूं, और मैंने ध्यान से विषय को नोट कर लिया है। नॉर्थ डकोटा के दौरे के संबंध में, यह एक अच्छा प्रस्ताव है। अगर यह व्यावहारिक है, तो यह आपके और आपकी पत्नी के लिए बहुत अच्छा होगा। आपको केवल एक स्टेशन वैगन किराए पर लेना है, ताकि आप यात्रा कर सकें, सो सकें और वहां खाना बना सकें। अपने साथ चार-पांच जोड़ी झांझ, एक हारमोनियम, एक मृदंग रखें। आप में से कोई एक हारमोनियम बजा सकता है, कोई एक मृदंग बजा सकता है, और श्रोताओं में से कुछ व्यक्ति करताल बजा सकते हैं। इस तरह आप अच्छा कीर्तन कर सकते हैं। सुबल मुझसे यहां न्यू वृंदाबन में मिले और इस योजना का वर्णन किया, लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह अभी परिपक्व है। लेकिन जब कोई व्यवस्था हो जाए तो आप उसे स्वीकार कर सकते हैं। आपने सुझाव दिया है कि नंदकिशोर और उनकी पत्नी आपके साथ जुड़ें, लेकिन आप प्रति सप्ताह $३५० के साथ दो जोड़ी पति-पत्नियों के साथ कैसे प्रबंधन करेंगे? कार्यक्रम बहुत अच्छा है, और यदि आप इसे व्यावहारिक बना सकते हैं, तो मेरा इसके लिए पूरा समर्थन है। यह हमारे दर्शन और संकीर्तन को फैलाने का एक अच्छा अवसर है। मैं समझता हूं कि आप और हिमावती पहले ही वैंकूवर जा चुके हैं, और मैं इस संबंध में आपसे आपकी रिपोर्ट सम्बंधित एक पत्र की अपेक्षा कर रहा हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया हिमावती को मेरा आशीर्वाद प्रदान करें। मुझे आशा है कि आप दोनों अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पुनश्च: जहां तक भक्तों के सुबह उठने के समय की बात है, यहां न्यू वृन्दाबन में लोग चार बजे तक उठ जाते हैं। लेकिन आपके देश में लोग इसके आदी नहीं हैं, और उन्हें इसकी आदत पड़ने में थोड़ा समय लगेगा। लेकिन जहां तक हो सके उन्हें चार बजे उठाने की कोशिश करें।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586880</id>
		<title>HI/690617 - हंसदूत को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586880"/>
		<updated>2022-07-02T10:46:56Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - हंसदूत को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690617 - Letter to Hansadutta written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690617_-_Letter_to_Hansadutta.JPG| हंसदूत को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १७,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय हंसदूत,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपके दिनांक जून ७, १९६९ और जून ११, १९६९ के पत्रों की प्राप्ति की पावती देता हूं, और मैंने ध्यान से विषय को नोट कर लिया है। नॉर्थ डकोटा के दौरे के संबंध में, यह एक अच्छा प्रस्ताव है। अगर यह व्यावहारिक है, तो यह आपके और आपकी पत्नी के लिए बहुत अच्छा होगा। आपको केवल एक स्टेशन वैगन किराए पर लेना है, ताकि आप यात्रा कर सकें, सो सकें और वहां खाना बना सकें। अपने साथ चार-पांच जोड़ी झांझ, एक हारमोनियम, एक मृदंग रखें। आप में से कोई एक हारमोनियम बजाएं, कोई एक मृदंग बजाएं, और श्रोताओं में से कुछ व्यक्ति करताल बजा सकते हैं। इस तरह आप अच्छा कीर्तन कर सकते हैं। सुबल मुझसे यहां न्यू वृंदाबन में मिले और इस योजना का वर्णन किया, लेकिन मुझे नहीं लगता कि यह अभी परिपक्व है। लेकिन जब कोई व्यवस्था हो जाए तो आप उसे स्वीकार कर सकते हैं। आपने सुझाव दिया है कि नंदकिशोर और उनकी पत्नी आपके साथ जुड़ें, लेकिन आप प्रति सप्ताह $३५० के साथ दो जोड़ी पति-पत्नियों के साथ कैसे प्रबंधन करेंगे? कार्यक्रम बहुत अच्छा है, और यदि आप इसे व्यावहारिक बना सकते हैं, तो मेरा इसके लिए पूरा समर्थन है। यह हमारे दर्शन और संकीर्तन को फैलाने का एक अच्छा अवसर है। मैं समझता हूं कि आप और हिमावती पहले ही वैंकूवर जा चुके हैं, और मैं इस संबंध में आपसे आपकी रिपोर्ट सम्बंधित एक पत्र की अपेक्षा कर रहा हूं।&lt;br /&gt;
कृपया हिमावती को मेरा आशीर्वाद प्रदान करें। मुझे आशा है कि आप दोनों अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पुनश्च: जहां तक सुबह उठने की बात है, यहां न्यू वृन्दाबन में लोग चार बजे तक उठ जाते हैं। लेकिन आपके देश में लोग इसके आदी नहीं हैं, और उन्हें इसकी आदत पड़ने में थोड़ा समय लगेगा। लेकिन जहां तक हो सके उन्हें चार बजे उठाने की कोशिश करें।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586659</id>
		<title>HI/690617 - गौरसुन्दर को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%97%E0%A5%8C%E0%A4%B0%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586659"/>
		<updated>2022-06-25T04:19:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - गौरसुन्दर को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690617 - Letter to Gaurasundara written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690617_-_Letter_to_ Goursundar.JPG| गौरसुन्दर को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १७,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय गौरसुन्दर,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका दिनांक जून १३, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है, और मैंने ध्यान से विषय को नोट कर लिया है। आपकी हाल की संकीर्तन सफलता के बारे में सुनकर मुझे बहुत खुशी हुई, और जब तक यह चल रहा है, सब कुछ अच्छी तरह से होगा। मैं समझ सकता हूं कि अब आप मजबूर होकर घर में रहने वालों की संख्या कम कर रहे हैं, इसलिए फिलहाल आप वहां पांच-छह आदमी रखें। यह मकान मालकिन सिर्फ फायदा उठाने के लिए किराया बढ़ा रही है, लेकिन चूंकि आपके पास रहने के लिए और कोई जगह नहीं है, इसलिए आपको कुछ समझौता करना होगा। जदुरानी तुरंत बॉस्टन लौट सकती हैं, और सुदामा तुरंत लंदन जा सकते हैं। लंदन में सुदामा की बहुत आवश्यकता है, लेकिन क्योंकि मुझे लगा कि आपके केंद्र में उनकी जरूरत है, मैंने उन्हें पहले जाने के लिए नहीं कहा। इन परिस्थितियों में, मुझे लगता है कि वह तुरंत लंदन जा सकते हैं। इस तरह चीजों को समायोजित करें। विश्वास रखें कि कृष्ण आपको वर्तमान असुविधा से बचाएंगे, और ये कदम तुरंत उठाएं। आपने गोविन्द दासी की संकीर्तन में निपुणता के बारे में बात की है, और मैं उनकी योग्यताओं के बारे में अच्छी तरह जानता हूँ। मैं उनकी क्षमता के बारे में १००% आश्वस्त हूं, और वह वहां आपकी गतिविधियों के लिए बहुत उपयोगी हो सकती हैं। दुर्भाग्य से वह बीमार हो जाती हैं, इसलिए पति के रूप में, आपको यह देखना चाहिए कि उनकी उचित देखभाल हो। वह आपकी पत्नी के रूप में आपके लिए एक अच्छी संपत्ति है, और मैं चाहता हूं कि आप दोनों मिलकर काम करें। यही मेरी इच्छा है। आपके पास हवाई में भगवान कृष्ण की बहुत अच्छी सेवा करने का इतना अच्छा अवसर है, और मैं चाहता हूं कि आप दोनों, पति-पत्नी, एक साथ काम करें। मुझे आप पर भरोसा है, और आप दोनों पर मेरे सब आशीर्वाद हैं कि भविष्य में आप अच्छे प्रचारक होंगे। आपने अब तक जो किया है वह बहुत अच्छा है, और मैं वहां आपकी सफलता के लिए कृष्ण से प्रार्थना कर रहा हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया अपने कार्यों की सभी अच्छी तस्वीरें &amp;lt;u&amp;gt;बीटीजी&amp;lt;/u&amp;gt; में प्रकाशन के लिए हयग्रीव को भेजें। हमने अपनी संकीर्तन गतिविधियों के कई चित्र संक्षिप्त विवरण के साथ देने का निर्णय लिया है। हयग्रीव को अब वरिष्ठ संपादक के रूप में पुनर्निर्मित किया गया है। आपको भी पहले की तरह आर्टिकल लिखने चाहिए। मेरे द्वारा आपके लेखों की बहुत सराहना की जाती है, इसलिए आप उन्हें न केवल संकीर्तन के बारे में, बल्कि हमारे दर्शन पर भी लिखते हैं। लेकिन अपनी संकीर्तन गतिविधियों की तस्वीरें तुरंत हयग्रीव को भेजें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र के लिए पुनः धन्यवाद। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586246</id>
		<title>HI/690617 - दिनेश को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690617_-_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586246"/>
		<updated>2022-06-13T04:51:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - दिनेश चन्द्र को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690617 - Letter to Dinesh written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690617_-_Letter_to_Dinesh.JPG| दिनेश को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १७,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय दिनेश,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका जून १३, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ और मैंने ध्यान से इसके विषय को नोट कर लिया है। मैं समझता हूं कि आप हमारी लंदन पार्टी के साथ मिलकर काम करने की योजना बना रहे हैं। इसलिए मैं आपको मेरे द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित एग्रीमेंट वापस भेज रहा हूं, और मुझे आशा है कि आप भगवान चैतन्य की कृपा से इन अभिलेखों का व्यापार वाला पक्ष करेंगे। यदि आप लंदन जाना चाहते हैं तो मुझे कोई आपत्ति नहीं है। आपने जो संकीर्तन चित्र भेजा है, मैं यह नहीं समझा कि आप इस चित्र को अगले एल्बम कवर में प्रिंट करना चाहते हैं, या इसे भेजने का आपका क्या विचार है। वैसे भी, यह बहुत अच्छा है, और इसे संलग्न करने के लिए मैं आपको धन्यवाद देता हूं। कृपया मुझे एग्रीमेंट की एक प्रति तुरंत भेजें ताकि मैं इसे यहां अपनी फाइलों में रख सकूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपनी पत्नी और बच्चे को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है कि आप सभी अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690612_-_%E0%A4%86%E0%A4%B0._%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586237</id>
		<title>HI/690612 - आर. चाल्सन को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690612_-_%E0%A4%86%E0%A4%B0._%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586237"/>
		<updated>2022-06-12T07:13:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - जिज्ञासु लोगों को‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690612 - Letter to R. Chalson written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690612 - Letter to R. Chalson.jpg| आर. चाल्सन को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १२,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय आर. चाल्सन,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जून ८, १९६९ को हमारे न्यूयॉर्क मंदिर को संबोधित और मुझे भेजे गए आपके अच्छे पत्र के लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। मुझे विषय पढ़कर बहुत खुशी हुई। मेरे आध्यात्मिक गुरु, ऊँ विष्णुपाद श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज प्रभुपाद, कभी-कभी कहते थे कि अगर मैं अपनी सारी संपत्ति बेचकर एक व्यक्ति को कृष्णभावनामृत में बदल सकता हूं, तो मुझे लगेगा कि मेरा मिशन सफल हो जाएगा। इसी तरह, मैं भी आपके पत्र को पढ़ने के बाद ऐसा सोच रहा हूं कि अगर मैं अपने प्रकाशन, &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता यथारूप&amp;lt;/u&amp;gt;, के माध्यम से एक व्यक्ति को भी कृष्णभावनामृत के लिए प्रेरित कर सकता हूं, तो मैं सोचूंगा कि मेरा श्रम सफल है। इसलिए मैं आपका पत्र पढ़ कर बहुत उत्साहित हूं, और मुझे दूसरों से भी ऐसे कई पत्र मिले हैं, इसलिए मैं बहुत आशान्वित हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे खेद है कि &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता यथारूप&amp;lt;/u&amp;gt; के कई महत्वपूर्ण श्लोकों को बिना किसी स्पष्टीकरण के छोड़ दिया गया था, लेकिन मैकमिलन कंपनी पुस्तक के खंड मात्रा को कम करना चाहती थी। मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं, इसलिए मेरा अगला प्रयास बिना किसी अपवाद के सभी श्लोकों के स्पष्टीकरण के साथ इसे प्रकाशित करने का होगा। दरअसल, हमारे कृष्ण भावनामृत आंदोलन का अर्थ है मानव समाज में कृष्ण की दिव्य समझ का प्रचार करना। &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt; में कहा गया है कि कई पुरुषों में से केवल एक ही आत्म-साक्षात्कार में रुचि रखता है, और हजारों आत्म-साक्षात्कार व्यक्तियों में से केवल एक ही कृष्ण को समझ सकता है। लेकिन अगर कोई कृष्ण को समझता है कि वे क्या हैं, उनकी दिव्य गतिविधियां क्या हैं, तो ऐसा व्यक्ति तुरंत भगवान के राज्य में प्रवेश करने के योग्य है, और इस दुखी दुनिया में फिर से आने के लिए नहीं। सामान्य तौर पर लोग यह भी नहीं समझते हैं कि यह दुनिया बद्ध आत्मा के लिए दुखी है। न ही उन्हें परमेश्वर के राज्य में बहुत दिलचस्पी है। वे इस दयनीय दुनिया को ईश्वर के बिना ईश्वर का राज्य बनाना चाहते हैं। इसलिए कृष्ण भावनामृत आंदोलन के प्रचार-प्रसार की बहुत आवश्यकता है। जैसा कि आप बहुत बुद्धिमान प्रतीत होते हैं और इस संबंध में रुचि रखते हैं, मैं आपसे इस आंदोलन में यथासंभव मदद करने का अनुरोध करता हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र के लिए फिर से धन्यवाद। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका, &amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690612_-_%E0%A4%86%E0%A4%B0._%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586207</id>
		<title>HI/690612 - आर. चाल्सन को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690612_-_%E0%A4%86%E0%A4%B0._%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B2%E0%A5%8D%E0%A4%B8%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586207"/>
		<updated>2022-06-11T04:30:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - जिज्ञासु लोगों को‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690612 - Letter to R. Chalson written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690612 - Letter to R. Chalson.jpg| आर. चाल्सन को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १२,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय आर. चाल्सन,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जून ८, १९६९ को हमारे न्यूयॉर्क मंदिर को संबोधित और मुझे भेजे गए आपके अच्छे पत्र के लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं। मुझे विषय पढ़कर बहुत खुशी हुई। मेरे आध्यात्मिक गुरु, ऊँ विष्णुपाद श्री श्रीमद् भक्तिसिद्धांत सरस्वती गोस्वामी महाराज प्रभुपाद, कभी-कभी कहते थे कि अगर मैं अपनी सारी संपत्ति बेचकर एक व्यक्ति को कृष्णभावनामृत में बदल सकता हूं, तो मुझे लगेगा कि मेरा मिशन सफल हो जाएगा। इसी तरह, मैं भी आपके पत्र को पढ़ने के बाद ऐसा सोच रहा हूं कि अगर मैं अपने प्रकाशन, &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता याथारूप&amp;lt;/u&amp;gt;, के माध्यम से एक व्यक्ति को भी कृष्णभावनामृत के लिए प्रेरित कर सकता हूं, तो मैं सोचूंगा कि मेरा श्रम सफल है। इसलिए मैं आपका पत्र पढ़ कर बहुत उत्साहित हूं, और मुझे दूसरों से भी ऐसे कई पत्र मिले हैं, इसलिए मैं बहुत आशान्वित हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे खेद है कि &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता याथारूप&amp;lt;/u&amp;gt; के कई महत्वपूर्ण श्लोकों को बिना किसी स्पष्टीकरण के छोड़ दिया गया था, लेकिन मैकमिलन कंपनी पुस्तक के खंड मात्रा को कम करना चाहती थी। मैं इससे संतुष्ट नहीं हूं, इसलिए मेरा अगला प्रयास बिना किसी अपवाद के सभी श्लोकों के स्पष्टीकरण के साथ इसे प्रकाशित करने का होगा। दरअसल, हमारे कृष्ण भावनामृत आंदोलन का अर्थ है मानव समाज में कृष्ण की दिव्य समझ का प्रचार करना। &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt; में कहा गया है कि कई पुरुषों में से केवल एक ही आत्म-साक्षात्कार में रुचि रखता है, और हजारों आत्म-साक्षात्कार व्यक्तियों में से केवल एक ही कृष्ण को समझ सकता है। लेकिन अगर कोई कृष्ण को समझता है कि वे क्या हैं, उनकी दिव्य गतिविधियां क्या हैं, तो ऐसा व्यक्ति तुरंत भगवान के राज्य में प्रवेश करने के योग्य है, और इस दुखी दुनिया में फिर से आने के लिए नहीं। सामान्य तौर पर लोग यह भी नहीं समझते हैं कि यह दुनिया बद्ध आत्मा के लिए दुखी है। न ही उन्हें परमेश्वर के राज्य में बहुत दिलचस्पी है। वे इस दयनीय दुनिया को ईश्वर के बिना ईश्वर का राज्य बनाना चाहते हैं। इसलिए कृष्ण भावनामृत आंदोलन के प्रचार-प्रसार की बहुत आवश्यकता है। जैसा कि आप बहुत बुद्धिमान प्रतीत होते हैं और इस संबंध में रुचि रखते हैं, मैं आपसे इस आंदोलन में यथासंभव मदद करने का अनुरोध करता हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र के लिए फिर से धन्यवाद। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका, &amp;lt;/br&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586174</id>
		<title>HI/690610 - तमाल कृष्ण को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586174"/>
		<updated>2022-06-10T07:01:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - तमाल कृष्ण को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690610 - Letter to Tamala Krishna written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690610_-_Letter_to_Tamal_Krishna.JPG| तमाल कृष्ण को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १०,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय तमाल कृष्ण,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। &amp;lt;u&amp;gt;कॉसमॉस&amp;lt;/u&amp;gt; में छपे लेख के साथ भेजे गए आपके पत्र दिनांक ५ जून १९६९ की मुझे प्राप्ति हुई है, और मैंने इन दोनों चीजों का विषय नोट कर लिया है। लेख बहुत अच्छा था, और मैं सराहना कर सकता हूं कि आप इस कृष्ण दर्शन को कैसे आत्मसात कर रहे हैं और इसे दूसरों तक पहुंचा रहे हैं। दधिभाण्ड उत्सव का आपका वर्णन बहुत रोमांचकारी लगता है, और यहाँ न्यू वृंदाबन की गायों के कारण मक्खन, घी, दूध और पनीर की भी अच्छी आपूर्ति होती है। ड्राफ्ट वकील के संबंध में, कृपया मामले में तेजी लाने का प्रयास करें, क्योंकि हमारे कई लड़के हैं जो ड्राफ्ट सेवा से छूट दिए जाने की इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। तो जब आप इसकी व्यवस्था करने में सक्षम होंगे तो यह हमारे संस्था के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। मेरी यात्रा योजनाओं के लिए आपके सुझावों के संबंध में, आपके विचार बहुत अच्छे हैं, और यदि मैं लंदन नहीं जाता, तो आप उम्मीद कर सकते हैं कि मैं १० जुलाई तक न्यू वृंदावन से सीधे लॉस एंजिलस आ जाऊं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है कि आप अच्छे और सुखद अवस्था में हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586173</id>
		<title>HI/690610 - तमाल कृष्ण को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586173"/>
		<updated>2022-06-10T07:00:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - तमाल कृष्ण को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690610 - Letter to Tamal Krishna written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690610_-_Letter_to_Tamal_Krishna.JPG| तमाल कृष्ण को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १०,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय तमाल कृष्ण,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। &amp;lt;u&amp;gt;कॉसमॉस&amp;lt;/u&amp;gt; में छपे लेख के साथ भेजे गए आपके पत्र दिनांक ५ जून १९६९ की मुझे प्राप्ति हुई है, और मैंने इन दोनों चीजों का विषय नोट कर लिया है। लेख बहुत अच्छा था, और मैं सराहना कर सकता हूं कि आप इस कृष्ण दर्शन को कैसे आत्मसात कर रहे हैं और इसे दूसरों तक पहुंचा रहे हैं। दधिभाण्ड उत्सव का आपका वर्णन बहुत रोमांचकारी लगता है, और यहाँ न्यू वृंदाबन की गायों के कारण मक्खन, घी, दूध और पनीर की भी अच्छी आपूर्ति होती है। ड्राफ्ट वकील के संबंध में, कृपया मामले में तेजी लाने का प्रयास करें, क्योंकि हमारे कई लड़के हैं जो ड्राफ्ट सेवा से छूट दिए जाने की इस सुविधा का लाभ उठा सकते हैं। तो जब आप इसकी व्यवस्था करने में सक्षम होंगे तो यह हमारे संस्था के लिए एक बहुत ही महत्वपूर्ण उपलब्धि होगी। मेरी यात्रा योजनाओं के लिए आपके सुझावों के संबंध में, आपके विचार बहुत अच्छे हैं, और यदि मैं लंदन नहीं जाता, तो आप उम्मीद कर सकते हैं कि मैं १० जुलाई तक न्यू वृंदावन से सीधे लॉस एंजिलस आ जाऊं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है कि आप अच्छे और सुखद अवस्था में हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586115</id>
		<title>HI/690610 - मुकुंद को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586115"/>
		<updated>2022-06-08T06:47:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - मुकुंद को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - अतिरिक्त लिखावट के साथ‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690610 - Letter to Mukunda written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690610_-_Letter_to_Mukunda_1.JPG| मुकुंद को पत्र (पृष्ठ १/२)}}&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690610_-_Letter_to_Mukunda_2.JPG| मुकुंद को पत्र (पृष्ठ १/२)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; जून १०, &amp;amp;nbsp; १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय मुकुंद,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। जून ३, १९६९ के आपके पत्र के लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं, और मैंने विषय को ध्यान से नोट कर लिया है। लीसेस्टर में माताजी शामदेवी के मंदिर के संबंध में, आपका कथन ठीक है, और मुझे हिंदू मंदिर की स्थापना में कोई दिलचस्पी नहीं है। शायद आप जानते हैं कि शुरू से ही मैंने अपने आंदोलन को कभी हिंदू धर्म नहीं बताया। धर्म का अर्थ है वास्तविक प्रक्रिया जिसके द्वारा हम ईश्वर को समझते हैं, और प्रथम श्रेणी का धर्म वह है जो लोगों को ईश्वर के प्रति प्रेम विकसित करना सिखाता है। परमेश्वर के अधिकार को जानना या स्वीकार करना एक बात है, परन्तु परमेश्वर से प्रेम करना दूसरी बात है। आम तौर पर, लोग भौतिक सुख-सुविधाओं में रुचि रखते हैं और वे भगवान को आपूर्ति करने वाले एजेंट के रूप में बनाते हैं। ऐसी भक्ति शुद्ध नहीं होती। यह भौतिक इच्छाओं से दूषित होता है, लेकिन जब कोई प्रेम और प्रणय से भगवान को सब कुछ देने की स्थिति में उन्नत हो जाता है, तो वह प्रथम श्रेणी की स्थिति होती है। हम कृष्ण भावनामृत के नाम से इस दर्शन को पढ़ा रहे हैं, और यह सभी संयमी व्यक्तियों पर लागू होता है। &amp;lt;u&amp;gt;भागवत्&amp;lt;/u&amp;gt; सिद्धांत यह है कि क्योंकि हम भगवान के अपने प्रसुप्त प्रेम को विकसित करके ही खुश रह सकते हैं, अतः यह हमारा पहला व्यवसाय है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं समझता हूं कि आपके पास अब तीन घर विचाराधीन हैं: उनमें से दो तुरंत उपलब्ध हैं, लेकिन एक को कुछ पैसे की आवश्यकता है। आप पैसे क्यों नहीं देते? धन राशि कितनी है? यदि आपके पास पैसों की कमी है और घर बहुत अच्छा है, तो हम पैसों की व्यवस्था कर सकते हैं। आपने कहा है कि मिस्टर जॉर्ज हैरिसन हमें एक चर्च देने के लिए आर्कबिशप से मिलेंगे, और यह एक बहुत अच्छा विचार है, लेकिन अभी तक मैं देख रहा हूं कि मिस्टर हैरिसन ने बहुत सी चीजों का वादा किया था जो व्यावहारिक रूप से पूरी नहीं हुई थीं। इसलिए चर्च की प्रतीक्षा करने के बजाय, यदि आप तीन घरों में से एक पर विचार कर सकते हैं, तो यह बेहतर होगा। आपका संकीर्तन आंदोलन बिना घर के भी चल रहा है, इसलिए शोक का कोई कारण नहीं है। आपको संकीर्तन जारी रखना चाहिए और हमारा साहित्य बेचना चाहिए, कोई बात नहीं मंदिर हो या न हो। मुझे बहुत खुशी है कि आप पहले ही १,००० &amp;lt;u&amp;gt;बीटीजी&amp;lt;/u&amp;gt; बेच चुके हैं, और मुझे लगता है कि आपके लिए ५,००० पत्रिकाएं बेचना बहुत मुश्किल नहीं होगा। यह आपकी वित्तीय समस्याओं का एक हिस्सा हल करेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके इष्ट गोष्ठी प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं: जब तक कोई कृष्ण लोक का निवासी न हो, वह आध्यात्मिक गुरु नहीं हो सकता। वह पहला प्रस्ताव है। एक आम आदमी आध्यात्मिक गुरु नहीं हो सकता, और अगर वह ऐसा हो जाता है तो वह केवल अशांति पैदा करेगा। और मुक्त व्यक्ति कौन है? जो कृष्ण को जानता है। &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt;, चौथे अध्याय, में कहा गया है कि जो कोई भी कृष्ण को वास्तव में जानता है, वह तुरंत मुक्त हो जाता है, और वर्तमान शरीर छोड़ने के बाद, वह तुरंत कृष्ण के पास जाता है। इसका मतलब है कि वह कृष्ण लोक का निवासी बन जाता है। जैसे ही कोई मुक्त होता है वह तुरंत कृष्ण लोक का निवासी होता है, और जो कोई भी कृष्ण के सत्य को जानता है वह आध्यात्मिक गुरु बन सकता है। वह भगवान चैतन्य का संस्करण है। तो पूरी बात को सारांशित करने के लिए, यह समझें कि एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु कृष्ण लोक का निवासी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका अगला प्रश्न, क्या आध्यात्मिक गुरु पहले एक बद्ध आत्मा थे, वास्तव में एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु कभी बद्ध आत्मा नहीं होते। मुक्त व्यक्ति तीन प्रकार के होते हैं। उन्हें १) साधन सिद्ध, २) कृपा सिद्ध, और ३) नित्य सिद्ध कहा जाता है। साधन सिद्ध का अर्थ है जिसने भक्ति सेवा के नियामक सिद्धांतों को निष्पादित करके संसिद्धि प्राप्त की है। कृपा सिद्ध का अर्थ है जिसने कृष्ण और आध्यात्मिक गुरु की विशेष दया से संसिद्धि प्राप्त की है, और नित्य सिद्ध का अर्थ है वह जो कभी दूषित नहीं हुआ। नित्य सिद्ध का लक्षण यह है कि वह अपने जीवन के शुरुआत से ही कृष्ण से जुड़ा हुआ है, और वह कृष्ण की सेवा करने से कभी परिश्रांत नहीं होता। अतः हमें इन लक्षणों से यह जानना होगा कि कौन क्या होता है। लेकिन जब कोई वास्तव में सिद्ध मंच पर होता है तो ऐसा कोई भेद नहीं होता है कि कौन साधन, कृपा या नित्य सिद्ध है। जब कोई सिद्ध होता है, तो कोई भेद नहीं होता कि कौन क्या है। ठीक उसी तरह जैसे नदी का पानी जब अटलांटिक महासागर में गिरता है, तो कोई भी यह भेद नहीं कर सकता कि हडसन नदी का हिस्सा कौन सा था अथवा कोई अन्य नदी का हिस्सा कौन सा था। न ही ऐसा कोई भेद करने की कोई आवश्यकता है। वास्तव में, प्रत्येक जीव शाश्वत रूप से अदूषित है, भले ही वह भौतिक स्पर्श में हो। यह वेदों का संस्करण है। &amp;lt;u&amp;gt;असंग अयम् पुरुष&amp;lt;/u&amp;gt; - जीव अदूषित है। जैसे पानी में तेल की एक बूंद होने पर आप तुरंत तेल को पानी से अलग कर सकते हैं, और पानी कभी भी तेल &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039; के साथ मिश्रित नहीं होता है। इसी तरह, एक जीव, हालांकि भौतिक संपर्क में है, हमेशा पदार्थ से अलग होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपने यह सहीं कहा कि जब आध्यात्मिक गुरु बोलते हैं तो यह माना जाना चाहिए कि कृष्ण बोल रहे हैं। यह एक तथ्य है। एक आध्यात्मिक गुरु को मुक्त होना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कृष्ण लोक से आया है या वह यहां से मुक्त हो गया है। लेकिन उसे मुक्त होना चाहिए। मुक्त होने का विज्ञान ऊपर बताया गया है, लेकिन जब कोई मुक्त हो जाता है, तो भेद करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि वह सीधे कृष्ण लोक से आया है या भौतिक दुनिया से। लेकिन व्यापक अर्थों में हर कोई कृष्ण लोक से आता है। जब कोई कृष्ण को भूल जाता है तो वह बद्ध हो जाता है, जब कोई कृष्ण को याद करता है तो वह मुक्त हो जाता है। मुझे आशा है कि इससे ये बिंदु स्पष्ट हो जाएंगे। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पश्चलेख मैं जानकी से यह जानने के लिए बहुत उत्सुक हूं कि वे पत्राचार क्यों नहीं करतीं? &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
सेवा में: श्रीमन मुकुंद दास अधिकारी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
७९ किर्ले रोड &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
बैटरसी स्ट्रीट &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
लंदन द.प. ११ &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
इंगलैंड &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586096</id>
		<title>HI/690610 - मुकुंद को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586096"/>
		<updated>2022-06-07T07:10:57Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - मुकुंद को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - अतिरिक्त लिखावट के साथ‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690610 - Letter to Mukunda written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690610_-_Letter_to_Mukunda_1.JPG| मुकुंद को पत्र (पृष्ठ १/२)}}&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690610_-_Letter_to_Mukunda_2.JPG| मुकुंद को पत्र (पृष्ठ १/२)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; जून १०, &amp;amp;nbsp; १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय मुकुंद,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। जून ३, १९६९ के आपके पत्र के लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं, और मैंने विषय को ध्यान से नोट कर लिया है। लीसेस्टर में माताजी शामदेवी के मंदिर के संबंध में, आपका कथन ठीक है, और मुझे हिंदू मंदिर की स्थापना में कोई दिलचस्पी नहीं है। शायद आप जानते हैं कि शुरू से ही मैंने अपने आंदोलन को कभी हिंदू धर्म नहीं बताया। धर्म का अर्थ है वास्तविक प्रक्रिया जिसके द्वारा हम ईश्वर को समझते हैं, और प्रथम श्रेणी का धर्म वह है जो लोगों को ईश्वर के प्रति प्रेम विकसित करना सिखाता है। परमेश्वर के अधिकार को जानना या स्वीकार करना एक बात है, परन्तु परमेश्वर से प्रेम करना दूसरी बात है। आम तौर पर, लोग भौतिक सुख-सुविधाओं में रुचि रखते हैं और वे भगवान को आपूर्ति करने वाले एजेंट के रूप में बनाते हैं। ऐसी भक्ति शुद्ध नहीं होती। यह भौतिक इच्छाओं से दूषित होता है, लेकिन जब कोई प्रेम और प्रणय से भगवान को सब कुछ देने की स्थिति में उन्नत हो जाता है, तो वह प्रथम श्रेणी की स्थिति होती है। हम कृष्ण भावनामृत के नाम से इस दर्शन को पढ़ा रहे हैं, और यह सभी संयमी व्यक्तियों पर लागू होता है। &amp;lt;u&amp;gt;भागवत्&amp;lt;/u&amp;gt; सिद्धांत यह है कि क्योंकि हम भगवान के अपने प्रसुप्त प्रेम को विकसित करके ही खुश रह सकते हैं, अतः यह हमारा पहला व्यवसाय है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं समझता हूं कि आपके पास अब तीन घर विचाराधीन हैं: उनमें से दो तुरंत उपलब्ध हैं, लेकिन एक को कुछ पैसे की आवश्यकता है। आप पैसे क्यों नहीं देते? धन राशि कितनी है? यदि आपके पास पैसों की कमी है और घर बहुत अच्छा है, तो हम पैसों की व्यवस्था कर सकते हैं। आपने कहा है कि मिस्टर जॉर्ज हैरिसन हमें एक चर्च देने के लिए आर्कबिशप से मिलेंगे, और यह एक बहुत अच्छा विचार है, लेकिन अभी तक मैं देख रहा हूं कि मिस्टर हैरिसन ने बहुत सी चीजों का वादा किया था जो व्यावहारिक रूप से पूरी नहीं हुई थीं। इसलिए चर्च की प्रतीक्षा करने के बजाय, यदि आप तीन घरों में से एक पर विचार कर सकते हैं, तो यह बेहतर होगा। आपका संकीर्तन आंदोलन बिना घर के भी चल रहा है, इसलिए शोक का कोई कारण नहीं है। आपको संकीर्तन जारी रखना चाहिए और हमारा साहित्य बेचना चाहिए, कोई बात नहीं मंदिर हो या न हो। मुझे बहुत खुशी है कि आप पहले ही १,००० &amp;lt;u&amp;gt;बीटीजी&amp;lt;/u&amp;gt; बेच चुके हैं, और मुझे लगता है कि आपके लिए ५,००० पत्रिकाएं बेचना बहुत मुश्किल नहीं होगा। यह आपकी वित्तीय समस्याओं का एक हिस्सा हल करेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके इष्ट गोष्ठी प्रश्नों के उत्तर इस प्रकार हैं: जब तक कोई कृष्ण लोक का निवासी न हो, वह आध्यात्मिक गुरु नहीं हो सकता। वह पहला प्रस्ताव है। एक आम आदमी आध्यात्मिक गुरु नहीं हो सकता, और अगर वह ऐसा हो जाता है तो वह केवल अशांति पैदा करेगा। और मुक्त व्यक्ति कौन है? जो कृष्ण को जानता है। &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt;, चौथे अध्याय, में कहा गया है कि जो कोई भी कृष्ण को वास्तव में जानता है, वह तुरंत मुक्त हो जाता है, और वर्तमान शरीर छोड़ने के बाद, वह तुरंत कृष्ण के पास जाता है। इसका मतलब है कि वह कृष्ण लोक का निवासी बन जाता है। जैसे ही कोई मुक्त होता है वह तुरंत कृष्ण लोक का निवासी होता है, और जो कोई भी कृष्ण के सत्य को जानता है वह आध्यात्मिक गुरु बन सकता है। वह भगवान चैतन्य का संस्करण है। तो पूरी बात को सारांशित करने के लिए, यह समझें कि एक वास्तविक आध्यात्मिक गुरु कृष्ण लोक का निवासी है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका अगला प्रश्न, क्या आध्यात्मिक गुरु पहले एक बद्ध आत्मा थे, वास्तव में एक प्रामाणिक आध्यात्मिक गुरु कभी बद्ध आत्मा नहीं होते। मुक्त व्यक्ति तीन प्रकार के होते हैं। उन्हें १) साधना सिद्ध, २) कृपा सिद्ध, और ३) नित्य सिद्ध कहा जाता है। साधना सिद्ध का अर्थ है जिसने भक्ति सेवा के नियामक सिद्धांतों को निष्पादित करके संसिद्धि प्राप्त की है। कृपा सिद्ध का अर्थ है जिसने कृष्ण और आध्यात्मिक गुरु की विशेष दया से संसिद्धि प्राप्त की है, और नित्य सिद्ध का अर्थ है वह जो कभी दूषित नहीं हुआ। नित्य सिद्ध का लक्षण यह है कि वह अपने जीवन की शुरुआत से ही कृष्ण से जुड़ा हुआ है, और वह कृष्ण की सेवा करने से कभी परिश्रांत नहीं होता। अतः हमें इन लक्षणों से यह जानना होगा कि कौन क्या होता है। लेकिन जब कोई वास्तव में सिद्ध मंच पर होता है तो ऐसा कोई भेद नहीं होता है कि कौन साधना, कृपा या नित्य सिद्ध है। जब कोई सिद्ध होता है, तो कोई भेद नहीं होता कि कौन क्या है। ठीक उसी तरह जैसे नदी का पानी जब अटलांटिक महासागर में गिरता है, तो कोई भी यह भेद नहीं कर सकता कि हडसन नदी का हिस्सा कौन सा है अथवा कोई अन्य नदी का हिस्सा कौन सा था। न ही ऐसा कोई भेद करने की कोई आवश्यकता है। वास्तव में, प्रत्येक जीव शाश्वत रूप से अदूषित है, भले ही वह भौतिक स्पर्श में हो। यह वेदों का संस्करण है। &amp;lt;u&amp;gt;असंग अयम् पुरुष&amp;lt;/u&amp;gt; - जीव अदूषित है। जैसे पानी में तेल की एक बूंद होने पर आप तुरंत तेल को पानी से अलग कर सकते हैं, और पानी कभी भी तेल &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039; के साथ मिश्रित नहीं होता है। इसी तरह, एक जीव, हालांकि भौतिक संपर्क में है, हमेशा पदार्थ से अलग होता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपने यह सहीं कहा कि जब आध्यात्मिक गुरु बोलते हैं तो यह माना जाना चाहिए कि कृष्ण बोल रहे हैं। यह एक तथ्य है। एक आध्यात्मिक गुरु को मुक्त होना चाहिए। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह कृष्ण लोक से आया है या वह यहां से मुक्त हो गया है। लेकिन उसे मुक्त होना चाहिए। मुक्त होने का विज्ञान ऊपर बताया गया है, लेकिन जब कोई मुक्त हो जाता है, तो भेद करने की कोई आवश्यकता नहीं है कि वह सीधे कृष्ण लोक से आया है या भौतिक दुनिया से। लेकिन व्यापक अर्थों में हर कोई कृष्ण लोक से आता है। जब कोई कृष्ण को भूल जाता है तो वह बद्ध हो जाता है, जब कोई कृष्ण को याद करता है तो वह मुक्त हो जाता है। मुझे आशा है कि इससे ये बिंदु स्पष्ट हो जाएंगे। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पश्चलेख मैं जानकी से यह सुनने के लिए बहुत उत्सुक हूं कि वह क्यों नहीं लिखती? &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
सेवा में: श्रीमन मुकुंद दास अधिकारी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
७९ किर्ले रोड &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
बैटरसी स्ट्रीट &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
लंदन द.प. ११ &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
इंगलैंड &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B7_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586024</id>
		<title>HI/690610 - मधुद्विष को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B7_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586024"/>
		<updated>2022-06-04T05:16:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - मधुद्विष को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690610 - Letter to Madhudvisa written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जून १०, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय मधुद्विष,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपके दिनांक जून ६, १९६९ के पत्रों की प्राप्ति की पावती देता हूं, और मैंने विषय को ध्यान से नोट कर लिया है। ब्रह्मचारी बने रहने का आपका संकल्प बहुत उत्साहजनक है। दरअसल, जीव को ज्यादा से ज्यादा उलझने की जरूरत नहीं है। बल्कि उसे अपना समय कृष्ण भावनामृत के व्यवसाय को समाप्त करने के लिए बचाना चाहिए, और इस प्रकार इस जीवन में मुक्त होना चाहिए। कामवासना हर जीव का एक लक्षण है, लेकिन श्रीमद्-भागवतम् में यह सलाह दी गई है कि यह खुजली की प्रवृत्ति की तरह कुछ है। यदि कोई इस खुजली को सहन कर ले तो वह इस खुजली के कारण होने वाले बड़े कष्टदायक व्यवसाय से खुद को बचा सकता है। अतः  बुद्धिमान व्यक्ति खुजली को संतुष्ट करने के बाद के प्रभावों को स्वीकार करने के बजाय खुजली की अनुभूति का दर्द सहन करता है। भारत में, इसलिए, कई अखंड ब्रह्मचारी हैं, और मेरे गुरु महाराज सबसे अच्छे ब्रह्मचारी थे। तो आपका ब्रह्मचारी बने रहने का निर्णय बहुत ही गौरवशाली है, और यदि आप कृष्ण भावनामृत के सिद्धांतों का सख्ती से पालन करते हैं, तो आप कभी भी किसी कामवासना से परेशान नहीं होंगे, और पूरी तरह से कृष्ण भावनामृत में लगे रहकर जीवन बहुत सरल हो जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बैंक ऑफ अमेरिका के माध्यम द्वारा भारत से आने वाले माल के संबंध में, मैं इसके साथ एक पत्र और $१०० का चेक संलग्न कर रहा हूं। मुझे आशा है कि यह आपके प्रश्न का हल करेगा। इस संलग्न पत्र के साथ आप आवश्यक कार्य कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके उत्साहवर्धक पत्र के लिए मैं एक बार फिर आपको धन्यवाद देता हूं। कृपया वहां के अन्य भक्तों को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B7_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586011</id>
		<title>HI/690610 - मधुद्विष को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%AE%E0%A4%A7%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B7_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=586011"/>
		<updated>2022-06-03T07:11:29Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - मधुद्विष को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690610 - Letter to Madhudvisa written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जून १०, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय मधुद्विष,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपके दिनांक जून ६, १९६९ के पत्रों की प्राप्ति की पावती देता हूं, और मैंने विषय को ध्यान से नोट कर लिया है। ब्रह्मचारी बने रहने का आपका संकल्प बहुत उत्साहजनक है। दरअसल, जीव को ज्यादा से ज्यादा उलझने की जरूरत नहीं है। बल्कि उसे अपना समय कृष्ण भावनामृत के व्यवसाय को समाप्त करने के लिए बचाना चाहिए, और इस प्रकार इस जीवन में मुक्त होना चाहिए। कामवासना हर जीव का एक लक्षण है, लेकिन श्रीमद्-भागवतम् में यह सलाह दी गई है कि यह खुजली की प्रवृत्ति की तरह कुछ है। यदि कोई इस खुजली को सहन कर ले तो वह इस खुजली के कारण होने वाले बड़े कष्टदायक व्यवसाय से खुद को बचा सकता है। अतः  बुद्धिमान व्यक्ति खुजली को संतुष्ट करने के बाद के प्रभावों को स्वीकार करने के बजाय खुजली की अनुभूति का दर्द सहन करता है। भारत में, इसलिए, कई अखंड ब्रह्मचारी हैं, और मेरे गुरु महाराज सबसे अच्छे ब्रह्मचारी थे। तो आपका ब्रह्मचारी बने रहने का निर्णय बहुत ही गौरवशाली है, और यदि आप कृष्ण भावनामृत के सिद्धांतों का कठोरता से पालन करते हैं, तो आप कभी भी किसी कामवासना से परेशान नहीं होंगे, और पूरी तरह से कृष्ण भावनामृत में लगे रहकर जीवन बहुत सरल हो जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बैंक ऑफ अमेरिका के माध्यम से भारत से आने वाले माल के संबंध में, मैं इसके साथ एक पत्र और $१०० का चेक संलग्न कर रहा हूं। मुझे आशा है कि इससे आपके प्रश्न का समाधान हो जाएगा। इस संलग्न पत्र के साथ आप आवश्यक कार्य कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके उत्साहवर्धक पत्र के लिए मैं एक बार फिर आपको धन्यवाद देता हूं। कृपया वहां के अन्य भक्तों को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585978</id>
		<title>HI/690610 - दिनेश को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585978"/>
		<updated>2022-06-02T05:31:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - दिनेश चन्द्र को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690610 - Letter to Dinesh written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690610_-_Letter_to_Dinesh.JPG| दिनेश को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १०,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय दिनेश,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका दिनांक जून ६, १९६९ का पत्र और आपके द्वारा भेजे गए एग्रीमेंट की प्रति प्राप्त हुई है। पहली बात यह है कि मैंने आपको अपना वचन पहले ही दे दिया है, इसलिए मेरे साथ एग्रीमेंट की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा शब्द अंतिम एग्रीमेंट है, लेकिन यदि आप इसे व्यावसायिक कारणों के लिए चाहते हैं, तो मुझे इस पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन शब्द हमेशा स्पष्ट नहीं होते हैं। एक और बात यह है कि हालांकि मैं इस संकीर्तन आंदोलन को पश्चिमी दुनिया में लाया हूं, हम इसे कॉपीराइट नहीं कर सकते। संकीर्तन आंदोलन मेरा आविष्कार नहीं है। तो इसे कॉपीराइट कैसे किया जा सकता है? इसके अलावा, जैसा कि आप मेरी पिछली रिकॉर्डिंग के एल्बम में पाएंगे, हरे कृष्ण का जप अनादि काल से चल रहा है। तो हरे कृष्ण को कॉपीराइट नहीं किया जा सकता है, हालांकि जिस धुन में मैं अपने शिष्यों के साथ गाता हूं, उसे कॉपीराइट किया जा सकता है। मुझे इस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन भ्रमित न हों कि हरे कृष्ण या भगवान चैतन्य के आंदोलन के नामजप को कॉपीराइट किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुबंध में कुछ बिंदु हैं जो बहुत स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए आप उन्हें मुझे डाक द्वारा समझा सकते हैं। बिंदु इस प्रकार हैं: &amp;quot;इस्कॉन के पास उक्त ध्वनि के सभी मूर्त भावों को संरक्षित और वितरित करने का एकमात्र और अनन्य अधिकार तथा प्राधिकरण होगा।&amp;quot; &amp;quot;उपरोक्त ध्वनि पूरी तरह से इस्कॉन द्वारा एक मूर्त रूप में तय किया जाएगा&amp;quot; &amp;quot;इस्कॉन के पास किसी भी मौजूदा ध्वनि रिकॉर्डिंग के लिए विशेष अधिकार होगा जो कि निर्धारण के किसी भी माध्यम में निहित है, जिसे पहले स्वामी द्वारा रिकॉर्ड किया गया है&amp;quot; &amp;quot;इस समझौते में शामिल सभी उद्देश्यों और गतिविधियों के लिए इस्कॉन के पास स्वामी के नाम और समानता का उपयोग करने का एकमात्र और अनन्य अधिकार होगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत: इन बिंदुओं पर आपके जवाब की प्राप्ति के पश्चात मैं आपको मेरे द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित एग्रीमेंट वापस भेज दूंगा। मैं आपके पत्र के विवरण से बहुत उत्साहित हूं, लेकिन मुझे आपको इस समझौते के पक्ष-विपक्ष के बारे में सूचित करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया कृष्णा देवी को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585957</id>
		<title>HI/690610 - दिनेश को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690610_-_%E0%A4%A6%E0%A4%BF%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585957"/>
		<updated>2022-06-01T05:24:34Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - दिनेश चन्द्र को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690610 - Letter to Dinesh written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690610_-_Letter_to_Dinesh.JPG| दिनेश को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून १०,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय दिनेश,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका दिनांक जून ६, १९६९ का पत्र और आपके द्वारा भेजे गए एग्रीमेंट की प्रति प्राप्त हो गई है। पहली बात यह है कि मैंने आपको अपना वचन पहले ही दे दिया है, इसलिए मेरे साथ एग्रीमेंट की कोई आवश्यकता नहीं है। मेरा शब्द अंतिम एग्रीमेंट है, लेकिन यदि आप इसे व्यावसायिक कारणों के लिए चाहते हैं, तो मुझे इस पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं है। लेकिन शब्द हमेशा स्पष्ट नहीं होते हैं। एक और बात यह है कि हालांकि मैं इस संकीर्तन आंदोलन को पश्चिमी दुनिया में लाया हूं, हम इसे कॉपीराइट नहीं कर सकते। संकीर्तन आंदोलन मेरा आविष्कार नहीं है। तो इसे कॉपीराइट कैसे किया जा सकता है? इसके अलावा, जैसा कि आप मेरी पिछली रिकॉर्डिंग के एल्बम में पाएंगे, हरे कृष्ण का जप अनादि काल से चल रहा है। तो हरे कृष्ण को कॉपीराइट नहीं किया जा सकता है, हालांकि जिस धुन में मैं अपने शिष्यों के साथ गाता हूं, उसे कॉपीराइट किया जा सकता है। मुझे इस एग्रीमेंट पर हस्ताक्षर करने में कोई आपत्ति नहीं है, लेकिन भ्रमित न हों कि हरे कृष्ण या भगवान चैतन्य के आंदोलन के नामजप को कॉपीराइट किया जा सकता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनुबंध में कुछ बिंदु हैं जो बहुत स्पष्ट नहीं हैं, इसलिए आप उन्हें मुझे डाक द्वारा समझा सकते हैं। बिंदु इस प्रकार हैं: &amp;quot;इस्कॉन के पास उक्त ध्वनि के सभी मूर्त भावों को संरक्षित और वितरित करने का एकमात्र और अनन्य अधिकार और प्राधिकरण होगा।&amp;quot; &amp;quot;उपरोक्त ध्वनि पूरी तरह से इस्कॉन द्वारा एक मूर्त रूप में तय किया जाएगा&amp;quot; &amp;quot;इस्कॉन के पास किसी भी मौजूदा ध्वनि रिकॉर्डिंग के लिए विशेष अधिकार होगा जो कि निर्धारण के किसी भी माध्यम में निहित है, जिसे पहले स्वामी द्वारा रिकॉर्ड किया गया है&amp;quot; &amp;quot;इस समझौते में शामिल सभी उद्देश्यों और गतिविधियों के लिए इस्कॉन के पास स्वामी के नाम और समानता का उपयोग करने का एकमात्र और अनन्य अधिकार होगा।&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अत: इन बिंदुओं पर आपके जवाब की प्राप्ति के पश्चात मैं आपको मेरे द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित एग्रीमेंट वापस भेज दूंगा। मैं आपके पत्र के बयान से बहुत उत्साहित हूं, लेकिन मुझे आपको इस समझौते के पक्ष-विपक्ष के बारे में सूचित करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया कृष्णा देवी को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690608_-_%E0%A4%88%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585912</id>
		<title>HI/690608 - ईशानदास को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690608_-_%E0%A4%88%E0%A4%B6%E0%A4%BE%E0%A4%A8%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585912"/>
		<updated>2022-05-30T02:35:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - ईशान को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690608 - Letter to Ishandas written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जून ०८, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
केंद्र न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, माउंड्सविल, वेस्ट वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय ईशानदास,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका दिनांक मई २८, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है और मैंने इसके विषय को नोट कर लिया है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि आप कृष्णभावनामृत में बहुत उत्साह से काम कर रहे हैं। नए भक्तों के लिए एक छोटी पुस्तिका का आपका विचार अच्छा है, और आप इसे आसानी से कर सकते हैं। जप के दस प्रकार के अपराध और एक भक्त की योग्यता जैसे महत्वपूर्ण विषयों को शामिल करना सुनिश्चित करें। जब यह पुस्तक पूरी हो जाएगी तो मैं इसका निरीक्षण करूंगा और इसे आपको मुद्रण के लिए लौटा दूंगा और मेरे पास जो भी सुझाव होंगे उन्हें जोड़ दूंगा। मुझे यह जानकर भी प्रसन्नता हो रही है कि आप मॉन्ट्रियल मंदिर के भौतिक ढांचे की मरम्मत का कार्यभार संभाल रहे हैं। हालाँकि हमारा पहला काम हमेशा संकीर्तन होता है, और जैसा कि हंसदूत ने मुझे बताया है कि आपको पुलिस से कुछ परेशानी हो रही थी क्योंकि वे धन इकट्ठा करने की अनुमति नहीं दे रहे थे, मैंने एक सुझाव दिया है कि इस कठिनाई को कैसे दूर किया जाए। तो आप इस बिंदु पर उनके साथ परामर्श कर सकते हैं और आवश्यक कार्य कर सकते हैं। मुझे जनार्दन से अभी तक संघटन के नोट वापस नहीं मिले हैं, इसलिए यदि आप उनसे मिलें तो कृपया उन्हें जल्द से जल्द भेजने के लिए याद दिलाएं। यह नोट करना बहुत उत्साहजनक है कि मंदिर में चार नए लोग रह रहे हैं, और यह इस बात का प्रमाण है कि आप वहां अच्छा कर रहे हैं। वास्तव में यदि हम केवल अपने निर्धारित मालाओं का जप करते हुए और नियामक सिद्धांतों का पालन करते हुए अपने आप को कृष्णभावनाभावित रखते हैं, तो हमारे संपर्क में आने वाली ईमानदार आत्माएं स्वतः ही आकर्षित होंगी। ऐसा इसलिए है क्योंकि हम किसी को झांसा नहीं दे रहे हैं, और अगर कोई आध्यात्मिक जीवन में खुद की संसिद्धि चाहता है, तो निश्चित रूप से वह हमारे सभी सिद्धांतों से सहमत होगा और वह हमारे साथ जुड़ना चाहेगा। इस देश में अन्य तथाकथित योग समाज वास्तव में केवल बकवास या इन्द्रियतृप्ति के रूपों की पेशकश कर रहे हैं, लेकिन इस तरह की भौतिक गतिविधियाँ वास्तविक आध्यात्मिक जीवन के बारे में गंभीर होने वाले को पर्याप्त रूप से आकर्षित नहीं करेंगी। वास्तविक आध्यात्मिक जीवन का अर्थ है भगवान के शाश्वत सेवक के रूप में अपनी संवैधानिक स्थिति में कार्य करना, इसलिए हमें भगवद् गीता के इस उदात्त विज्ञान को बड़े पैमाने पर जनता के सामने पेश करना चाहिए, और जो वास्तव में गंभीर हैं वे इसका लाभ उठाएंगे। अपनी संकीर्तन पार्टी के माध्यम से अधिक से अधिक ऐसी ईमानदार आत्माओं तक पहुँचने का प्रयास करें। यह सबसे बड़ी सेवा होगी जो आप कृष्ण और अपने साथी लोगों के लिए कर सकते हैं। कृष्ण ने आपको अच्छी क्षमता और बुद्धि दी है, इसलिए अब आपको कृष्ण की सेवा में उनका पूरा उपयोग करते रहना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया अपनी अच्छी पत्नी बिभावती को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690608_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585827</id>
		<title>HI/690608 - हंसदूत को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690608_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585827"/>
		<updated>2022-05-27T07:45:40Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - हंसदूत को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - अतिरिक्त लिखावट के साथ‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690608 - Letter to Hansadutta written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690608_-_Letter_to_Hansadutta_1.JPG| हंसदूत को पत्र (पृष्ठ १/१)}}&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690608_-_Letter_to_Hansadutta_2.JPG| हंसदूत को पत्र (पृष्ठ १/२)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून ८,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय हंसदूत,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका जून २, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है और मैंने इसके विषय को नोट कर लिया है। मैं समझता हूं कि पुलिस की रुकावट के कारण आपको कुछ असुविधा हो रही है, लेकिन हमें एक बुरे सौदे का सर्वोत्तम लाभ उठाना होगा। संस्कृत की एक कहावत है, &amp;lt;u&amp;gt;शठे शाठ्यम समाचरेत्&amp;lt;/u&amp;gt;, और इसका मतलब है कि अगर कोई शठ है, तो हमें भी शठ बनना चाहिए। एक शठ व्यक्ति के लिए हमें एक साधारण व्यक्ति नहीं होना चाहिए। कृष्णभावनाभावित भक्तों से बहुत बुद्धिमान होने की अपेक्षा की जाती है, इसलिए हमें कृष्णभावनामृत में अपनी उन्नति को सिद्ध करने के लिए बहुत समझदारी से काम लेना होगा। मुझे लगता है कि आपको संकीर्तन पार्टी के साथ एक टेबल रखना चाहिए, एक टेबल जिसमे एक चैरिटी बॉक्स और बिक्री के लिए हमारी किताबें और साहित्य रखना चाहिए। आप हमेशा की तरह अपना कार्य करते हैं और जब पुलिस आएगी तो आप कहें कि आप प्रचार नहीं कर रहे हैं। आपने बस एक टेबल रखी है और जो कोई खरीदना चाहता है वह ऐसा कर सकता है। इसे &amp;lt;u&amp;gt;शठे शाठ्यम समाचरेत्&amp;lt;/u&amp;gt; कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बीटल नायक के बारे में, निश्चित रूप से आप उसे एक गैर समझदार व्यक्ति पाएंगे। वास्तव में वे अबोध हैं, लेकिन दुनिया के पश्चिमी हिस्से में बुद्धिमान होना मूर्खता है, और अज्ञान आनंद है। यह पूरी भौतिक सभ्यता घोर अज्ञानता है, और इसलिए आप दुनिया के इस हिस्से में बहुत बुद्धिमान व्यक्तियों की अपेक्षा नहीं कर सकते। भले ही कोई एक महान दार्शनिक, लेखक, या ऐसा ही कुछ हो, लेकिन यह उसे उन चुनिंदा बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक होने के योग्य नहीं बनाता है जो कृष्णभावनामृत को लेते हैं। बंगाली में एक और कहावत है कि जंगल में सियार को एक महान कुलीन माना जाता है क्योंकि वह बहुत चालाक होता है। इसी प्रकार, भौतिकवादी जीवन शैली में हर कोई अंधा है, और हजारों बड़े अंधे नेताओं के बावजूद, अनुयायी - जो खुद भी अंधे अज्ञ हैं - उन्हें कोई ठोस लाभ नहीं मिल सकता। अतः आपने उसे कृष्ण भावनामृत के बारे में कुछ धारणा देकर अपना कर्तव्य किया है। वह सब ठीक है। हमें इन तथाकथित नेताओं के साथ अपना ज्यादा समय बर्बाद नहीं करना चाहिए क्योंकि वे जंगल के सियार हैं। वे वास्तव में नेता नहीं हैं। एकमात्र नेता कृष्ण हैं और जो कृष्णभावनाभावित हैं। अन्य केवल गुमराह करने वाले हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्याप्त व्यस्तता के अभाव में आपका नाखुश होना एक अच्छा संकेत है। इसे &amp;lt;u&amp;gt;अबरत्य कालतयूं&amp;lt;/u&amp;gt; कहते हैं। जब कोई व्यक्ति कृष्णभावनामृत में उन्नत होता है तो उसे हमेशा यह सोचना चाहिए कि कृष्ण की सेवा से विलग होकर मेरा समय व्यर्थ न हो जाए। आपका मुख्य व्यवसाय संकीर्तन है। हर जगह से मुझे अच्छी रिपोर्ट मिल रही है, खासकर बॉस्टन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिलस और हवाई से कि उन्हें बाहरी कीर्तन से अच्छी सफलता मिल रही है। तो आप बिना किसी चूक के इस सिद्धांत का पालन करें, और चालाक के साथ चालाकी का व्यवहार करें। कभी-कभी आपके पत्र से ऐसा प्रतीत होता है कि आप भ्रमित हैं। मुझे नहीं पता कि आपको ऐसा क्यों होना चाहिए। आपका स्पष्ट कार्यक्रम कृष्ण भावनामृत का प्रसार करना है, और आप इसके लिए सक्षम और अनुभवी हैं। आपको भ्रमित क्यों महसूस करना चाहिए? जैसा कि आप थोड़ा बदलाव चाहते हैं, मझे लगता है कि आप अपनी संकीर्तन पार्टी के साथ कुछ समय के लिए वैंकूवर जा सकते हैं, और एक केंद्र को मजबूती से स्थापित करने में मदद कर सकते हैं क्योंकि आनंद अकेले वहां संघर्ष कर रहे हैं। मंडली भद्र और वृंदाबनेश्वरी ने उनकी मदद की थी, लेकिन जल्द ही वे हैम्बर्ग के लिए रवाना हो रहे हैं। तो आप कुछ दिनों के लिए वैंकूवर क्यों नहीं जाते?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया अपनी अच्छी पत्नी, हिमावती*, के साथ-साथ अन्य सभी भक्तों को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
* मुझे उनसे और अपने श्री विग्रह के लिए एक पोशाक के बारे में सुनकर खुशी होगी। &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690608_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585771</id>
		<title>HI/690608 - हंसदूत को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690608_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585771"/>
		<updated>2022-05-26T03:04:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - हंसदूत को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - अतिरिक्त लिखावट के साथ‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690608 - Letter to Hansadutta written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690608_-_Letter_to_Hansadutta_1.JPG| हंसदूत को पत्र (पृष्ठ १/१)}}&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690608_-_Letter_to_Hansadutta_2.JPG| हंसदूत को पत्र (पृष्ठ १/२)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून ८,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय हंसदूत,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका जून २, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है और मैंने इसके विषय को नोट कर लिया है। मैं समझता हूं कि पुलिस की रुकावट के कारण आपको कुछ असुविधा हो रही है, लेकिन हमें एक बुरे सौदे का सर्वोत्तम लाभ उठाना होगा। संस्कृत की एक कहावत है, &amp;lt;u&amp;gt;शठे शाठ्यम समाचरेत्&amp;lt;/u&amp;gt;, और इसका मतलब है कि अगर कोई शठ है, तो हमें भी शठ बनना चाहिए। एक शठ व्यक्ति के लिए हमें एक साधारण व्यक्ति नहीं होना चाहिए। कृष्णभावनाभावित भक्तों से बहुत बुद्धिमान होने की अपेक्षा की जाती है, इसलिए हमें कृष्णभावनामृत में अपनी उन्नति को सिद्ध करने के लिए बहुत समझदारी से काम लेना होगा। मुझे लगता है कि आपको संकीर्तन पार्टी के साथ एक टेबल रखना चाहिए, एक टेबल जिसमे एक चैरिटी बॉक्स और बिक्री के लिए हमारी किताबें और साहित्य रखना चाहिए। आप हमेशा की तरह अपना कार्य करते हैं और जब पुलिस आएगी तो आप कहें कि आप प्रचार नहीं कर रहे हैं। आपने बस एक टेबल रखी है और जो कोई खरीदना चाहता है वह ऐसा कर सकता है। इसे &amp;lt;u&amp;gt;शठे शाठ्यम समाचरेत्&amp;lt;/u&amp;gt; कहा जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
बीटल नायक के बारे में, निश्चित रूप से आप उसे एक गैर समझदार व्यक्ति पाएंगे। वास्तव में वे अबोध हैं, लेकिन दुनिया के पश्चिमी हिस्से में बुद्धिमान होना मूर्खता है, और अज्ञान आनंद है। यह पूरी भौतिक सभ्यता घोर अज्ञानता है, और इसलिए आप दुनिया के इस हिस्से में बहुत बुद्धिमान व्यक्तियों की अपेक्षा नहीं कर सकते। भले ही कोई एक महान दार्शनिक, लेखक, या ऐसा ही कुछ हो, लेकिन यह उसे उन चुनिंदा बुद्धिमान व्यक्तियों में से एक होने के योग्य नहीं बनाता है जो कृष्णभावनामृत को लेते हैं। बंगाली में एक और कहावत है कि जंगल में एक सियार को एक महान कुलीन माना जाता है क्योंकि वह बहुत चालाक होता है। इसी प्रकार, भौतिकवादी जीवन शैली में हर कोई अंधा है, और हजारों बड़े अंधे नेताओं के बावजूद, अनुयायी - जो खुद भी अंधे अज्ञ हैं - उन्हें कोई ठोस लाभ नहीं मिल सकता। अतः आपने उसे कृष्ण भावनामृत के बारे में कुछ धारणा देकर अपना कर्तव्य किया है। वह सब ठीक है। हमें इन तथाकथित नेताओं के साथ अपना ज्यादा समय बर्बाद नहीं करना चाहिए क्योंकि वे जंगल में सियार हैं। वे वास्तव में नेता नहीं हैं। एकमात्र नेता कृष्ण हैं और जो कृष्णभावनाभावित हैं। अन्य केवल गुमराह करने वाले हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पर्याप्त व्यस्तता के अभाव में आपका नाखुश होना एक अच्छा संकेत है। इसे &amp;lt;u&amp;gt;अबरत्य कालतयूं&amp;lt;/u&amp;gt; कहते हैं। जब कोई व्यक्ति कृष्णभावनामृत में उन्नत होता है तो उसे हमेशा यह सोचना चाहिए कि कृष्ण की सेवा से विलग होकर मेरा समय व्यर्थ न हो जाए। आपका मुख्य व्यवसाय संकीर्तन है। हर जगह से मुझे अच्छी रिपोर्ट मिल रही है, खासकर बॉस्टन, न्यूयॉर्क, लॉस एंजिलस और हवाई से कि उन्हें बाहरी कीर्तन से अच्छी सफलता मिल रही है। तो आप बिना किसी चूक के इस सिद्धांत का पालन करें, और चालाक के साथ चालाकी का व्यवहार करें। कभी-कभी आपके पत्र में ऐसा प्रतीत होता है कि आप भ्रमित हैं। मुझे नहीं पता कि आपको ऐसा क्यों होना चाहिए। आपका स्पष्ट कार्यक्रम कृष्ण भावनामृत का प्रसार करना है, और आप इसके लिए सक्षम और अनुभवी हैं। आपको भ्रमित क्यों महसूस करना चाहिए? जैसा कि आप थोड़ा बदलाव चाहते हैं, मझे लगता है कि आप अपनी संकीर्तन पार्टी के साथ कुछ समय के लिए वैंकूवर जा सकते हैं, और एक केंद्र को मजबूती से स्थापित करने में मदद कर सकते हैं क्योंकि आनंद अकेले वहां संघर्ष कर रहे हैं। मंडली भद्र और वृंदाबनेश्वरी ने उनकी मदद की थी, लेकिन जल्द ही वे हैम्बर्ग के लिए रवाना हो रहे हैं। तो आप कुछ दिनों के लिए वैंकूवर क्यों नहीं जाते?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया अपनी अच्छी पत्नी, हिमावती*, के साथ-साथ अन्य सभी भक्तों को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
* मुझे उनसे और अपने श्री विग्रह के लिए एक पोशाक के बारे में सुनकर खुशी होगी। &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690608_-_%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585662</id>
		<title>HI/690608 - आनंद को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690608_-_%E0%A4%86%E0%A4%A8%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585662"/>
		<updated>2022-05-23T04:47:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - आनंद को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690608 - Letter to Ananda written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690608_-_Letter_to_Ananda.JPG| आनंद को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून ८,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय आनंद,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपका पत्र (अदिनांकित) पाकर बहुत खुश हूं और मैंने आपका नया पता नोट कर लिया है। मुझे यह जानकर प्रसन्नता हो रही है कि आप पहले ही उस स्थान के लिए एक महीने के किराए का भुगतान कर चुके हैं। मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं कि आप वहां अकेले और चुपचाप संघर्ष कर रहे हैं, और इसके लिए कृष्ण निश्चित रूप से आपको आशीर्वाद देंगे। मैंने अपने पिछले पत्र में सुझाव दिया था कि यदि आप अकेला महसूस कर रहे हैं तो आप टोरंटो पार्टी में शामिल हो सकते हैं। लेकिन यदि नहीं, तो आप अपने वर्तमान कार्यक्रम को जारी रखें, और मैं इसका पूरा समर्थन करता हूँ। सभी केंद्रों में हर कोई अपने-अपने केंद्र को बेहतर बनाने की पूरी कोशिश कर रहा है, और धीरे-धीरे वे बहुत अच्छी प्रगति के तथ्यात्मक प्रमाण बन रहे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मंडली भद्र और उनकी पत्नी को जर्मन भाषा में हमारे प्रकाशनों की जिम्मेदारी लेने के लिए जर्मनी जाना होगा। यह पहले ही तय हो चुका है, और समझा जाता है कि वे २७ जून को जा रहे हैं। इसलिए वे अपनी उपस्थिति द्वारा व्यक्तिगत रूप से आपकी मदद नहीं कर पाएंगे। हालाँकि, आप हंसदूत से पत्राचार कर सकते हैं, और वे कुछ दिनों के लिए अपनी संकीर्तन पार्टी के साथ वहाँ जा सकते हैं और आपके केंद्र को मजबूती से स्थापित करने में आपकी मदद कर सकते हैं। मैं इस संबंध में हंसदूत को भी पत्र लिख रहा हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र के लिए मैं फिर से आपको धन्यवाद देता हूं। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585659</id>
		<title>HI/690607 - उत्तमश्लोक को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585659"/>
		<updated>2022-05-22T03:43:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - उत्तम श्लोक को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Uttamasloka written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690607_-_Letter_to_Uttama_Sloka.JPG| उत्तमश्लोक को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;माउंड्सविल, वेस्ट वर्जीनिया २६०४१ &amp;lt;/u&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय उत्तम श्लोक,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपका पत्र (अदिनांकित) पाकर बहुत खुश हूं और मैंने इन बातों को नोट कर लिया है कि आपने मंदिर छोड़ दिया था लेकिन अब आप फिर से लौट आए हैं। यह अतिशय उत्साहजनक है, क्योंकि इसका मतलब है कि कृष्ण आप पर अत्यंत दयालु हैं। यद्यपि आपने उन्हें छोड़ दिया, उन्होंने आपको जाने की अनुमति नहीं दी। आप पर उनकी विशेष कृपा है। व्यक्तियों में कभी-कभी असहमति हो सकती है, लेकिन यह बिल्कुल स्वाभाविक है। सामान्य पारिवारिक मामलों में भी कभी-कभी असहमति होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि असहमत सदस्य तुरंत परिवार छोड़ दें। इसी तरह हमारे कृष्ण भावनामृत आंदोलन का अर्थ है कि हम सभी कृष्ण के परिवारों में एक साथ एकत्रित हो रहे हैं। वास्तव में हम भगवान के सनातन परिवार के सदस्य हैं, लेकिन स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण हम अब कृष्ण के साथ अपने शाश्वत संबंध को भूल गए हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे पागल आदमी अपने पारिवारिक रिश्ते को भूल जाता है और सड़क पर भटकता है। परन्तु जब वह फिर से अपनी सामान्य मानसिक स्थिति में होता है, तो वह अपने परिवार के सदस्यों को याद करता है और उनके पास वापस चला जाता है। इसी तरह यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन उस स्मृति को पुनर्जीवित करने का एक उपचार है कि हम सभी कृष्ण के परिवार से संबंधित हैं। तो हम इस भौतिक दुनिया में कृष्ण के परिवार की एक प्रतिकृति स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें कोई भौतिक गतिविधियां नहीं हैं। भौतिक कार्यों से बचने का अर्थ है चार नियामक सिद्धांतों का पालन करना और अपने आप को लगातार कृष्ण भावनामृत गतिविधियों में संलग्न करना और शुद्ध भक्तों की संगति रखना। केवल शरीर और आत्मा को एक साथ रखने के लिए जितनी आवश्यकता होती है, उससे अधिक हमें अपने इंद्रियों को भोग नहीं देना चाहिए। हमें अपने आप को बहुत कठिन कार्यों में नहीं लगाना चाहिए, और हमें कृष्णभावनामृत के प्रसार के लिए जो आवश्यक है, उससे अधिक कुछ भी नहीं बोलना चाहिए। हमें स्थिति, परिस्थितियों और उद्देश्यों के संबंध में नियामक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। हमें लालची नहीं होना चाहिए और हमें कृष्ण में रुचि न रखने वाले व्यक्तियों के साथ घुलना-मिलना नहीं चाहिए। इस तरह, हम लगातार प्रगति कर सकते हैं और कृष्ण के परिवार में अपनी सदस्यता बनाए रख सकते हैं। इस प्रकार, इस जीवन के अंत में हम वास्तव में आध्यात्मिक लोक में प्रवेश करेंगे। तो आपका मुख्य कार्य संकीर्तन फैलाना, वृक्ष की भाँती सहिष्णु बनना और घास से भी विनम्र होना चाहिए। यदि कभी भी कोई कठिनाई हो तो कृपया उपरोक्त तरीके से समाधान करने का प्रयास करें, लेकिन भक्तों की संगति न छोड़ें। यह आपकी मदद नहीं करेगा, भले ही कुछ मुश्किलें हो सकती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र को पढ़कर मुझे इतनी प्रसन्नता हो रही है कि आपको कृष्ण और मेरे निदेशन में अटूट विश्वास है, और यह मनोदृष्टि आपको कृष्णभावनामृत में अधिकाधिक रूप से मदद करेगी। आपके पत्र के लिए एक बार फिर धन्यवाद। मुझे आशा है की आप अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;[अहस्ताक्षरित]&#039;&#039; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585642</id>
		<title>HI/690607 - उत्तमश्लोक को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585642"/>
		<updated>2022-05-21T05:00:02Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - उत्तम श्लोक को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Uttamasloka written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690607_-_Letter_to_Uttama_Sloka.JPG| उत्तमश्लोक को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;माउंड्सविल, वेस्ट वर्जीनिया २६०४१ &amp;lt;/u&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय उत्तम श्लोक,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपका पत्र (अदिनांकित) पाकर बहुत खुश हूं और मैंने इन बातों को नोट कर लिया है कि आपने मंदिर छोड़ दिया था लेकिन अब आप फिर से लौट आए हैं। यह अतिशय उत्साहजनक है, क्योंकि इसका मतलब है कि कृष्ण आप पर अत्यंत दयालु हैं। यद्यपि आपने उन्हें छोड़ दिया, उन्होंने आपको जाने की अनुमति नहीं दी। आप पर उनकी विशेष कृपा है। व्यक्तियों में कभी-कभी असहमति हो सकती है, लेकिन यह बिल्कुल स्वाभाविक है। सामान्य पारिवारिक मामलों में भी कभी-कभी असहमति होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि असहमत सदस्य तुरंत परिवार छोड़ दें। इसी तरह हमारे कृष्ण भावनामृत आंदोलन का अर्थ है कि हम सभी कृष्ण के परिवारों में एक साथ एकत्रित हो रहे हैं। वास्तव में हम भगवान के सनातन परिवार के सदस्य हैं, लेकिन स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण हम अब कृष्ण के साथ अपने शाश्वत संबंध को भूल गए हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे पागल आदमी अपने पारिवारिक रिश्ते को भूल जाता है और सड़क पर भटकता है। परन्तु जब वह फिर से अपनी सामान्य मानसिक स्थिति में होता है, तो वह अपने परिवार के सदस्यों को याद करता है और उनके पास वापस चला जाता है। इसी तरह यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन उस स्मृति को पुनर्जीवित करने का एक उपचार है कि हम सभी कृष्ण के परिवार से संबंधित हैं। तो हम इस भौतिक दुनिया में कृष्ण के परिवार की एक प्रतिकृति स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें कोई भौतिक गतिविधियां नहीं हैं। भौतिक कार्यों से बचने का अर्थ है चार नियामक सिद्धांतों का पालन करना और अपने आप को लगातार कृष्ण भावनामृत गतिविधियों में संलग्न करना और शुद्ध भक्तों की संगति रखना। केवल शरीर और आत्मा को एक साथ रखने के लिए जितनी आवश्यकता होती है, उससे अधिक हमें अपने इंद्रियों को भोग नहीं देना चाहिए। हमें अपने आप को बहुत कठिन कार्यों में नहीं लगाना चाहिए, और हमें कृष्णभावनामृत के प्रसार के लिए जो आवश्यक है, उससे अधिक कुछ भी नहीं बोलना चाहिए। हमें स्थिति, परिस्थितियों और उद्देश्यों के संबंध में नियामक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। हमें लालची नहीं होना चाहिए और हमें कृष्ण में रुचि न रखने वाले व्यक्तियों के साथ घुलना-मिलना नहीं चाहिए। इस तरह, हम लगातार प्रगति कर सकते हैं और कृष्ण के परिवार में अपनी सदस्यता बनाए रख सकते हैं। इस प्रकार, इस जीवन के अंत में हम वास्तव में आध्यात्मिक लोक में प्रवेश करेंगे। तो आपका मुख्य कार्य संकीर्तन फैलाना, वृक्ष की भाँती सहिष्णु बनना और घास से भी विनम्र होना चाहिए। यदि कभी भी कोई कठिनाई हो तो कृपया उपरोक्त तरीके से समाधान करने का प्रयास करें, लेकिन भक्तों की संगति न छोड़ें। यह आपकी मदद नहीं करेगा, भले ही कुछ मुश्किलें हो सकती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र को पढ़कर मुझे इतनी प्रसन्नता हो रही है कि आपको कृष्ण और मेरे निदेशन में अटूट विश्वास है, और यह मनोदृष्टि आपको कृष्णभावनामृत में अधिकाधिक रूप से मदद करेगी। आपके पत्र के लिए एक बार फिर धन्यवाद। मुझे आशा है की आप अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;[अहस्ताक्षरित]&#039;&#039; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=Category:HI/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B2_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B&amp;diff=585633</id>
		<title>Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - उत्तम श्लोक को</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=Category:HI/%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B2_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%87_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B&amp;diff=585633"/>
		<updated>2022-05-20T09:15:31Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;H Category:HI/श्रील प्रभ...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - दीक्षित शिष्यों को|H]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - व्यक्ति के अनुसार]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/सभी हिंदी श्रेणियां|9]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - नियुक्त नेताओं को|H]]&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
*&#039;&#039;&#039;This is the link to the English equivalent&#039;&#039;&#039; &#039;&#039;&#039;[[:Vanisource:Category:Uttama Sloka - Letters|Category:Uttama Sloka - Letters]]&#039;&#039;&#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585632</id>
		<title>HI/690607 - उत्तमश्लोक को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585632"/>
		<updated>2022-05-20T09:15:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - उत्तम श्लोक को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Uttamasloka written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690607_-_Letter_to_Uttama_Sloka.JPG| उत्तमश्लोक को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;माउंड्सविल, वेस्ट वर्जीनिया २६०४१ &amp;lt;/u&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ०७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय उत्तम श्लोक,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपका पत्र (अदिनांकित) पाकर बहुत खुश हूं और मैंने इन बातों को नोट कर लिया है कि आपने मंदिर छोड़ दी थी लेकिन अब आप फिर से लौट आए हैं। यह सबसे उत्साहजनक है, क्योंकि इसका मतलब है कि कृष्ण आप पर बहुत दयालु हैं। यद्यपि आपने उन्हें छोड़ दिया, उन्होंने आपको जाने की अनुमति नहीं दी। आप पर उनकी विशेष कृपा है। व्यक्तियों में कभी-कभी असहमति हो सकती है, लेकिन यह बिल्कुल स्वाभाविक है। सामान्य पारिवारिक मामलों में भी कभी-कभी असहमति होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि असहमत सदस्य तुरंत परिवार छोड़ देंगे। इसी तरह हमारे कृष्ण भावनामृत आंदोलन का अर्थ है कि हम सभी कृष्ण के परिवारों में एक साथ एकत्रित हो रहे हैं। वास्तव में हम भगवान के सनातन परिवार के सदस्य हैं, लेकिन स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण हम अब कृष्ण के साथ अपने शाश्वत संबंध को भूल गए हैं, ठीक उसी तरह जैसे पागल आदमी अपने पारिवारिक रिश्ते को भूल जाता है और सड़क पर भटकता है। लेकिन जब वह फिर से अपनी सामान्य मानसिक स्थिति में होता है, तो वह अपने परिवार के सदस्यों को याद करता है और उनके पास वापस चला जाता है। इसी तरह यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन स्मृति को पुनर्जीवित करने का एक उपचार है कि हम सभी कृष्ण के परिवार से संबंधित हैं। तो हम इस भौतिक दुनिया में कृष्ण के परिवार की एक प्रतिकृति स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें कोई भौतिक गतिविधियां नहीं हैं। भौतिक कार्यों से बचने का अर्थ है चार नियामक सिद्धांतों का पालन करना और अपने आप को लगातार कृष्ण भावनामृत गतिविधियों में संलग्न करना और शुद्ध भक्तों की संगति रखना। केवल शरीर और आत्मा को एक साथ रखने के लिए जितनी आवश्यकता होती है, उससे अधिक हमें अपने इंद्रियों को भोग नहीं देना चाहिए। हमें अपने आप को बहुत कठिन कार्यों में नहीं लगाना चाहिए, और हमें कृष्णभावनामृत के प्रसार के लिए जो आवश्यक है, उससे अधिक कुछ भी नहीं बोलना चाहिए। हमें स्थिति, परिस्थितियों और उद्देश्यों के संबंध में नियामक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। हमें लालची नहीं होना चाहिए और हमें कृष्ण में रुचि नहीं रखने वाले व्यक्तियों के साथ घुलना-मिलना नहीं चाहिए। इस तरह, हम लगातार प्रगति कर सकते हैं और कृष्ण के परिवार में अपनी सदस्यता बनाए रख सकते हैं। इस प्रकार, इस जीवन के अंत में हम वास्तव में आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करेंगे। तो आपका मुख्य कार्य संकीर्तन फैलाना, वृक्ष की भाँती सहिष्णु बनना और घास से भी विनम्र होना चाहिए। यदि कभी भी कोई कठिनाई हो तो कृपया उपरोक्त तरीके से समाधान करने का प्रयास करें, लेकिन भक्तों की संगति न छोड़ें। यह आपकी मदद नहीं करेगा, भले ही कुछ मुश्किलें हो सकती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र को पढ़कर मुझे इतनी प्रसन्नता हो रही है कि आपको कृष्ण और मेरे निदेशन में अटूट विश्वास है, और यह रवैया आपको कृष्णभावनामृत में अधिक से अधिक मदद करेगा। आपके पत्र के लिए एक बार फिर धन्यवाद। मुझे आशा है की आप अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;[अहस्ताक्षरित]&#039;&#039; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585629</id>
		<title>HI/690607 - उत्तमश्लोक को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%89%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%A4%E0%A4%AE%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B2%E0%A5%8B%E0%A4%95_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585629"/>
		<updated>2022-05-20T09:06:25Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - उत्तमश्लोक को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Uttamasloka written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690607_-_Letter_to_Uttama_Sloka.JPG| उत्तमश्लोक को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;माउंड्सविल, वेस्ट वर्जीनिया २६०४१ &amp;lt;/u&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ०७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय उत्तम श्लोक,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपका पत्र (अदिनांकित) पाकर बहुत खुश हूं और मैंने इन बातों को नोट कर लिया है कि आपने मंदिर छोड़ दी थी लेकिन अब आप फिर से लौट आए हैं। यह सबसे उत्साहजनक है, क्योंकि इसका मतलब है कि कृष्ण आप पर बहुत दयालु हैं। यद्यपि आपने उन्हें छोड़ दिया, उन्होंने आपको जाने की अनुमति नहीं दी। आप पर उनकी विशेष कृपा है। व्यक्तियों में कभी-कभी असहमति हो सकती है, लेकिन यह बिल्कुल स्वाभाविक है। सामान्य पारिवारिक मामलों में भी कभी-कभी असहमति होती है, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि असहमत सदस्य तुरंत परिवार छोड़ देंगे। इसी तरह हमारे कृष्ण भावनामृत आंदोलन का अर्थ है कि हम सभी कृष्ण के परिवारों में एक साथ एकत्रित हो रहे हैं। वास्तव में हम भगवान के सनातन परिवार के सदस्य हैं, लेकिन स्वतंत्रता के दुरुपयोग के कारण हम अब कृष्ण के साथ अपने शाश्वत संबंध को भूल गए हैं, ठीक उसी तरह जैसे पागल आदमी अपने पारिवारिक रिश्ते को भूल जाता है और सड़क पर भटकता है। लेकिन जब वह फिर से अपनी सामान्य मानसिक स्थिति में होता है, तो वह अपने परिवार के सदस्यों को याद करता है और उनके पास वापस चला जाता है। इसी तरह यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन स्मृति को पुनर्जीवित करने का एक उपचार है कि हम सभी कृष्ण के परिवार से संबंधित हैं। तो हम इस भौतिक दुनिया में कृष्ण के परिवार की एक प्रतिकृति स्थापित करने की कोशिश कर रहे हैं जिसमें कोई भौतिक गतिविधियां नहीं हैं। भौतिक कार्यों से बचने का अर्थ है चार नियामक सिद्धांतों का पालन करना और अपने आप को लगातार कृष्ण भावनामृत गतिविधियों में संलग्न करना और शुद्ध भक्तों की संगति रखना। केवल शरीर और आत्मा को एक साथ रखने के लिए जितनी आवश्यकता होती है, उससे अधिक हमें अपने इंद्रियों को भोग नहीं देना चाहिए। हमें अपने आप को बहुत कठिन कार्यों में नहीं लगाना चाहिए, और हमें कृष्णभावनामृत के प्रसार के लिए जो आवश्यक है, उससे अधिक कुछ भी नहीं बोलना चाहिए। हमें स्थिति, परिस्थितियों और उद्देश्यों के संबंध में नियामक सिद्धांतों का पालन करना चाहिए। हमें लालची नहीं होना चाहिए और हमें कृष्ण में रुचि नहीं रखने वाले व्यक्तियों के साथ घुलना-मिलना नहीं चाहिए। इस तरह, हम लगातार प्रगति कर सकते हैं और कृष्ण के परिवार में अपनी सदस्यता बनाए रख सकते हैं। इस प्रकार, इस जीवन के अंत में हम वास्तव में आध्यात्मिक दुनिया में प्रवेश करेंगे। तो आपका मुख्य कार्य संकीर्तन फैलाना, वृक्ष की भाँती सहिष्णु बनना और घास से भी विनम्र होना चाहिए। यदि कभी भी कोई कठिनाई हो तो कृपया उपरोक्त तरीके से समाधान करने का प्रयास करें, लेकिन भक्तों की संगति न छोड़ें। यह आपकी मदद नहीं करेगा, भले ही कुछ मुश्किलें हो सकती हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र को पढ़कर मुझे इतनी प्रसन्नता हो रही है कि आपको कृष्ण और मेरे निदेशन में अटूट विश्वास है, और यह रवैया आपको कृष्णभावनामृत में अधिक से अधिक मदद करेगा। आपके पत्र के लिए एक बार फिर धन्यवाद। मुझे आशा है की आप अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;[अहस्ताक्षरित]&#039;&#039; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585585</id>
		<title>HI/690607 - सुदामा को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585585"/>
		<updated>2022-05-19T04:37:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - सुदामा को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Sudama written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जून ०७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय सुदामा,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुदामा दास ब्रह्मचारी और हवाई भक्तों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए नमन। मैंने आपके जून २, १९६९ के पत्र की इतनी सराहना की है कि मैं इस संकीर्तन आंदोलन की शक्ति को दिखाने हेतु विभिन्न केंद्रों को भेजने के लिए इस पत्र की प्रतियां बना रहा हूं। तो फिलहाल जब आप हवाई में उत्साहपूर्वक काम कर रहे हैं, वहां एक बहुत अच्छा केंद्र स्थापित करने का प्रयास करें। मुझे पता है कि वहां अच्छी संभावनाएं हैं, और मुझे लगता है कि कृष्ण पहले से ही इस उद्देश्य के लिए प्रोत्साहन दे रहे हैं, क्योंकि गौरसुंदर और बलभद्र हवाई द्वीप पर एक अच्छी जगह खोजने गए हैं। तो आप सभी कर्तव्यनिष्ठा और संयुक्त रूप से काम करें, आप सभी अच्छी आत्माएं हैं, और आप सफल होंगे यदि आप हवाई को न्यू नवद्वीप में बदल सकें। भगवान चैतन्य अपना आशीर्वाद बरसाएंगे और आप न केवल इस जीवन में खुश रहेंगे, बल्कि आपको कृष्ण लोक में पदोन्नत किया जाएगा। अपनी शक्ति को अभी हवाई केंद्र में केंद्रित करें, और भविष्य में हम जापान में एक केंद्र स्थापित करेंगे। मुझे लगता है कि हवाई में आपके संकीर्तन की गर्जना जल्द ही जापान और हांगकांग सहित पड़ोसी स्थानों में सुनाई देगी। समुद्र विष्णु के ससुर हैं, क्योंकि समुद्र मंथन से भाग्य की देवी लक्ष्मी का जन्म हुआ था। तो भाग्य की देवी, लक्ष्मी, समुद्र की बेटी होने के नाते, समुद्र भी समुद्र की बेटी और दामाद की महिमा फैलाने में मदद करेंगे। तो कृपया मुझे अपनी गतिविधियों के बारे में सूचित रखें, और यह मुझे उत्साहित करेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे यह जानकर खुशी हुई कि गोविंद दासी बीमार होने के बावजूद संकीर्तन पार्टी में जा रही हैं और इससे उनकी सारी बीमारी ठीक हो जाएगी। चिंता न करें। मैं हमेशा गोविंद दासी और जदुरानी, कृष्ण भावनामृत के ऐसे ईमानदार कार्यकर्ता, के बारे में सोचता हूं। तो कृपया वहां के सभी भक्तों को मेरा आशीर्वाद दें, और आप सभी को अत्यंत उत्साह से काम करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585552</id>
		<title>HI/690607 - सुदामा को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585552"/>
		<updated>2022-05-18T05:12:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - सुदामा को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Sudama written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जून ०७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय सुदामा,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सुदामा दास ब्रह्मचारी और हवाई भक्तों को उनके उत्कृष्ट कार्य के लिए नमन। मैंने आपके जून २, १९६९ के पत्र की इतनी सराहना की है कि मैं इस संकीर्तन आंदोलन की शक्ति को दिखाने हेतु विभिन्न केंद्रों को भेजने के लिए इस पत्र की प्रतियां बना रहा हूं। तो फिलहाल जब आप हवाई में उत्साहपूर्वक काम कर रहे हैं, वहां एक बहुत अच्छा केंद्र स्थापित करने का प्रयास करें। मुझे पता है कि वहां अच्छी संभावनाएं हैं, और मुझे लगता है कि कृष्ण पहले से ही इस उद्देश्य के लिए प्रोत्साहन दे रहे हैं, क्योंकि गौरसुंदर और बलभद्र हवाई द्वीप पर एक अच्छी जगह खोजने गए हैं। तो आप सभी कर्तव्यनिष्ठा और संयुक्त रूप से काम करें, आप सभी अच्छी आत्माएं हैं, और आप सफल होंगे यदि आप हवाई को न्यू नवद्वीप में बदल सकें। भगवान चैतन्य अपना आशीर्वाद बरसाएंगे और आप न केवल इस जीवन में खुश रहेंगे, बल्कि आपको कृष्ण लोक में पदोन्नत किया जाएगा। अपनी शक्ति को अभी हवाई केंद्र में केंद्रित करें, और भविष्य में हम जापान में एक केंद्र स्थापित करेंगे। मुझे लगता है कि हवाई में आपके संकीर्तन की गर्जना जल्द ही जापान और हांगकांग सहित पड़ोसी स्थानों में सुनाई देगी। समुद्र विष्णु के ससुर हैं, क्योंकि समुद्र मंथन से भाग्य की देवी लक्ष्मी का जन्म हुआ था। तो भाग्य की देवी, लक्ष्मी, समुद्र की बेटी होने के नाते, समुद्र भी समुद्र की बेटी और दामाद की महिमा फैलाने में मदद करेगी। तो कृपया मुझे अपनी गतिविधियों के बारे में सूचित रखें, और यह मुझे उत्साहित करेगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे यह जानकर खुशी हुई कि गोविंद दासी बीमार होने के बावजूद संकीर्तन पार्टी में जा रही हैं और इससे उनकी सारी बीमारी ठीक हो जाएगी। चिंता न करें। मैं हमेशा गोविंद दासी और जदुरानी, कृष्ण भावनामृत के ऐसे ईमानदार कार्यकर्ता, के बारे में सोचता हूं। तो कृपया वहां के सभी भक्तों को मेरा आशीर्वाद दें, और आप सभी को अत्यंत उत्साह से काम करना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%80_%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585520</id>
		<title>HI/690607 - श्रीमती डेविस को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%80_%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585520"/>
		<updated>2022-05-17T00:20:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - भक्तों के माता-पिता को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Mrs. Davis written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690607_-_Letter_to_Mrs_Davis.JPG| श्रीमती डेविस को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून ७,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय श्रीमती डेविस,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका मई ३१, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है और मैंने विषय  को ध्यान से नोट कर लिया है। पतित उद्धरण दो दिन पहले यहां थे, और मैंने उनसे उस स्थिति के बारे में बात की थी जिसका आपने अपने पत्र में उल्लेख किया है। यदि आप यहां न्यू वृंदाबन आ सकते हैं तो कोई आपत्ति नहीं होगी। आपके बेटे, पतित उद्धरण, को सारी बात समझा दी गई है, इसलिए आप उनके साथ परामर्श कर सकते हैं और आवश्यक कार्य कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%80_%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585502</id>
		<title>HI/690607 - श्रीमती डेविस को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%A4%E0%A5%80_%E0%A4%A1%E0%A5%87%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585502"/>
		<updated>2022-05-16T04:03:59Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - भक्तों के माता-पिता को‎‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Mrs. Davis written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690607_-_Letter_to_Mrs_Davis.JPG| श्रीमती डेविस को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून ७,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय श्रीमती डेविस,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका मई ३१, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है और मैंने विषय  को ध्यान से नोट कर लिया है। पतित उद्धरण दो दिन पहले यहां थे, और मैंने उनसे उस स्थिति के बारे में बात की थी जिसका आपने अपने पत्र में उल्लेख किया है। यदि आप यहां न्यू वृंदाबन आ सकते हैं तो कोई आपत्ति नहीं होगी। आपके बेटे, पतित उद्धरण, को सारी बात समझा दी गई है, इसलिए आप उसके साथ परामर्श कर सकते हैं और आवश्यक कार्य कर सकते हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585495</id>
		<title>HI/690607 - कृष्ण दास को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585495"/>
		<updated>2022-05-16T03:45:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - कृष्णा दास‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Krishna dasa written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690607_-_Letter_to_Krishna_Das.JPG| कृष्ण दास को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया २६०४१ &amp;lt;/u&amp;gt; &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय कृष्ण दास,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका मई २५, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है, और मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि शारदीया और वैकुंठनाथ दोनों बॉस्टन में अच्छा कार्य कर रहे हैं। मुझे आशा है कि आपने अब तक उन्हें बधाई पत्र भेज दिए होंगे। जब मैं मॉन्ट्रियल में था तो शारदीया ने वैकुंठनाथ से शादी करने की इच्छा व्यक्त की, और मैंने तुरंत कहा कि वह उसके लिए आरक्षित रहेगा। वह एक बहुत अच्छा लड़का है, और मुझे आशा है कि वे कृष्णभावनामृत में अपने भावी गृहस्थ जीवन में खुश रहेंगे। मुझे मंडली-भद्र और वृंदाबनेश्वरी से भी खबर मिली है कि उन्होंने पहले ही अपने टिकट खरीद लिए हैं और २७ जून को जा रहे हैं, इसलिए जब वे पहुंचें, तो कृपया उनका अच्छा सहयोग करें। आप सभी ईमानदार कार्यकर्ता हैं, और वे भी बहुत ईमानदार आत्मा हैं। तो एक साथ अच्छी तरह से सहयोग करें, और मुझे आशा है कि हमारा हैम्बर्ग केंद्र जल्द ही यूरोप में महत्वपूर्ण केंद्र बन जाएगा। लंदन में उन्हें अभी तक कोई उपयुक्त जगह नहीं मिली है, लेकिन फिर भी वे वहां रथयात्रा उत्सव मनाने के लिए तैयार हैं। परन्तु अभी तक मुझे इस त्योहार के बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिली है। इन परिस्थितियों में अभी तक यह निश्चित नहीं है कि मैं लंदन जाऊंगा या नहीं, लेकिन अपने पत्र के उत्तर में आपने मेरे जर्मनी जाने की इच्छा व्यक्त की है, तो क्या आपको लगता है कि आप वर्तमान स्थिति में मेरा वहां अगवानी करने में सक्षम हैं? मेरे जर्मनी जाने का मतलब है यात्रा का किराया आदि सहित बहुत सारे खर्च। अगर आपको लगता है कि आप इन खर्चों को पूरा कर पाएंगे, तो मुझे सीधे वहां जाने में कोई आपत्ति नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;पीस फार्मूला&amp;lt;/u&amp;gt; की बिक्री की आपकी रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि जब आप जर्मन भाषा में &amp;lt;u&amp;gt;बैक टू गॉडहेड&amp;lt;/u&amp;gt; छपवाएंगे तो यह बहुत अच्छी तरह से वितरित किया जाएगा। मैं देख सकता हूं कि जयगोविंद आपके केंद्र के लिए एक बड़ी संपत्ति हैं और छपाई के मामले में कोई कठिनाई नहीं होगी। वह उस लाइन के विशेषज्ञ हैं, और उन्होंने और रायराम ने यहां न्यूयॉर्क में &amp;lt;u&amp;gt;बैक टू गॉडहेड&amp;lt;/u&amp;gt; सम्बंधित कार्य कई महीनों तक किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585479</id>
		<title>HI/690607 - कृष्ण दास को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585479"/>
		<updated>2022-05-15T12:08:18Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - कृष्णा दास‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Krishna dasa written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690607_-_Letter_to_Krishna_Das.JPG| कृष्ण दास को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया २६०४१ &amp;lt;/u&amp;gt; &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय कृष्ण दास,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका मई २५, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है, और मैं आपको सूचित करना चाहता हूं कि शारदीया और वैकुंठनाथ दोनों बॉस्टन में अच्छा कार्य कर रहे हैं। मुझे आशा है कि आपने अब तक उन्हें बधाई पत्र भेज दिए होंगे। जब मैं मॉन्ट्रियल में था तो शारदीया ने वैकुंठनाथ से शादी करने की इच्छा व्यक्त की, और मैंने तुरंत कहा कि वह उसके लिए आरक्षित रहेगा। वह एक बहुत अच्छा लड़का है, और मुझे आशा है कि वे कृष्णभावनामृत में अपने भावी गृहस्थ जीवन में खुश होंगे। मुझे मंडली-भद्र और वृंदाबनेश्वरी से भी खबर मिली है कि उन्होंने पहले ही अपने टिकट खरीद लिए हैं और २७ जून को जा रहे हैं, इसलिए जब वे पहुंचें, तो कृपया उनका अच्छा सहयोग करें। आप सभी ईमानदार कार्यकर्ता हैं, और वे भी बहुत ईमानदार आत्मा हैं। तो एक साथ अच्छी तरह से सहयोग करें, और मुझे आशा है कि हमारा हैम्बर्ग केंद्र जल्द ही यूरोप में महत्वपूर्ण केंद्र बन जाएगा। लंदन में उन्हें अभी तक कोई उपयुक्त जगह नहीं मिली है, लेकिन फिर भी वे वहां रथयात्रा उत्सव मनाने के लिए तैयार हैं। परन्तु अभी तक मुझे इस त्योहार के बारे में कोई निश्चित जानकारी नहीं मिली है। इन परिस्थितियों में अभी तक यह निश्चित नहीं है कि मैं लंदन जाऊंगा या नहीं, लेकिन अपने पत्र के उत्तर में आपने मेरे जर्मनी जाने की इच्छा व्यक्त की है, तो क्या आपको लगता है कि आप वर्तमान स्थिति में मेरा वहां अगवानी करने में सक्षम हैं? मेरे जर्मनी जाने का मतलब है यात्रा का किराया आदि सहित बहुत सारे खर्च। अगर आपको लगता है कि आप इन खर्चों को पूरा कर पाएंगे, तो मुझे सीधे वहां जाने में कोई आपत्ति नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;पीस फार्मूला&amp;lt;/u&amp;gt; की बिक्री की आपकी रिपोर्ट से ऐसा प्रतीत होता है कि जब आप जर्मन भाषा में &amp;lt;u&amp;gt;बैक टू गॉडहेड&amp;lt;/u&amp;gt; छपवाएंगे तो यह बहुत अच्छी तरह से वितरित किया जाएगा। मैं देख सकता हूं कि जयगोविंद आपके केंद्र के लिए एक बड़ी संपत्ति हैं और छपाई के मामले में कोई कठिनाई नहीं होगी। वह उस लाइन के विशेषज्ञ हैं, और उन्होंने और रायराम ने यहां न्यूयॉर्क में &amp;lt;u&amp;gt;बैक टू गॉडहेड&amp;lt;/u&amp;gt; सम्बंधित कार्य कई महीनों तक किया।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%9C%E0%A4%AF%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585408</id>
		<title>HI/690607 - जयगोविंद को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690607_-_%E0%A4%9C%E0%A4%AF%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%B5%E0%A4%BF%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585408"/>
		<updated>2022-05-13T04:52:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - जयगोविंद को‎‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690607 - Letter to Jayagovinda written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690607_-_Letter_to_Jayagovinda.JPG| जयगोविंद को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया २६०४१&amp;lt;/u&amp;gt; &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय जयगोविंद,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपके दिनांक मई २७, १९६९ के पत्र और मई २०, १९६९ के आपके पत्र की प्राप्ति की सूचना देना चाहता हूं। मैंने तुरंत अच्युतानंद को यूनाइटेड शिपिंग कॉरपोरेशन को दिए गए माल की एक प्रति भेज दी है। ऐसा प्रतीत होता है कि यह कंपनी निष्क्रिय है और व्यवसायिक नहीं है। तो शायद मुझे कोई अन्य शिपिंग एजेंटों के पास जाना होगा, और मैंने पहले ही अच्युतानंद को सलाह दी है कि वे आवश्यक कार्य करें। श्री विग्रह की दूसरी जत्था जो आपने लॉस एंजिलस भेजा था, वह उन्हें प्राप्त हुआ है। मुझे यह जानकर बहुत खुशी हुई कि आप जर्मन केंद्र में उत्साह महसूस कर रहे हैं, और यह स्पष्ट है कि कृष्ण आपको वहां चाहते थे। कृपया वहाँ अपनी पूरी शक्ति के साथ अपने अन्य गुरु भाईयों के सहयोग से कार्य करें। कृष्ण दास, आप, शिवानंद और उत्तम श्लोक सभी अच्छी आत्माएं हैं और भगवान कृष्ण के सच्चे भक्त हैं। इसलिए जब आप मेरे निर्देशन में निष्ठापूर्वक कार्य करते रहेंगे, तो आपकी आगे की उन्नति निश्चित है। मुझे मंडली भद्र से एक पत्र मिला है कि वे २७ जून को वहां पहुंच रहे हैं, और जब वे पहुंचें, तो सहयोग की भावना से सब कुछ बहुत अच्छी तरह से करें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है कि इस समय तक आपने टाइपराइटर प्राप्त कर लिया है और जर्मन अनुवाद चल रहे हैं। आपने पूछा है कि क्या आपको जर्मन भाषा सीखनी चाहिए, और मेरा जवाब है हां, आपको इसे हर तरह से सीखना चाहिए। यहां न्यू वृंदाबन में बिल्कुल वृंदाबन जैसा माहौल है। वे सुबह ४ बजे से रात १० बजे तक नियमित गतिविधियां कर रहे हैं। दिन में कई बार अरात्रिकों का सिलसिला चल रहा है, जिस तरह आपने वृंदावन में देखा था। आपने वृंदावन के जो चित्र लिए हैं, वे &amp;lt;u&amp;gt;बीटीजी&amp;lt;/u&amp;gt; में प्रकाशित हो चुके हैं, और मैंने जापान से भेजी गई एक विशेष अग्रिम प्रति देखी है। यह बहुत अच्छा लेख है, और आपने बहुत अच्छा किया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;  &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
विशेष ध्यान दें: आपने जो अखबार की कतरनें छापी हैं, उनका पुनरुत्पादन बहुत अच्छा किया गया था, और मैं अन्य केंद्रों को दिखाने के लिए इस पृष्ठ की लगभग दस और प्रतियां चाहता हूं।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690606_-_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585375</id>
		<title>HI/690606 - वृन्दावनेश्वरी को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690606_-_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585375"/>
		<updated>2022-05-11T15:40:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - वृन्दावनेश्वरी दासी को‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - जिनके पृष्ठ या पाठ गायब हैं‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690606 - Letter to Vrndavanesvari written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690606 - Letter to Vrndabaneshvari.jpg| वृन्दाबनेश्वरी को पत्र (पृष्ठ १/१ – मूलपाठ गायब)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ६, &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; ६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी प्रिय वृन्दाबनेश्वरी, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। &amp;quot;विक्टोरिया डे&amp;quot; के आपके पत्र के लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं, और मैंने विषय को खुशी से नोट किया है। मुझे हैम्बर्ग के भक्तों के पत्र मिले हैं, और वे यह जानकर बहुत प्रसन्न हैं कि आप जून २७ को सुबह ९:३० बजे पहुंचेंगे। मुझे भी बहुत खुशी हुई कि आप वहां जाने के लिए तैयार हैं। मंडली भद्र को लिखे अपने पिछले पत्र में, मैंने उन्हें पहले ही सूचित कर दिया था कि वह जर्मन &amp;lt;u&amp;gt;बैक टू गॉडहेड&amp;lt;/u&amp;gt; के संपादक के रूप में कार्य करेंगे। इसलिए जब आप वहां जाएं तो कृपया सहकारी मनोदशा में सब कुछ स्थापित करें। वहां के कार्यकर्ता बहुत ईमानदार हैं, और आपके उनके साथ जुड़ने पर, उन्हें बहुत प्रोत्साहन मिलेगा। मुझे यह जानकर भी खुशी हुई कि आप &amp;lt;u&amp;gt;भगवन् श्री चैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत&amp;lt;/u&amp;gt; को पढ़ने का आनंद ले रहे हैं, और अब आपको और आपके पति दोनों को यूरोपीय देशों में भगवान चैतन्य की इन शिक्षाओं का प्रचार करना है। तो कृपया हमारी पुस्तकों को बहुत ध्यान से पढ़ें, और जैसे ही कोई प्रश्न हो आप मुझसे पूछ सकते हैं। मुझे आशा है कि भविष्य में मंडली भद्र इस पुस्तक का जर्मन भाषा में अनुवाद करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र में पहले प्रश्न के बारे में कि हम आध्यात्मिक धामों के बारे में कैसे जानते हैं क्योंकि एक बार जाने के बाद कोई नहीं लौटता है, आपको पता होना चाहिए कि इस भौतिक दुनिया में समय-समय पर प्रकट होने वाले महान मुक्त आत्माएं और अवतार वास्तव में वापस नहीं आ रहे हैं, क्योंकि वे कभी भी भौतिक संदूषण या भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन नहीं होते हैं। पतित जीवों को बचाने के उद्देश्य से वे यहां अस्थायी रूप से आते हैं और जब उनका व्यवसाय समाप्त हो जाता है तो वापस चले जाते हैं, और यह सब सीधे भगवान के प्रत्यक्ष आदेश के तहत है। तो भौतिकता में भगवान या महान मुक्त आत्माओं की उपस्थिति दूषित जीव की उपस्थिति से अलग है, जो इस दुनिया पर प्रभुत्व रखने की इच्छा के कारण भौतिक दुनिया में जन्म लेने के लिए मजबूर है। अपने दूसरे प्रश्न में आपने पूछा कि क्या हम वृंदावन में पृथ्वी को याद करेंगे, और उत्तर निश्चित रूप से हाँ है। जब नारद मुनि व्यासदेव से बात कर रहे थे, जैसा कि आपने हमारे &amp;lt;u&amp;gt;श्रीमद् भागवतम्&amp;lt;/u&amp;gt; के पहले स्कंध में पढ़ा होगा, वे एक आध्यात्मिक शरीर में थे, लेकिन उन्होंने अपने पिछले जीवन को याद किया और व्यासदेव से इसकी व्याख्या की। भौतिक जीवन में विस्मृति है, लेकिन आध्यात्मिक जीवन में विस्मृति नहीं है। मुझे आशा है कि यह आपके इन प्रश्नों का पर्याप्त उत्तर होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया अपने परिवार को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;[अहस्ताक्षरित]&#039;&#039; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690606_-_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585142</id>
		<title>HI/690606 - वृन्दावनेश्वरी को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690606_-_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%B5%E0%A4%A8%E0%A5%87%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B5%E0%A4%B0%E0%A5%80_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585142"/>
		<updated>2022-05-10T15:22:08Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - वृन्दावनेश्वरी दासी को‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - जिनके पृष्ठ या पाठ गायब हैं‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690606 - Letter to Vrndavanesvari written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690606 - Letter to Vrndabaneshvari.jpg| वृन्दाबनेश्वरी को पत्र (पृष्ठ १/१ – मूलपाठ गायब)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ६, &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; ६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी प्रिय वृन्दाबनेश्वरी, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। “विक्टोरिया डे” के आपके पत्र के लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं, और मैंने विषय को खुशी से नोट किया है। मुझे हैम्बर्ग के भक्तों के पत्र मिले हैं, और वे यह जानकर बहुत प्रसन्न हैं कि आप जून २७ को सुबह ९:३० बजे पहुंचेंगे। मुझे भी बहुत खुशी हुई कि आप वहां जाने के लिए तैयार हैं। मंडली भद्र को लिखे अपने पिछले पत्र में, मैंने उन्हें पहले ही सूचित कर दिया था कि वह जर्मन &amp;lt;u&amp;gt;बैक टू गॉडहेड&amp;lt;/u&amp;gt; के संपादक के रूप में कार्य करेंगे। इसलिए जब आप वहां जाएं तो कृपया सहकारी मनोदशा में सब कुछ स्थापित करें। वहां के कार्यकर्ता बहुत ईमानदार हैं, और आपके उनके साथ जुड़ने पर, उन्हें बहुत प्रोत्साहन मिलेगा। मुझे यह जानकर भी खुशी हुई कि आप &amp;lt;u&amp;gt;भगवन् श्री चैतन्य महाप्रभु का शिक्षामृत&amp;lt;/u&amp;gt; को पढ़ने का आनंद ले रहे हैं, और अब आपको और आपके पति दोनों को यूरोपीय देशों में भगवान चैतन्य की इन शिक्षाओं का प्रचार करना है। तो कृपया हमारी पुस्तकों को बहुत ध्यान से पढ़ें, और जैसे ही कोई प्रश्न हो आप मुझसे पूछ सकते हैं। मुझे आशा है कि भविष्य में मंडली भद्र इस पुस्तक का जर्मन भाषा में अनुवाद करेंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र में पहले प्रश्न के बारे में कि हम आध्यात्मिक धामों के बारे में कैसे जानते हैं क्योंकि एक बार जाने के बाद कोई नहीं लौटता है, आपको पता होना चाहिए कि इस भौतिक दुनिया में समय-समय पर प्रकट होने वाले महान मुक्त आत्माएं और अवतार वास्तव में वापस नहीं आ रहे हैं, क्योंकि वे कभी भी भौतिक संदूषण या भौतिक प्रकृति के नियमों के अधीन नहीं होते हैं। पतित जीवों को बचाने के उद्देश्य से वे यहां अस्थायी रूप से आते हैं और जब उनका व्यवसाय समाप्त हो जाता है तो वापस चले जाते हैं, और यह सब सीधे भगवान के प्रत्यक्ष आदेश के तहत है। तो भौतिकता में भगवान या महान मुक्त आत्माओं की उपस्थिति दूषित जीव की उपस्थिति से अलग है, जो इस दुनिया पर प्रभुत्व रखने की इच्छा के कारण भौतिक दुनिया में जन्म लेने के लिए मजबूर है। अपने दूसरे प्रश्न में आपने पूछा कि क्या हम वृंदावन में पृथ्वी को याद करेंगे, और उत्तर निश्चित रूप से हाँ है। जब नारद मुनि व्यासदेव से बात कर रहे थे, जैसा कि आपने हमारे &amp;lt;u&amp;gt;श्रीमद् भागवतम्&amp;lt;/u&amp;gt; के पहले स्कंध में पढ़ा होगा, वे एक आध्यात्मिक शरीर में थे, लेकिन उन्होंने अपने पिछले जीवन को याद किया और व्यासदेव से इसकी व्याख्या की। भौतिक जीवन में विस्मृति है, लेकिन आध्यात्मिक जीवन में विस्मृति नहीं है। मुझे आशा है कि यह आपके इन प्रश्नों का पर्याप्त उत्तर होगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया अपने परिवार को मेरा आशीर्वाद दें। मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;[अहस्ताक्षरित]&#039;&#039; &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%A4%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585068</id>
		<title>HI/690605 - तूर्य को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%A4%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585068"/>
		<updated>2022-05-07T11:55:20Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - तूर्य को‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद द्वारा नव दीक्षितों को नाम देने वाले पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690605 - Letter to Turya written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690605_-_Letter_to_Turyadas.JPG| तूर्यदास को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; २६०४१ &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून ५,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय तूर्यदास,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। आपके जप माला के साथ भेजा गया आपका मई २९, १९६९ का पत्र मुझे प्राप्त हुआ है, और मैंने उनका विधिवत जप किया है और आपको अपने शिष्य के रूप में दीक्षा दी है। आपका आध्यात्मिक नाम तुर्यदास है और इसका अर्थ है पारलौकिक। तो आप पारलौकिक भगवान, कृष्ण, के सेवक हैं और जब कोई दिव्य भगवान की सेवा करता है, तो वह भी पूरी तरह से भौतिक प्रकृति के नियमों और प्रदूषण से परे हो जाता है। भौतिक जीवन में, हर कोई कर्म के नियमों से कसकर बंधा हुआ है, और किसी भी भौतिक माध्यम से इन नियमों को पार करने का कोई सवाल ही नहीं है। आधुनिक सभ्यता भौतिक जीवन के कष्टों, अर्थात् जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगों को भौतिक ज्ञान की उन्नति के द्वारा पार करने की कोशिश कर रही है, लेकिन वास्तव में यह प्रगति उन्हें जीवन की भौतिक अवधारणा में और अधिक मजबूती से बांध रही है। तो इस प्रकार इन भौतिक दुखों से कोई मुक्ति या अतिक्रमण नहीं है। जो बुद्धिमान व्यक्ति यह समझ लेता है कि भौतिक उन्नति के कार्य की सेवा करने के बजाय, उसे कृष्ण की सेवा करनी चाहिए, तो ऐसा व्यक्ति कर्म के कड़े नियमों से परे हो जाता है। कृष्ण हमें &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt; में निर्देश देते हैं कि जो कोई प्रेमपूर्ण भक्ति सेवा में उनकी सेवा करता है, वह सभी भौतिक संदूषण से पूरी तरह से मुक्त हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब आपके पास जप माला है, इसलिए कृपया प्रतिदिन कम से कम १६ माला जाप करें, और &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता यथारूप&amp;lt;/u&amp;gt; का प्रतिदिन कम से कम एक अध्याय पढ़ें। गौरसुंदर आपको उन १० अपराधों के बारे में बताएंगे जिनसे बचना चाहिए। आपको जिन चार प्रमुख नियामक प्रतिबंधों का पालन करना चाहिए वे हैं १) कॉफी या चाय सहित कोई नशा नहीं, २) कोई अवैध यौन-जीवन नहीं, ३) कोई मांसाहारी आहार नहीं, ४) कोई जुआ नहीं। मैं गौरसुंदर से समझता हूं कि आप पहले से ही हवाई मंदिर की मदद कर रहे हैं और आप बहुत अच्छे, ईमानदार लड़के हैं। तो ईमानदारी और सेवा की इन अच्छी योग्यताओं के साथ आप निश्चित रूप से कृष्णभावनामृत में अपने जीवन की संसिद्धि करने में अच्छी प्रगति करेंगे। जैसा कि आपके पास &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt; के इस महान आध्यात्मिक विज्ञान के बारे में प्रश्न हैं, कृपया गौरसुंदर से परामर्श करें, वह एक बहुत ही बुद्धिमान लड़का है, और मैं भी यथासंभव मदद करने के लिए हमेशा आपकी सेवा में हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%A4%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585028</id>
		<title>HI/690605 - तूर्य को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%A4%E0%A5%82%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=585028"/>
		<updated>2022-05-06T04:25:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - तूर्य को‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद द्वारा नव दीक्षितों को नाम देने वाले पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690605 - Letter to Gopala Krishna written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690605_-_Letter_to_Turyadas.JPG| तूर्यदास को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; २६०४१ &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून ५,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय तूर्यदास,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। आपके जप माला के साथ भेजा गया आपका मई २९, १९६९ का पत्र मुझे प्राप्त हुआ है, और मैंने उनका विधिवत जप किया है और आपको अपने शिष्य के रूप में दीक्षा दी है। आपका आध्यात्मिक नाम तुर्यदास है और इसका अर्थ है पारलौकिक। तो आप पारलौकिक भगवान, कृष्ण, के सेवक हैं और जब कोई दिव्य भगवान की सेवा करता है, तो वह भी पूरी तरह से भौतिक प्रकृति के नियमों और प्रदूषण से परे हो जाता है। भौतिक जीवन में, हर कोई कर्म के नियमों से कसकर बंधा हुआ है, और किसी भी भौतिक माध्यम से इन नियमों को पार करने का कोई सवाल ही नहीं है। आधुनिक सभ्यता भौतिक जीवन के कष्टों, अर्थात् जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था और रोगों को भौतिक ज्ञान की उन्नति के द्वारा पार करने की कोशिश कर रही है, लेकिन वास्तव में यह प्रगति उन्हें जीवन की भौतिक अवधारणा में और अधिक मजबूती से बांध रही है। तो इस प्रकार इन भौतिक दुखों से कोई मुक्ति या अतिक्रमण नहीं है। जो बुद्धिमान व्यक्ति यह समझ लेता है कि भौतिक उन्नति के कार्य की सेवा करने के बजाय, उसे कृष्ण की सेवा करनी चाहिए, तो ऐसा व्यक्ति कर्म के कड़े नियमों से परे हो जाता है। कृष्ण हमें &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt; में निर्देश देते हैं कि जो कोई प्रेमपूर्ण भक्ति सेवा में उनकी सेवा करता है, वह सभी भौतिक संदूषण से पूरी तरह से मुक्त हो जाता है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अब आपके पास जप माला है, इसलिए कृपया प्रतिदिन कम से कम १६ माला जाप करें, और &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता यथारूप&amp;lt;/u&amp;gt; का प्रतिदिन कम से कम एक अध्याय पढ़ें। गौरसुंदर आपको उन १० अपराधों के बारे में बताएंगे जिनसे बचना चाहिए। आपको जिन चार प्रमुख नियामक प्रतिबंधों का पालन करना चाहिए वे हैं १) कॉफी या चाय सहित कोई नशा नहीं, २) कोई अवैध यौन-जीवन नहीं, ३) कोई मांसाहारी आहार नहीं, ४) कोई जुआ नहीं। मैं गौरसुंदर से समझता हूं कि आप पहले से ही हवाई मंदिर की मदद कर रहे हैं और आप बहुत अच्छे, ईमानदार लड़के हैं। तो ईमानदारी और सेवा की इन अच्छी योग्यताओं के साथ आप निश्चित रूप से कृष्णभावनामृत में अपने जीवन की संसिद्धि करने में अच्छी प्रगति करेंगे। जैसा कि आप &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt; के इस महान आध्यात्मिक विज्ञान के बारे में प्रश्न कर रहे हैं, कृपया गौरसुंदर से परामर्श करें, वह एक बहुत ही बुद्धिमान लड़का है, और मैं भी यथासंभव मदद करने के लिए हमेशा आपकी सेवा में हूं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584978</id>
		<title>HI/690605 - श्रीमान को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584978"/>
		<updated>2022-05-04T14:30:27Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - विविध को‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690605 - Letter to Sir written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जून ०५, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमान,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आपका मई २७, १९६९ का हिन्दी पत्र प्राप्त हुआ, और मुझे नहीं पता कि गोपाल कृष्ण के पिता इतने परेशान क्यों हैं। मुझे मई २९, १९६९ को गोपाल कृष्ण का एक पत्र मिला है जिसमें वे लिखते हैं &amp;quot;मुझे नहीं लगता कि मेरे माता-पिता को अब कोई आपत्ति होगी क्योंकि मैंने उन्हें तार और पत्र में आश्वासन दिया है कि मैं उनका परित्याग नहीं करने जा रहा हूँ।&amp;quot; मुझे उम्मीद है कि इससे पूरी बात साफ हो जाएगी। जहां तक मुझे याद है, मैं आपसे सैन फ्रांसिस्को में मिला था, अगर मैं सही हूं। मुझे उम्मीद है कि आप अच्छे हैं। आपके पत्र के लिए धन्यवाद।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदीय, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584976</id>
		<title>HI/690605 - श्रीमान को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584976"/>
		<updated>2022-05-04T14:22:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - विविध को‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690605 - Letter to Sir written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जून ०५, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमान,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आपका मई २९, १९६९ का हिन्दी पत्र प्राप्त हुआ, और मुझे नहीं पता कि गोपाल कृष्ण के पिता इतने परेशान क्यों हैं। मुझे मई २९, १९६९ को गोपाल कृष्ण का एक पत्र मिला है जिसमें वे लिखते हैं “मुझे नहीं लगता कि मेरे माता-पिता को अब कोई आपत्ति होगी क्योंकि मैंने उन्हें तार और पत्र में आश्वासन दिया है कि मैं उनका परित्याग नहीं करने जा रहा हूँ।“ मुझे उम्मीद है कि इससे पूरी बात साफ हो जाएगी। जहां तक मुझे याद है, मैं आपसे सैन फ्रांसिस्को में मिला था, अगर मैं सही हूं। मुझे उम्मीद है कि आप अच्छा हैं। आपके पत्र के लिए धन्यवाद।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भवदीय, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584895</id>
		<title>HI/690605 - गोपाल कृष्ण को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%97%E0%A5%8B%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%B2_%E0%A4%95%E0%A5%83%E0%A4%B7%E0%A5%8D%E0%A4%A3_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584895"/>
		<updated>2022-05-02T16:37:55Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - गोपाल कृष्ण को]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - अतिरिक्त लिखावट के साथ‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690605 - Letter to Gopala Krishna written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690605_-_Letter_to_Gopal_Krishna_1.JPG| गोपाल कृष्ण को पत्र (पृष्ठ १/२)}}&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690605_-_Letter_to_Gopal_Krishna_2.JPG| गोपाल कृष्ण को पत्र (पृष्ठ २/२)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून ५,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय गोपाल कृष्ण,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपके मई २९, १९६९ के पत्र की प्राप्ति की स्वीकृति देना चाहता हूं। मैंने पहले ही आपके जप माला पर विधिवत जप कर भेज दिया है, और मुझे आशा है कि आप हमेशा कृष्ण भावनामृत में खुश रहेंगे। चूंकि आप एक बहुत ही अच्छी आत्मा हैं, कृष्ण निश्चित रूप से आपको सभी आशीर्वाद देंगे। इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप दुनिया के इस हिस्से में रहते हैं या भारत में। आप जहां भी रहें वहां आप नियमित रूप से हरे कृष्ण का जाप करें, और आपके उदाहरण का अनुसरण अन्य लोग भी करेंगे। दुनिया को इस लाभ की जरूरत है, और जब आप भारत लौटेंगे  तो ऐसे कई तरीके हैं जिनसे आप अपने माता-पिता को समझा सकते हैं कि कृष्ण भावनामृत को अपनाने का मतलब यह नहीं है कि आपको अपने सांसारिक मामलों को छोड़ना होगा। मैं जानता हूं कि भारत में बहुत से मूर्ख व्यक्ति हैं जो सोचते हैं कि &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt; को पढ़कर व्यक्ति इस संसार को त्यागने के योग्य हो जाता है। यह पूरी तरह से मूर्खता है। अर्जुन एक पारिवारिक व्यक्ति थे, एक सैनिक थे, और उन्हें सीधे &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt; के सिद्धांत सिखाए गए थे, लेकिन उन्होंने कभी भी दुनिया या युद्ध के मैदान का त्याग नहीं किया। पता नहीं क्यों कुछ ऐसे क्षीण व्यक्ति हैं जो ऐसा सोचते हैं, कि अगर कोई आदमी भक्त हो जाता है, तो उसे सांसारिक मामलों में कोई दिलचस्पी नहीं रहेगी। हम मायावदी नहीं हैं; हम यह नहीं कहते कि दुनिया झूठी है। हम कहते हैं कि यदि कृष्ण सत्य हैं, तो जगत् भी सत्य है क्योंकि जगत् कृष्ण की शक्ति का प्रकटीकरण है। तो अगर कृष्ण सत्य हैं, तो उनकी ऊर्जा असत्य कैसे हो सकती है? मायावादी तथाकथित अद्वैतवाद का प्रचार करते हैं, लेकिन वे हमेशा ब्रह्म और माया में भेद करते हैं। कहते हैं ब्रह्म सत्य है, माया मिथ्या है। हम कहते हैं कि माया सत्य है, और क्योंकि यह कृष्ण की शक्ति है, उसे कृष्ण की सेवा में लगाना चाहिए। यही हमारा दर्शन है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जहाँ तक आपके माता-पिता का संबंध है, मुझे आपके माता-पिता के एक मित्र का एक और पत्र मिला है जिसका नाम भारतेंदु विमल है। मैं यह पत्र आपके पढ़ने के लिए संलग्न कर रहा हूं। आपके पिता ने उन्हें मझे यह कहने के लिए प्रेरित किया है कि मैं आपको दीक्षा न दूँ। यह सज्जन मुझे सैन फ्रांसिस्को में देखने आए थे। वह कोई कांग्रेसी हो सकते हैं, और सरकार के खर्चे पर वे कुछ तथाकथित सांस्कृतिक यात्रा कर रहे थे। सरकार किसी को भी नृत्य या कविता पाठ के लिए भेजने में रुचि रखती है, लेकिन जब सरकार से कृष्ण भावनामृत के प्रचार के लिए कुछ सुविधाएं देने का अनुरोध किया जाता है, तो वे प्रोत्साहित नहीं करेंगे। दूसरी ओर वे उन प्रकाशनों को प्रोत्साहित करते हैं जिनमें कृष्ण को काले और निम्न जन्म के रूप में चित्रित किया गया है। यह हमारी सरकार की स्थिति है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे खुशी है कि आपके माता-पिता &amp;lt;u&amp;gt;भगवद् गीता&amp;lt;/u&amp;gt; और भगवान कृष्ण में रुचि रखते हैं, और जब आप भारत लौटेंगे तो आप उन्हें कृष्ण दर्शन को बहुत अच्छी तरह से समझाते हैं। मुझे यह जानकर भी प्रसन्नता हो रही है कि जब आप विवाह करेंगे तो आप उस लड़की से विवाह करेंगे जो भगवान कृष्ण की उपासक है और जो चार बुनियादी सिद्धांतों का सख्ती से पालन करने के लिए सहमत है। मुझे यह जानकर बहुत प्रसन्नता हो रही है कि आपने हमारे अरात्रिक गीत “किबा जया गोरचंदेर” की सराहना की है। आपने भारत लौटने पर स्वेच्छा से कुछ करने की पेशकश की है, और सबसे अच्छी परियोजना इस कृष्ण भावनामृत आंदोलन के प्रतिनिधि के रूप में वहां काम करना होगा। मेरी राय में, भारत इस मूल सांस्कृतिक जीवन को त्याग कर नीचे जा रहा है जो कि उसका अपना है। सरकार पश्चिम की चमचमाती सभ्यता से मोहक है, और यह हमारे दिवंगत प्रधान मंत्री, श्री नेहरू की एक निश्चित नीति थी, जो भारत को रातों-रात अमेरिका के रूप में समृद्ध और भौतिक रूप से उन्नत देखना चाहते थे। यह निश्चित रूप से गांधी की नीति थी कि वे अपने संगठन को ग्रामीण जीवन में केंद्रित करें, सादा जीवन और गोरक्षा को अपनाएं। लेकिन महात्मा गांधी की मृत्यु के ठीक बाद, उनके प्रमुख शिष्य पंडित नेहरू ने आधुनिक गौ-हत्या घर की योजना बनाई। तो यह हमारी स्थिति है। यदि आप कृष्ण भावनामृत विज्ञान को समझ गए हैं, तो आप भारत में इस सांस्कृतिक जीवन को पुनर्जीवित करने का प्रयास करें। निःसंदेह जब तक मैं जीवित रहूंगा, मैं तुम्हें हर संभव सहायता दूंगा। लेकिन अगर आप युवा पीढ़ी के बीच कृष्ण भावनामृत का प्रचार करने के लिए बॉम्बे जैसे शहर में अपनी शक्ति केंद्रित करते हैं, जैसा कि मैं यहां पश्चिमी दुनिया में कर रहा हूं, तो यह कृष्ण और आपके देश की महान सेवा होगी। मैंने पहले ही आपसे इस परियोजना पर विचार करने के लिए कहा है कि आप हमारी पुस्तकों और साहित्य को कैसे आगे बढ़ा सकते हैं। मैं कोई अन्य विकल्प नहीं सुझा सकता, लेकिन यदि आप मेरी इस इच्छा को क्रियान्वित कर सकते हैं, तो मैं आपका हमेशा आभारी रहूंगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जितनी बार संभव हो मुझसे पत्राचार के लिए आपका स्वागत है, और यह मेरा कर्तव्य है कि मैं आपको सही निर्देश दूं। उनका अनुसरण करने का प्रयास करें और आप खुश रहेंगे। मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
संलग्न-पत्रादि: १ &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584822</id>
		<title>HI/690605 - चंदनाचार्य को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690605_-_%E0%A4%9A%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%A8%E0%A4%BE%E0%A4%9A%E0%A4%BE%E0%A4%B0%E0%A5%8D%E0%A4%AF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584822"/>
		<updated>2022-04-29T18:26:11Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - चंदनाचार्य को]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - अतिरिक्त लिखावट के साथ‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690605 - Letter to Candanacarya written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690605_-_Letter_to_ Chandanacharya.JPG| चंदनाचार्य को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक...... जून ५,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय चंदनाचार्य,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। जून २, १९६९ के आपके पत्र के लिए मैं आपको बहुत-बहुत धन्यवाद देता हूं, और मैंने विषय को ध्यान से नोट कर लिया है। प्रति दिन $१०० कमाने के अवसर के साथ कोलंबस में काम करने के आपके प्रस्ताव के संबंध में, आप इसे क्यों नहीं लेते? यह इस केंद्र के लिए एक बड़ी मदद होगी क्योंकि वहां के छात्रों के बीच हमारे आंदोलन को फैलाने की इतनी बड़ी संभावना है, और अगर हम १६वीं एवेन्यू पर बड़ा चर्च खरीद सकते हैं, या यदि वे अपने वर्तमान घर को पास के लॉट और गैस स्टेशन के साथ खरीद सकते हैं, तो यह वहां की गतिविधियों के लिए एक जबरदस्त परिसंपत्ति होगी। मैंने गैस स्टेशन में देखा है कि वहां दो कमरे हैं, तो यदि एक कमरा रसोई के लिए इस्तेमाल किया जाएगा, तो दूसरे का मंदिर कक्ष के रूप में उपयोग किया जा सकता है, और घर भक्तों के लिए एक आश्रम के रूप में काम करेगा। पहला पसंद बड़ा चर्च होगा, लेकिन अगर आप चर्च या वर्तमान साइट को खरीदने के लिए वित्त संग्रह कर सकते हैं, तो यह बहुत अच्छी सेवा होगी। इसलिए यदि आप वास्तव में प्रतिदिन $१०० कमा सकते हैं, तो मुझे लगता है कि आपको इस अवसर का लाभ उठाना चाहिए। कृपया डाक द्वारा मुझे बताएं कि आपने क्या निर्णय लिया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
विशेष ध्यान दें: मैं एक पत्र संलग्न कर रहा हूं जो मुझे आज हवाई में सुदामा से मिला है, ताकि आप पश्चिमी दुनिया के लड़के और लड़कियों के बीच इस मंत्र का प्रचार करने की महान संभावना देख सकें। मुझे कलाई कैलेंडर भेजने के लिए मैं आपका धन्यवाद करता हूं। &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रद्युम्न, मैं मशीनों के बारे में जानने के लिए उत्सुक हूँ। &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690604_-_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%82_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584785</id>
		<title>HI/690604 - प्रभास बाबू को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690604_-_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%82_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584785"/>
		<updated>2022-04-28T14:17:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - शिपिंग कार्मिक को]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690604 - Letter to Prabhas Babu written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690604_-_Letter_to_Prabhas_Babu.JPG| प्रभास बाबू को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; २६०४१ &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ४, १९६९ &amp;lt;br/&amp;gt;&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूनाइटेड शिपिंग कारपोरेशन &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
१४/२, ओल्ड चाइना बाजार स्ट्रीट, कमरा #१३ &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
कलकत्ता-१, भारत &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ध्यान दें: श्री प्रभास बाबू &amp;lt;br/&amp;gt;&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय प्रभास बाबू: &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र दिनांक अप्रैल २, १९६९ के उत्तर में भेजे गए मेरे पिछले पत्र के संदर्भ में, मुझे आश्चर्य है कि जयगोविंद दास ब्रह्मचारी द्वारा भेजे गए पैकेजों के साथ-साथ आत्मा राम एंड संस द्वारा भेजे गए पैकेज अभी तक प्रेषित नहीं किए गए हैं। आपने अपने अप्रैल २, १९६९ के पत्र में स्वीकार किया कि ये सामान भेजने के लिए तैयार हैं, लेकिन आपने अभी तक इन्हें भेजा नहीं। मैं समझ सकता हूँ कि पीभूति बाबू की मृत्यु की वजह से देरी हुई थी, लेकिन वे अभी भी क्यों देरी कर रहे हैं? कृपया मुझे बताएं कि हमारे माल की शिपिंग में इतनी देरी क्यों हो रही है। कृपया इस पत्र को प्राथमिकता के आधार पर समझें, और मुझे बताएं कि मेरा माल अभी तक क्यों नहीं भेजा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैसा कि मुझे जयगोविंद दास ब्रह्मचारी द्वारा सूचित किया गया है, आप निम्नलिखित मदों को धारण कर रहे हैं: &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज १. गहने और कपड़ों के साथ १० १/२” पीतल की आर-के मूर्तियों की एक जोड़ी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज २. एक जोड़ी १३” पीतल की आर-के मुर्तियां गहनों और कपड़ों के साथ &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज ३. एक मृदुंगम &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज ४. एक हारमोनियम- डबल रीड के साथ, ७ स्टॉप, पूरा कवर &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज ५. ३० डिब्बों की धूप, प्रत्येक गत्ते का डिब्बा जिसमें १२ बक्से होते हैं &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज ६. १,४०० मिश्रित बृजबासी चित्र &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
८ दर्जन मिश्रित पीतल धूप धारक &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
२ दर्जन लाल चंदन माला &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
५० विषम &amp;lt;u&amp;gt;श्रीमद्भागवतम्&amp;lt;/u&amp;gt; विवरणिका &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
१६ &amp;lt;u&amp;gt;अन्य ग्रहों की सुगम यात्रा&amp;lt;/u&amp;gt; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
और ३ जोड़ी पीतल की झांझ, &amp;lt;u&amp;gt;बैक टू गॉडहेड&amp;lt;/u&amp;gt; की ४ पुरानी प्रतियां ८ लकड़ी के धूप धारक, ५ ट्यूब धूप, कंठी और काउंटर मालाओं के साथ वृंदावन से ७ तुलसी माला, पूजा के प्रदर्शन के लिए नियमित वस्तुएं नामतः शंख, ५-प्रकाश दीपक, धूप धारक, कप और चम्मच, &amp;lt;u&amp;gt;श्रीमद् भागवतम्&amp;lt;/u&amp;gt; का एक सेट, नोट्स इत्यादि। इसके अलावा, पुस्तकों के ८ बंडल आत्मा राम एंड संस द्वारा आपको भेजे गए थे, जिसमें &amp;lt;u&amp;gt;श्रीमद भागवतम्&amp;lt;/u&amp;gt;, स्कंध एक-१०४ प्रतियां, स्कंध दो-११० प्रतियां, स्कंध तीन-४६ प्रतियां थीं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
मैं आपके शीघ्र उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
भवदीय, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;[अहस्ताक्षरित]&#039;&#039; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए सी बी स / पी डी बी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690604_-_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%82_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584758</id>
		<title>HI/690604 - प्रभास बाबू को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690604_-_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A4%BE%E0%A4%B8_%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A5%82_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584758"/>
		<updated>2022-04-27T13:38:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: Created page with &amp;quot;Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎ Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,...&amp;quot;&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - शिपिंग कार्मिक को]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690604 - Letter to Prabhas Babu written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690604_-_Letter_to_Prabhas_Babu.JPG| प्रभास बाबू को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; २६०४१ &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
जून ४, १९६९ &amp;lt;br/&amp;gt;&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यूनाइटेड शिपिंग कारपोरेशन &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
१४/२, ओल्ड चाइना बाजार स्ट्रीट, कमरा #१३ &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
कलकत्ता-१, भारत &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ध्यान दें: श्री प्रभास बाबू &amp;lt;br/&amp;gt;&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रिय प्रभास बाबू: &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपके पत्र दिनांक अप्रैल २, १९६९ के उत्तर में भेजे गए मेरे पिछले पत्र के संदर्भ में, मुझे आश्चर्य है कि जयगोविंद दास ब्रह्मचारी द्वारा भेजे गए पैकेजों के साथ-साथ आत्मा राम एंड संस द्वारा भेजे गए पैकेज अभी तक नहीं भेजे गए हैं। आपने अपने अप्रैल २, १९६९ के पत्र में स्वीकार किया कि ये सामान भेजने के लिए तैयार हैं, लेकिन आपने अभी तक इन्हें भेजा नहीं। मैं समझ सकता हूँ कि पीभूति बाबू की मृत्यु की वजह से देरी हुई थी, लेकिन वे अभी भी क्यों देरी कर रहे हैं? कृपया मुझे बताएं कि हमारे माल की शिपिंग में इतनी देरी क्यों हो रही है। कृपया इस पत्र को प्राथमिकता के आधार पर समझें, और मुझे बताएं कि मेरा माल अभी तक क्यों नहीं भेजा गया है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जैसा कि मुझे जयगोविंद दास ब्रह्मचारी द्वारा सूचित किया गया है, आप निम्नलिखित मदों को धारण कर रहे हैं: &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज १. गहने और कपड़ों के साथ १० १/२” पीतल की आर-के मूर्तियों की एक जोड़ी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज २. एक जोड़ी १३” पीतल की आर-के मुर्तियां गहनों और कपड़ों के साथ &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज ३. एक मृदुंगम &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज ४. एक हारमोनियम- डबल रीड के साथ, ७ स्टॉप, पूरा कवर &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज ५. ३० डिब्बों की धूप, प्रत्येक गत्ते का डिब्बा जिसमें १२ बक्से होते हैं &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
पैकेज ६. १,४०० मिश्रित बृजबासी चित्र &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
८ दर्जन मिश्रित पीतल धूप धारक &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
२ दर्जन लाल चंदन माला &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
५० विषम &amp;lt;u&amp;gt;श्रीमद्भागवतम्&amp;lt;/u&amp;gt; विवरणिका &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
१६ &amp;lt;u&amp;gt;अन्य ग्रहों की सुगम यात्रा&amp;lt;/u&amp;gt; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
और ३ जोड़ी पीतल की झांझ, &amp;lt;u&amp;gt;बैक टू गॉडहेड&amp;lt;/u&amp;gt; की ४ पुरानी प्रतियां ८ लकड़ी के धूप धारक, ५ ट्यूब धूप, कंठी और काउंटर मालाओं के साथ वृंदावन से ७ तुलसी माला, पूजा के प्रदर्शन के लिए नियमित वस्तुएं, शंख, ५-प्रकाश दीपक, धूप धारक, कप और चम्मच, &amp;lt;u&amp;gt;श्रीमद् भागवतम्&amp;lt;/u&amp;gt; का एक सेट, नोट्स इत्यादि। इसके अलावा, पुस्तकों के ८ बंडल आत्मा राम एंड संस द्वारा आपको भेजे गए थे, जिसमें &amp;lt;u&amp;gt;श्रीमद भागवतम&amp;lt;/u&amp;gt;, स्कंध एक-१०४ प्रतियां, स्कंध दो-११० प्रतियां, स्कंध तीन-४६ प्रतियां थीं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
मैं आपके शीघ्र उत्तर की प्रतीक्षा कर रहा हूँ। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
भवदीय, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;[अहस्ताक्षरित]&#039;&#039; &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए सी बी स / पी डी बी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690603_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584617</id>
		<title>HI/690603 - श्यामसुंदर को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690603_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%BE%E0%A4%AE%E0%A4%B8%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%B0_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584617"/>
		<updated>2022-04-24T07:26:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-06 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - श्यामसुंदर को]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690603 - Letter to Syamasundara written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690603_-_Letter_to_Syamsundar_1.JPG| श्यामसुंदर को पत्र (पृष्ठ १/२)}}&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690603_-_Letter_to_ Syamsundar_2.JPG| श्यामसुंदर को पत्र (पृष्ठ २/२)}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया २६०४१ &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक &amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; जून ३, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय श्यामसुंदर,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका २९ मई, १९६९, का पत्र प्राप्त हुआ है और मैंने इसका विषय नोट कर लिया है। मुझे बहुत खुशी है कि रानी ने रीडनडेंट चर्चेस बिल को मंजूरी दे दी है, और हमारे मंदिर के लिए एक चर्च मिलने की अच्छी संभावना है। कई निरर्थक चर्च हैं क्योंकि परिष्कृत पुजारियों द्वारा बाइबल की रूढ़िबद्ध प्रस्तुति के कारण ईसाई लोग धीरे-धीरे अपने धार्मिक विश्वासों से विचलित हो रहे हैं। आधुनिक युवा पहले से शिक्षित हैं, इसलिए वे एक ही स्थिर आदर्श वाक्य की पुनरावृत्ति में अधिक रुचि नहीं रखते हैं। वे कुछ गतिशील चाहते हैं, आध्यात्मिक समझ में प्रगति, लेकिन ईसाई पुजारी उन्हें संतुष्ट नहीं कर सके। इन सभी हठधर्मी सिद्धांतों की तुलना में, हमारा कृष्ण भावनामृत आंदोलन, वैज्ञानिक और दार्शनिक दृष्टिकोण से भी, सब कुछ सही परिप्रेक्ष्य में प्रस्तुत करता है। इसलिए यदि आप हमारे आंदोलन में उपयोग करने के लिए इंग्लैंड में एक चर्च को प्राप्त कर सकते हैं, तो मुझे लगता है कि हम पूरी दुनिया में ऐसे कई चर्चों को प्राप्त करने में सक्षम होंगे। भगवान ईसा मसीह के लिए हमारे मन में बहुत सम्मान है। हम उन्हें कृष्ण के शक्तिशाली अवतार के रूप में स्वीकार करते हैं, जितना हम भगवान बुद्ध को स्वीकार करते हैं। हम बौद्धों, ईसाइयों और यहां तक कि मुसलमानों को भी अपने कृष्ण भावनामृत आंदोलन में समायोजित कर सकते हैं, इसलिए यदि इन धर्मों के धर्मगुरु हमारे दर्शन को समझने की कोशिश करते हैं, तो निश्चित रूप से दुनिया के आध्यात्मिक जीर्णोद्धार के मामले में बहुत प्रोत्साहन मिलेगा। इसलिए कैंटरबरी के आर्कबिशप को समझाने की कोशिश करें और उनसे विनती करें कि हमें दुनिया के सबसे महान शहर लंदन में ईश्वर-चेतना फैलाने का यह मौका दें। यदि मेरी उपस्थिति की आवश्यकता है, तो मैं जून के महीने में किसी भी समय जाने के लिए तैयार हूं, क्योंकि मैं जुलाई में सैन फ्रांसिस्को की रथयात्रा में जाने की सोच रहा हूं जिसकी व्यवस्था तमाल कृष्ण कर रहे हैं। यह महोत्सव १९६७ और ६८ में सैन फ्रांसिस्को में आपकी उपस्थिति के कारण सफल रहा था, इसलिए अब वे आपकी अनुपस्थिति को महसूस कर रहे हैं, लेकिन वे इसे किसी न किसी तरह से सफलतापूर्वक करने का साहस रखते हैं। तमाल ने नर नारायण को बढ़ईगीरी का काम करने के लिए बुलाया है, इसलिए वे वहाँ जा रहे होंगे। तो मैं रथयात्रा या तो एसएफ या लंदन में देखूंगा। यदि मुझे लंदन बुलाने की व्यवस्था की जाती है तो मैं पहली वरीयता के रूप में वहां जाऊंगा। तो जैसा कि आप मुझे दिन-प्रतिदिन की प्रगति के बारे में बताते हैं, और यदि यह प्रगति उपयुक्त है, तो मैं लंदन जाऊंगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ब्रह्मचारियों के संबंध में, दो तुरंत वहाँ जा सकते हैं, लेकिन परिवहन की व्यवस्था कैसे होगी? उन्हें आव्रजन विभाग को दिखाने के लिए बैंक में जमा धन की व्यवस्था करने की भी आवश्यकता हो सकती है। यह एक बाधा है, और तुम भी सब बिखरे हुए हो, तो तुम उन्हें कैसे समायोजित करोगे? कोई उपयुक्त रहने की जगह न होने के कारण आपके काम में पहले से ही बाधा आ रही है, इसलिए यदि दो और आपके साथ जुड़ जाते हैं, तो क्या फायदा है? एक और बात यह है कि आपके द्वारा प्रशिक्षित होने वाले नवागंतुक, जो सभी बुजुर्ग सदस्य हैं, को क्या कठिनाई है। अन्य केंद्रों से, व्यावहारिक रूप से हर दिन कोई न कोई अपनी जप माला, प्रशंसा पत्र और कुछ पैसे शुरुआती खर्चों के लिए भेजता है। मैं उनके मनकों पर जप करता हूं और उन्हें दीक्षित छात्र के रूप में उन्हें लौटा देता हूं। आप इसी सिद्धांत का पालन क्यों नहीं करते? यदि ये लड़के गंभीर हैं, तो उन्हें दीक्षित होने दें, और नियमों का पालन करें, और जो भी मार्गदर्शन आप उन्हें दे सकते हैं, उन्हें स्वीकार करना चाहिए। लंदन में कुछ अन्य ब्रह्मचारियों को प्रशिक्षण देने के लिए यहां के ब्रह्मचारियों को आमंत्रित करना अच्छा नहीं है, जब वहां पहले से ही छह मौजूद हैं। यदि आप उन्हें प्रशिक्षित नहीं कर सकते हैं, तो आप यह कैसे मान सकते हैं कि यहां का कोई व्यक्ति कर सकता है? प्रशिक्षण अधिरोपण नहीं है। यह प्रशिक्षु द्वारा स्वैच्छिक रूप से स्वीकार किया जाता है। वैसे भी, जब आप सभी को समायोजित करने के लिए एक बड़ा स्थान प्राप्त करेंगे, तो आपके पास जितने चाहें उतने ब्रह्मचारी होंगे, और मैं उसकी व्यवस्था करूंगा। मैं पुरुषोत्तम को भी भेज सकता हूं, जो व्यक्तिगत रूप से मेरी सहायता कर रहे हैं, बशर्ते यह वहां आपके प्रचार में मदद करे। इसी तरह मैं सुबल या किसी और से पूछ सकता हूं, तो यह कोई समस्या नहीं है।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
माताजी के संबंध में, मैंने आपकी टिप्पणी को नोट कर लिया है, और वास्तव में हम &amp;lt;u&amp;gt;प्राकृत सहजिया&amp;lt;/u&amp;gt; का एक समूह नहीं बनाना चाहते हैं, या ऐसे भक्त जो कृष्ण के विज्ञान को नहीं जानते हैं और भक्ति के विज्ञान को नहीं जानते हैं, लेकिन ज्ञान की गहराई के बिना केवल श्री विग्रह की पूजा करते हैं। वह भौतिकवादी भक्त कहलाता है, लेकिन उसे भी अस्वीकार नहीं किया जाता है। यह एक शुरुआत है, लेकिन एक प्रचारक को इससे ऊपर होना चाहिए। खैर उनसे मित्रता रखें। वह कृष्ण से प्रेम करने की कोशिश कर रही हैं और यह अच्छी बात है। क्यों न रथयात्रा करने में उनसे मदद लें? अगर वह आर्थिक मदद दे सकती हैं, तो अन्य सभी मदद आ जाएगी। कृपया मालती को उनके ३० मई के अच्छे पत्र के लिए धन्यवाद दें। यदि आप कृपया कुछ हॉलैंड प्रिंटर से उद्धरण ले सकते हैं कि वे &amp;lt;u&amp;gt;टीएलसी&amp;lt;/u&amp;gt; की तरह एक पुस्तक को प्रिंट करने के लिए कितना शुल्क लेंगे, तो हम इस जानकारी का उपयोग कर सकते हैं। मुझे आशा है की आप अच्छे हैं, आपके उत्तर की प्रतीक्षा में। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690528_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584616</id>
		<title>HI/690528 - श्रीपति को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690528_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A4%BF_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584616"/>
		<updated>2022-04-24T07:25:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-05 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - श्रीपति को]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद द्वारा नव दीक्षितों को नाम देने वाले पत्र]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - अतिरिक्त लिखावट के साथ‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690528 - Letter to Sripati written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690528_-_Letter_to_Sripati.JPG| श्रीपति को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; २६०४१ &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक......मई २८,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय श्रीपति दास,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। आपके जप माला के साथ भेजे गए पत्र दिनांक मई १८, १९६९, के लिए मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं, और मैंने उनका विधिवत जप किया है और आपको अपने शिष्य के रूप में दीक्षा दी है। आपका आध्यात्मिक नाम, श्रीपति दास*, का अर्थ है भगवान नारायण या कृष्ण का सेवक। यदि आप अपनी कृष्णभावनामृत को वैसे ही विकसित करना जारी रखेंगे जैसे आप करते रहे हैं, तो निश्चित रूप से आप भगवान कृष्ण के कुशल सेवक होंगे। हमारी प्रक्रिया न कोई अवैध यौन जीवन, न कोई मांसाहारी भोजन, कोई नशा नहीं, और न कोई जुआ गतिविधियों के नियमों का ईमानदारी से पालन करना है। साथ ही, हमें दस प्रकार के अपराधों से बचते हुए, प्रतिदिन कम से कम १६ माला जप करनी चाहिए। मॉन्ट्रियल मंदिर में आपके अपने अच्छे गुरु भाइयों के साथ आपका बहुत अच्छा संबंध है, और आपको उस क्षेत्र में कृष्ण भावनामृत का प्रचार करने में उनकी मदद करनी चाहिए। तो कृपया हंसदूत से परामर्श करें, और इस संबंध में आपके लिए पर्याप्त कार्य होगी। यदि कोई प्रश्न या कठिनाइयाँ उत्पन्न होती हैं, तो आप वहाँ के पुराने भक्तों से परामर्श कर सकते हैं, या यदि आप चाहें, तो मैं आपकी किसी भी तरह से मदद करने के लिए हमेशा आपकी सेवा में हूँ। तो अब आपके पास अपने जीवन को संसिद्धि प्रदान करने का बहुत अच्छा अवसर है, और कृपया इस बारे में हमेशा गंभीर रहें। तब कृष्ण निश्चित रूप से आपको अच्छी उन्नति के लिए सभी सुविधाएं देंगे।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आशा है की आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
*श्रीपति = भाग्य की देवी लक्ष्मी के पति। &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%AF%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584614</id>
		<title>HI/690527 - यमुना को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%AF%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%A8%E0%A4%BE_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584614"/>
		<updated>2022-04-24T07:24:49Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-05 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - यमुना दासी को‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित‎‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690527 - Letter to Yamuna written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690527_-_Letter_to_Yamuna.JPG| यमुना को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३ &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;माउंड्सविल, वेस्ट वर्जीनिया २६०४१ &amp;lt;/u&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; &amp;amp;nbsp; मई २७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरी प्रिय यमुना,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपके पिछले तीन पत्र मिले हैं, और आखरी पात्र, दिनांक २४ मई, १९६९, में आपने जगन्नाथ रथ के बारे में पूछताछ की है। सिल्वर डेकोरेशन के साथ क्रिमसन रंग बिल्कुल ठीक है। रथों को सजाने के बारे में कोई सख्त नियम नहीं है। जहां तक संभव हो हम सोने, चांदी और अन्य चमकदार धातु की कढ़ाई के कार्य से रथों को बहुत ही आकर्षक ढंग से सजा सकते हैं। विचार यह है कि जितना अधिक हम कृष्ण को सजाते हैं, जो उनकी रथ से अभिन्न हैं, उतना ही हम परोक्ष रूप से सजाए जाते हैं। हमारी तुलना परम भगवान की छाया के रूप में की जाती है, और जैसा कि बाइबिल में भी कहा गया है, मनुष्य को भगवान के अनुसरण पर बनाया गया है। हम शास्त्रों से समझते हैं कि कृष्ण का उनका अपना विग्रह, या आध्यात्मिक शरीर है, ठीक उसी प्रकार जैसे एक आदमी के दो हाथ, दो पैर और सभी समान विशेषताएं हैं। अगर आप अपने चेहरे को सजाते हैं, तो आप सीधे नहीं देखते कि आपका चेहरा कैसे सुंदर हो गया है, लेकिन जब आप आईने में अपने चेहरे का प्रतिबिंब देखते हैं, तो आप परोक्ष रूप से सुंदरता देख सकते हैं। इसलिए प्रत्यक्ष रूप से कृष्ण की सेवा करने से परोक्ष रूप से सेवा का फल हमें मिलता है। जैसे हम सीधे कृष्ण को बहुत अच्छा प्रसाद देते हैं, लेकिन परोक्ष रूप से हम प्रसाद के अच्छे स्वाद का आनंद लेते हैं। तो हमें यह हमेशा याद रखना चाहिए, कि कृष्ण हमेशा अपने में पूर्ण हैं; वे अपनी संतुष्टि के लिए हमारी एक चुटकी मदद नहीं चाहते हैं, लेकिन अगर हम उन्हें कई तरीकों से संतुष्ट करने की कोशिश करते हैं, जैसा कि आचार्यों और शास्त्रों द्वारा निर्देशित किया गया है, तो परोक्ष रूप से हम ऐसी गतिविधियों से लाभान्वित होते हैं। तो लंदन में इस रथयात्रा महोत्सव को अच्छी तरह से करने का प्रयास करें, और श्यामसुंदर ने मुझे इस योजना के बारे में पहले ही सूचित कर दिया है कि थेम्स आदि पर किसी पार्क में तीन रथ खींची जाएंगी। तो किसी तरह, अगर आप इस रथ महोत्सव को लंदन में शुरू कर सकते हैं, तो हर तरह से लंदन केंद्र सफल होगा। मुझे कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप वहां मंदिर स्थापित कर सकते हैं या नहीं, लेकिन अगर आप रथयात्रा उत्सव की शुरुआत कर सकते हैं, तो निश्चित रूप से यह एक बड़ी सफलता होगी। अतः जहाँ तक हो सके इस वसीयत को क्रियान्वित करने का प्रयास करें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मैं माताजी शामदासी को हिन्दी में पत्र लिख रहा हूं, जिसे उन्हें दिया जा सकता है। उन्होंने मुझे अपने मंदिर आने के लिए लंदन आमंत्रित किया है, लेकिन अगर मैं वहां जाऊँगा तो यात्रा-टिकट के पैसे वहीं से आने चाहिए। मैं जहां भी जाता हूं, वह केंद्र जो मुझे आमंत्रित करता है, वह कम से कम दो के लिए यात्रा-टिकट के पैसे भेजता है। इसके अलावा, लीसेस्टर लंदन से १२५ मील दूर है। बेशक ऐसे बहुत से भारतीय हैं जो वहां हिंदू मंदिर पाकर खुश होंगे, लेकिन हम विशेष रूप से किसी और चीज में रुचि रखते हैं। हमारी योजना हिंदुओं या किसी अन्य व्यक्तिगत समूह को प्रायोजित करने की नहीं है। हमारा वास्तविक उद्देश्य कृष्ण भावनामृत का प्रसार करना है। इसका मतलब है कि एक ईश्वर हैं; कृष्ण, एक शास्त्र है; &amp;lt;u&amp;gt;भगवद गीता यथारूप&amp;lt;/u&amp;gt;, एक मंत्र है; हरे कृष्ण, और एक काम है; भगवान कृष्ण की सेवा। हम पूरी दुनिया में इस पंथ का प्रचार करना चाहते हैं, और मुझे यकीन है कि सभी धर्मों के लोग हमारे साथ जुड़ेंगे। यदि हम माताजी के सिद्धांतों पर मंदिर की स्थापना करते हैं, तो यह भी बहुत अच्छा है, हम हिंदुओं के एक वर्ग का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं, लेकिन हम वास्तव में अपने आदर्शों पर अमल नहीं हो पाएंगे। इसलिए हम इस संबंध में बहुत अधिक उत्साहित नहीं हो सकते। वह निस्संदेह कृष्ण की एक अच्छी भक्त हैं, लेकिन उन्हें कृष्ण भावनामृत का विज्ञान सीखना होगा, मुझे आशा है की आप अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584613</id>
		<title>HI/690527 - श्रीमान को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%AE%E0%A4%BE%E0%A4%A8_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584613"/>
		<updated>2022-04-24T07:22:43Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-05 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - भक्तों के माता-पिता को‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र जिन्हें स्कैन की आवश्यकता है‎]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690527 - Letter to Sir written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मई २७, १९६९ &amp;lt;br/&amp;gt;&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
(?) खन्ना एबं विला &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
सांताक्रूज़ ईस्ट &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
बॉम्बे-५५ इंडिया &amp;lt;br/&amp;gt;&amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीमान,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मुझे आपका तार और आपका पत्र दिनांक मई २०, १९६९ प्राप्त हुआ है, और मैंने विषय को ध्यान से नोट कर लिया है। मुझे नहीं पता कि आप अपने बेटे के ब्राह्मणत्व को स्वीकार करने के बारे में इतना चिंतित क्यों हैं। वैसे भी, निश्चिंत रहें क्योंकि आपके बेटे को कम से कम एक साल बाद तक ब्राह्मणत्व में दीक्षा नहीं दी जाएगी, जब तक कि वह आपकी मंजूरी के साथ तैयार न हो। ब्राह्मणत्व इतना आसान काम नहीं है कि किसी को अचानक ब्राह्मण में बदल दिया जा सके। हम अपने शिष्यों का कम से कम एक वर्ष तक व्यवहार देखने के बाद ही ब्राह्मणत्व की दीक्षा देते हैं, विशेष रूप से निम्नलिखित सिद्धांतों के संदर्भ में: १) किसी को अवैध यौन संबंध नहीं बनाना चाहिए, २) किसी को मांसाहार नहीं खाना चाहिए, ३) किसी को नहीं लेना चाहिए कॉफी, चाय या सिगरेट सहित कोई भी नशीला पदार्थ, और ४) जुए में भाग नहीं लेना चाहिए।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इसके अलावा, यदि किसी को ब्राह्मणत्व में दीक्षित किया जाता है, तो इसका मतलब यह नहीं है कि वह अपने सामान्य काम को बंद कर देगा और अपने परिवार की मदद नहीं करेगा। मुझे नहीं पता कि आप इतने परेशान क्यों हैं कि वह अब आपकी मदद नहीं करेगा। वैसे भी, मैं इस मामले में आपके साथ आगे बातचीत करने के लिए आपका पत्र आपके बेटे को भेज रहा हूं। लेकिन निश्चिंत रहें कि अब से कम से कम एक वर्ष के लिए उन्हें ब्राह्मणत्व में स्वीकार नहीं किया जाएगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका, &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584612</id>
		<title>HI/690527 - रायराम को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AF%E0%A4%B0%E0%A4%BE%E0%A4%AE_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584612"/>
		<updated>2022-04-24T07:21:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-05 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - रायराम को]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - अतिरिक्त लिखावट के साथ‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690527 - Letter to Rayarama written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690527_-_Letter_to_Rayarama.JPG| रायराम को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; २६०४१ &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक......मई २७,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय रायराम,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका मई २१, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है, और मैंने विषय  को ध्यान से नोट कर लिया है। कंपोजर मशीन के संबंध में इस्कॉन प्रेस खाते में पैसे ट्रांसफर करने में कोई कठिनाई नहीं होगी। लेकिन कोलंबस में वे पहले से ही &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039; हैं, इसलिए एक समान आईबीएम कंपोजर के लिए बातचीत कर रहे हैं, तो मुझे देखने दो कि उनकी शर्तें यहां क्या हैं। तुलना करने के बाद मैं आपको इस विषय में अवश्य निर्देश दूंगा। संकीर्तन के संबंध में आप सप्ताह में चार दिन बाहर जा सकते हैं, लेकिन जितना हो सके बाहर जाने की कोशिश करें। जहां तक बीरभद्र का संबंध है, वह तुरंत यहां न्यू वृंदावन आ सकते हैं, और मैं उनकी मां को भी यहां बुलाऊंगा।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद दूसरों तक पहुंचाएं। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
संलग्न पत्र; कंपोजर मशीन के लिए एक अनुबंध।&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584611</id>
		<title>HI/690527 - मुकुंद को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%AE%E0%A5%81%E0%A4%95%E0%A5%81%E0%A4%82%E0%A4%A6_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584611"/>
		<updated>2022-04-24T07:20:53Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-05 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - मुकुंद को]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690527 - Letter to Mukunda written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690527_-_Letter_to_Mukunda.JPG| मुकुंद को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;माउंड्सविल, वेस्ट वर्जीनिया, २६०४१ &amp;lt;/u&amp;gt; &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
मई २७, १९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय मुकुंद,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मुझे आपका मई २३, १९६९ का पत्र प्राप्त हुआ है और मैंने विषय को ध्यान से नोट कर लिया है। तुम मेरे स्वास्थ्य की चिंता मत करो। मैं अब काफी फिट हूं, और न्यू वृंदावन में मैं रोजाना पहाड़ियों पर टहल रहा हूं। बॉस्टन में तीन या चार दिनों के लिए मुझे कुछ तीव्र पीठ दर्द था, लेकिन कृष्ण की कृपा से यह बहुत जल्द ठीक हो गया। इस शरीर को रोगों का मंदिर कहा जाता है। जब तक कोई रोग नहीं है तब तक यह अद्भुत है, लेकिन जब रोग है तो यह अद्भुत नहीं है। तो यह है रोग का मंदिर। बेशक, आप सभी मुझ पर बहुत दयालु हैं, जब भी मैं थोड़ा अस्वस्थ होता हूं तो आप चिंतित हो जाते हैं, और इस तरह की चिंता के लिए मैं आपका बहुत-बहुत धन्यवाद करता हूं। लेकिन जहां तक मेरा सवाल है, मैं हमेशा दुनिया के पश्चिमी हिस्से में कृष्ण भावनामृत फैलाने के अपने जीवन के मिशन को तेज करना चाहता हूं। मुझे अब भी दृढ़ विश्वास है कि अगर मैं उन सभी लड़कों और लड़कियों की मदद से इस आंदोलन को स्थापित कर सकता हूं, जो अब मेरे साथ जुड़ गए हैं, तो यह एक बड़ी उपलब्धि होगी। मैं बूढ़ा हूं, और पहले से ही चेतावनी दी जा चुकी है, लेकिन इससे पहले कि मैं इस शरीर को छोड़ दूं, मैं आप में से कुछ को कृष्ण भावनामृत की समझ में बहुत मजबूत देखना चाहता हूं। मुझे बहुत खुशी और गर्व है कि आप छह लड़के और लड़कियां, हालांकि आप लंदन में एक अच्छा केंद्र स्थापित नहीं कर पाए हैं, फिर भी आपने अपना सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया है। और भारत में यह खबर बहुत दूर तक पहुंच गई है कि मेरे शिष्य कृष्णभावनामृत में बहुत अच्छा काम कर रहे हैं। तो यही मेरा अभिमान है। मुझे अपने गुरु भाई का एक पत्र मिला है जिसमें बताया गया है कि भारत में यह विज्ञापन दिया गया है कि वियतनाम में भी कोई हरे कृष्ण आंदोलन फैला रहा है। इसलिए निराश होने की जरूरत नहीं है। आप अपना काम उतना अच्छा करें जितना कृष्ण आपको अवसर देते हैं, और आपकी चिंता का कोई कारण नहीं होगा। सब कुछ सुचारू रूप से चल रहा है। लेकिन चूंकि अब आप अलग हो गए हैं, इसलिए आपकी गतिविधियों की ताकत में थोड़ी आकुलता लग रही है। अब आप उसी भावना से एक साथ इकट्ठा होने की कोशिश करें जैसे आप कर रहे थे, और उस स्थिति में, मंदिर हो या कोई मंदिर न हो, आपका आंदोलन उत्तरोत्तर चलता रहेगा। हम मंदिर के बारे में ज्यादा चिंतित नहीं हैं क्योंकि इस युग में मंदिर पूजा प्राथमिक कारक नहीं है। प्राथमिक कारक संकीर्तन है। लेकिन कभी-कभी हम एक ऐसा केंद्र चाहते हैं जहां लोग इकट्ठा होकर देख सकें, इसलिए एक मंदिर की जरूरत अप्रधान है। इसलिए तुरंत एक साथ रहने की पूरी कोशिश करें। मैं यह देखने के लिए बहुत उत्सुक हूं कि आप फिर से साथ रहें।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;u&amp;gt;बीटीजी&amp;lt;/u&amp;gt; की आपकी बिक्री के संबंध में, हमने प्रति माह २०,००० प्रतियों को छापने का एक बड़ा जोखिम उठाया है, और इस जोखिम को लेने से पहले, हमने चार अलग-अलग केंद्रों से परामर्श किया, और आप सभी सहमत हुए। अब आप अपना सर्वश्रेष्ठ प्रयास करें और परिणाम कृष्ण की इच्छा पर निर्भर करेगा। इसलिए जहां तक हो सके अपना कोटा भरने की कोशिश करें। मैं जून के अंत तक न्यू वृंदावन में रहूंगा, और अगर मैं लंदन नहीं जाता हूं, तो मैं जुलाई में रथयात्रा महोत्सव में भाग लेने के लिए सैन फ्रांसिस्को जाऊंगा। तमाल कृष्ण इस वर्ष महोत्सव के भव्य प्रदर्शन की व्यवस्था कर रहे हैं। सुदामा के बारे में, वह अब हवाई मंदिर में हैं, और मुझे नहीं लगता कि किसी को लंदन जाना चाहिए जब तक कि आपको ठहरने के लिए उचित जगह न मिले। मुझे आशा है कि आप अच्छे हैं। &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584610</id>
		<title>HI/690527 - हंसदूत को लिखित पत्र, न्यू वृंदाबन, अमेरिका</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/690527_-_%E0%A4%B9%E0%A4%82%E0%A4%B8%E0%A4%A6%E0%A5%82%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A5%8B_%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%96%E0%A4%BF%E0%A4%A4_%E0%A4%AA%E0%A4%A4%E0%A5%8D%E0%A4%B0,_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%B5%E0%A5%83%E0%A4%82%E0%A4%A6%E0%A4%BE%E0%A4%AC%E0%A4%A8,_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%B0%E0%A4%BF%E0%A4%95%E0%A4%BE&amp;diff=584610"/>
		<updated>2022-04-24T07:20:01Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;Dhriti: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969-05 - श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका से]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र जो लिखे गए - अमेरीका, न्यू वृंदाबन से‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के प्रवचन,वार्तालाप एवं पत्र - अमेरीका, न्यू वृंदाबन]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - हंसदूत को]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र - अतिरिक्त लिखावट के साथ‎‎]]&lt;br /&gt;
[[Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र - मूल पृष्ठों के स्कैन सहित]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link= HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]]&#039;&#039;&#039;[[:Category:HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार|HI/श्रील प्रभुपाद के पत्र -  दिनांक के अनुसार]], [[:Category:HI/1969 - श्रील प्रभुपाद के पत्र|1969]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
&#039;&#039;&#039;&amp;lt;big&amp;gt;[[Vanisource:690527 - Letter to Hansadutta written from New Vrindaban, USA|Original Vanisource page in English]]&amp;lt;/big&amp;gt;&#039;&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{LetterScan|690527_-_Letter_to_Hansadutta.JPG| हंसदूत को पत्र}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;त्रिदंडी गोस्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;big&amp;gt;ए.सी. भक्तिवेदांत स्वामी&amp;lt;br /&amp;gt;&amp;lt;/big&amp;gt;&lt;br /&gt;
संस्थापक-आचार्य:&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
अंतर्राष्ट्रीय कृष्णभावनामृत संघ&amp;lt;/big&amp;gt;&amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
केंद्र: न्यू वृंदाबन&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; आरडी ३, &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; माउंड्सविल, वेस्ट  वर्जीनिया &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp;&amp;amp;nbsp; २६०४१ &amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
दिनांक......मई २७,...................१९६९ &amp;lt;br&amp;gt;&amp;lt;br&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
मेरे प्रिय हंसदूत,&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद स्वीकार करें। मैं आपके दिनांक मई २२, १९६९ के पत्र की प्राप्ति की सूचना देना चाहता हूं, और मैंने विषय को ध्यान से नोट कर लिया है। मैंने उन लड़के को दीक्षा दी है जिनकी आपने सिफारिश की है जिनका नाम स्टीव* है और उनकी जप माला इसके साथ भेजे गए हैं। कृपया जहां तक संभव हो कृष्णभावनामृत के सिद्धांतों को समझने में उनकी मदद करें। चंदनाचार्य के सदानंदिनी के साथ विवाह के संबंध में, यदि वे आपस में बस जाते हैं, तो मुझे खुशी होगी। वे बहुत अच्छा संयोजन हैं। आपने लिखा है कि आप कानुप्रिया के साथ टोरंटो जाने की इच्छा कर रहे हैं, लेकिन यह तभी हो सकता है जब मॉन्ट्रियल मंदिर का त्याग न हो। आप वहां इतना अच्छा कर रहे हैं जैसा आपने लिखा है, तो आप क्यों जाना चाहते हैं? बहुत जल्द हमें &amp;lt;u&amp;gt;बैक टू गॉडहेड&amp;lt;/u&amp;gt; की भारी मात्रा मिलेगी, और मैं चाहता हूं कि मॉन्ट्रियल मंदिर कम से कम १०० डॉलर क़ीमत की प्रतियां हर महीने बेचने के लिए ख़रीदे। क्या आपको लगता है कि टोरंटो में आप उतना पैसा जुटा पाएंगे जितना आप मॉन्ट्रियल में अभी कर रहे हैं? कृपया इन मामलों पर विचार करें और मुझे बताएं कि आपने क्या निर्णय लिया है। वैसे भी, मुझे खुशी है कि आप इस उदात्त आंदोलन को फैलाने के लिए बहुत उत्साहित हैं, और भक्तों को न्यूपोर्ट महोत्सव में जाने का आपका विचार बहुत अच्छा है। आप इस बिंदु पर अन्य केंद्रों के साथ पत्राचार कर सकते हैं। दूसरी बात यह है कि मैंने भरदराज और रुक्मिणी से कुछ नहीं सुना। मैं उनसे सुनने के लिए उत्सुक हूं और यह देखने के लिए कि वे चित्र कैसे कर रहे हैं। मेरे पास उनके करने के लिए बहुत सारे चित्र हैं, लेकिन वे पत्राचार क्यों नहीं कर रहे हैं?&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृपया मेरा आशीर्वाद हिमावती और अन्य सभी को दें। मुझे आशा है कि आप सभी अच्छे हैं।&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आपका नित्य शुभचिंतक, &amp;lt;br /&amp;gt;&lt;br /&gt;
[[File:SP Signature.png|300px]]&amp;lt;br /&amp;gt; &lt;br /&gt;
ए. सी. भक्तिवेदांत स्वामी &amp;lt;br/&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रीपति दास। &#039;&#039;[हस्तलिखित]&#039;&#039;&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>Dhriti</name></author>
	</entry>
</feed>