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	<title>Vanipedia - User contributions [en]</title>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_9.29&amp;diff=612410</id>
		<title>HI/BG 9.29</title>
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		<updated>2024-07-10T05:52:37Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 9|H29]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 9| अध्याय ९: परम गुह्य ज्ञान]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 9.28| BG 9.28]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 9.28|BG 9.28]] - [[HI/BG 9.30|BG 9.30]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 9.30| BG 9.30]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 29 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:समोऽहं सर्वभूतेषु न मे द्वेष्योऽस्ति न प्रियः ।&lt;br /&gt;
:ये भजन्ति तु मां भक्त्या मयि ते तेषु चाप्यहम् ॥२९॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सम:—समभाव; अहम्—मैं; सर्व-भूतेषु—समस्त जीवों में; न—कोई नहीं; मे—मुझको; द्वेष्य:—द्वेषपूर्ण; अस्ति—है; न—न तो; प्रिय:—प्रिय; ये—जो; भजन्ति—दिव्यसेवा करते हैं; तु—लेकिन; माम्—मुझको; भक्त्या—भक्ति से; मयि—मुझमें हैं; ते—वे व्यक्ति; तेषु—उनमें; च—भी; अपि—निश्चय ही; अहम्—मैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मैं न तो किसी से द्वेष करता हूँ, न ही किसी के साथ पक्षपात करता हूँ | मैं सबों के लिए समभाव हूँ | किन्तु जो भी भक्तिपूर्वक मेरी सेवा करता है, वह मेरा मित्र है, मुझमें स्थित रहता है और मैं भी उसका मित्र हूँ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यहाँ पर प्रश्न किया जा सकता है कि जब कृष्ण का सबों के लिए समभाव है और उनका कोई विशिष्ट मित्र नहीं है तो फिर वे उन भक्तों में विशेष रूचि क्यों लेते हैं, जो उनकी दिव्यसेवा में सदैव लगे रहते हैं? किन्तु यह भेदभाव नहीं है, यह तो सहज है | इस जगत् में हो सकता है कि कोई व्यक्ति अत्यन्त उपकारी हो, किन्तु तो भी वह अपनी सन्तानों में विशेष रूचि लेता है | भगवान् का कहना है कि प्रत्येक जीव, चाहे वह जिस योनी का हो, उनका पुत्र है, अतः वे हर एक को जीवन की आवश्यक वस्तुएँ प्रदान करते हैं | वे उस बादल के सदृश हैं जो सबों के ऊपर जलवृष्टि करता है, चाहे यह वृष्टि चट्टान पर हो या स्थल पर, या जल में हो | किन्तु भगवान् अपने भक्तों का विशेष ध्यान रखते हैं | ऐसे ही भक्तों का यहाँ उल्लेख हुआ है – वे सदैव कृष्णभावनामृत में रहते हैं, फलतः वे निरन्तर कृष्ण में लीन रहते हैं | कृष्णभावनामृत शब्द ही बताता है कि जो लोग ऐसे भावनामृत में रहते हैं वे सजीव अध्यात्मवादी हैं और उन्हीं में स्थित हैं | भगवान् यहाँ स्पष्ट रूप से कहते हैं – &#039;&#039;मयि ते&#039;&#039; अर्थात् वे मुझमें हैं | फलतः भगवान् भी उनमें हैं | इससे &#039;&#039;येयथा मां प्रपद्यन्ते तांस्तथैव भजाम्यहम्&#039;&#039; की भी व्याख्या हो जाती है – जो भीमेरी शरण में आ जाता है, उसकी मैं उसी रूप में रखवाली करता हूँ | यह दिव्य आदान-प्रदान भाव विद्यमान रहता है, क्योंकि भक्त तथा भगवान् दोनों सचेतन हैं | जब हीरे को सोने की अँगूठी में जड़ दिया जाता है तो वह अत्यन्त सुन्दर लगता है | इससे सोने की महिमा बढती है, किन्तु साथ ही हीरे की भी महिमा बढती है | भगवान् तथा जीव निरन्तर चमकते रहते हैं और जब कोई जीव भगवान् की सेवा में प्रवृत्त होता है तो वह सोने की भाँति दिखता है | भगवान् हीरे के समान हैं, अतः यह संयोग अत्युत्तम होता है | शुद्ध अवस्था में जीव भक्त कहलाते हैं | परमेश्र्वर अपने भक्तों के भी भक्त बन जाते हैं | यदि भगवान् तथा भक्त में आदान-प्रदान का भाव न रहे तो सगुणवादी दर्शन ही न रहे | मायावादी दर्शन परमेश्र्वर तथा जीव के मध्य ऐसा आदान-प्रदान का भाव नहीं मिलता, किन्तु सगुणवादी दर्शन में ऐसा होता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्रायः यह दृष्टान्त दिया जाता है कि भगवान् कल्पवृक्ष के समान हैं और मनुष्य इस वृक्ष से जो भी माँगता है, भगवान् उसकी पूर्ति करते हैं | किन्तु यहाँ पर जो व्याख्या दी गई है वह अधिक पूर्ण है | यहाँ पर भगवान् को भक्त का पक्ष लेने वाला कहा गया है | यह भक्त के प्रति भगवान् की विशेष कृपा की अभिव्यक्ति है | भगवान् के आदान-प्रदान भाव को कर्म के नियम के अन्तर्गत नहीं मानना चाहिए | यह तो उस दिव्य अवस्था से सम्बन्धित रहता है जिसमें भगवान् तथा उनके भक्त कर्म करते हैं | भगवद्भक्ति इस जगत का कार्य नहीं है, यह तो उस अध्यात्म का अंश है, जहाँ शाश्र्वत आनन्द तथा ज्ञान का प्राधान्य रहता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 9.28| BG 9.28]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 9.28|BG 9.28]] - [[HI/BG 9.30|BG 9.30]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 9.30| BG 9.30]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_9.28&amp;diff=612409</id>
		<title>HI/BG 9.28</title>
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		<updated>2024-07-10T05:43:26Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 9|H28]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 9| अध्याय ९: परम गुह्य ज्ञान]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 9.27| BG 9.27]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 9.27|BG 9.27]] - [[HI/BG 9.29|BG 9.29]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 9.29| BG 9.29]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 28 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:शुभाशुभफलैरेवं मोक्ष्यसे कर्मबन्धनैः ।&lt;br /&gt;
:संन्यासयोगयुक्तात्मा विमुक्तो मामुपैष्यसि ॥२८॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
शुभ—शुभ; अशुभ—अशुभ; फलै:—फलों के द्वारा; एवम्—इस प्रकार; मोक्ष्यसे—मुक्त हो जाओगे; कर्म—कर्म के; बन्धनै:—बन्धन से; सन्न्यास—संन्यास के; योग—योग से; युक्त-आत्मा—मन को स्थिर करके; विमुक्त:—मुक्त हुआ; माम्—मुझे; उपैष्यसि—प्राह्रश्वत होगे।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस तरह तुम कर्म के बन्धन तथा इसके शुभाशुभ फलों से मुक्त हो सकोगे | इस संन्यासयोग में अपने चित्त को स्थिर करके तुम मुक्त होकर मेरे पास आ सकोगे |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
गुरु के निर्देशन में कृष्णभावनामृत में रहकर कर्म करने को युक्त कहते हैं | पारिभाषिक शब्द युक्त-वैराग्य है | श्रीरूप गोस्वामी ने इसकी व्याख्या इस प्रकार की है (भक्तिरसामृतसिन्धु २.२५५)—&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अनासक्तस्य विषयान्यथार्हमुपयुञ्जतः |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
निर्बन्धः कृष्णसम्बन्धे युक्तं वैराग्यमुच्यते ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
श्रीरूप गोस्वामी कहते हैं कि जब तक हम इस जगत् में हैं, तब तक हमें कर्म करना पड़ता है, हम कर्म करना बन्द नहीं कर सकते | अतः यदि कर्म करके उसके फल कृष्ण को अर्पित कर दिये जायँ तो वह युक्तवैराग्य कहलाता है | वस्तुतः संन्यास में स्थित होने पर ऐसे कर्मों से चित्त रूपी दर्पण स्वच्छ हो जाता है और कर्ता ज्यों-ज्यों क्रमशः आत्म-साक्षात्कार की ओर प्रगति करता रहता जाता है, त्यों-त्यों परमेश्र्वर के प्रति पूर्णतया समर्पित होता रहता है | अतएव अन्त में वह मुक्त हो जाता है और यह मुक्ति भी विशिष्ट होती है | इस मुक्ति से वह ब्रह्मज्योति में तदाकार नहीं होता, अपितु भगवद्धाम में प्रवेश करता है | यहाँ स्पष्ट उल्लेख है – माम् उपैष्यसी– वह मेरे पास आता है, अर्थात् मेरे धाम वापस आता है | मुक्ति की पाँच विभिन्न अवस्थाएँ हैं और यहाँ स्पष्ट किया गया है कि जो भक्त जीवन भर परमेश्र्वर के निर्देशन में रहता है, वह ऐसी अवस्था को प्राप्त हुआ रहता है, जहाँ से वह शरीर त्यागने के बाद भगवद्धाम जा सकता है और भगवान् की प्रत्यक्ष संगति में रह सकता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिस व्यक्ति में अपने जीवन को भगवत्सेवा में रत रखने के अतिरिक्त अन्य कोई रूचि नहीं होती, वही वास्तविक संन्यासी है | ऐसा व्यक्ति भगवान् की परम इच्छा पर आश्रित रहते हुए अपने को उनका नित्य दास मानता है | अतः वह जो कुछ करता है, भगवान् के लाभ के लिए करता है | वह जो कुछ करता है, भगवान् की सेवा करने के लिए करता है | वह सकामकर्मों या वेदवर्णित कर्तव्यों पर ध्यान नहीं देता | सामान्य मनुष्यों के लिए वेदवर्णित कर्तव्यों को सम्पन्न करना अनिवार्य होता है | किन्तु शुद्धभक्त भगवान् की सेवा में पूर्णतया रत होकर भी कभी-कभी वेदों द्वारा अनुमोदित कर्तव्यों का विरोध करता प्रतीत होता है, जो वस्तुतः विरोध नहीं है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः वैष्णव आचार्यों का कथन है कि बुद्धिमान से बुद्धिमान व्यक्ति भी शुद्धभक्त की योजनाओं तथा कार्यों को नहीं समझ सकता | ठीक शब्द है – &#039;&#039;ताँर वाक्य, क्रिया, मुद्रा विज्ञेह ना बुझय&#039;&#039; &#039;&#039;&#039;([[Vanisource:CC Madhya 23.39|चैतन्यचरितामृत, मध्य २३.३९]])&#039;&#039;&#039;| इस प्रकार जो व्यक्ति भगवान् की सेवा में रत है, या जो निरन्तर योजना बनाता रहता है कि किस तरह भगवान् की सेवा की जाये, उसे ही वर्तमान में पूर्णतया मुक्त मानना चाहिए और भविष्य में उसका भगवद्धाम जाना ध्रुव है | जिस प्रकार कृष्ण आलोचना से परे हैं, उसी प्रकार वह भक्त भी सारी भौतिक आलोचना से परे हो जाता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 9.27| BG 9.27]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 9.27|BG 9.27]] - [[HI/BG 9.29|BG 9.29]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 9.29| BG 9.29]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_7.16&amp;diff=612408</id>
		<title>HI/BG 7.16</title>
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		<updated>2024-07-10T05:26:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: Word to Word translation&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 7|H16]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 7| अध्याय ७: भगवद्ज्ञान]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 7.15| BG 7.15]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 7.15|BG 7.15]] - [[HI/BG 7.17|BG 7.17]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 7.17| BG 7.17]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 16 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:चतुर्विधा भजन्ते मां जनाः सुकृतिनोऽर्जुन ।&lt;br /&gt;
:आर्तो जिज्ञासुरर्थार्थी ज्ञानी च भरतर्षभ ॥१६॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
चतुः विधा:- चार प्रकार के; भजन्ते - सेवा करते हैं; माम् - मेरी; जना:- व्यक्ति; सु-कृतिनः - पुण्यात्मा; अर्जुन– हे अर्जुन; आर्तः– विपदाग्रस्त, पीड़ित; जिज्ञासुः - ज्ञान के जिज्ञासु; अर्थ-अर्थी - लाभ की इच्छा रखने वाले; ज्ञानी– वस्तुओं को सही रूप में जानने वाले, तत्त्वज्ञ; च - भी; भरत - ऋषभ - हे भरतश्रेष्ठ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे भरतश्रेष्ठ! चार प्रकार के पुण्यात्मा मेरी सेवा करते हैं – आर्त, जिज्ञासु, अर्थार्थी तथा ज्ञानी |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
दुष्कृती के सर्वथा विपरीत ऐसे लोग हैं जो शास्त्रीय विधि-विधानों का दृढ़ता से पालन करते हैं और ये सुकृतिनः कहलाते हैं अर्थात् ये वे लोग हैं जो शास्त्रीय विधि-विधानों, नैतिक तथा सामाजिक नियमों को मानते हैं और परमेश्र्वर के प्रति न्यूनाधिक भक्ति करते हैं | इस लोगों की चार श्रेणियाँ हैं – वे जो पीड़ित हैं, वे जिन्हें धन की आवश्यकता है, वे जिन्हें जिज्ञासा है और वे जिन्हें परमसत्य का ज्ञान है | ये सारे लोग विभिन्न परिस्थितियों में परमेश्र्वर की भक्ति करते रहते हैं | ये शुद्ध भक्त नहीं हैं, क्योंकि ये भक्ति के बदले कुछ महत्त्वाकांक्षाओं की पूर्ति करना चाहते हैं | शुद्ध भक्ति निष्काम होती है और उसमें किसी लाभ की आकांशा नहीं रहती | भक्तिरसामृत सिन्धु में (१.१.११) शुद्ध भक्ति की परिभाषा इस प्रकार की गई है –&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अन्याभिलाषिताशून्यं ज्ञानकर्माद्यनावृतम् |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
आनुकूल्येन कृष्णानुशीलनं भक्तिरुत्तमा ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;मनुष्य को चाहिए कि परमेश्र्वर कृष्ण की दिव्य प्रेमाभक्ति किसी सकामकर्म अथवा मनोधर्म द्वारा भौतिक लाभ की इच्छा से रहित होकर करे | यह शुद्धभक्ति कहलाती है |&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जब ये चार प्रकार के लोग परमेश्र्वर के पास भक्ति के लिए आते हैं और शुद्ध भक्त की संगती से पूर्णतया शुद्ध हो जाते हैं, तो ये भी शुद्ध भक्त हो जाते हैं | जहाँ तक दुष्टों (दुष्कृतियों) का प्रश्न है उनके लिए भक्ति दुर्गम है क्योंकि उनका जीवन स्वार्थपूर्ण, अनियमित तथा निरुद्देश्य होता है | किन्तु इनमें से भी कुछ लोग शुद्ध भक्त के सम्पर्क में आने पर शुद्ध भक्त बन जाते हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो लोग सदैव सकाम कर्मों में व्यस्त रहते हैं, वे संकट के समय भगवान् के पास आते हैं और तब वे शुद्धभक्तों की संगति करते हैं तथा विपत्ति में भगवान् के भक्त बन जाते हैं | जो बिलकुल हताश हैं वे भी कभी-कभी शुद्ध भक्तों की संगति करने आते हैं और ईश्र्वर के विषय में जानने की जिज्ञासा करते हैं | इसी प्रकार शुष्क चिन्तक जब ज्ञान के प्रत्येक क्षेत्र से हताश हो जाते हैं तो वे कभी-कभी ईश्र्वर को जानना चाहते हैं और वे भगवान् की भक्ति करने आते हैं | इस प्रकार ये निराकार ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा के ज्ञान को पार कर जाते हैं और भगवत्कृपा से या उनके शुद्ध भक्त की कृपा से उन्हें साकार भगवान् का बोध हो जाता है | कुल मिलाकर जब आर्त, जिज्ञासु, ज्ञानी तथा धन की इच्छा रखने वाले समस्त भौतिक इच्छाओं से मुक्त हो जाते हैं और जब वे यह भलीभाँति समझ जाते हैं कि भौतिक आसक्ति से आध्यात्मिक उन्नति का कोई सरोकार नहीं है, तो वे शुद्धभक्त बन जाते हैं | जब तक ऐसी शुद्ध अवस्था प्राप्त नहीं हो लेती, तब तक भगवान् की दिव्यसेवा में लगे भक्त सकाम कर्मों में या संसारी ज्ञान की खोज में अनुरक्त रहते हैं | अतः शुद्ध भक्ति की अवस्था तक पहुँचने के लिए मनुष्य को इन सबों को लाँघना होता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 7.15| BG 7.15]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 7.15|BG 7.15]] - [[HI/BG 7.17|BG 7.17]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 7.17| BG 7.17]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_6.15&amp;diff=612407</id>
		<title>HI/BG 6.15</title>
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		<updated>2024-07-10T05:08:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 6|H15]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 6| अध्याय ६: ध्यानयोग]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 6.13-14| BG 6.13-14]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 6.13-14|BG 6.13-14]] - [[HI/BG 6.16|BG 6.16]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 6.16| BG 6.16]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 15 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:युञ्जन्नेवं सदात्मानं योगी नियतमानसः ।&lt;br /&gt;
:शान्तिं निर्वाणपरमां मत्संस्थामधिगच्छति ॥१५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
युञ्जन्—अभ्यास करते हुए; एवम्—इस प्रकार से; सदा—निरन्तर; आत्मानम्—शरीर, मन तथा आत्मा; योगी—योग का साधक; नियत-मानस:—संयमित मन से युक्त; शान्तिम्—शान्ति को; निर्वाण-परमाम्—भौतिक अस्तित्व का अन्त; मत्-संस्थाम्—चिन्मयव्योम (भगवद्धाम) को; अधिगच्छति—प्राह्रश्वत करता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार शरीर, मन तथा कर्म में निरन्तर संयम का अभ्यास करते हुए संयमित मन वाले योगी को इस भौतिक अस्तित्व की समाप्ति पर भगवद्धाम की प्राप्ति होती है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अब योगाभ्यास के चरम लक्ष्य का स्पष्टीकरण किया जा रहा है | योगाभ्यास किसी भौतिक सुविधा की प्राप्ति के लिए नहीं किया जाता, इसका उद्देश्य तो भौतिक संसार से विरक्ति प्राप्त करना है | जो कोई इसके द्वारा स्वास्थ्य-लाभ चाहता है या भौतिक सिद्धि प्राप्त करने का इच्छुक होता है वह भगवद्गीता के अनुसार योगी नहीं है | न ही भौतिक अस्तित्व की समाप्ति का अर्थ शून्य में प्रवेश है क्योंकि यह कपोलकल्पना है | भगवान् की सृष्टि में कहीं भी शून्य नहीं है | उलटे भौतिक अस्तित्व की समाप्ति से मनुष्य भगवद्धाम में प्रवेश करता है | भगवद्गीता में भगवद्धाम का भी स्पष्टीकरण किया गया है कि यह वह स्थान है जहाँ न सूर्य की आवश्यकता है, न चाँद या बिजली की | आध्यात्मिक राज्य के सारे लोक उसी प्रकार से स्वतः प्रकाशित हैं, जिस प्रकार सूर्य द्वारा यह भौतिक आकाश | वैसे तो भगवद्धाम सर्वत्र है, किन्तु चिन्मयव्योम तथा उसके लोकों को ही परमधाम कहा जाता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
एक पूर्णयोगी जिसे भगवान् कृष्ण का पूर्णज्ञान है जैसा कि यहाँ भगवान् ने स्वयं कहा है (मच्चितः, मत्परः, मत्स्थान्म्) वास्तविक शान्ति प्राप्त कर सकता है और अन्ततोगत्वा कृष्णलोक या गोलोक वृन्दावन को प्राप्त होता है | ब्रह्मसंहिता में (५.३७) स्पष्ट उल्लेख है – गोलोक एवनिवसत्यखिलात्मभूतः– यद्यपि भगवान् सदैव अपने धाम में निवास करते हैं, जिसे गोलोक कहते हैं, तो भी वे अपनी परा-आध्यात्मिक शक्तियों के कारण सर्वव्यापी ब्रह्म तथा अन्तर्यामी परमात्मा हैं | कोई भी कृष्ण तथा विष्णु रूप में उनके पूर्ण विस्तार को सही-सही जाने बिना वैकुण्ठ में या भगवान् के नित्यधाम (गोलोक वृन्दावन) में प्रवेश नहीं कर सकता | अतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति ही पूर्णयोगी है क्योंकि उसका मन सदैव कृष्ण के कार्यकलापों में तल्लीन रहता है (स वै मनः कृष्णपदारविन्दयोः) | वेदों में (श्र्वेताश्र्वतर उपनिषद् ३.८) भी हम पाते हैं – तमेव विदित्वाति मृत्युमेति– केवल भगवान् कृष्ण को जानने पर जन्म तथा मृत्यु के पथ को जीता जा सकता है | दूसरे शब्दों में, योग की पूर्णता संसार से मुक्ति प्राप्त करने में है, इन्द्रजाल अथवा व्यायाम के करतबों द्वारा जनता को मुर्ख बनाने में नहीं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.25&amp;diff=612406</id>
		<title>HI/BG 5.25</title>
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		<updated>2024-07-10T05:06:12Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== श्लोक 25 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:लभन्ते ब्रह्मनिर्वाणमृषयः क्षीणकल्मषाः ।&lt;br /&gt;
:छिन्नद्वैधा यतात्मानः सर्वभूतहिते रताः ॥२५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
लभन्ते—प्राह्रश्वत करते हैं; ब्रह्म-निर्वाणम्—मुक्ति; ऋषय:—अन्तर से क्रियाशील रहने वाले; क्षीण-कल्मषा:—समस्त पापों से रहित; छिन्न—निवृत्त होकर; द्वैधा:—द्वैत से; यत-आत्मान:—आत्म-साक्षात्कार में निरत; सर्व-भूत—समस्त जीवों के; हिते—कल्याण में; रता:—लगे हुए।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो लोग संशय से उत्पन्न होने वाले द्वैत से परे हैं, जिनके मन आत्म-साक्षात्कार में रत हैं, जो समस्त जीवों के कल्याणकार्य करने में सदैव व्यस्त रहते हैं और जो समस्त पापों से रहित हैं, वे ब्रह्मनिर्वाण (मुक्ति) को प्राप्त होते हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
केवल वही व्यक्ति सभी जीवों के कल्याणकार्य में रत कहा जाएगा जो पूर्णतया कृष्णभावनाभावित है | जब व्यक्ति को यह वास्तविक ज्ञान हो जाता है कि कृष्ण ही सभी वस्तुओं के उद्गम हैं तब वह जो भी कर्म करता है सबों के हित को ध्यान में रखकर करता है | परमभोक्ता, परमनियन्ता तथा परमसखा कृष्ण को भूल जाना मानवता के क्लेशों का कारण है | अतः समग्र मानवता के लिए कार्य करना सबसे बड़ा कल्याणकार्य है | कोई भी मनुष्य ऐसे श्रेष्ठ कार्य में तब तक नहीं लग पाता जब तक वह स्वयं मुक्त न हो | कृष्णभावनाभावित मनुष्य के हृदय में कृष्ण की सर्वोच्चता पर बिलकुल संदेह नहीं रहता | वह इसीलिए सन्देह नहीं करता क्योंकि वह समस्त पापों से रहित होता है | ऐसा है – यह दैवी प्रेम |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जो व्यक्ति मानव समाज का भौतिक कल्याण करने में ही व्यस्त रहता है वह वास्तव में किसी की भी सहायता नहीं कर सकता | शरीर तथा मन की क्षणिक खुशी सन्तोषजनक नहीं होती | जीवन-संघर्ष में कठिनाइयों का वास्तविक कारण मनुष्य द्वारा परमेश्र्वर से अपने सम्बन्ध की विस्मृति में ढूँढा जा सकता है | जब मनुष्य कृष्ण के साथ अपने सम्बन्ध के प्रति सचेष्ट रहता है तो वह वास्तव में मुक्तात्मा होता है, भले ही वह भौतिक शरीर के जाल में फँसा हो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.23&amp;diff=612405</id>
		<title>HI/BG 5.23</title>
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		<updated>2024-07-10T05:02:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 5| अध्याय ५: कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 23 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:शक्नोतीहैव यः सोढुं प्राक्शरीरविमोक्षणात् ।&lt;br /&gt;
:कामक्रोधोद्भवं वेगं स युक्तः स सुखी नरः ॥२३॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
शक्नोति—समर्थ है; इह एव—इसी शरीर में; य:—जो; सोढुम्—सहन करने के लिए; प्राक्—पूर्व; शरीर—शरीर; विमोक्षणात्—त्याग करने से; काम—इच्छा; क्रोध—तथा क्रोध से; उद्भवम्—उत्पन्न; वेगम्—वेग को; स:—वह; युक्त:—समाधि में; स:—वही; सुखी—सुखी; नर:—मनुष्य।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यदि इस शरीर को त्यागने के पूर्व कोई मनुष्य इन्द्रियों के वेगों को सहन करने तथा इच्छा एवं क्रोध के वेग को रोकने में समर्थ होता है, तो वह इस संसार में सुखी रह सकता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यदि कोई आत्म-साक्षात्कार के पथ पर अग्रसर होना चाहता है तो उसे भौतिक इन्द्रियों के वेग को रोकने का प्रयत्न करना चाहिए | ये वेग हैं – वाणीवेग, क्रोधवेग, मनोवेग, उदरवेग, उपस्थवेग तथा जिह्वावेग | जो व्यक्ति इन विभिन्न इन्द्रियों के वेगों को तथा मन को वश में करने में समर्थ है वह &#039;&#039;गोस्वामी&#039;&#039; या स्वामी कहलाता है | ऐसे गोस्वामी नितान्त संयमित जीवन बिताते हैं और इन्द्रियों के वेगों का तिरस्कार करते हैं | भौतिक इच्छाएँ पूर्ण न होने पर क्रोध उत्पन्न होता है और इस प्रकार मन, नेत्र तथा वक्षस्थल उत्तेजित होते हैं | अतः इस शरीर का परित्याग करने के पूर्व मनुष्य को इन्हें वश में करने का अभ्यास करना चाहिए | जो ऐसा कर सकता है वह स्वरुपसिद्ध माना जाता है और आत्म-साक्षात्कार की अवस्था में वह सुखी रहता है | योगी का कर्तव्य है कि वह इच्छा और क्रोध को वश में करने का भरसक प्रयत्न करे |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.15&amp;diff=612404</id>
		<title>HI/BG 5.15</title>
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		<updated>2024-07-10T05:00:21Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 5|H15]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 5| अध्याय ५: कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 15 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।&lt;br /&gt;
:अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
न—कभी नहीं; आदत्ते—स्वीकार करता है; कस्यचित्—किसी का; पापम्—पाप; न—न तो; च—भी; एव—निश्चय ही; सु-कृतम्—पुण्य को; विभु:—परमेश्वर; अज्ञानेन—अज्ञान से; आवृतम्—आच्छादित; ज्ञानम्—ज्ञान; तेन—उससे; मुह्यन्ति—मोह-ग्रस्त होते हैं; जन्तव:—जीवगण।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
परमेश्र्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है , न पुण्यों को | किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते हैं, जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किये रहता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
विभु का अर्थ है, परमेश्र्वर जो असीम ज्ञान, धन, बल, यश, सौन्दर्य तथा त्याग से युक्त है | वह सदैव आत्मतृप्त और पाप-पुण्य से अविचलित रहता है | वह किसी भी जीव के लिए विशिष्ट परिस्थिति नहीं उत्पन्न करता, अपितु जीव अज्ञान से मोहित होकर जीवन के लिए विशिष्ट परिस्थिति की कामना करता है, जिसके कारण कर्म तथा फल की शृंखला आरम्भ होती है | जीव परा प्रकृति के कारण ज्ञान से पूर्ण है | तो भी वह अपनी सीमित शक्ति के कारण अज्ञान के वशीभूत हो जाता है | भगवान् सर्वशक्तिमान् है, किन्तु जीव नहीं है | भगवान् विभु अर्थात् सर्वज्ञ है, किन्तु जीव अणु है | जीवात्मा में इच्छा करने की शक्ति है, किन्तु ऐसी इच्छा की पूर्ति सर्वशक्तिमान भगवान् द्वारा ही की जाती है | अतः जब जीव अपनी इच्छाओं से मोहग्रस्त हो जाता है तो भगवान् उसे अपनी इच्छापूर्ति करने देते हैं, किन्तु किसी परिस्थिति विशेष में इच्छित कर्मों तथा फलों के लिए उत्तरदायी नहीं होते | अतएव मोहग्रस्त होने से देहधारी जीव अपने को परिस्थितिजन्य शरीर मान लेता है और जीवन के क्षणिक दुख तथा सुख को भोगता है | भगवान् परमात्मा रूप में जीव के चिरसंगी रहते हैं, फलतः वे प्रत्येक जीव की इच्छाओं को उसी तरह समझते हैं जिस तरह फूल के निकट रहने वाला फूल की सुगन्ध को | इच्छा जीव को बद्ध करने के लिए सूक्ष्म बन्धन है | भगवान् मनुष्य की योग्यता के अनुसार उसकी इच्छा को पूरा करते हैं – &#039;&#039;आपन सोची होत नहिं प्रभु सोची तत्काल&#039;&#039; | अतः व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सर्वशक्तिमान नहीं होता | किन्तु भगवान् इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं | वे निष्पक्ष होने के कारण स्वतन्त्र अणुजीवों की इच्छाओं में व्यवधान नहीं डालते | किन्तु जब कोई कृष्ण की इच्छा करता है तो भगवान् उसकी विशेष चिन्ता करते हैं और उसे इस प्रकार प्रोत्साहित करते हैं कि भगवान् को प्राप्त करने की उसकीइच्छा पूरी हो और वह सदैव सुखी रहे | अतएव वैदिक मन्त्र पुकार कर कहते हैं – &#039;&#039;एष उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते |एष उ एवासाधु कर्म कारयति यमधो निनीषते&#039;&#039; – &amp;quot;भगवान् जीव को शुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह ऊपर उठे | भगवान् उसे अशुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह नरक जाए |&amp;quot; (कौषीतकी उपनिषद् ३.८) |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः |&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&#039;&#039;ईश्र्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वाश्र्वभ्रमेव च ||&#039;&#039;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;जीव अपने सुख-दुःख में पूर्णतया आश्रित है | परमेश्र्वर की इच्छा से वह स्वर्ग या नरक जाता है, जिस तरह वायु के द्वारा प्रेरित बादल |&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः देहधारी जीव कृष्णभावनामृत की उपेक्षा करने की अपनी अनादि प्रवृत्ति के कारण अपने लिए मोह उत्पन्न करता है | फलस्वरूप स्वभावतः सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी वह अपने अस्तित्व की लघुता के कारण भगवान् के प्रति सेवा करने की अपनी स्वाभाविक स्थिति भूल जाता है और इस तरह वह अविद्या द्वारा बन्दी बना लिया जाता है | अज्ञानवश जीव यह कहता है कि उसके भवबन्धन के लिए भगवान् उत्तरदायी हैं | इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्र (२.१.३४) भी करते हैं – &#039;&#039;वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति&#039;&#039; – &amp;quot;भगवान् न तो किसी के प्रति घृणा करते हैं, न किसी को चाहते हैं, यद्यपि ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है |&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 5.14| BG 5.14]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 5.14|BG 5.14]] - [[HI/BG 5.16|BG 5.16]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 5.16| BG 5.16]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.15&amp;diff=612403</id>
		<title>HI/BG 5.15</title>
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		<updated>2024-07-10T04:59:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 5|H15]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 5| अध्याय ५: कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== श्लोक 15 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।&lt;br /&gt;
:अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
न—कभी नहीं; आदत्ते—स्वीकार करता है; कस्यचित्—किसी का; पापम्—पाप; न—न तो; च—भी; एव—निश्चय ही; सु-कृतम्—पुण्य को; विभु:—परमेश्वर; अज्ञानेन—अज्ञान से; आवृतम्—आच्छादित; ज्ञानम्—ज्ञान; तेन—उससे; मुह्यन्ति—मोह-ग्रस्त होते हैं; जन्तव:—जीवगण।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
परमेश्र्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है , न पुण्यों को | किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते हैं, जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किये रहता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
विभु का अर्थ है, परमेश्र्वर जो असीम ज्ञान, धन, बल, यश, सौन्दर्य तथा त्याग से युक्त है | वह सदैव आत्मतृप्त और पाप-पुण्य से अविचलित रहता है | वह किसी भी जीव के लिए विशिष्ट परिस्थिति नहीं उत्पन्न करता, अपितु जीव अज्ञान से मोहित होकर जीवन के लिए विशिष्ट परिस्थिति की कामना करता है, जिसके कारण कर्म तथा फल की शृंखला आरम्भ होती है | जीव परा प्रकृति के कारण ज्ञान से पूर्ण है | तो भी वह अपनी सीमित शक्ति के कारण अज्ञान के वशीभूत हो जाता है | भगवान् सर्वशक्तिमान् है, किन्तु जीव नहीं है | भगवान् विभु अर्थात् सर्वज्ञ है, किन्तु जीव अणु है | जीवात्मा में इच्छा करने की शक्ति है, किन्तु ऐसी इच्छा की पूर्ति सर्वशक्तिमान भगवान् द्वारा ही की जाती है | अतः जब जीव अपनी इच्छाओं से मोहग्रस्त हो जाता है तो भगवान् उसे अपनी इच्छापूर्ति करने देते हैं, किन्तु किसी परिस्थिति विशेष में इच्छित कर्मों तथा फलों के लिए उत्तरदायी नहीं होते | अतएव मोहग्रस्त होने से देहधारी जीव अपने को परिस्थितिजन्य शरीर मान लेता है और जीवन के क्षणिक दुख तथा सुख को भोगता है | भगवान् परमात्मा रूप में जीव के चिरसंगी रहते हैं, फलतः वे प्रत्येक जीव की इच्छाओं को उसी तरह समझते हैं जिस तरह फूल के निकट रहने वाला फूल की सुगन्ध को | इच्छा जीव को बद्ध करने के लिए सूक्ष्म बन्धन है | भगवान् मनुष्य की योग्यता के अनुसार उसकी इच्छा को पूरा करते हैं – &#039;&#039;आपन सोची होत नहिं प्रभु सोची तत्काल&#039;&#039; | अतः व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सर्वशक्तिमान नहीं होता | किन्तु भगवान् इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं | वे निष्पक्ष होने के कारण स्वतन्त्र अणुजीवों की इच्छाओं में व्यवधान नहीं डालते | किन्तु जब कोई कृष्ण की इच्छा करता है तो भगवान् उसकी विशेष चिन्ता करते हैं और उसे इस प्रकार प्रोत्साहित करते हैं कि भगवान् को प्राप्त करने की उसकीइच्छा पूरी हो और वह सदैव सुखी रहे | अतएव वैदिक मन्त्र पुकार कर कहते हैं – &#039;&#039;एष उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते |एष उ एवासाधु कर्म कारयति यमधो निनीषते&#039;&#039; – &amp;quot;भगवान् जीव को शुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह ऊपर उठे | भगवान् उसे अशुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह नरक जाए |&amp;quot; (कौषीतकी उपनिषद् ३.८) |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्र्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वाश्र्वभ्रमेव च ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;जीव अपने सुख-दुःख में पूर्णतया आश्रित है | परमेश्र्वर की इच्छा से वह स्वर्ग या नरक जाता है, जिस तरह वायु के द्वारा प्रेरित बादल |&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः देहधारी जीव कृष्णभावनामृत की उपेक्षा करने की अपनी अनादि प्रवृत्ति के कारण अपने लिए मोह उत्पन्न करता है | फलस्वरूप स्वभावतः सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी वह अपने अस्तित्व की लघुता के कारण भगवान् के प्रति सेवा करने की अपनी स्वाभाविक स्थिति भूल जाता है और इस तरह वह अविद्या द्वारा बन्दी बना लिया जाता है | अज्ञानवश जीव यह कहता है कि उसके भवबन्धन के लिए भगवान् उत्तरदायी हैं | इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्र (२.१.३४) भी करते हैं – &#039;&#039;वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति&#039;&#039; – &amp;quot;भगवान् न तो किसी के प्रति घृणा करते हैं, न किसी को चाहते हैं, यद्यपि ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है |&amp;quot;&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.15&amp;diff=612402</id>
		<title>HI/BG 5.15</title>
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		<updated>2024-07-10T04:52:46Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 5|H15]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 5| अध्याय ५: कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 15 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।&lt;br /&gt;
:अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
न—कभी नहीं; आदत्ते—स्वीकार करता है; कस्यचित्—किसी का; पापम्—पाप; न—न तो; च—भी; एव—निश्चय ही; सु-कृतम्—पुण्य को; विभु:—परमेश्वर; अज्ञानेन—अज्ञान से; आवृतम्—आच्छादित; ज्ञानम्—ज्ञान; तेन—उससे; मुह्यन्ति—मोह-ग्रस्त होते हैं; जन्तव:—जीवगण।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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परमेश्र्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है , न पुण्यों को | किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते हैं, जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किये रहता है |&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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विभु का अर्थ है, परमेश्र्वर जो असीम ज्ञान, धन, बल, यश, सौन्दर्य तथा त्याग से युक्त है | वह सदैव आत्मतृप्त और पाप-पुण्य से अविचलित रहता है | वह किसी भी जीव के लिए विशिष्ट परिस्थिति नहीं उत्पन्न करता, अपितु जीव अज्ञान से मोहित होकर जीवन के लिए विशिष्ट परिस्थिति की कामना करता है, जिसके कारण कर्म तथा फल की शृंखला आरम्भ होती है | जीव परा प्रकृति के कारण ज्ञान से पूर्ण है | तो भी वह अपनी सीमित शक्ति के कारण अज्ञान के वशीभूत हो जाता है | भगवान् सर्वशक्तिमान् है, किन्तु जीव नहीं है | भगवान् विभु अर्थात् सर्वज्ञ है, किन्तु जीव अणु है | जीवात्मा में इच्छा करने की शक्ति है, किन्तु ऐसी इच्छा की पूर्ति सर्वशक्तिमान भगवान् द्वारा ही की जाती है | अतः जब जीव अपनी इच्छाओं से मोहग्रस्त हो जाता है तो भगवान् उसे अपनी इच्छापूर्ति करने देते हैं, किन्तु किसी परिस्थिति विशेष में इच्छित कर्मों तथा फलों के लिए उत्तरदायी नहीं होते | अतएव मोहग्रस्त होने से देहधारी जीव अपने को परिस्थितिजन्य शरीर मान लेता है और जीवन के क्षणिक दुख तथा सुख को भोगता है | भगवान् परमात्मा रूप में जीव के चिरसंगी रहते हैं, फलतः वे प्रत्येक जीव की इच्छाओं को उसी तरह समझते हैं जिस तरह फूल के निकट रहने वाला फूल की सुगन्ध को | इच्छा जीव को बद्ध करने के लिए सूक्ष्म बन्धन है | भगवान् मनुष्य की योग्यता के अनुसार उसकी इच्छा को पूरा करते हैं – &#039;&#039;आपन सोची होत नहिं प्रभु सोची तत्काल&#039;&#039; | अतः व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सर्वशक्तिमान नहीं होता | किन्तु भगवान् इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं | वे निष्पक्ष होने के कारण स्वतन्त्र अणुजीवों की इच्छाओं में व्यवधान नहीं डालते | किन्तु जब कोई कृष्ण की इच्छा करता है तो भगवान् उसकी विशेष चिन्ता करते हैं और उसे इस प्रकार प्रोत्साहित करते हैं कि भगवान् को प्राप्त करने की उसकीइच्छा पूरी हो और वह सदैव सुखी रहे | अतएव वैदिक मन्त्र पुकार कर कहते हैं – एष उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते |एष उ एवासाधु कर्म कारयति यमधो निनीषते – &amp;quot;भगवान् जीव को शुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह ऊपर उठे | भगवान् उसे अशुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह नरक जाए |&amp;quot; (कौषीतकी उपनिषद् ३.८) |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्र्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वाश्र्वभ्रमेव च ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;जीव अपने सुख-दुःख में पूर्णतया आश्रित है | परमेश्र्वर की इच्छा से वह स्वर्ग या नरक जाता है, जिस तरह वायु के द्वारा प्रेरित बादल |&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः देहधारी जीव कृष्णभावनामृत की उपेक्षा करने की अपनी अनादि प्रवृत्ति के कारण अपने लिए मोह उत्पन्न करता है | फलस्वरूप स्वभावतः सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी वह अपने अस्तित्व की लघुता के कारण भगवान् के प्रति सेवा करने की अपनी स्वाभाविक स्थिति भूल जाता है और इस तरह वह अविद्या द्वारा बन्दी बना लिया जाता है | अज्ञानवश जीव यह कहता है कि उसके भवबन्धन के लिए भगवान् उत्तरदायी हैं | इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्र (२.१.३४) भी करते हैं – &#039;&#039;वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति&#039;&#039; – &amp;quot;भगवान् न तो किसी के प्रति घृणा करते हैं, न किसी को चाहते हैं, यद्यपि ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है |&amp;quot;&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.15&amp;diff=612401</id>
		<title>HI/BG 5.15</title>
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		<updated>2024-07-10T04:52:16Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 15 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।&lt;br /&gt;
:अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
न—कभी नहीं; आदत्ते—स्वीकार करता है; कस्यचित्—किसी का; पापम्—पाप; न—न तो; च—भी; एव—निश्चय ही; सु-कृतम्—पुण्य को; विभु:—परमेश्वर; अज्ञानेन—अज्ञान से; आवृतम्—आच्छादित; ज्ञानम्—ज्ञान; तेन—उससे; मुह्यन्ति—मोह-ग्रस्त होते हैं; जन्तव:—जीवगण।&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
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परमेश्र्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है , न पुण्यों को | किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते हैं, जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किये रहता है |&lt;br /&gt;
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विभु का अर्थ है, परमेश्र्वर जो असीम ज्ञान, धन, बल, यश, सौन्दर्य तथा त्याग से युक्त है | वह सदैव आत्मतृप्त और पाप-पुण्य से अविचलित रहता है | वह किसी भी जीव के लिए विशिष्ट परिस्थिति नहीं उत्पन्न करता, अपितु जीव अज्ञान से मोहित होकर जीवन के लिए विशिष्ट परिस्थिति की कामना करता है, जिसके कारण कर्म तथा फल की शृंखला आरम्भ होती है | जीव परा प्रकृति के कारण ज्ञान से पूर्ण है | तो भी वह अपनी सीमित शक्ति के कारण अज्ञान के वशीभूत हो जाता है | भगवान् सर्वशक्तिमान् है, किन्तु जीव नहीं है | भगवान् विभु अर्थात् सर्वज्ञ है, किन्तु जीव अणु है | जीवात्मा में इच्छा करने की शक्ति है, किन्तु ऐसी इच्छा की पूर्ति सर्वशक्तिमान भगवान् द्वारा ही की जाती है | अतः जब जीव अपनी इच्छाओं से मोहग्रस्त हो जाता है तो भगवान् उसे अपनी इच्छापूर्ति करने देते हैं, किन्तु किसी परिस्थिति विशेष में इच्छित कर्मों तथा फलों के लिए उत्तरदायी नहीं होते | अतएव मोहग्रस्त होने से देहधारी जीव अपने को परिस्थितिजन्य शरीर मान लेता है और जीवन के क्षणिक दुख तथा सुख को भोगता है | भगवान् परमात्मा रूप में जीव के चिरसंगी रहते हैं, फलतः वे प्रत्येक जीव की इच्छाओं को उसी तरह समझते हैं जिस तरह फूल के निकट रहने वाला फूल की सुगन्ध को | इच्छा जीव को बद्ध करने के लिए सूक्ष्म बन्धन है | भगवान् मनुष्य की योग्यता के अनुसार उसकी इच्छा को पूरा करते हैं – &#039;&#039;आपन सोची होत नहिं प्रभु सोची तत्काल&#039;&#039;| अतः व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सर्वशक्तिमान नहीं होता | किन्तु भगवान् इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं | वे निष्पक्ष होने के कारण स्वतन्त्र अणुजीवों की इच्छाओं में व्यवधान नहीं डालते | किन्तु जब कोई कृष्ण की इच्छा करता है तो भगवान् उसकी विशेष चिन्ता करते हैं और उसे इस प्रकार प्रोत्साहित करते हैं कि भगवान् को प्राप्त करने की उसकीइच्छा पूरी हो और वह सदैव सुखी रहे | अतएव वैदिक मन्त्र पुकार कर कहते हैं – एष उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते |एष उ एवासाधु कर्म कारयति यमधो निनीषते – &amp;quot;भगवान् जीव को शुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह ऊपर उठे | भगवान् उसे अशुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह नरक जाए |&amp;quot; (कौषीतकी उपनिषद् ३.८) |&lt;br /&gt;
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&amp;quot;जीव अपने सुख-दुःख में पूर्णतया आश्रित है | परमेश्र्वर की इच्छा से वह स्वर्ग या नरक जाता है, जिस तरह वायु के द्वारा प्रेरित बादल |&amp;quot;&lt;br /&gt;
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अतः देहधारी जीव कृष्णभावनामृत की उपेक्षा करने की अपनी अनादि प्रवृत्ति के कारण अपने लिए मोह उत्पन्न करता है | फलस्वरूप स्वभावतः सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी वह अपने अस्तित्व की लघुता के कारण भगवान् के प्रति सेवा करने की अपनी स्वाभाविक स्थिति भूल जाता है और इस तरह वह अविद्या द्वारा बन्दी बना लिया जाता है | अज्ञानवश जीव यह कहता है कि उसके भवबन्धन के लिए भगवान् उत्तरदायी हैं | इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्र (२.१.३४) भी करते हैं – &#039;&#039;वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति&#039;&#039; – &amp;quot;भगवान् न तो किसी के प्रति घृणा करते हैं, न किसी को चाहते हैं, यद्यपि ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है |&amp;quot;&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>HI/BG 5.15</title>
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		<updated>2024-07-10T04:51:10Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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न—कभी नहीं; आदत्ते—स्वीकार करता है; कस्यचित्—किसी का; पापम्—पाप; न—न तो; च—भी; एव—निश्चय ही; सु-कृतम्—पुण्य को; विभु:—परमेश्वर; अज्ञानेन—अज्ञान से; आवृतम्—आच्छादित; ज्ञानम्—ज्ञान; तेन—उससे; मुह्यन्ति—मोह-ग्रस्त होते हैं; जन्तव:—जीवगण।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
परमेश्र्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है , न पुण्यों को | किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते हैं, जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किये रहता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
विभु का अर्थ है, परमेश्र्वर जो असीम ज्ञान, धन, बल, यश, सौन्दर्य तथा त्याग से युक्त है | वह सदैव आत्मतृप्त और पाप-पुण्य से अविचलित रहता है | वह किसी भी जीव के लिए विशिष्ट परिस्थिति नहीं उत्पन्न करता, अपितु जीव अज्ञान से मोहित होकर जीवन के लिए विशिष्ट परिस्थिति की कामना करता है, जिसके कारण कर्म तथा फल की शृंखला आरम्भ होती है | जीव परा प्रकृति के कारण ज्ञान से पूर्ण है | तो भी वह अपनी सीमित शक्ति के कारण अज्ञान के वशीभूत हो जाता है | भगवान् सर्वशक्तिमान् है, किन्तु जीव नहीं है | भगवान् विभु अर्थात् सर्वज्ञ है, किन्तु जीव अणु है | जीवात्मा में इच्छा करने की शक्ति है, किन्तु ऐसी इच्छा की पूर्ति सर्वशक्तिमान भगवान् द्वारा ही की जाती है | अतः जब जीव अपनी इच्छाओं से मोहग्रस्त हो जाता है तो भगवान् उसे अपनी इच्छापूर्ति करने देते हैं, किन्तु किसी परिस्थिति विशेष में इच्छित कर्मों तथा फलों के लिए उत्तरदायी नहीं होते | अतएव मोहग्रस्त होने से देहधारी जीव अपने को परिस्थितिजन्य शरीर मान लेता है और जीवन के क्षणिक दुख तथा सुख को भोगता है | भगवान् परमात्मा रूप में जीव के चिरसंगी रहते हैं, फलतः वे प्रत्येक जीव की इच्छाओं को उसी तरह समझते हैं जिस तरह फूल के निकट रहने वाला फूल की सुगन्ध को | इच्छा जीव को बद्ध करने के लिए सूक्ष्म बन्धन है | भगवान् मनुष्य की योग्यता के अनुसार उसकी इच्छा को पूरा करते हैं – आपन सोची होत नहिं प्रभु सोची तत्काल| अतः व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सर्वशक्तिमान नहीं होता | किन्तु भगवान् इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं | वे निष्पक्ष होने के कारण स्वतन्त्र अणुजीवों की इच्छाओं में व्यवधान नहीं डालते | किन्तु जब कोई कृष्ण की इच्छा करता है तो भगवान् उसकी विशेष चिन्ता करते हैं और उसे इस प्रकार प्रोत्साहित करते हैं कि भगवान् को प्राप्त करने की उसकीइच्छा पूरी हो और वह सदैव सुखी रहे | अतएव वैदिक मन्त्र पुकार कर कहते हैं – एष उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते |एष उ एवासाधु कर्म कारयति यमधो निनीषते – &amp;quot;भगवान् जीव को शुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह ऊपर उठे | भगवान् उसे अशुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह नरक जाए |&amp;quot; (कौषीतकी उपनिषद् ३.८) |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्र्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वाश्र्वभ्रमेव च ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;जीव अपने सुख-दुःख में पूर्णतया आश्रित है | परमेश्र्वर की इच्छा से वह स्वर्ग या नरक जाता है, जिस तरह वायु के द्वारा प्रेरित बादल |&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः देहधारी जीव कृष्णभावनामृत की उपेक्षा करने की अपनी अनादि प्रवृत्ति के कारण अपने लिए मोह उत्पन्न करता है | फलस्वरूप स्वभावतः सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी वह अपने अस्तित्व की लघुता के कारण भगवान् के प्रति सेवा करने की अपनी स्वाभाविक स्थिति भूल जाता है और इस तरह वह अविद्या द्वारा बन्दी बना लिया जाता है | अज्ञानवश जीव यह कहता है कि उसके भवबन्धन के लिए भगवान् उत्तरदायी हैं | इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्र (२.१.३४) भी करते हैं – &#039;&#039;वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति&#039;&#039; – &amp;quot;भगवान् न तो किसी के प्रति घृणा करते हैं, न किसी को चाहते हैं, यद्यपि ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है |&amp;quot;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.15&amp;diff=612399</id>
		<title>HI/BG 5.15</title>
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		<updated>2024-07-10T04:48:48Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 5|H15]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 5| अध्याय ५: कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== श्लोक 15 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:नादत्ते कस्यचित्पापं न चैव सुकृतं विभुः ।&lt;br /&gt;
:अज्ञानेनावृतं ज्ञानं तेन मुह्यन्ति जन्तवः ॥१५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
न—कभी नहीं; आदत्ते—स्वीकार करता है; कस्यचित्—किसी का; पापम्—पाप; न—न तो; च—भी; एव—निश्चय ही; सु-कृतम्—पुण्य को; विभु:—परमेश्वर; अज्ञानेन—अज्ञान से; आवृतम्—आच्छादित; ज्ञानम्—ज्ञान; तेन—उससे; मुह्यन्ति—मोह-ग्रस्त होते हैं; जन्तव:—जीवगण।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
परमेश्र्वर न तो किसी के पापों को ग्रहण करता है , न पुण्यों को | किन्तु सारे देहधारी जीव उस अज्ञान के कारण मोहग्रस्त रहते हैं, जो उनके वास्तविक ज्ञान को आच्छादित किये रहता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
विभु का अर्थ है, परमेश्र्वर जो असीम ज्ञान, धन, बल, यश, सौन्दर्य तथा त्याग से युक्त है | वह सदैव आत्मतृप्त और पाप-पुण्य से अविचलित रहता है | वह किसी भी जीव के लिए विशिष्ट परिस्थिति नहीं उत्पन्न करता, अपितु जीव अज्ञान से मोहित होकर जीवन के लिए विशिष्ट परिस्थिति की कामना करता है, जिसके कारण कर्म तथा फल की शृंखला आरम्भ होती है | जीव परा प्रकृति के कारण ज्ञान से पूर्ण है | तो भी वह अपनी सीमित शक्ति के कारण अज्ञान के वशीभूत हो जाता है | भगवान् सर्वशक्तिमान् है, किन्तु जीव नहीं है | भगवान् विभु अर्थात् सर्वज्ञ है, किन्तु जीव अणु है | जीवात्मा में इच्छा करने की शक्ति है, किन्तु ऐसी इच्छा की पूर्ति सर्वशक्तिमान भगवान् द्वारा ही की जाती है | अतः जब जीव अपनी इच्छाओं से मोहग्रस्त हो जाता है तो भगवान् उसे अपनी इच्छापूर्ति करने देते हैं, किन्तु किसी परिस्थिति विशेष में इच्छित कर्मों तथा फलों के लिए उत्तरदायी नहीं होते | अतएव मोहग्रस्त होने से देहधारी जीव अपने को परिस्थितिजन्य शरीर मान लेता है और जीवन के क्षणिक दुख तथा सुख को भोगता है | भगवान् परमात्मा रूप में जीव के चिरसंगी रहते हैं, फलतः वे प्रत्येक जीव की इच्छाओं को उसी तरह समझते हैं जिस तरह फूल के निकट रहने वाला फूल की सुगन्ध को | इच्छा जीव को बद्ध करने के लिए सूक्ष्म बन्धन है | भगवान् मनुष्य की योग्यता के अनुसार उसकी इच्छा को पूरा करते हैं – आपन सोची होत नहिं प्रभु सोची तत्काल| अतः व्यक्ति अपनी इच्छाओं को पूरा करने में सर्वशक्तिमान नहीं होता | किन्तु भगवान् इच्छाओं की पूर्ति कर सकते हैं | वे निष्पक्ष होने के कारण स्वतन्त्र अणुजीवों की इच्छाओं में व्यवधान नहीं डालते | किन्तु जब कोई कृष्ण की इच्छा करता है तो भगवान् उसकी विशेष चिन्ता करते हैं और उसे इस प्रकार प्रोत्साहित करते हैं कि भगवान् को प्राप्त करने की उसकीइच्छा पूरी हो और वह सदैव सुखी रहे | अतएव वैदिक मन्त्र पुकार कर कहते हैं – एष उ ह्येव साधु कर्म कारयति तं यमेभ्यो लोकेभ्य उन्निनीषते |एष उ एवासाधु कर्म कारयति यमधो निनीषते – &amp;quot;भगवान् जीव को शुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह ऊपर उठे | भगवान् उसे अशुभ कर्मों में इसीलिए प्रवृत्त करते हैं जिससे वह नरक जाए |&amp;quot; (कौषीतकी उपनिषद् ३.८) |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अज्ञो जन्तुरनीशोऽयमात्मनः सुखदुःखयोः |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्र्वरप्रेरितो गच्छेत् स्वर्गं वाश्र्वभ्रमेव च ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;जीव अपने सुख-दुःख में पूर्णतया आश्रित है | परमेश्र्वर की इच्छा से वह स्वर्ग या नरक जाता है, जिस तरह वायु के द्वारा प्रेरित बादल |&amp;quot;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतः देहधारी जीव कृष्णभावनामृत की उपेक्षा करने की अपनी अनादि प्रवृत्ति के कारण अपने लिए मोह उत्पन्न करता है | फलस्वरूप स्वभावतः सच्चिदानन्द स्वरूप होते हुए भी वह अपने अस्तित्व की लघुता के कारण भगवान् के प्रति सेवा करने की अपनी स्वाभाविक स्थिति भूल जाता है और इस तरह वह अविद्या द्वारा बन्दी बना लिया जाता है | अज्ञानवश जीव यह कहता है कि उसके भवबन्धन के लिए भगवान् उत्तरदायी हैं | इसकी पुष्टि वेदान्त-सूत्र (२.१.३४) भी करते हैं – वैषम्यनैर्घृण्ये न सापेक्षत्वात् तथा हि दर्शयति – &amp;quot;भगवान् न तो किसी के प्रति घृणा करते हैं, न किसी को चाहते हैं, यद्यपि ऊपर से ऐसा प्रतीत होता है |&amp;quot;&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_9.18&amp;diff=612398</id>
		<title>HI/BG 9.18</title>
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		<updated>2024-07-10T04:38:33Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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==== श्लोक 18 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:गतिर्भर्ता प्रभुः साक्षी निवासः शरणं सुहृत् ।&lt;br /&gt;
:प्रभवः प्रलयः स्थानं निधानं बीजमव्ययम् ॥१८॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
गति:—लक्ष्य; भर्ता—पालक; प्रभु:—भगवान्; साक्षी—गवाह; निवास:—धाम; शरणम्—शरण; सु-हृत्—घनिष्ठ मित्र; प्रभव:—सृष्टि; प्रलय:—संहार; स्थानम्—भूमि, स्थिति; निधानम्—आश्रय, विश्राम स्थल; बीजम्—बीज, कारण; अव्ययम्—अविनाशी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मैं ही लक्ष्य, पालनकर्ता, स्वामी, साक्षी, धाम, शरणस्थली तथा अत्यन्तप्रिय मित्र हूँ | मैं सृष्टि तथा प्रलय, सबका आधार, आश्रय तथा अविनाशी बीज भी हूँ|&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
गति का अर्थ है गन्तव्य या लक्ष्य, जहाँ हम जाना चाहते हैं| लेकिन चरमलक्ष्य तो कृष्ण हैं, यद्यपि लोग इसे जानते नहीं | जो कृष्ण को नहींजानता वह पथभ्रष्ट हो जाता है और उसकी तथाकथित प्रगति या तो आंशिक होती है या फिरभ्रमपूर्ण | ऐसे अनेक लोग हैं जो देवताओं को ही अपना लक्ष्य बनाते हैं और तदानुसारकठोर नियमों का पालन करते हुए चन्द्रलोक, सूर्यलोक, इन्द्रलोक, महर्लोक जैसे विभिन्न लोकों को प्राप्त होते हैं | किन्तु ये सारे लोक कृष्ण की ही सृष्टि होनेके कारण कृष्ण हैं और नहीं भी हैं | ऐसे लोक भी कृष्ण की शक्ति की अभिव्यक्तियाँ होने के कारण कृष्ण हैं, किन्तु वस्तुतः वे कृष्ण की अनुभूति की दिशा में सोपान का कार्य करते हैं | कृष्ण की विभिन्न शक्तियों तक पहुँचने का अर्थ है अप्रत्यक्षतःकृष्ण तक पहुँचना | अतः मनुष्य को चाहिए कि कृष्ण तक सीधे पहुँचे, क्योंकि इससे समय तथा शक्ति की बचत होगी | उदाहरणार्थ, यदि किसी ऊँची इमारत की चोटी तक एलीवेटर(लिफ्ट) के द्वारा पहुँचने की सुविधा हो तो फिर एक-एक सीढ़ी करके ऊपर क्यों चढ़ाजाये? सब कुछ कृष्ण की शक्ति पर आश्रित है | प्रत्येक जीव के हृदय में स्थित होनेके कारण कृष्ण परम साक्षी हैं | हमारा घर, देश या लोक जहाँ पर हम रह रहें हैं, सबकुछ कृष्ण का है | शरण के लिए कृष्ण परम गन्तव्य हैं, अतः मनुष्य को चाहिए कि अपनीरक्षा या अपने कष्टों के विनाश के लिए कृष्ण की शरण ग्रहण करे | हम चाहें जहाँ भीशरण लें हमें जानना चाहिए कि हमारा आश्रय कोई जीवित शक्ति होनी चाहिए | कृष्ण परमजीव हैं | चूँकि कृष्ण हमारी उत्पत्ति के कारण या हमारे परमपिता हैं, अतः उनसेबढ़कर न तो कोई मित्र हो सकता है, न शुभचिन्तक | कृष्ण सृष्टि के आदि उद्गम और पलेके पश्चात् परम विश्रामस्थल हैं | अतः कृष्ण सभी कारणों के शाश्र्वत कारण हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_9.15&amp;diff=612397</id>
		<title>HI/BG 9.15</title>
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		<updated>2024-07-10T04:34:05Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 9|H15]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 9| अध्याय ९: परम गुह्य ज्ञान]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 15 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:ज्ञानयज्ञेन चाप्यन्ये यजन्तो मामुपासते ।&lt;br /&gt;
:एकत्वेन पृथक्त्वेन बहुधा विश्वतोमुखम् ॥१५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
ज्ञान-यज्ञेन—ज्ञान के अनुशीलन द्वारा; च—भी; अपि—निश्चय ही; अन्ये—अन्य लोग; यजन्त:—यज्ञ करते हुए; माम्—मुझको; उपासते—पूजते हैं; एकत्वेन—एकान्त भाव से; पृथक्त्वेन—द्वैतभाव से; बहुधा—अनेक प्रकार से; विश्वत:-मुखम्—विश्व रूप में।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अन्य लोग जो ज्ञान के अनुशीलन द्वारा यज्ञ में लगे रहते हैं, वे भगवान् की पूजा उनके अद्वय रूप में, विविध रूपों में तथा विश्र्व रूप में करते हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यह श्लोक पिछले श्लोकों का सारांश है | भगवान् अर्जुन को बताते हैं कि जो विशुद्ध कृष्णभावनामृत में लगे रहते हैं और कृष्ण के अतिरिक्त अन्य किसी को नहीं जानते, वे महात्मा कहलाते हैं | तो भी कुछ लोग ऐसे भी होते हैं जो वास्तव में महात्मा पद को प्राप्त नहीं होते, किन्तु वे भी विभिन्न प्रकारों से कृष्ण की पूजा करते हैं | इनमें से कुछ का वर्णन आर्त, अर्थार्थी, ज्ञानी तथा जिज्ञासु के रूप में किया जा चुका है | किन्तु फिर भी कुछ ऐसे भी लोग होते हैं जो इनसे भी निम्न होते हैं | इन्हें तीन कोटियों में रखा जाता है – १) परमेश्र्वर तथा अपने को एक मानकर पूजा करने वाले, २) परमेश्र्वर के किसी मनोकल्पित रूप की पूजा करने वाले, ३) भगवान् के विश्र्व रूप की पूजा करने वाले | इनमें से सबसे अधम वे हैं जो अपने आपको अद्वैतवादी मानकर अपनी पूजा परमेश्र्वर के रूप में करते हैं और इन्हीं का प्राधान्य भी है | ऐसे लोग अपने को परमेश्र्वर मानते हैं और इस मानसिकता के कारण वे अपनी पूजा आप करते हैं | यह भी एक प्रकार की ईशपूजा है, क्योंकि वे समझते हैं कि वे भौतिक पदार्थ न होकर आत्मा है | कम से कम, ऐसा भाव तो प्रधान रहता है | सामान्यतया निर्विशेषवादी इसी प्रकार से परमेश्र्वर को पूजते हैं | दूसरी कोटि के लोग वे हैं जो देवताओं के उपासक हैं, जो अपनी कल्पना से किसी भी स्वरूप को परमेश्र्वर का स्वरूप मान लेते हैं | तृतीय कोटि में वे लोग आते हैं जो इस ब्रह्माण्ड से परे कुछ भी नहीं सोच पाते | वे ब्रह्माण्ड को ही परम जीव या सत्ता मानकर उसकी उपासना करते हैं | यह ब्रह्माण्ड भी भगवान् का एक स्वरूप है |&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_9.11&amp;diff=612396</id>
		<title>HI/BG 9.11</title>
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		<updated>2024-07-10T04:31:09Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 9|H11]]&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 11 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।&lt;br /&gt;
:परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥११॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अवजानन्ति—उपहास करते हैं; माम्—मुझको; मूढा:—मूर्ख व्यक्ति; मानुषीम्—मनुष्य रूप में; तनुम्—शरीर; आश्रितम्—मानते हुए; परम्—दिव्य; भावम्—स्वभाव को; अजानन्त:—न जानते हुए; मम—मेरा; भूत—प्रत्येक वस्तु का; महा-ईश्वरम्—परम स्वामी।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ, तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं | वे मुझ परमेश्र्वर के दिव्य स्वभाव को नहीं जानते |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस अध्याय के पूर्ववर्ती श्लोकों से यह स्पष्ट है कि यद्यपि भगवान् मनुष्य रूप में प्रकट होते हैं, किन्तु वे सामान्य व्यक्ति नहीं होते | जो भगवान् सारे विराट जगत का सृजन, पालन तथा संहार करता हो वह मनुष्य नहीं हो सकता | तो भी अनेक मुर्ख हैं, जो कृष्ण को शक्तिशाली पुरुष के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते | वस्तुतः वे आदि परमपुरुष हैं, जैसा कि ब्रह्मसंहिता में प्रमाण स्वरूप कहा गया है – ईश्र्वरः परमः कृष्णः– वे परम ईश्र्वर हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्र्वर या नियन्ता अनेक हैं और वे एक दूसरे से बढ़कर प्रतीत होते हैं | भौतिक जगत् में सामान्य प्रबन्धकार्यों का कोई न कोई निर्देशक होता है, जिसके ऊपर एक सचिव होता है, फिर उसके ऊपर मन्त्री तथा अन्य उससे भी ऊपर राष्ट्रपति होता है | इनमें से हर एक नियन्त्रक होता है, किन्तु एक दूसरे के द्वारा नियन्त्रित होता है | ब्रह्मसंहिता में कहा गया है कि कृष्ण परम नियन्ता हैं | निस्सन्देह भौतिक जगत् तथा वैकुण्ठलोक दोनों में ही कई-कई निर्देशक होते हैं, किन्तु कृष्ण परम नियन्ता हैं (ईश्र्वरः परमः कृष्णः) तथा उनका शरीर सच्चिदानन्द रूप अर्थात् अभौतिक होता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछले श्लोकों में जिन अद्भुत कार्यकलापों का वर्णन हुआ है, वे भौतिक शरीर द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकते | कृष्ण का शरीर सच्चिदानन्द रूप है | यद्यपि वे सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, किन्तु मुर्ख लोग उनका उपहास करते हैं और उन्हें मनुष्य मानते हैं | उनका शरीर यहाँ मानुषीम् कहा गया है, क्योंकि वे कुरुक्षेत्र युद्ध में एक राजनीतिज्ञ और अर्जुन के मित्र की भाँति सामान्य व्यक्ति बनकर कर्म करते हैं | वे अनेक प्रकार से सामान्य पुरुष की भाँति कर्म करते हैं, किन्तु उनका शरीर सच्चिदानन्द विग्रह रूप है | इसकी पुष्टि वैदिक साहित्य में भी हुई है | सच्चिदानन्द रूपाय कृष्णाय– मैं भगवान् कृष्ण को नमस्कार करता हूँ जो सच्चिदान्नद रूप हैं (गोपाल तापनी उपनिषद् १.१) | वेदों में ऐसे अन्य वर्णन भी हैं | तमेकं गोविन्दम्– आप इन्द्रियों तथा गायों के आनन्दस्वरूप गोविन्द हैं | सच्चिदान्नदविग्रहम्– तथा आपका रूप सच्चिदान्नद स्वरूप है (गोपाल तापनी उपनिषद् १.३५) |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान् कृष्ण के सच्चिदानन्दस्वरूप होने पर भी ऐसे अनेक तथाकथित विद्वान तथा भगवद्गीता के टीकाकार हैं जो कृष्ण को सामान्य पुरुष कहकर उनका उपहास करते हैं | भले ही अपने पूर्व पुण्यों के कारण विद्वान असाधारण व्यक्ति के रूप में पैदा हुआ हो, किन्तु श्रीकृष्ण के बारे में ऐसी धारणा उसकी अल्पज्ञता के कारण होती है | इसीलिए वह मूढ कहलाता है, क्योंकि मुर्ख पुरुष ही कृष्ण को सामान्य पुरुष मानते हैं | ऐसे मुर्ख पुरुष कृष्ण को सामान्य पुरुष इसीलिए मानते हैं, क्योंकि वे कृष्ण के गुह्य कार्यों तथा उनकी विभिन्न शक्तियों से अपरिचित होते हैं | वे यह नहीं जानते कि कृष्ण का शरीर पूर्णज्ञान तथा आनन्द का प्रतिक है, वे प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं और किसी को भी मुक्ति प्रदान करने वाले हैं | चूँकि वे कृष्ण के इतने सारे दिव्य गुणों को नहीं जानते, इसीलिए उनका उपहास करते हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ये मूढ यह भी नहीं जानते कि इस जगत् में भगवान् का अवतरण उनकी अन्तरंगा शक्ति का प्राकट्य है | वे भौतिक शक्ति (माया) के स्वामी हैं | जैसा कि अनेक स्थलों पर कहा जा चुका है (मम माया दुरत्यया), भगवान् का दावा है कि यद्यपि भौतिक शक्ति अत्यन्त प्रबल है, किन्तु वह उनके वश में रहती है और जो भी उनकी शरण ग्रहण कर लेता है, वह इस माया के वश से बाहर निकल आता है | यदि कृष्ण का शरणागत जीव माया के प्रभाव से बाहर निकल सकता है, तो भला परमेश्र्वर जो सम्पूर्ण विराट जगत् का सृजन, पालन तथा संहारकर्ता है, हम लोगों जैसा शरीर कैसे धारण कर सकता है? अतः कृष्ण विषयक ऐसी धारणा मूर्खतापूर्ण है | फिर भी मुर्ख व्यक्ति यह नहीं समझ सकते कि सामान्य व्यक्ति के रूप में प्रकट होने वाले भगवान् समस्त परमाणुओं तथा इस विराट ब्रह्माण्ड के नियन्ता किस तरह हो सकते हैं | बृहत्तम तथा सूक्ष्मतम तो उनकी विचार शक्ति से परे होते हैं, अतः वे यह सोच भी नहीं सकते कि मनुष्य-जैसा रूप कैसे एक साथ विशाल को तथा अणु को वश में कर सकता है | यद्यपि कृष्ण असीम तथा ससीम को नियन्त्रित करते हैं, किन्तु वे इस जगत् से विलग रहते हैं | उनके योगमैश्र्वरम् या अचिन्त्य दिव्य शक्ति के विषय में कहा गया है कि वे एकसाथ ससीम तथा असीम को वश में रख सकते हैं, किन्तु जो शुद्ध भक्त हैं वे इसे स्वीकार करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि कृष्ण भगवान् हैं | अतः वे पूर्णतया उनकी शरण में जाते हैं और कृष्णभावनामृत में रहकर कृष्ण की भक्ति में अपने को रत रखते हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
सगुणवादियों तथा निर्गुणवादियों में भगवान् के मनुष्य रूप में प्रकट होने को लेकर काफी मतभेद है | किन्तु यदि हम भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत जैसे प्रामाणिक ग्रंथों का अनुशीलन कृष्णतत्त्व समझने के लिए करें तो हम समझ सकते हैं कि कृष्ण श्रीभगवान् हैं | यद्यपि वे इस धराधाम में सामान्य व्यक्ति की भाँति प्रकट हुए थे, किन्तु वे सामान्य व्यक्ति हैं नहीं | श्रीमद्भागवत में &#039;&#039;&#039;([[Vanisource:SB 1.1.20|भागवत १.१.२०]])&#039;&#039;&#039; जब शौनक आदि मुनियों ने सूत गोस्वामी से कृष्ण के कार्यकलापों के विषय में पूछा तो उन्होंने कहा –&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कृतवान् किल कर्माणि सह रामेण केशवः |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अतिमर्त्यानि भगवान् गूढः कपटमानुषः ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;भगवान् श्रीकृष्ण ने बलराम के साथ-साथ मनुष्य की भाँति क्रीड़ा की और इस तरह प्रच्छन्न रूप में उन्होंने अनेक अतिमानवीय कार्य किये |&amp;quot; मनुष्य के रूप में भगवान् का प्राकट्य मुर्ख को मोहित बना देता है | कोई भी मनुष्य उन अलौकिक कार्यों को सम्पन्न नहीं कर सकता जिन्हें उन्होंने इस धरा पर करके दिखा दिया था | जब कृष्ण अपने पिता तथा माता (वसुदेव तथा देवकी) के समक्ष प्रकट हुए तो वे चार भुजाओं से युक्त थे | किन्तु माता-पिता की प्रार्थना पर उन्होंने एक सामान्य शिशु का रूप धारण कर लिया – बभूव प्राकृतः शिशुः &#039;&#039;&#039;([[Vanisource:SB 10.3.46|भागवत १०.३.४६]])&#039;&#039;&#039;| वे एक सामान्य शिशु, एक सामान्य मानव बन गये | यहाँ पर भी यह इंगित होता है कि सामान्य व्यक्ति के रूप में प्रकट होना उनके दिव्य शरीर का एक गुण है | भगवद्गीता के ग्याहरवें अध्याय में भी कहा गया है कि अर्जुन ने कृष्ण से अपना चतुर्भुज रूप दिखलाने के लिए प्रार्थना की (तैनेव रूपेण चतुर्भुजेन) | इस रूप को प्रकट करने के बाद अर्जुन के प्रार्थना करने पर उन्होंने पूर्व मनुष्य रूप धारण कर लिया (मानुषं रूपम्) | भगवान् के ये विभिन्न गुण निश्चय ही सामान्य मनुष्य जैसे नहीं हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कतिपय लोग, जो कृष्ण का उपहास करते हैं और मायावादी दर्शन से प्रभावित होते हैं, श्रीमद्भागवत के निम्नलिखित श्लोक &#039;&#039;&#039;([[Vanisource:SB 3.29.21|३.२९.२१]])&#039;&#039;&#039; को यह सिद्ध करने के लिए उद्धृत करते हैं कि कृष्ण एक सामान्य व्यक्ति थे | अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा– परमेश्र्वर समस्त जीवों में विद्यमान हैं | अच्छा हो कि इस श्लोक को हम जीव गोस्वामी तथा विश्र्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जैसे वैष्णव आचार्यों से ग्रहण करें, न की कृष्ण का उपहास करने वाले अनधिकारी व्यक्तियों की व्याख्याओं से | जीव गोस्वामी इस श्लोक की टीका करते हुए कहते हैं कि कृष्ण समस्त चराचारों में अपने अंश विस्तार परमात्मा के रूप में स्थित हैं | अतः कोई भी नवदीक्षित भक्त जो मन्दिर में भगवान् की अर्चामूर्ति पर ही ध्यान देता है और अन्य जीवों का सम्मान नहीं करता वह वृथा ही मन्दिर में भगवान् की पूजा में लगा रहता है | भगवद्भक्तों के तीन प्रकार हैं, जिनमें से नवदीक्षित सबसे निम्न श्रेणी के हैं | नवदीक्षित भक्त अन्य भक्तों की अपेक्षा मन्दिर के अर्चविग्रह पर अधिक ध्यान देते हैं, अतः विश्र्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर चेतावनी देते हैं कि इस प्रकार की मानसिकता को सुधारना चाहिए | भक्त को समझना चाहिए कि चूँकि कृष्ण परमात्मा रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं, अतः प्रत्येक व्यक्ति परमेश्र्वर का निवास या मन्दिर है, इसीलिए जिस तरह कोई भक्त भगवान् के मन्दिर का सम्मान करता है, वैसे ही उसे प्रत्येक व्यक्ति का समुचित सम्मान करना चाहिए, जिसमें परमात्मा निवास करता है | अतः प्रत्येक व्यक्ति का समुचित सम्मान करना चाहिए,कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसे अनेक निर्विशेषवादी हैं जो मन्दिरपूजा का उपहास करते हैं | वे कहते हैं कि चूँकि भगवान् सर्वत्र हैं तो फिर अपने को हम मन्दिरपूजा तक ही सीमित क्यों रखें? यदि ईश्र्वर सर्वत्र हैं तो क्या वे मन्दिर या अर्चविग्रह में नहीं होंगे? यद्यपि सगुणवादी तथा निर्विशेषवादी निरन्तर लड़ते रहेंगे, किन्तु कृष्णभावनामृत में पूर्ण भक्त यह जानता है कि यद्यपि कृष्ण भगवान् हैं, किन्तु इसके साथ वे सर्वव्यापी भी हैं, जिसकी पुष्टि ब्रह्मसंहिता में हुई है | यद्यपि उनका निजी धाम गोलोक वृन्दावन है और वे वहीँ निरन्तर वास करते हैं , किन्तु वे अपनी शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियों द्वारा तथा अपने स्वांश द्वारा भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् में सर्वत्र विद्यमान रहते हैं |&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_9.11&amp;diff=612395</id>
		<title>HI/BG 9.11</title>
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		<updated>2024-07-10T04:27:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 9|H11]]&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 11 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:अवजानन्ति मां मूढा मानुषीं तनुमाश्रितम् ।&lt;br /&gt;
:परं भावमजानन्तो मम भूतमहेश्वरम् ॥११॥&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
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अवजानन्ति—उपहास करते हैं; माम्—मुझको; मूढा:—मूर्ख व्यक्ति; मानुषीम्—मनुष्य रूप में; तनुम्—शरीर; आश्रितम्—मानते हुए; परम्—दिव्य; भावम्—स्वभाव को; अजानन्त:—न जानते हुए; मम—मेरा; भूत—प्रत्येक वस्तु का; महा-ईश्वरम्—परम स्वामी।&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जब मैं मनुष्य रूप में अवतरित होता हूँ, तो मूर्ख मेरा उपहास करते हैं | वे मुझ परमेश्र्वर के दिव्य स्वभाव को नहीं जानते |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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इस अध्याय के पूर्ववर्ती श्लोकों से यह स्पष्ट है कि यद्यपि भगवान् मनुष्य रूप में प्रकट होते हैं, किन्तु वे सामान्य व्यक्ति नहीं होते | जो भगवान् सारे विराट जगत का सृजन, पालन तथा संहार करता हो वह मनुष्य नहीं हो सकता | तो भी अनेक मुर्ख हैं, जो कृष्ण को शक्तिशाली पुरुष के अतिरिक्त और कुछ नहीं मानते | वस्तुतः वे आदि परमपुरुष हैं, जैसा कि ब्रह्मसंहिता में प्रमाण स्वरूप कहा गया है – ईश्र्वरः परमः कृष्णः– वे परम ईश्र्वर हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ईश्र्वर या नियन्ता अनेक हैं और वे एक दूसरे से बढ़कर प्रतीत होते हैं | भौतिक जगत् में सामान्य प्रबन्धकार्यों का कोई न कोई निर्देशक होता है, जिसके ऊपर एक सचिव होता है, फिर उसके ऊपर मन्त्री तथा अन्य उससे भी ऊपर राष्ट्रपति होता है | इनमें से हर एक नियन्त्रक होता है, किन्तु एक दूसरे के द्वारा नियन्त्रित होता है | ब्रह्मसंहिता में कहा गया है कि कृष्ण परम नियन्ता हैं | निस्सन्देह भौतिक जगत् तथा वैकुण्ठलोक दोनों में ही कई-कई निर्देशक होते हैं, किन्तु कृष्ण परम नियन्ता हैं (ईश्र्वरः परमः कृष्णः) तथा उनका शरीर सच्चिदानन्द रूप अर्थात् अभौतिक होता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
पिछले श्लोकों में जिन अद्भुत कार्यकलापों का वर्णन हुआ है, वे भौतिक शरीर द्वारा सम्पन्न नहीं हो सकते | कृष्ण का शरीर सच्चिदानन्द रूप है | यद्यपि वे सामान्य व्यक्ति नहीं हैं, किन्तु मुर्ख लोग उनका उपहास करते हैं और उन्हें मनुष्य मानते हैं | उनका शरीर यहाँ मानुषीम् कहा गया है, क्योंकि वे कुरुक्षेत्र युद्ध में एक राजनीतिज्ञ और अर्जुन के मित्र की भाँति सामान्य व्यक्ति बनकर कर्म करते हैं | वे अनेक प्रकार से सामान्य पुरुष की भाँति कर्म करते हैं, किन्तु उनका शरीर सच्चिदानन्द विग्रह रूप है | इसकी पुष्टि वैदिक साहित्य में भी हुई है | सच्चिदानन्द रूपाय कृष्णाय– मैं भगवान् कृष्ण को नमस्कार करता हूँ जो सच्चिदान्नद रूप हैं (गोपाल तापनी उपनिषद् १.१) | वेदों में ऐसे अन्य वर्णन भी हैं | तमेकं गोविन्दम्– आप इन्द्रियों तथा गायों के आनन्दस्वरूप गोविन्द हैं | सच्चिदान्नदविग्रहम्– तथा आपका रूप सच्चिदान्नद स्वरूप है (गोपाल तापनी उपनिषद् १.३५) |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवान् कृष्ण के सच्चिदानन्दस्वरूप होने पर भी ऐसे अनेक तथाकथित विद्वान तथा भगवद्गीता के टीकाकार हैं जो कृष्ण को सामान्य पुरुष कहकर उनका उपहास करते हैं | भले ही अपने पूर्व पुण्यों के कारण विद्वान असाधारण व्यक्ति के रूप में पैदा हुआ हो, किन्तु श्रीकृष्ण के बारे में ऐसी धारणा उसकी अल्पज्ञता के कारण होती है | इसीलिए वह मूढ कहलाता है, क्योंकि मुर्ख पुरुष ही कृष्ण को सामान्य पुरुष मानते हैं | ऐसे मुर्ख पुरुष कृष्ण को सामान्य पुरुष इसीलिए मानते हैं, क्योंकि वे कृष्ण के गुह्य कार्यों तथा उनकी विभिन्न शक्तियों से अपरिचित होते हैं | वे यह नहीं जानते कि कृष्ण का शरीर पूर्णज्ञान तथा आनन्द का प्रतिक है, वे प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं और किसी को भी मुक्ति प्रदान करने वाले हैं | चूँकि वे कृष्ण के इतने सारे दिव्य गुणों को नहीं जानते, इसीलिए उनका उपहास करते हैं |&lt;br /&gt;
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ये मूढ यह भी नहीं जानते कि इस जगत् में भगवान् का अवतरण उनकी अन्तरंगा शक्ति का प्राकट्य है | वे भौतिक शक्ति (माया) के स्वामी हैं | जैसा कि अनेक स्थलों पर कहा जा चुका है (मम माया दुरत्यया), भगवान् का दावा है कि यद्यपि भौतिक शक्ति अत्यन्त प्रबल है, किन्तु वह उनके वश में रहती है और जो भी उनकी शरण ग्रहण कर लेता है, वह इस माया के वश से बाहर निकल आता है | यदि कृष्ण का शरणागत जीव माया के प्रभाव से बाहर निकल सकता है, तो भला परमेश्र्वर जो सम्पूर्ण विराट जगत् का सृजन, पालन तथा संहारकर्ता है, हम लोगों जैसा शरीर कैसे धारण कर सकता है? अतः कृष्ण विषयक ऐसी धारणा मूर्खतापूर्ण है | फिर भी मुर्ख व्यक्ति यह नहीं समझ सकते कि सामान्य व्यक्ति के रूप में प्रकट होने वाले भगवान् समस्त परमाणुओं तथा इस विराट ब्रह्माण्ड के नियन्ता किस तरह हो सकते हैं | बृहत्तम तथा सूक्ष्मतम तो उनकी विचार शक्ति से परे होते हैं, अतः वे यह सोच भी नहीं सकते कि मनुष्य-जैसा रूप कैसे एक साथ विशाल को तथा अणु को वश में कर सकता है | यद्यपि कृष्ण असीम तथा ससीम को नियन्त्रित करते हैं, किन्तु वे इस जगत् से विलग रहते हैं | उनके योगमैश्र्वरम् या अचिन्त्य दिव्य शक्ति के विषय में कहा गया है कि वे एकसाथ ससीम तथा असीम को वश में रख सकते हैं, किन्तु जो शुद्ध भक्त हैं वे इसे स्वीकार करते हैं, क्योंकि उन्हें पता है कि कृष्ण भगवान् हैं | अतः वे पूर्णतया उनकी शरण में जाते हैं और कृष्णभावनामृत में रहकर कृष्ण की भक्ति में अपने को रत रखते हैं |&lt;br /&gt;
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सगुणवादियों तथा निर्गुणवादियों में भगवान् के मनुष्य रूप में प्रकट होने को लेकर काफी मतभेद है | किन्तु यदि हम भगवद्गीता तथा श्रीमद्भागवत जैसे प्रामाणिक ग्रंथों का अनुशीलन कृष्णतत्त्व समझने के लिए करें तो हम समझ सकते हैं कि कृष्ण श्रीभगवान् हैं | यद्यपि वे इस धराधाम में सामान्य व्यक्ति की भाँति प्रकट हुए थे, किन्तु वे सामान्य व्यक्ति हैं नहीं | श्रीमद्भागवत में &#039;&#039;&#039;([[Vanisource:SB 1.1.20|भागवत १.१.२०]])&#039;&#039;&#039; जब शौनक आदि मुनियों ने सूत गोस्वामी से कृष्ण के कार्यकलापों के विषय में पूछा तो उन्होंने कहा –&lt;br /&gt;
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कृतवान् किल कर्माणि सह रामेण केशवः |&lt;br /&gt;
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अतिमर्त्यानि भगवान् गूढः कपटमानुषः ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;भगवान् श्रीकृष्ण ने बलराम के साथ-साथ मनुष्य की भाँति क्रीड़ा की और इस तरह प्रच्छन्न रूप में उन्होंने अनेक अतिमानवीय कार्य किये |&amp;quot; मनुष्य के रूप में भगवान् का प्राकट्य मुर्ख को मोहित बना देता है | कोई भी मनुष्य उन अलौकिक कार्यों को सम्पन्न नहीं कर सकता जिन्हें उन्होंने इस धरा पर करके दिखा दिया था | जब कृष्ण अपने पिता तथा माता (वासुदेव तथा देवकी) के समक्ष प्रकट हुए तो वे चार भुजाओं से युक्त थे | किन्तु माता-पिता की प्रार्थना पर उन्होंने एक सामान्य शिशु का रूप धारण कर लिया – बभूव प्राकृतः शिशुः &#039;&#039;&#039;([[Vanisource:SB 10.3.46|भागवत १०.३.४६]])&#039;&#039;&#039;| वे एक सामान्य शिशु, एक सामान्य मानव बन गये | यहाँ पर भी यह इंगित होता है कि सामान्य व्यक्ति के रूप में प्रकट होना उनके दिव्य शरीर का एक गुण है | भगवद्गीता के ग्याहरवें अध्याय में भी कहा गया है कि अर्जुन ने कृष्ण से अपना चतुर्भुज रूप दिखलाने के लिए प्रार्थना की (तैनेव रूपेण चतुर्भुजेन) | इस रूप को प्रकट करने के बाद अर्जुन के प्रार्थना करने पर उन्होंने पूर्व मनुष्य रूप धारण कर लिया (मानुषं रूपम्) | भगवान् के ये विभिन्न गुण निश्चय ही सामान्य मनुष्य जैसे नहीं हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
कतिपय लोग, जो कृष्ण का उपहास करते हैं और मायावादी दर्शन से प्रभावित होते हैं, श्रीमद्भागवत के निम्नलिखित श्लोक &#039;&#039;&#039;([[Vanisource:SB 3.29.21|३.२९.२१]])&#039;&#039;&#039; को यह सिद्ध करने के लिए उद्धृत करते हैं कि कृष्ण एक सामान्य व्यक्ति थे | अहं सर्वेषु भूतेषु भूतात्मावस्थितः सदा– परमेश्र्वर समस्त जीवों में विद्यमान हैं | अच्छा हो कि इस श्लोक को हम जीव गोस्वामी तथा विश्र्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर जैसे वैष्णव आचार्यों से ग्रहण करें, न की कृष्ण का उपहास करने वाले अनधिकारी व्यक्तियों की व्याख्याओं से | जीव गोस्वामी इस श्लोक की टीका करते हुए कहते हैं कि कृष्ण समस्त चराचारों में अपने अंश विस्तार परमात्मा के रूप में स्थित हैं | अतः कोई भी नवदीक्षित भक्त जो मन्दिर में भगवान् की अर्चामूर्ति पर ही ध्यान देता है और अन्य जीवों का सम्मान नहीं करता वह वृथा ही मन्दिर में भगवान् की पूजा में लगा रहता है | भगवद्भक्तों के तीन प्रकार हैं, जिनमें से नवदीक्षित सबसे निम्न श्रेणी के हैं | नवदीक्षित भक्त अन्य भक्तों की अपेक्षा मन्दिर के अर्चविग्रह पर अधिक ध्यान देते हैं, अतः विश्र्वनाथ चक्रवर्ती ठाकुर चेतावनी देते हैं कि इस प्रकार की मानसिकता को सुधारना चाहिए | भक्त को समझना चाहिए कि चूँकि कृष्ण परमात्मा रूप में प्रत्येक जीव के हृदय में विद्यमान हैं, अतः प्रत्येक व्यक्ति परमेश्र्वर का निवास या मन्दिर है, इसीलिए जिस तरह कोई भक्त भगवान् के मन्दिर का सम्मान करता है, वैसे ही उसे प्रत्येक व्यक्ति का समुचित सम्मान करना चाहिए, जिसमें परमात्मा निवास करता है | अतः प्रत्येक व्यक्ति का समुचित सम्मान करना चाहिए,कभी उपेक्षा नहीं करनी चाहिए |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
ऐसे अनेक निर्विशेषवादी हैं जो मन्दिरपूजा का उपहास करते हैं | वे कहते हैं कि चूँकि भगवान् सर्वत्र हैं तो फिर अपने को हम मन्दिरपूजा तक ही सीमित क्यों रखें? यदि ईश्र्वर सर्वत्र हैं तो क्या वे मन्दिर या अर्चविग्रह में नहीं होंगे? यद्यपि सगुणवादी तथा निर्विशेषवादी निरन्तर लड़ते रहेंगे, किन्तु कृष्णभावनामृत में पूर्ण भक्त यह जानता है कि यद्यपि कृष्ण भगवान् हैं, किन्तु इसके साथ वे सर्वव्यापी भी हैं, जिसकी पुष्टि ब्रह्मसंहिता में हुई है | यद्यपि उनका निजी धाम गोलोक वृन्दावन है और वे वहीँ निरन्तर वास करते हैं , किन्तु वे अपनी शक्ति की विभिन्न अभिव्यक्तियों द्वारा तथा अपने स्वांश द्वारा भौतिक तथा आध्यात्मिक जगत् में सर्वत्र विद्यमान रहते हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>HI/BG 9.5</title>
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		<updated>2024-07-10T04:25:00Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 9|H05]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 9| अध्याय ९: परम गुह्य ज्ञान]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 5 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:न च मत्स्थानि भूतानि पश्य मे योगमैश्वरम् ।&lt;br /&gt;
:भूतभृन्न च भूतस्थो ममात्मा भूतभावनः ॥५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
न—कभी नहीं; च—भी; मत्-स्थानि—मुझमें स्थित; भूतानि—सारी सृष्टि; पश्य—देखो; मे—मेरा; योगम् ऐश्वरम्—अचिन्त्य योगशक्ति; भूत-भृत्—समस्त जीवों का पालक; न—नहीं; च—भी; भूत-स्थ:—विराट अभिव्यक्ति में; मम—मेरा; आत्मा—स्व, आत्म; भूत-भावन:—समस्त अभिव्यक्तियों का स्रोत।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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तथापि मेरे द्वारा उत्पन्न सारी वस्तुएँ मुझमें स्थित नहीं रहतीं | जरा, मेरे योग-ऐश्र्वर्य को देखो! यद्यपि मैं समस्त जीवों का पालक (भर्ता) हूँ और सर्वत्र व्याप्त हूँ, लेकिन मैं इस विराट अभिव्यक्ति का अंश नहीं हूँ, मैं सृष्टि का कारणस्वरूप हूँ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान् का कथन है कि सब कुछ उन्हीं पर आश्रित है (मत्स्थानि सर्वभूतानि) | इसका अन्य अर्थ नहीं लगाना चाहिए | भगवान् जगत् के पालन तथा निर्वाह के लिए प्रत्यक्ष रूप से उत्तरदायी नहीं हैं | कभी-कभी हम एटलस (एक रोमन देवता) को अपने कंधों पर गोला उठाये देखते हैं, वह अत्यन्त थका लगता है और इस विशाल पृथ्वीलोक को धारण किये रहता है | हमें किसी ऐसे चित्र को मन में नहीं लाना चाहिए जिसमें कृष्ण का इस सृजित ब्रह्माण्ड को धारण किये हुए हों | उनका कहना है कि यद्यपि सारी वस्तुएँ उन पर टिकी हैं, किन्तु वे पृथक् रहते हैं | सारे लोक अन्तरिक्ष में तैर रहें हैं और यह अन्तरिक्ष परमेश्र्वर की शक्ति है | किन्तु वे अन्तरिक्ष से भिन्न हैं, वे पृथक् स्थित हैं | अतः भगवान् कहते हैं &amp;quot;यद्यपि ये सब रचित पदार्थ मेरी अचिन्त्य शक्ति पर टिके हैं, किन्तु भगवान् के रूप में मैं उनसे पृथक् हूँ |&amp;quot; यह भगवान् का अचिन्त्य ऐश्र्वर्य है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिककोश निरुक्ति में कहा गया है – युज्यतेऽनेन दुर्घटेषु कार्येषु– परमेश्र्वर अपनी शक्ति का प्रदर्शन करते हुए अचिन्त्य आश्चर्यजनक लीलाएँ कर रहे हैं | उनका व्यक्तित्व विभिन्न शक्तियों से पूर्ण है और उनका संकल्प स्वयं एक तथ्य है | भगवान् को इसी रूप में समझना चाहिए | हम कोई काम करना चाहते हैं, तो अनेक विघ्न आते हैं और कभी-कभी हम जो चाहते हैं वह नहीं कर पाते | किन्तु जब कृष्ण कोई कार्य करना चाहते हैं, तो सब कुछ इतनी पूर्णता से सम्पन्न हो जाता है कि कोई सोच नहीं पाता कि यह सब कैसे हुआ | भगवान् इसी तथ्य को समझाते हैं – यद्यपि वे समस्त सृष्टि के पालन तथा धारणकर्ता हैं, किन्तु वे इस सृष्टि का स्पर्श नहीं करते | केवल उनकी परम इच्छा से प्रत्येक वस्तु सृजन, धारण, पालन एवं संहार होता है | उनके मन और स्वयं उनमें कोई भेद नहीं है जैसा हमारे भौतिक मन में और स्वयं हम में भेद होता है, क्योंकि वे परमात्मा हैं | साथ ही वे प्रत्येक वस्तु में उपस्थित हैं, किन्तु सामान्य व्यक्ति यह नहीं समझ पाता कि वे साकार रूप में किस तरह उपस्थित हैं | वे भौतिक जगत् से भिन्न हैं तो भी प्रत्येक वस्तु उन्हीं पर आश्रित है | यहाँ पर इसे ही योगम् ऐश्र्वरम् अर्थात् भगवान् की योगशक्ति कहा गया है |&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_9.3&amp;diff=612393</id>
		<title>HI/BG 9.3</title>
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		<updated>2024-07-10T04:19:58Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 9|H03]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 9| अध्याय ९: परम गुह्य ज्ञान]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 3 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:अश्रद्दधानाः पुरुषा धर्मस्यास्य परन्तप ।&lt;br /&gt;
:अप्राप्य मां निवर्तन्ते मृत्युसंसारवर्त्मनि ॥३॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अश्रद्दधाना:—श्रद्धाविहीन; पुरुषा:—पुरुष; धर्मस्य—धर्म के प्रति; अस्य—इस; परन्तप—हे शत्रुहन्ता; अप्राह्रश्वय—बिना प्राह्रश्वत किये; माम्—मुझको; निवर्तन्ते—लौटते हैं; मृत्यु—मृत्यु के; संसार—संसार में; वत्र्मनि—पथ में।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
हे परन्तप! जो लोग भक्ति में श्रद्धा नहीं रखते, वे मुझे प्राह्रश्वत नहीं कर पाते। अत: वे इस भौतिक जगत् में जन्म-मृत्यु के मार्ग पर वापस आते रहते हैं।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रद्धाविहीन के लिए भक्तियोग पाना कठिन है, यही इस श्लोक का तातपर्य है | श्रद्धा तो भक्तों की संगति से उत्पन्न की जाती है | महापुरुषों से वैदिक प्रमाणों को सुनकर भी अभागे लोग ईश्र्वर में श्रद्धा नहीं रखते | वे झिझकते रहते हैं और भगवद्भक्ति में दृढ़ नहीं रहते | इस प्रकार कृष्णभावनामृत की प्रगति में श्रद्धा मुख्य है | चैतन्यचरितामृत में कहा गया है कि श्रद्धा तो वह पूर्ण विश्र्वास है कि परमेश्र्वर श्रीकृष्ण की ही सेवा द्वारा सारी सिद्धि प्राप्त की जा सकती है | यही वास्तविक श्रद्धा है | श्रीमद्भागवत में &#039;&#039;&#039;([[Vanisource:SB 4.31.14|४.३१.१४]])&#039;&#039;&#039; कहा गया है:-&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यथा तरोर्मूलनिषेचनेन तृप्यन्ति तत्स्कंधभुजोपशाखाः |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
प्राणोपहाराच्च यथेन्द्रियाणां तथेव सर्वार्हणमच्युतेज्या ||&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;quot;वृक्ष की जड़ को सींचने से उसकी डालें, टहनियाँ तथा पत्तियाँ तुष्ट होती हैं और आमाशय को भोजन प्रदान करने से शरीर की सारी इन्द्रियाँ तृप्त होती हैं | इसी तरह भगवान् की दिव्यसेवा करने से सारे देवता तथा अन्य समस्त जीव स्वतः प्रसन्न होते हैं |&amp;quot; अतः गीता पढ़ने के बाद मनुष्य को चाहिए कि वह गीता के इस निष्कर्ष को प्राप्त हो-मनुष्य को अन्य सारे कार्य छोड़कर भगवान् कृष्ण की सेवा करनी चाहिए | यदि वह इस जीवन-दर्शन से विश्र्वस्त हो जाता है, तो यही श्रद्धा हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस श्रद्धा का विकास कृष्णभावनामृत की विधि है | कृष्णभावनाभावित व्यक्तियों की तीन कोटियाँ हैं | तीसरी कोटि में वे लोग आते हैं जो श्रद्धाविहीन हैं | यदि ऐसे लोग ऊपर-ऊपर भक्ति में लगे रहें तो भी उन्हें सिद्द अवस्था प्राप्त नहीं हो पाती | सम्भावना यही है कि वे लोग कुछ काल के बाद नीचे गिर जाएँ | वे भले ही भक्ति में लगे रहें, किन्तु पूर्ण विश्र्वास तथा श्रद्धा के अभाव में कृष्णभावनामृत में उनका लगा रह पाना कठिन है | अपने प्रचार कार्यों के दौरान हमें इसका प्रत्यक्ष अनुभव है कि कुछ लोग आते हैं और किन्हीं गुप्त उद्देश्यों से कृष्णभावनामृत को ग्रहण करते हैं | किन्तु जैसे ही उनकी आर्थिक दशा कुछ सुधर जाती है कि वे इस विधि को त्यागकर पुनः पुराने ढरें पर लग जाते हैं | कृष्णभावनामृत में केवल श्रद्धा के द्वारा ही प्रगति की जा सकती है | जहाँ तक श्रद्धा की बात है, जो व्यक्ति भक्ति-साहित्य में निपुण है और जिसने दृढ़ श्रद्धा की अवस्था प्राप्त कर ली है, वह कृष्णभावनामृत का प्रथम कोटि का व्यक्ति कहलाता है | दूसरी कोटि में वे व्यक्ति आते हैं जिन्हें भक्ति-शास्त्रों का ज्ञान नहीं है, किन्तु स्वतः ही उनकीदृढ़ श्रद्धा है कि कृष्णभक्ति सर्वश्रेष्ठ मार्ग है, अतः वे इसे ग्रहण करते हैं | तृतीय कोटि के व्यक्ति को यह श्रद्धा तो रहती है कि कृष्ण की भक्ति उत्तम होती है, किन्तु भागवत तथा गीता जैसे शास्त्रों से उसे कृष्ण का पर्याप्त ज्ञान प्राप्त नहीं हो पता | कभी-कभी तृतीय कोटि के व्यक्तियों की प्रवृत्ति कर्मयोग तथा ज्ञानयोग की ओर रहती है और कभी-कभी वे विचलित होते रहते हैं, किन्तु ज्योंही उनसे ज्ञान तथा कर्मयोग का संदूषण निकल जाता है, वे कृष्णभावनामिट की द्वितीय कोटि या प्रथम कोटि में प्रविष्ट होते हैं | कृष्ण के प्रति श्रद्धा भी तीन अवस्थाओं में विभाजित है और श्रीमद्भागवत में इनका वर्णन है | भागवत के ग्यारहवें स्कंध में प्रथम, द्वितीय तथा तृतीय कोटि की आस्तिकता का भी वर्णन हुआ है | जो लोग कृष्ण के विषय में तथा भक्ति की श्रेष्ठता को सुनकर भी श्रद्धा नहीं रखते और यह सोचते हैं कि यह मात्र प्रशंसा है, उन्हें यह मार्ग अत्यधिक कठिन जान पड़ता है, भले ही वे ऊपर से भक्ति में रत क्यों न हों | उन्हें सिद्धि प्राप्त होने की बहुत कम आशा है | इस प्रकार भक्ति करने के लिए श्रद्धा परमावश्यक है |&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_8.28&amp;diff=612392</id>
		<title>HI/BG 8.28</title>
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		<updated>2024-07-10T04:11:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 8|H28]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 8| अध्याय ८: भगवत्प्राप्ति]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 8.27| BG 8.27]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 8.27|BG 8.27]] - [[HI/BG 9.1|BG 9.1]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 9.1| BG 9.1]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 28 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:वेदेषु यज्ञेषु तपःसु चैव&lt;br /&gt;
:दानेषु यत्पुण्यफलं प्रदिष्टम् ।&lt;br /&gt;
:अत्येति तत्सर्वमिदं विदित्वा&lt;br /&gt;
:योगी परं स्थानमुपैति चाद्यम् ॥२८॥&lt;br /&gt;
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&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
वेदेषु—वेदाध्ययन में; यज्ञेषु—यज्ञ सम्पन्न करने में; तप:सु—विभिन्न प्रकार की तपस्याएँ करने में; च—भी; एव—निश्चय ही; दानेषु—दान देने में; यत्—जो; पुण्यफ लम्—पुण्यकर्म का फल; प्रदिष्टम्—सूचित; अत्येति—लाँघ जाता है; तत् सर्वम्—वे सब; इदम्—यह; विदित्वा—जानकर; योगी—योगी; परम्—परम; स्थानम्—धाम को; उपैति—प्राह्रश्वत करता है; च—भी; आद्यम्—मूल, आदि।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो व्यक्ति भक्तिमार्ग स्वीकार करता है, वह वेदाध्ययन, तपस्या, दान, दार्शनिक तथा सकाम कर्म करने से प्राप्त होने वाले फलों से वंचित नहीं होता | वह मात्र भक्ति सम्पन्न करके इन समस्त फलों की प्राप्ति करता है और अन्त में परम नित्यधाम को प्राप्त होता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यह श्लोक सातवें तथा आठवें अध्यायों का उपसंहार है, जिनमे कृष्णभावनामृत तथा भक्ति का विशेष वर्णन है | मनुष्य को अपने गुरु के निर्देशन में वेदाध्ययन करना होता है, उन्हीं के आश्रम में रहते हुए तपस्या करनी होती है | ब्रह्मचारी को गुरु के घर में एक दास की भाँति रहना पड़ता है और द्वार-द्वार भिक्षा माँगकर गुरु के पास लाना होता है | उसे गुरु के उपदेश पर ही भोजन करना होता है और यदि किसी दिन गुरु शिष्य को भोजन करने के लिए बुलाना भूल जाय तो शिष्य को उपवास करना होता है | ब्रह्मचर्य पालन के ये कुछ वैदिक नियम हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने गुरु के आश्रम में जब छात्र पाँच से बीस वर्ष तक वेदों का अध्ययन कर लेता है तो वह परम चरित्रवान बन जाता है | वेदों का अध्ययन मनोधर्मियों के मनोरंजन के लिए नहीं, अपितु चरित्र-निर्माण के लिए है | इस प्रशिक्षण के बाद ब्रह्मचारी को गृहस्थ जीवन में प्रवेश करके विवाह करने की अनुमति दी जाती है | गृहस्थ के रूप में उसे अनेक यज्ञ करने होते हैं, जिससे वह आगे उन्नति कर सके | उसे देश, काल तथा पात्र के अनुसार तथा सात्त्विक, राजसिक तथा तामसिक दान में अन्तर करते हुए दान देना होता है, जैसा कि भगवद्गीता में वर्णित है | गृहस्थ जीवन के बाद वानप्रस्थ आश्रम ग्रहण करना पड़ता है, जिसमें उसे जंगल में रहते हुए वृक्ष की छाल पहन कर और क्षौर कर्म आदि किये बिना कठिन तपस्या करनी होती है इस प्रकार मनुष्य ब्रह्मचर्य, गृहस्थ, वानप्रस्थ तथा अन्त में संन्यास आश्रम का पालन करते हुए जीवन की सिद्धावस्था को प्राप्त होता है | तब इनमें से कुछ स्वर्गलोक को जाते हैं और यदि वे और अधिक उन्नति करते हैं तो अधिक उच्च्लोकों को या तो निर्विशेष ब्रह्मज्योति, या वैकुण्ठलोक या कृष्णलोक को जाते हैं | वैदिक ग्रंथों में इसी मार्ग की रूपरेखा प्राप्त होती है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु कृष्णभावनामृत की विशेषता यह है कि मनुष्य एक ही झटके में भक्ति करने के कारण मनुष्य जीवन के विभिन्न आश्रमों के अनुष्ठानों को पार कर जाता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इदं विदित्वा शब्द सूचित करते हैं कि मनुष्य को भगवद्गीता के इस अध्याय में तथा सातवें अध्याय में दिये हुए कृष्ण के उपदेशों को समझना चाहिए | उसे विद्वता या मनोधर्म से इस दोनों अध्यायों को समझने का प्रयास नहीं करना चाहिए, अपितु भक्तों की संगति से श्रवण करके समझना चाहिए | सातवें से लेकर बारहवें तक के अध्याय भगवद्गीता के सार रूप हैं | प्रथम छह अध्याय तथा अन्तिम छह अध्याय इन मध्यवर्ती छहों अध्यायों के लिए आवरण पात्र हैं जिनकी सुरक्षा भगवान् करते हैं | यदि कोई गीता के इन छह अध्यायों को भक्त की संगति में भलीभाँति समझ लेता है तो उसका जीवन समस्त तपस्याओं, यज्ञों, दानों, चिन्तनों को पार करके महिमा-मण्डित हो उठेगा, क्योंकि केवल कृष्णभावनामृत के द्वारा उसे इतने कर्मों का फल प्राप्त हो जाता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
जिसे भगवद्गीता में तनिक भी श्रद्धा नहीं है, उसे किसी भक्त से भगवद्गीता समझनी चाहिए, क्योंकि चौथे अध्याय के प्रारम्भ में ही कहा गया है कि केवल भक्तगण ही गीता को समझ सकते हैं, अन्य कोई भी भगवद्गीता के अभिप्राय को नहीं समझ सकता | अतः मनुष्य को चाहिए कि वह किसी भक्त से भगवद्गीता पढ़े; मनोधर्मियों से नहीं | यह श्रद्धा का सूचक है | जब भक्त की खोज की जाती है और अन्ततः भक्त की संगति प्राप्त हो जाती है, उसी क्षण से भगवद्गीता का वास्तविक अध्ययन तथा उसका ज्ञान प्रारम्भ हो जाता है | भक्त की संगति से भक्ति आती है और भक्ति के कारण कृष्ण या ईश्र्वर तथा कृष्ण के कार्यकलापों, उनके रूप, नाम, लीलाओं आदि से संबंधित सारे भ्रम दूर हो जाते हैं | इस प्रकार भ्रमों के दूर हो जाने पर वह अपने अध्ययन में स्थिर हो जाता है | तब उसे भगवद्गीता के अध्ययन में रस आने लगता है और कृष्णभावनाभावित होने की अनुभूति होने लगती है | आगे बढ़ने पर वह कृष्ण के प्रेम में पूर्णतया अनुरक्त हो जाता है | यह जीवन की सर्वोच्च सिद्ध अवस्था है, जिससे भक्त कृष्ण के धाम गोलोक वृन्दावन को प्राप्त होता है, जहाँ वह नित्य सुखी रहता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
इस प्रकार श्रीमद्भगवद्गीता के आठवें अध्याय &amp;quot;भगवत्प्राप्ति&amp;quot; का भक्तिवेदान्त तात्पर्य पूर्ण हुआ |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
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		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_8.3&amp;diff=612391</id>
		<title>HI/BG 8.3</title>
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		<updated>2024-07-10T04:03:54Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 8|H03]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 8| अध्याय ८: भगवत्प्राप्ति]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 8.2| BG 8.2]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 8.2|BG 8.2]] - [[HI/BG 8.4|BG 8.4]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 8.4| BG 8.4]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 3 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:श्रीभगवानुवाच &lt;br /&gt;
:अक्षरं ब्रह्म परमं स्वभावोऽध्यात्ममुच्यते ।&lt;br /&gt;
:भूतभावोद्भवकरो विसर्गः कर्मसंज्ञितः ॥३॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री-भगवान् उवाच—भगवान् ने कहा; अक्षरम्—अविनाशी; ब्रह्म—ब्रह्म; परमम्—दिव्य; स्वभाव:—सनातन प्रकृति; अध्यात्मम्—आत्मा; उच्यते—कहलाता है; भूतभाव-उद्भव-कर:—जीवों के भौतिक शरीर को उत्पन्न करने वाला; विसर्ग:—सृष्टि; कर्म—सकाम कर्म; संज्ञित:—कहलाता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
भगवान् ने कहा – अविनाशी और दिव्य जीव ब्रह्म कहलाता है और उसका नित्य स्वभाव अध्यात्म या आत्म कहलाता है | जीवों के भौतिक शरीर से सम्बन्धित गतिविधि कर्म या सकाम कर्म कहलाती है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
ब्रह्म अविनाशी तथा नित्य और इसका विधान कभी भी नहीं बदलता | किन्तु ब्रह्म से परे परब्रह्म होता है | ब्रह्म का अर्थ है जीव और परब्रह्म का अर्थ भगवान् है | जीव का स्वरूप भौतिक जगत् में उसकी स्थिति से भिन्न होता है | भौतिक चेतना में उसका स्वभाव पदार्थ पर प्रभुत्व जताना है, किन्तु आध्यात्मिक चेतना या कृष्णभावनामृत में उसकी स्थिति परमेश्र्वर की सेवा करना है | जब जीव भौतिक चेतना में होता है तो उसे इस संसार में विभिन्न प्रकार के शरीर धारण करने पड़ते हैं | यह भौतिक चेतना के कारण कर्म अथवा विविध सृष्टि कहलाता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
वैदिक साहित्य में जीव को जीवात्मा तथा ब्रह्म कहा जाता है, किन्तु उसे कभी परब्रह्म नहीं कहा जाता | जीवात्मा विभिन्न स्थितियाँ ग्रहण करता है – कभी वह अन्धकार पूर्ण भौतिक प्रकृति में मिल जाता है और पदार्थ को अपना स्वरूप मान लेता है तो कभी वह परा आध्यात्मिक प्रकृति के साथ मिल जाता है | इसीलिए वह परमेश्र्वर की तटस्था शक्ति कहलाता है | भौतिक या आध्यात्मिक प्रकृति के साथ अपनी पहचान के अनुसार ही उसे भौतिक या आध्यात्मिक शरीर प्राप्त होता है | भौतिक प्रकृति में वह चौरासी लाख योनियों में से कोई भी शरीर धारण कर सकता है, किन्तु आध्यात्मिक प्रकृति में उसका एक ही शरीर होता है | भौतिक प्रकृति में वह अपने कर्म अनुसार कभी मनुष्य रूप में प्रकट होता है तो कभी देवता, पशु, पक्षी आदि के रूप में प्रकट होता है | स्वर्गलोक की प्राप्ति तथा वहाँ का सुख भोगने की इच्छा से वह कभी-कभी यज्ञ सम्पन्न करता है, किन्तु जब उसका पुण्य क्षीण हो जाता है तो वह पुनः मनुष्य रूप में पृथ्वी पर वापस आ जाता है | यह प्रक्रिया कर्म कहलाती है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
छांदोग्य उपनिषद् में वैदिक यज्ञ-अनुष्ठानों का वर्णन मिलता है | यज्ञ की वेदी में पाँच अग्नियों को पाँच प्रकार की आहुतियाँ दी जाती हैं | ये पाँच अग्नियाँ स्वर्गलोक, बादल, पृथ्वी, मनुष्य तथा स्त्री रूप मानी जाती हैं और श्रद्धा, सोम, वर्षा, अन्न तथा वीर्य ये पाँच प्रकार की आहुतियाँ हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यज्ञ प्रक्रिया में जीव अभीष्ट स्वर्गलोकों की प्राप्ति के लिए विशेष यज्ञ करता है और उन्हें प्राप्त करता है | जब यज्ञ का पुण्य क्षीण हो जाता है तो वह पृथ्वी पर वर्षा के रूप में उतरता है और अन्न का रूप ग्रहण करता है | इस अन्न को मनुष्य खाता है जिससे यह वीर्य में परिणत होता है जो स्त्री के गर्भ में जाकर फिर से मनुष्य का रूप धारण करता है | यह मनुष्य पुनः यज्ञ करता है और पुनः वही चक्र चलता है | इस प्रकार जीव शाश्र्वत रीति से आता और जाता रहता है | किन्तु कृष्णभावनाभावित पुरुष ऐसे यज्ञों से दूर रहता है | वह सीधे कृष्णभावनामृत ग्रहण करता है और इस प्रकार ईश्र्वर के पास वापस जाने की तैयारी करता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
भगवद्गीता के निर्विशेषवादी भाष्यकार बिना कारण के कल्पना करते हैं कि इस जगत् में ब्रह्म जीव का रूप धारण करता है और इसके समर्थन में वे गीता के पँद्रहवें अध्याय के सातवें श्लोक को उद्धृत करते हैं | किन्तु इस श्लोक में भगवान् जीव को &amp;quot;मेरा शाश्र्वत अंश&amp;quot; भी कहते हैं | भगवान् का यह अंश, जीव, भले ही भौतिक जगत् में आ गिरता है, किन्तु परमेश्र्वर (अच्युत) कभी नीचे नहीं गिरता | अतः यह विचार कि ब्रह्म जीव का रूप धारण करता है ग्राह्य नहीं है | यह स्मरण रखना होगा कि वैदिक साहित्य में ब्रह्म (जीवात्मा) को परब्रह्म (परमेश्र्वर) से पृथक् माना जाता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.7&amp;diff=609388</id>
		<title>HI/BG 5.7</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.7&amp;diff=609388"/>
		<updated>2024-02-28T07:16:15Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 5|H07]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 5| अध्याय ५: कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 5.6| BG 5.6]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 5.6|BG 5.6]] - [[HI/BG 5.8-9|BG 5.8-9]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 5.8-9| BG 5.8-9]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 7 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:योगयुक्तो विशुद्धात्मा विजितात्मा जितेन्द्रियः ।&lt;br /&gt;
:सर्वभूतात्मभूतात्मा कुर्वन्नपि न लिप्यते ॥७॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
योग-युक्त:—भक्ति में लगे हुए; विशुद्ध-आत्मा—शुद्ध आत्मा; विजित-आत्मा—आत्म-संयमी; जित-इन्द्रिय:—इन्द्रियों को जीतने वाला; सर्व-भूत—समस्त जीवों के प्रति; आत्म-भूत-आत्मा—दयालु; कुर्वन् अपि—कर्म में लगे रहकर भी; न—कभी नहीं; लिह्रश्वयते—बँधता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो भक्तिभाव में कर्म करता है, जो विशुद्ध आत्मा है और अपने मन तथा इन्द्रियों को वश में रखता है, वह सबों को प्रिय होता है और सभी लोग उसे प्रिय होते हैं | ऐसा व्यक्ति कर्म करता हुआ भी कभी नहीं बँधता |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो कृष्णभावनामृत के कारण मुक्तिपथ पर है वह प्रत्येक जीव को प्रिय होता है और प्रत्येक जीव उसके लिए प्यारा है | यह कृष्णभावनामृत के कारण होता है | ऐसा व्यक्ति किसी भी जीव को कृष्ण के पृथक् नहीं सोच पाता, जिस प्रकार वृक्ष की पत्तियाँ तथा टहनियाँ वृक्ष से भिन्न नहीं होती | वह भलीभाँति जानता है कि वृक्ष की पत्तियाँ तथा टहनियाँ वृक्ष से भिन्न नहीं होतीं | वह भलीभाँति जानता है कि वृक्ष की जड़ में डाला गया जल समस्त पत्तियों तथा टहनियों में फैल जाता है अथवा आमाशय को भोजन देने से शक्ति स्वतः पूरे शरीर में फैल जाती है | चूँकि कृष्णभावनामृत में कर्म करने वाला सबों का दास होता है, अतः वह हर एक को प्रिय होता है | चूँकि प्रत्येक व्यक्ति उसके कर्म से प्रसन्न रहता है, अतः उसकी चेतना शुद्ध रहती है | चूँकि उसकी चेतना शुद्ध रहती है, अतः उसका मन पूर्णतया नियंत्रण में रहता है | मन के नियंत्रित होने से उसकी इन्द्रियाँ संयमित रहती है | चूँकि उसका मन सदैव कृष्ण में स्थिर रहता है, अतः उसके विचलित होने का प्रश्न ही नहीं उठता | न ही उसे कृष्ण से सम्बद्ध कथाओं के अतिरिक्त अन्य कार्यों में अपनी इन्द्रियों को लगाने का अवसर मिलता है | वह कृष्णकथा के अतिरिक्त और कुछ सुनना नहीं चाहता, वह कृष्ण को अर्पित किए हुआ भोजन के अतिरिक्त अन्य कुछ नहीं खाना चाहता और न ऐसे किसी स्थान में जाने की इच्छा रखता है जहाँ कृष्ण सम्बन्धी कार्य न होता हो | अतः उसकी इन्द्रियाँ वश में रहती हैं | ऐसा व्यक्ति जिसकी इन्द्रियाँ संयमित हो, वह किसी के प्रति अपराध नहीं कर सकता | इस पर कोई यह प्रश्न कर सकता है, तो फिर अर्जुन अन्यों के प्रति युद्ध में आक्रामक क्यों था? क्या वह कृष्णभावनाभावित नहीं था? वस्तुतः अर्जुन ऊपर से ही आक्रामक था, क्योंकि जैसा कि द्वितीय अध्याय में बताया जा चुका है, आत्मा के अवध्य होने के कारण युद्धभूमि में एकत्र हुए सारे व्यक्ति अपने-अपने स्वरूप में जीवित बने रहेंगे | अतः अध्यात्मिक दृष्टि से कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में कोई मारा नहीं गया | वहाँ पर स्थित कृष्ण की आज्ञा से केवल उनके वस्त्र बदल दिये गये | अतः अर्जुन कुरुक्षेत्र की युद्धभूमि में युद्ध करता हुआ भी वस्तुतः युद्ध नहीं कर रहा था | वह तो पूर्ण कृष्णभावनामृत में कृष्ण के आदेश का पालन मात्र कर रहा था | ऐसा व्यक्ति कभी कर्मबन्धन से नहीं बँधता |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_5.10&amp;diff=609387</id>
		<title>HI/BG 5.10</title>
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		<updated>2024-02-28T07:14:24Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 5|H10]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 5| अध्याय ५: कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 10 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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:ब्रह्मण्याधाय कर्माणि सङ्गं त्यक्त्वा करोति यः ।&lt;br /&gt;
:लिप्यते न स पापेन पद्मपत्रमिवाम्भसा ॥१०॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
ब्रह्मणि—भगवान् में; आधाय—समॢपत करके; कर्माणि—सारे कार्यों को; सङ्गम्—आसक्ति; त्यक्त्वा—त्यागकर; करोति—करता है; य:—जो; लिह्रश्वयते—प्रभावित होता है; न—कभी नहीं; स:—वह; पापेन—पाप से; पद्म-पत्रम्—कमल पत्र; इव—के स²श; अम्भसा—जल के द्वारा।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो व्यक्ति कर्मफलों को परमेश्र्वर को समर्पित करके आसक्तिरहित होकर अपना कर्म करता है, वह पापकर्मों से उसी प्रकार अप्रभावित रहता है, जिस प्रकार कमलपत्र जल से अस्पृश्य रहता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यहाँ पर ब्रह्मणि का अर्थ &amp;quot;कृष्णभावनामृत में&amp;quot; है | यह भौतिक जगत् प्रकृति के तीन गुणों की समग्र अभिव्यक्ति है जिसे प्रधान की संज्ञा दी जाती है | वेदमन्त्र सर्वं ह्येतद्ब्रह्म (माण्डूक्य उपनिषद् २), तस्माद् एतद्ब्रह्म नामरूपमन्नं च जायते (मुण्डक उपनिषद् १.२.१०) तथा भगवद्गीता में &#039;&#039;&#039;([[HI/BG 14.3|१४.३]])&#039;&#039;&#039; मम योनिर्महद्ब्रह्म से प्रकट है कि जगत् की प्रत्येक वस्तु ब्रह्म की अभिव्यक्ति है और यद्यपि कार्य भिन्न-भिन्न रूप में प्रकट होते हैं, किन्तु तो भी वे कारण से अभिन्न हैं | इशोपनिषद् में कहा गया है कि सारी वस्तुएँ परब्रह्म या कृष्ण से सम्बन्धित हैं, अतएव वे केवल उन्हीं की हैं | जो यह भलीभाँति जानता है कि प्रत्येक वस्तु कृष्ण की है और वे ही प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं अतः प्रत्येक वस्तु भगवान् की सेवा में ही नियोजित है, उसे स्वभावतः शुभ-अशुभ कर्मफलों से कोई प्रयोजन नहीं रहता | यहाँ तक कि विशेष प्रकार का कर्म सम्पन्न करने के लिए भगवान् द्वारा प्रदत्त मनुष्य का शरीर भी कृष्णभावनामृत में संलग्न किया जा सकता है | तब यह पापकर्मों के कल्मष से वैसे ही परे रहता है जैसे कि कमलपत्र जल में रहकर भी भीगता नहीं | भगवान् गीता &#039;&#039;&#039;([[HI/BG 3.30|३.३०]])&#039;&#039;&#039; में भी कहते है – मयि सर्वाणि कर्माणि संन्यस्य– सम्पूर्ण कर्मों को मुझे (कृष्ण को) समर्पित करो | तात्पर्य यह है कि कृष्णभावनामृत-विहीन पुरुष शरीर एवं इन्द्रियों को अपना स्वरूप समझ कर कर्म करता है, किन्तु कृष्णभावनाभावित व्यक्ति यह समझ कर कर्म करता है कि वह देह कृष्ण की सम्पत्ति है, अतः इसे कृष्ण की सेवा में प्रवृत्त होना चाहिए |&lt;br /&gt;
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__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_4.4&amp;diff=608586</id>
		<title>HI/BG 4.4</title>
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		<updated>2024-02-05T08:22:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 4|H04]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 4| अध्याय ४: दिव्य ज्ञान]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 4.3| BG 4.3]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 4.3|BG 4.3]] - [[HI/BG 4.5|BG 4.5]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 4.5| BG 4.5]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 4 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:अर्जुन उवाच&lt;br /&gt;
:अपरं भवतो जन्म परं जन्म विवस्वतः ।&lt;br /&gt;
:कथमेतद्विजानीयां त्वमादौ प्रोक्तवानिति ॥४॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्जुन: उवाच—अर्जुन ने कहा; अपरम्—अर्वाचीन, कनिष्ठ; भवत:—आपका; जन्म—जन्म; परम्—श्रेष्ठ (ज्येष्ठ) ; जन्म—जन्म; विवस्वत:—सूर्यदेव का; कथम्—कैसे; एतत्—यह; विजानीयाम्—मैं समझूँ; त्वम्—तुमने; आदौ—प्रारम्भ में; प्रोक्तवान्—उपदेश दिया; इति—इस प्रकार।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
अर्जुन ने कहा – सूर्यदेव विवस्वान् आप से पहले हो चुके (ज्येष्ठ) हैं, तो फिर मैं कैसे समझूँ कि प्रारम्भ में भी आपने उन्हें इस विद्या का उपदेश दिया था |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जब अर्जुन भगवान् के माने हुए भक्त हैं तो फिर उन्हें कृष्ण के वचनों पर विश्र्वास क्यों नहीं हो रहा था ? तथ्य यह है कि अर्जुन यह जिज्ञासा अपने लिए नहीं कर रहा है, अपितु यह जिज्ञासा उन सबों के लिए है, जो भगवान् में विश्र्वास नहीं करते, अथवा उन असुरों के लिए है, जिन्हें यह विचार पसन्द नहीं है कि कृष्ण को भगवान् माना जाय | उन्हीं के लिए अर्जुन यह बात इस तरह पूछ रहा है, मानो वह स्वयं भगवान् या कृष्ण से अवगत न हो | जैसा कि दसवें अध्याय में स्पष्ट हो जायेगा, अर्जुन भलीभाँति जानता था कि कृष्ण श्रीभगवान् हैं और वे प्रत्येक वस्तु के मूलस्त्रोत हैं तथा ब्रह्म की चरम सीमा हैं | निस्सन्देह, कृष्ण इस पृथ्वी पर देवकी के पुत्र रूप में भी अवतीर्ण हुए | सामान्य व्यक्ति के लिए यह समझ पाना अत्यन्त कठिन है कि कृष्ण किस प्रकार उसी शाश्र्वत आदिपुरुष श्रीभगवान् के रूप में बने रहे | अतः इस बात को स्पष्ट करने के लिए ही अर्जुन ने कृष्ण से यह प्रश्न पूछा, जिससे वे ही प्रामाणिक रूप में बताएँ | कृष्ण परम प्रमाण हैं, यह तथ्य आज ही नहीं अनन्तकाल से सारे विश्र्व द्वारा स्वीकार किया जाता रहा है | केवल असुर ही इसे अस्वीकार करते रहे हैं | जो भी हो, चूँकि कृष्ण सर्वस्वीकृत परम प्रमाण हैं, अतः अर्जुन उन्हीं से प्रश्न करता है, जिससे कृष्ण स्वयं बताएँ और असुर तथा उनके अनुयायी जिस भाँति अपने लिए तोड़-मरोड़ करके उन्हें प्रस्तुत करते रहे हैं, उससे बचा जा सके | यह प्रत्येक व्यक्ति के लिए आवश्यक है कि अपने कल्याण के लिए वह कृष्णविद्या को जाने | अतः जब कृष्ण स्वयं अपने विषय में बोल रहे हों तो यह सारे विश्र्व के लिए शुभ है | कृष्ण द्वारा की गई ऐसी व्याख्याएँ असुरों को भले ही विचित्र लगें, क्योंकि वे अपने ही दृष्टिकोण से कृष्ण का अध्ययन करते हैं, किन्तु जो भक्त हैं वे साक्षात् कृष्ण द्वारा उच्चरित वचनों का हृदय से स्वागत करते हैं | भक्तगण कृष्ण के ऐसे प्रामाणिक वचनों की सदा पूजा करेंगे, क्योंकि वे लोग उनके विषय में अधिकाधिक जानने के लिए उत्सुक रहते हैं | इस तरह नास्तिकगण जो कृष्ण को सामान्य व्यक्ति मानते हैं वे भी कृष्ण को अतिमानव, सच्चिदानन्द विग्रह, दिव्य, त्रिगुणातीत तथा दिक्काल के प्रभाव से परे समझ सकेंगे | अर्जुन की कोटि के श्रीकृष्ण-भक्त को कभी भी श्रीकृष्ण के दिव्य स्वरूप के विषय में कोई भ्रम नहीं हो सकता | अर्जुन द्वारा भगवान् के समक्ष ऐसा प्रश्न उपस्थित करने का उद्देश्य उन व्यक्तियों की नस्तिक्तावादी प्रवृत्ति को चुनौती देना था, जो कृष्ण को भौतिक प्रकृति के गुणों के अधीन एक समान्य व्यक्ति मानते हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 4.3| BG 4.3]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 4.3|BG 4.3]] - [[HI/BG 4.5|BG 4.5]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 4.5| BG 4.5]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_4.3&amp;diff=608585</id>
		<title>HI/BG 4.3</title>
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		<updated>2024-02-05T08:17:13Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 4|H03]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 4| अध्याय ४: दिव्य ज्ञान]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 4.2| BG 4.2]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 4.2|BG 4.2]] - [[HI/BG 4.4|BG 4.4]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 4.4| BG 4.4]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 3 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:स एवायं मया तेऽद्य योगः प्रोक्तः पुरातनः ।&lt;br /&gt;
:भक्तोऽसि मे सखा चेति रहस्यं ह्येतदुत्तमम् ॥३॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
स:—वही; एव—निश्चय ही; अयम्—यह; मया—मेरे द्वारा; ते—तुमसे; अद्य—आज; योग:—योगविद्या; प्रोक्त:—कही गयी; पुरातन:—अत्यन्त प्राचीन; भक्त:—भक्त; असि—हो; मे—मेरे; सखा—मित्र; च—भी; इति—अत:; रहस्यम्—रहस्य; हि—निश्चय ही; एतत्—यह; उत्तमम्—दिव्य।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
आज मेरे द्वारा वही यह प्राचीन योग यानी परमेश्र्वर के साथ अपने सम्बन्ध का विज्ञान, तुमसे कहा जा रहा है, क्योंकि तुम मेरे भक्त तथा मित्र हो, अतः तुम इस विज्ञान के दिव्य रहस्य को समझ सकते हो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मनुष्यों की दो श्रेणियाँ हैं – भक्त तथा असुर | भगवान् ने अर्जुन को इस विद्या का पात्र इसीलिए चुना क्योंकि वह उनका भक्त था | किन्तु असुर के लिए इस परम गुह्यविद्या को समझ पाना सम्भव नहीं है | इस परम ज्ञानग्रंथ के अनेक संस्करण उपलब्ध हैं | इनमें से कुछ भक्तों की टीकाएँ हैं और कुछ असुरों की | जो टीकाएँ भक्तों द्वारा की गई हैं वे वास्तविक हैं, किन्तु जो असुरों द्वारा की गई हैं वे व्यर्थ हैं | अर्जुन श्रीकृष्ण को भगवान् के रूप में मानता है, अतः जो गीता भाष्य अर्जुन के पदचिन्हों का अनुसरण करते हुए किया गया है वह इस परमविद्या के पक्ष में वास्तविक सेवा है | किन्तु असुर भगवान् कृष्ण को उस रूप में नहीं मानते | वे कृष्ण के विषय में तरह-तरह की मनगढ़ंत बातें करते हैं और वे कृष्ण के उपदेश-मार्ग से सामान्य जनता को गुमराह करते रहते हैं | ऐसे कुमार्गों से बचने के लिए यह एक चेतावनी है | मनुष्य को चाहिए कि अर्जुन की परम्परा का अनुसरण करे और श्रीमद्भगवद्गीता के इस परमविज्ञान से लाभान्वित हो |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_4.2&amp;diff=608584</id>
		<title>HI/BG 4.2</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_4.2&amp;diff=608584"/>
		<updated>2024-02-05T08:11:35Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 4|H02]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 4| अध्याय ४: दिव्य ज्ञान]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 4.1| BG 4.1]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 4.1|BG 4.1]] - [[HI/BG 4.3|BG 4.3]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 4.3| BG 4.3]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 2 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:एवं परम्पराप्राप्तमिमं राजर्षयो विदुः ।&lt;br /&gt;
:स कालेनेह महता योगो नष्टः परन्तप ॥२॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
एवम्—इस प्रकार; परम्परा—गुरु-परम्परा से; प्राह्रश्वतम्—प्राह्रश्वत; इमम्—इस विज्ञान को; राज-ऋषय:—साधु राजाओं ने; विदु:—जाना; स:—वह ज्ञान; कालेन—कालक्रम में; इह—इस संसार में; महता—महान; योग:—परमेश्वर के साथ अपने सम्बन्ध का विज्ञान, योगविद्या; नष्ट:—छिन्न-भिन्न हो गया; परन्तप—हे शत्रुओं को दमन करने वाले, अर्जुन।.&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार यह परम विज्ञान गुरु-परम्परा द्वारा प्राह्रश्वत किया गया और राजॢषयों ने इसी विधि से इसे समझा। किन्तु कालक्रम में यह परम्परा छिन्न हो गई, अत: यह विज्ञान यथारूप में लुह्रश्वत हो गया लगता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
यहाँ स्पष्ट कहा गया है कि गीता विशेष रूप से राजॢषयों के लिए थी&lt;br /&gt;
क्योंकि वे इसका उपयोग प्रजा के ऊपर शासन करने में करते थे। निश्चय&lt;br /&gt;
ही भगवद्गीता कभी भी आसुरी पुरुषों के लिए नहीं थी जिनसे किसी को&lt;br /&gt;
भी इसका लाभ न मिलता और जो अपनी-अपनी सनक के अनुसार&lt;br /&gt;
विभिन्न प्रकार की विवेचना करते। अत: जैसे ही असाधु भाष्यकारों के&lt;br /&gt;
निहित स्वार्थों से गीता का मूल उद्देश्य उच्छिन्न हुआ वैसे ही पुन: गुरु-&lt;br /&gt;
परम्परा स्थापित करने की आवश्यकता प्रतीत हुई। पाँच हजार वर्ष पूर्व&lt;br /&gt;
भगवान् ने स्वयं देखा कि गुरु-परम्परा टूट चुकी है, अत: उन्होंने घोषित&lt;br /&gt;
किया कि गीता का उद्देश्य नष्ट हो चुका है। इसी प्रकार इस समय गीता के&lt;br /&gt;
इतने संस्करण उपलब्ध हैं (विशेषतया अंग्रेजी में) कि उनमें से प्राय: सभी&lt;br /&gt;
प्रामाणिक गुरु-परम्परा के अनुसार नहीं हैं। विभिन्न संसारी विद्वानों ने गीता&lt;br /&gt;
की असंख्य टीकाएँ की हैं, किन्तु वे प्राय: सभी श्रीकृष्ण को स्वीकार नहीं&lt;br /&gt;
करते, यद्यपि वे कृष्ण के नाम पर अच्छा व्यापार चलाते हैं। यह आसुरी&lt;br /&gt;
प्रवृत्ति है, क्योंकि असुरगण ईश्वर में विश्वास नहीं करते, वे केवल परमेश्वर&lt;br /&gt;
के गुणों का लाभ उठाते हैं। अतएव अंग्रेजी में गीता के एक संस्करण की&lt;br /&gt;
नितान्त आवश्यकता थी जो परम्परा (गुरु-परम्परा) से प्राह्रश्वत हो। प्रस्तुत&lt;br /&gt;
प्रयास इसी आवश्यकता की पूर्ति के उद्देश्य से किया गया है। भगवद्गीता&lt;br /&gt;
यथारूप मानवता के लिए महान वरदान है, किन्तु यदि इसे मानसिक&lt;br /&gt;
चिन्तन समझा जाय तो यह समय का अपव्यय होगा।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 4.1| BG 4.1]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 4.1|BG 4.1]] - [[HI/BG 4.3|BG 4.3]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 4.3| BG 4.3]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_3.37&amp;diff=608583</id>
		<title>HI/BG 3.37</title>
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		<updated>2024-02-05T07:11:22Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 3|H37]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 3| अध्याय ३: कर्मयोग]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 3.36| BG 3.36]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 3.36|BG 3.36]] - [[HI/BG 3.38|BG 3.38]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 3.38| BG 3.38]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 37 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:श्रीभगवानुवाच &lt;br /&gt;
:काम एष क्रोध एष रजोगुणसमुद्भवः ।&lt;br /&gt;
:महाशनो महापाप्मा विद्ध्येनमिह वैरिणम् ॥३७॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्री-भगवान् उवाच—श्रीभगवान् ने कहा; काम:—विषयवासना; एष:—यह; क्रोध:—क्रोध; एष:—यह; रज:-गुण—रजोगुण से; समुद्भव:—उत्पन्न; महा-अशन:—सर्वभक्षी; महा-पाह्रश्वमा—महान पापी; विद्धि—जानो; एनम्—इसे; इह—इस संसार में; वैरिणम्—महान शत्रु।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
श्रीभगवान् ने कहा – हे अर्जुन! इसका कारण रजोगुण के सम्पर्क से उत्पन्न काम है, जो बाद में क्रोध का रूप धारण करता है और जो इस संसार का सर्वभक्षी पापी शत्रु है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जब जीवात्मा भौतिक सृष्टि के सम्पर्क में आता है तो उसका शाश्र्वत कृष्ण-प्रेम रजोगुण की संगति से काम में परिणत हो जाता है | अथवा दूसरे शब्दों में, ईश्र्वर-प्रेम का भाव काम में उसी तरह बदल जाता है जिस तरह इमली से संसर्ग से दूध दही में बदल जाता है और जब काम की संतुष्टि नहीं होती तो यह क्रोध में परिणत हो जाता है, क्रोध मोह में और मोह इस संसार में निरन्तर बना रहता है | अतः जीवात्मा का सबसे बड़ा शत्रु काम है और यह काम ही है जो विशुद्ध आत्मा को इस संसार में फँसे रहने के लिए प्रेरित करता है | क्रोध तमोगुण का प्राकट्य है | ये गुण अपने आपको क्रोध तथा अन्य रूपों में प्रकट करते हैं | अतः यदि रहने तथा कार्य करने की विधियों द्वारा रजोगुण को तमोगुण में न गिरने देकर सतोगुण तक ऊपर उठाया जाय तो मनुष्य को क्रोध में पतित होने से आध्यात्मिक आसक्ति के द्वारा बचाया जा सकता है |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
अपने नित्य वर्धमान चिदानन्द के लिए भगवान् ने अपने आपको अनेक रूपों में विस्तारित कर लिया और जीवात्माएँ उनके इस चिदानन्द के ही अंश हैं | उनको भी आंशिक स्वतन्त्रता प्राप्त है, किन्तु अपनी इस स्वतन्त्रता का दुरूपयोग करके जब वे सेवा को इन्द्रियसुख में बदल देती हैं तो वे काम की चपेट में आ जाती हैं | भगवान् ने इस सृष्टि की रचना जीवात्माओं के लिए इन कामपूर्ण रुचियों की पूर्ति हेतु सुविधा प्रदान करने के निमित्त की और जब जीवात्माएँ दीर्घकाल तक काम-कर्मों में फँसे रहने के कारण पूर्णतया ऊब जाती हैं, तो वे अपना वास्तविक स्वरूप जानने के लिए जिज्ञासा करने लगती हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
यही जिज्ञासा वेदान्त-सूत्र का प्रारम्भ है जिसमें यः कहा गया है – अथातो ब्रह्मजिज्ञासा– मनुष्य को परम तत्त्व की जिज्ञासा करनी चाहिए | और इस परम तत्त्व की परिभाषा श्रीमद्भागवत में इस प्रकार दी गई है – जन्माद्यस्य यतोऽन्वयादितरतश्र्च – सारी वस्तुओं का उद्गम परब्रह्म है | अतः काम का उद्गम भी परब्रह्म से हुआ | अतः यदि काम को भगवत्प्रेम में या कृष्णभावना में परिणत कर दिया जाय, या दूसरे शब्दों में कृष्ण के लिए ही सारी इच्छाएँ हों तो काम तथा क्रोध दोनों ही आध्यात्मिक बन सकेंगे | भगवान् राम के अनन्य सेवक हनुमान ने रावण की स्वर्णपुरी को जलाकर अपना क्रोध प्रकट किया, किन्तु ऐसा करने से वे भगवान् के सबसे बड़े भक्त बन गये | यहाँ पर भी श्रीकृष्ण अर्जुन को प्रेरित करते हैं कि वे शत्रुओं पर अपना क्रोध भगवान् को प्रसन्न करने के लिए दिखाए | अतः काम तथा क्रोध कृष्णभावनामृत में प्रयुक्त होने पर हमारे शत्रु न रह कर मित्र बन जाते हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 3.36| BG 3.36]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 3.36|BG 3.36]] - [[HI/BG 3.38|BG 3.38]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 3.38| BG 3.38]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_3.39&amp;diff=608582</id>
		<title>HI/BG 3.39</title>
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		<updated>2024-02-05T07:02:42Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 3|H39]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 3| अध्याय ३: कर्मयोग]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 3.38| BG 3.38]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 3.38|BG 3.38]] - [[HI/BG 3.40|BG 3.40]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 3.40| BG 3.40]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 39 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:आवृतं ज्ञानमेतेन ज्ञानिनो नित्यवैरिणा ।&lt;br /&gt;
:कामरूपेण कौन्तेय दुष्पूरेणानलेन च ॥३९॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
आवृतम्—ढका हुआ; ज्ञानम्—शुद्ध चेतना; एतेन—इससे; ज्ञानिन:—ज्ञाता का; नित्य-वैरिणा—नित्य शत्रु द्वारा; काम-रूपेण—काम के रूप में; कौन्तेय—हे कुन्तीपुत्र; दुष्पूरेण—कभी भी तुष्ट न होने वाली; अनलेन—अग्नि द्वारा; च—भी।.&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इस प्रकार ज्ञानमय जीवात्मा की शुद्ध चेतना उसके काम रूपी नित्य शत्रु से ढकी रहती है जो कभी भी तुष्ट नहीं होता और अग्नि के समान जलता रहता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
मनुस्मृति में कहा गया है कि कितना भी विषय-भोग क्यों न किया जाय काम की तृप्ति नहीं होती, जिस प्रकार कि निरन्तर ईंधन डालने से अग्नि कभी नहीं बुझती | भौतिक जगत् में समस्त कार्यकलापों का केन्द्रबिन्दु मैथुन (कामसुख) है, अतः इस जगत् को मैथुन्य-आगार या विषयी-जीवन की हथकड़ियाँ कहा गया है | एक सामान्य बन्दीगृह में अपराधियों को छड़ों के भीतर रखा जाता है इसी प्रकार जो अपराधी भगवान् के नियमों की अवज्ञा करते हैं, वे मैथुन-जीवन द्वारा बन्दी बनाये जाते हैं | इन्द्रियतृप्ति के आधार पर भौतिक सभ्यता की प्रगति का अर्थ है, इस जगत् में जीवात्मा की बन्धन अवधि को बढाना | अतः यह काम अज्ञान का प्रतीक है जिसके द्वारा जीवात्मा को इस संसार में रखा जाता है | इन्द्रियतृप्ति का भोग करते समय हो सकता है कि कुछ प्रसन्नता की अनुभूति हो, किन्तु यह प्रसन्नता की अनुभूति ही इन्द्रियभोक्ता का चरम शत्रु है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 3.38| BG 3.38]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 3.38|BG 3.38]] - [[HI/BG 3.40|BG 3.40]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 3.40| BG 3.40]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_3.25&amp;diff=608581</id>
		<title>HI/BG 3.25</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_3.25&amp;diff=608581"/>
		<updated>2024-02-05T06:55:50Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 3|H25]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 3| अध्याय ३: कर्मयोग]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 3.24| BG 3.24]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 3.24|BG 3.24]] - [[HI/BG 3.26|BG 3.26]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 3.26| BG 3.26]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 25 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:सक्ताः कर्मण्यविद्वांसो यथा कुर्वन्ति भारत ।&lt;br /&gt;
:कुर्याद्विद्वांस्तथासक्तश्चिकीर्षुर्लोकसंग्रहम् ॥२५॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
सक्ता:—आसक्त; कर्मणि—नियत कर्मों में; अविद्वांस:—अज्ञानी; यथा—जिस तरह; कुर्वन्ति—करते हैं; भारत—हे भरतवंशी; कुर्यात्—करना चाहिए; विद्वान्—विद्वान; तथा—उसी तरह; असक्त:—अनासक्त; चिकीर्षु:—चाहते हुए भी, इच्छुक; लोक-सङ्ग्रहम्—सामान्य जन।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जिस प्रकार अज्ञानी-जन फल की आसक्ति से कार्य करते हैं, उसी तरह विद्वान जनों को चाहिए कि वे लोगों को उचित पथ पर ले जाने के लिए अनासक्त रहकर कार्य करें |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
एक कृष्णभावनाभावित मनुष्य तथा कृष्णभावनाहीन व्यक्ति में केवल इच्छाओं का भेद होता है | कृष्णभावनाभावित व्यक्ति कभी ऐसा कोई कार्य नहीं करता जो कृष्णभावनामृत के विकास में सहायक न हो | यहाँ तक कि वह उस अज्ञानी पुरुष की तरह कर्म कर सकता है जो भौतिक कार्यों में अत्यधिक आसक्त रहता है | किन्तु इनमें से एक ऐसे कार्य अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए करता है, जबकि दूसरा कृष्ण की तुष्टि के लिए | अतः कृष्णभावनाभावित व्यक्ति को चाहिए कि वह लोगों को यह प्रदर्शित करे कि किस तरह कार्य किया जाता है और किस तरह कर्मफलों को कृष्णभावनामृत कार्य में नियोजित किया जाता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
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__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_3.12&amp;diff=608555</id>
		<title>HI/BG 3.12</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_3.12&amp;diff=608555"/>
		<updated>2024-02-04T13:40:38Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 3|H12]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 3| अध्याय ३: कर्मयोग]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 3.11| BG 3.11]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 3.11|BG 3.11]] - [[HI/BG 3.13|BG 3.13]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 3.13| BG 3.13]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 12 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:इष्टान्भोगान्हि वो देवा दास्यन्ते यज्ञभाविताः ।&lt;br /&gt;
:तैर्दत्तानप्रदायैभ्यो यो भुङ्क्ते स्तेन एव सः ॥१२॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
इष्टान्—वांछित; भोगान्—जीवन की आवश्यकतार्एँ; हि—निश्चय ही; व:—तुम्हें; देवा:—देवतागण; दास्यन्ते—प्रदान करेंगे; यज्ञ-भाविता:—यज्ञ सम्पन्न करने से प्रसन्न होकर; तै:—उनके द्वारा; दत्तान्—प्रदत्त वस्तुएँ; अप्रदाय—बिना भेंट किये; एभ्य:—इन देवताओं को; य:—जो; भुङ्क्ते—भोग करता है; स्तेन:—चोर; एव—निश्चय ही; स:—वह।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जीवन की विभिन्न आवश्यकताओं की पूर्ति करने वाले विभिन्न देवता यज्ञ सम्पन्न होने पर प्रसन्न होकर तुम्हारी सारी आवश्यकताओं की पूर्ति करेंगे | किन्तु जो इन उपहारों को देवताओं को अर्पित किये बिना भोगता है, वह निश्चित रूप से चोर है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
देवतागण भगवान् विष्णु द्वारा भोग-सामग्री प्रदान करने के लिए अधिकृत किये गये हैं | अतः नियत यज्ञों द्वारा उन्हें अवश्य संतुष्ट करना चाहिए | वेदों में विभिन्न देवताओं के लिए भिन्न-भिन्न प्रकार के यज्ञों की संस्तुति है, किन्तु वे सब अन्ततः भगवान् को ही अर्पित किये जाते हैं | किन्तु जो यह नहीं समझ सकता है कि भगवान् क्या हैं, उसके लिए देवयज्ञ का विधान है | अनुष्ठानकर्ता के भौतिक गुणों के अनुसार वेदों में विभिन्न प्रकार के यज्ञों का विधान है | विभिन्न देवताओं की पूजा भी उसी आधार पर अर्थात् गुणों के अनुसार की जाती है | उदाहरणार्थ, मांसाहारियों को देवी काली की पूजा करने के लिए कहा जाता है, जो भौतिक प्रकृति की घोर रूपा हैं और देवी के समक्ष पशुबलि का आदेश है | किन्तु जो सतोगुणी हैं उनके लिए विष्णु की दिव्य पूजा बताई जाती है | अन्ततः समस्त यज्ञों का ध्येय उत्तरोत्तर दिव्य-पद प्राप्त करना है | सामान्य व्यक्तियों के लिए कम से कम पाँच यज्ञ आवश्यक हैं, जिन्हें पञ्चमहायज्ञ कहते हैं |&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
किन्तु मनुष्य को यह जानना चाहिए कि जीवन की सारी आवश्यकताएँ भगवान् के देवता प्रतिनिधियों द्वारा ही पूरी की जाती हैं | कोई कुछ बना नहीं सकता | उदाहरणार्थ मानव समाज के भोज्य पदार्थों को लें | इन भोज्य पदार्थों में शाकाहारियों के लिए अन्न, फल, शाक, दूध, चीनी आदि हैं और मांसाहारियों के मांसादि जिनमें से कोई भी पदार्थ मनुष्य नहीं बना सकता | एक और उदहारण लें – यथा उष्मा, प्रकाश, जल, वायु आदि जो जीवन के लिए आवश्यक हैं, इनमें से किसी को बनाया नहीं जा सकता | परमेश्र्वर के बिना न तो प्रचुर प्रकाश मिल सकता है, न चाँदनी, वर्षा या प्रातःकालीन समीर ही, जिनके बिना मनुष्य जीवित नहीं रह सकता | स्पष्ट है कि हमारा जीवन भगवान् द्वारा प्रदत्त वस्तुओं पर आश्रित है | यहाँ तक कि हमें अपने उत्पादन-उद्यमों के लिए अनेक कच्चे मालों की आवश्यकता होती है यथा धातु, गंधक, पारद, मैंगनीज तथा अन्य अनेक आवश्यक वस्तुएँ जिनकी पूर्ति भगवान् के प्रतिनिधि इस उद्देश्य से करते हैं कि हम इनका समुचित उपयोग करके आत्म-साक्षात्कार के लिए अपने आपको स्वस्थ एवं पुष्ट बनायें जिससे जीवन का चरम लक्ष्य अर्थात् भौतिक जीवन-संघर्ष से मुक्ति प्राप्त हो सके | यज्ञ सम्पन्न करने से मानव जीवन का चरम लक्ष्य प्राप्त हो जाता है | यदि हम जीवन-उद्देश्य को भूल कर भगवान् के प्रतिनिधियों से अपनी इन्द्रियतृप्ति के लिए वस्तुएँ लेते रहेंगे और इस संसार में अधिकाधिक फँसते जायेंगे, जो कि सृष्टि का उद्देश्य नहीं है तो निश्चय ही हम चोर हैं और इस तरह हम प्रकृति के नियमों द्वारा दण्डित होंगे | चोरों का समाज कभी सुखी नहीं रह सकता क्योंकि उनका कोई जीवन-लक्ष्य नहीं होता | भौतिकतावादी चोरों का कभी कोई जीवन-लक्ष्य नहीं होता | उन्हें तो केवल इन्द्रियतृप्ति की चिन्ता रहती है, वे नहीं जानते कि यज्ञ किस तरह किये जाते हैं | किन्तु चैतन्य महाप्रभु ने यह यज्ञ सम्पन्न करने की सरलतम विधि का प्रवर्तन किया | यह है संकीर्तन-यज्ञ जो संसार के किसी भी व्यक्ति द्वारा, जो कृष्णभावनामृत के सिद्धान्तों को अंगीकार करता है, सम्पन्न किया जा सकता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 3.11| BG 3.11]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 3.11|BG 3.11]] - [[HI/BG 3.13|BG 3.13]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 3.13| BG 3.13]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_2.66&amp;diff=608554</id>
		<title>HI/BG 2.66</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_2.66&amp;diff=608554"/>
		<updated>2024-02-04T13:31:19Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: changed ही to की (hi to ki)&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 2|H66]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 2| अध्याय २: गीता का सार]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 2.65| BG 2.65]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 2.65|BG 2.65]] - [[HI/BG 2.67|BG 2.67]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 2.67| BG 2.67]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 66 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:नास्ति बुद्धिरयुक्तस्य न चायुक्तस्य भावना ।&lt;br /&gt;
:न चाभावयतः शान्तिरशान्तस्य कुतः सुखम् ॥६६॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
न अस्ति—नहीं हो सकती; बुद्धि:—दिव्य बुद्धि; अयुक्तस्य—कृष्णभावना से सम्बन्धित न रहने वाले में; न—नहीं; च—तथा; अयुक्तस्य—कृष्णभावना से शून्य पुरुष का; भावना—स्थिर चित्त (सुख में) ; न—नहीं; च—तथा; अभावयत:—जो स्थिर नहीं है उसके; शान्ति:—शान्ति; अशान्तस्य—अशान्त का; कुत:—कहाँ है; सुखम्—सुख।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जो कृष्णभावनामृत में परमेश्र्वर से सम्बन्धित नहीं है उसकी न तो बुद्धि दिव्य होती है और न ही मन स्थिर होता है जिसके बिना शान्ति की कोई सम्भावना नहीं है | शान्ति के बिना सुख हो भी कैसे सकता है?&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
कृष्णभावनाभावित हुए बिना शान्ति की कोई सम्भावना नहीं हो सकती | अतः पाँचवे अध्याय में (५.२९) इसकी पुष्टि की गई है कि जब मनुष्य यह समझ लेता है कि कृष्ण ही यज्ञ तथा तपस्या के उत्तम फलों के एकमात्र भोक्ता हैं और समस्त ब्रह्माण्ड के स्वामी हैं तथा वे समस्त जीवों के असली मित्र हैं तभी उसे वास्तविक शान्ति मिल सकती है | अतः यदि कोई कृष्णभावनाभावित नहीं है तो उसके मन का कोई अन्तिम लक्ष्य नहीं हो सकता | मन की चंचलता का एकमात्र कारण अन्तिम लक्ष्य का अभाव है | जब मनुष्य को यह पता चल जाता है कि कृष्ण ही भोक्ता, स्वामी तथा सबके मित्र है, तो स्थिर चित्त होकर शान्ति का अनुभव किया जा सकता है | अतएव जो कृष्ण से सम्बन्ध न रखकर कार्य में लगा रहता है, वह निश्चय ही सदा दुखी और अशान्त रहेगा, भले ही वह जीवन में शान्ति तथा अध्यात्मिक उन्नति का कितना ही दिखावा क्यों न करे | कृष्णभावनामृत स्वयं प्रकट होने वाली शान्तिमयी अवस्था है, जिसकी प्राप्ति कृष्ण के सम्बन्ध से ही हो सकती है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 2.65| BG 2.65]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 2.65|BG 2.65]] - [[HI/BG 2.67|BG 2.67]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 2.67| BG 2.67]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
__NOTOC__&lt;br /&gt;
__NOEDITSECTION__&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
	</entry>
	<entry>
		<id>https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_2.71&amp;diff=608553</id>
		<title>HI/BG 2.71</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/BG_2.71&amp;diff=608553"/>
		<updated>2024-02-04T13:21:30Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: Changed Vaastu to Vastu&lt;/p&gt;
&lt;hr /&gt;
&lt;div&gt;[[Category:HI/श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता - अध्याय 2|H71]]&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 2| अध्याय २: गीता का सार]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&amp;lt;div style=&amp;quot;float:right&amp;quot;&amp;gt;[[File:Go-previous.png|link=HI/BG 2.70| BG 2.70]] &#039;&#039;&#039;[[HI/BG 2.70|BG 2.70]] - [[HI/BG 2.72|BG 2.72]]&#039;&#039;&#039; [[File:Go-next.png|link=HI/BG 2.72| BG 2.72]]&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== श्लोक 71 ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;devanagari&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
:विहाय कामान्यः सर्वान्पुमांश्चरति निःस्पृहः ।&lt;br /&gt;
:निर्ममो निरहङ्कारः स शान्तिमधिगच्छति ॥७१॥&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
विहाय—छोडक़र; कामान्—इन्द्रियतृह्रिश्वत की भौतिक इच्छाएँ; य:—जो; सर्वान्—समस्त; पुमान्—पुरुष; चरति—रहता है; नि:स्पृह:—इच्छारहित; निर्मम:—ममतारहित; निरहङ्कार:—अहंकारशून्य; स:—वह; शान्तिम्—पूर्ण शान्ति को; अधिगच्छति—प्राह्रश्वत होता है।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;translation&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
जिस व्यक्ति ने इन्द्रियतृप्ति की समस्त इच्छाओं का परित्याग कर दिया है, जो इच्छाओं से रहित रहता है और जिसने सारी ममता त्याग दी है तथा अहंकार से रहित है, वही वास्तविक को शान्ति प्राप्त कर सकता है |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;purport&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
निस्पृह होने का अर्थ है – इन्द्रियतृप्ति के लिए कुछ भी इच्छा न करना | दूसरे शब्दों में, कृष्णभावनाभावित होने की इच्छा वास्तव में इच्छाशून्यता या निस्पृहता है | इस शरीर को मिथ्या ही आत्मा माने बिना तथा संसार की किसी वस्तु में कल्पित स्वामित्व रखे बिना श्रीकृष्ण के नित्य दास के रूप में अपनी यथार्थ स्थिति को जान लेना कृष्णभावनामृत की सिद्ध अवस्था है | जो इस सिद्ध अवस्था में स्थित है वह जानता है कि श्रीकृष्ण ही प्रत्येक वस्तु के स्वामी हैं, अतः प्रत्येक वस्तु का उपयोग उनकी तुष्टि के लिए किया जाना चाहिए | अर्जुन आत्म-तुष्टि के लिए युद्ध नहीं करना चाहता था, किन्तु जब वह पूर्ण रूप से कृष्णभावनाभावित हो गया तो उसने युद्ध किया, क्योंकि कृष्ण चाहते थे कि वह युद्ध करे | उसे अपने लिए युद्ध करने की कोई इच्छा न थी, किन्तु वही अर्जुन कृष्ण के लिए अपनी शक्ति भर लड़ा | वास्तविक इच्छाशून्यता कृष्ण-तुष्टि के लिए इच्छा है, यह इच्छाओं को नष्ट करने का कोई कृत्रिम प्रयास नहीं है | जीव कभी भी इच्छाशून्य या इन्द्रियशून्य नहीं हो सकता, किन्तु उसे अपनी इच्छाओं की गुणवत्ता बदलनी होती है | भौतिक दृष्टि से इच्छाशून्य व्यक्ति जानता है कि प्रत्येक वस्तु कृष्ण की है (ईशावास्यमिदं सर्वम्), अतः वह किसी वस्तु पर अपना स्वामित्व घोषित नहीं करता | यह दिव्य ज्ञान आत्म-साक्षात्कार पर आधारित है – अर्थात् इस ज्ञान पर कि प्रत्येक जीव कृष्ण का अंश-स्वरूप है और जीव की शाश्र्वत स्थिति कभी न तो कृष्ण के तुल्य होती है न उनसे बढ़कर | इस प्रकार कृष्णभावनामृत का यह ज्ञान ही वास्तविक शान्ति का मूल सिद्धान्त है |&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>HI/BG 5.16</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: Shloka text was missing added the same&lt;/p&gt;
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&amp;lt;div style=&amp;quot;float:left&amp;quot;&amp;gt;&#039;&#039;&#039;[[Hindi - श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप |श्रीमद्‍ भगवद्‍गीता यथारूप ]] - [[HI/BG 5| अध्याय ५: कर्मयोग – कृष्णभावनाभावित कर्म]]&#039;&#039;&#039;&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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{{RandomImage|Hindi}}&lt;br /&gt;
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==== श्लोक 16 ====&lt;br /&gt;
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:&#039;&#039;ज्ञानेन तु तदज्ञानं येषां नाशितमात्मनः ।&lt;br /&gt;
तेषामादित्यवज्ज्ञानं प्रकाशयति तत्परम् ॥१६॥&#039;&#039;&lt;br /&gt;
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==== शब्दार्थ ====&lt;br /&gt;
&lt;br /&gt;
&amp;lt;div class=&amp;quot;synonyms&amp;quot;&amp;gt;&lt;br /&gt;
ज्ञानेन—ज्ञान से; तु—लेकिन; तत्—वह; अज्ञानम्—अविद्या; येषाम्—जिनका; नाशितम्—नष्ट हो जाती है; आत्मन:—जीव का; तेषाम्—उनके; आदित्य-वत्—उदीयमान सूर्य के समान; ज्ञानम्—ज्ञान को; प्रकाशयति—प्रकट करता है; तत् परम्—कृष्णभावनामृत को।&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== अनुवाद ====&lt;br /&gt;
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किन्तु जब कोई उस ज्ञान से प्रबुद्ध होता है, जिससे अविद्या का विनाश होता है, तो उसके ज्ञान से सब कुछ उसी तरह प्रकट हो जाता है, जैसे दिन में सूर्य से सारी वस्तुएँ प्रकाशित हो जाती हैं |&lt;br /&gt;
&amp;lt;/div&amp;gt;&lt;br /&gt;
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==== तात्पर्य ====&lt;br /&gt;
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जो लोग कृष्ण को भूल गये हैं वे निश्चित रूप से मोहग्रस्त होते हैं, किन्तु जो कृष्णभावनाभावित हैं वे नहीं होते | भगवद्गीता में कहा गया है – सर्वंज्ञानप्लवेन, ज्ञानाग्निःसर्वकर्माणि तथा न हि ज्ञानेन सदृशम्| ज्ञान सदैव सम्माननीय है | और वह ज्ञान क्या है? श्रीकृष्ण के प्रति आत्मसमर्पण करने पर ही पूर्णज्ञान प्राप्त होता है, जैसा कि गीता में (७.१९) ही कहा गया है – बहूनां जन्मनामन्ते ज्ञानवान्मां प्रपद्यते | अनेकानेक जन्म बीत जाने पर ही पूर्णज्ञान प्राप्त करके मनुष्य कृष्ण की शरण में जाता है अथवा जब उसे कृष्णभावनामृत प्राप्त होता है तो उसे सब कुछ प्रकट होने लगता है, जिस प्रकार सूर्योदय होने पर सारी वस्तुएँ दिखने लगती हैं | जीव नाना प्रकार से मोहग्रस्त होता है | उदाहरणार्थ, जब वह अपने को ईश्र्वर मानने लगता है, तो वह अविद्या के पाश में जा गिरता है | यदि जीव ईश्र्वर है तो वह अविद्या से कैसे मोहग्रस्त हो सकता है? क्या ईश्र्वर अविद्या से मोहग्रस्त होता है? यदि ऐसा हो सकता है, तो फिर अविद्या या शैतान ईश्र्वर से बड़ा है | वास्तविक ज्ञान उसी से प्राप्त हो सकता है जो पूर्णतः कृष्णभावनाभावित है | अतः ऐसे ही प्रामाणिक गुरु की खोज करनी होती है और उसी से सीखना होता है कि कृष्णभावनामृत क्या है, क्योंकि कृष्णभावनामृत से सारी अविद्या उसी प्रकार दूर हो जाती है, जिस प्रकार सूर्य से अंधकार दूर होता है | भले ही किसी व्यक्ति को इसका पूरा ज्ञान हो कि वह शरीर नहीं अपितु इससे परे है, तो भी हो सकता है कि वह आत्मा तथा परमात्मा में अन्तर न कर पाए | किन्तु यदि वह पूर्ण प्रामाणिक कृष्णभावनाभावित गुरु की शरण ग्रहण करता है तो वह सब कुछ जान सकता है | ईश्र्वर के प्रतिनिधि से भेंट होने पर ही ईश्र्वर तथा ईश्र्वर के साथ अपने सम्बन्ध को सही-सही जाना जा सकता है | ईश्र्वर का प्रतिनिधि कभी भी अपने आपको ईश्र्वर नहीं कहता, यद्यपि उसका सम्मान ईश्र्वर की ही भाँति किया जाता है, क्योंकि उसे ईश्र्वर का ज्ञान होता है | मनुष्य को ईश्र्वर और जीव के अन्तर को समझना होता है | अतएव भगवान् कृष्ण ने द्वितीय अध्याय में (२.१२) यह कहा है कि प्रत्येक जीव व्यष्टि है और भगवान् भी व्यष्टि हैं | ये सब भूतकाल में व्यष्टि थे, सम्प्रति भी व्यष्टि हैं और भविष्य में मुक्त होने पर भी व्यष्टि बने रहेंगे | रात्रि के समय अंधकार में हमें प्रत्येक वस्तु एकसी दिखती है, किन्तु दिन में सूर्य के उदय पर सारी वस्तुएँ अपने-अपने वास्तविक स्वरूप में दिखती हैं | आध्यात्मिक जीवन में व्यष्टि की पहचान ही वास्तविक ज्ञान है |&lt;br /&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>HI/750731 बातचीत - श्रील प्रभुपाद न्यू ऑरलियन्स में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
		<link rel="alternate" type="text/html" href="https://dev.vanipedia.org/w/index.php?title=HI/750731_%E0%A4%AC%E0%A4%BE%E0%A4%A4%E0%A4%9A%E0%A5%80%E0%A4%A4_-_%E0%A4%B6%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A5%80%E0%A4%B2_%E0%A4%AA%E0%A5%8D%E0%A4%B0%E0%A4%AD%E0%A5%81%E0%A4%AA%E0%A4%BE%E0%A4%A6_%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A5%82_%E0%A4%91%E0%A4%B0%E0%A4%B2%E0%A4%BF%E0%A4%AF%E0%A4%A8%E0%A5%8D%E0%A4%B8_%E0%A4%AE%E0%A5%87%E0%A4%82_%E0%A4%85%E0%A4%AA%E0%A4%A8%E0%A5%80_%E0%A4%85%E0%A4%AE%E0%A5%83%E0%A4%A4%E0%A4%B5%E0%A4%BE%E0%A4%A3%E0%A5%80_%E0%A4%B5%E0%A5%8D%E0%A4%AF%E0%A4%95%E0%A5%8D%E0%A4%A4_%E0%A4%95%E0%A4%B0%E0%A4%A4%E0%A5%87_%E0%A4%B9%E0%A5%88%E0%A4%82&amp;diff=595893"/>
		<updated>2023-02-17T19:38:51Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: Created page with &amp;quot;Category:HI/Hindi - श्रील प्रभुपाद की अमृत वाणी  Category:HI/अमृत वाणी - १९७५  Category:HI/अ...&amp;quot;&lt;/p&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>750731 Conversation - Srila Prabhupada Speaks a Nectar Drop in New Orleans</title>
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		<updated>2023-02-16T05:23:41Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>750731 Conversation - Srila Prabhupada Speaks a Nectar Drop in New Orleans</title>
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		<updated>2023-02-16T05:20:32Z</updated>

		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>HI/750909 प्रवचन - श्रील प्रभुपाद वृंदावन में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
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		<updated>2023-02-05T19:25:48Z</updated>

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{{Audiobox_NDrops|HI/Hindi - श्रील प्रभुपाद की अमृत वाणी|&amp;lt;mp3player&amp;gt;https://vanipedia.s3.amazonaws.com/Nectar+Drops/750909SB-VRNDAVAN_ND_01.mp3&amp;lt;/mp3player&amp;gt;|&amp;quot;आप सभी लोगों से यह समझने की उम्मीद नहीं कर सकते हैं कि धर्म क्या है और धर्म क्या नहीं है, लोगों का सामान्य जनसमूह। तो किसी व्यक्ति या किसी भी प्राणी की स्थिति क्या है जो धर्म और अधर्म के बीच अंतर करना नहीं जानता है? इसलिए वे रहे हैं उनका वर्णन किया गया है। उन्हें यथा पशु: के रूप में वर्णित किया गया है। पशु: पशु: का अर्थ है पशु। एक जानवर भेद नहीं कर सकता है कि क्या सही है और क्या गलत है। यह संभव नहीं है। इसलिए यह कहा जाता है, धर्मेण हिना पशुभि: समाना: &amp;quot;जो धर्म से अनभिज्ञ है -धर्म, वह पशु से बेहतर नहीं है।&amp;quot;|Vanisource:750909 - Lecture SB 06.02.05-6 - Vrndavana|७५०९०९ - प्रवचन SB 06.02.05-6 - वृंदावन}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>HI/750729 प्रवचन - श्रील प्रभुपाद डलास में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
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{{Audiobox_NDrops|HI/Hindi - श्रील प्रभुपाद की अमृत वाणी|&amp;lt;mp3player&amp;gt;https://vanipedia.s3.amazonaws.com/Nectar+Drops/750729SB-DALLAS_ND_01.mp3&amp;lt;/mp3player&amp;gt;|&amp;quot;हर कोई अपने असली काम को भूल रहा है। उसका असली काम यह है कि उसे पता होना चाहिए, उसे पता होना चाहिए, कि &amp;quot;मैं शाश्वत हूँ । मैंने इस अस्थायी शरीर को धारण किया है और प्रकृति के नियमों के अधीन हूँ: जन्म, मृत्यु और बुढ़ापा। तो मेरी असली समस्या यह है कि कैसे फिर से शाश्वत हो जाऊं, और जन्म, मृत्यु, वृद्धावस्था को स्वीकार न करूं। यही मेरा वास्तविक व्यवसाय है।&amp;quot; लेकिन क्योंकि मैं प्रकृति के भौतिक गुणों से संक्रमित हूं, हम विभिन्न योजनाएँ बना रहे हैं। हर कोई व्यस्त है। हर कोई अपने वास्तविक व्यवसाय को भूलकर विभिन्न योजनाओं में व्यस्त है। इसे माया कहा जाता है। मा का अर्थ है &amp;quot;नहीं&amp;quot;; या का अर्थ है &amp;quot;यह।&amp;quot; इसलिए माया का अर्थ है जब आप समझते हैं, &amp;quot;यह मेरा काम नहीं है।&amp;quot;|Vanisource:750729 - Lecture SB 06.01.47 - Dallas|७५०७२९ - प्रवचन SB 06.01.47 - डलास}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>750729 Lecture - Srila Prabhupada Speaks a Nectar Drop in Dallas</title>
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{{Audiobox_NDrops|Nectar Drops from Srila Prabhupada|&amp;lt;mp3player&amp;gt;https://vanipedia.s3.amazonaws.com/Nectar+Drops/750729SB-DALLAS_ND_01.mp3&amp;lt;/mp3player&amp;gt;|&amp;quot;Everyone is forgetting his real business. His real business is he should know, one should know, that &amp;quot;I am eternal. I have taken this temporary body and subjected to the laws of nature: birth, death and old age. So my real problem is how to become again eternal, not accepting any more birth, death, old age. That is my real business.&amp;quot; But because I am infected with the material modes of nature, we are making different plans. Everyone is busy. Everyone is busy in different plans, forgetting his real business. This is called māyā. Māyā means. . . ma means &amp;quot;not&amp;quot;; ya means &amp;quot;this.&amp;quot; Therefore māyā means when you understand, &amp;quot;This is not my business.&amp;quot;|Vanisource:750729 - Lecture SB 06.01.47 - Dallas|750729 - Lecture SB 06.01.47 - Dallas}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>HI/750813 प्रवचन - श्रील प्रभुपाद लंडन में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
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{{Audiobox_NDrops|HI/Hindi - श्रील प्रभुपाद की अमृत वाणी|&amp;lt;mp3player&amp;gt;https://vanipedia.s3.amazonaws.com/Nectar+Drops/750813SB-LONDON_ND_01.mp3&amp;lt;/mp3player&amp;gt;|&amp;quot;कृष्ण वास्तव में भोक्ता हैं। भोक्तारं यज्ञतपसां ([[HI/BG 5.29|भ.गी. ५.२९]])।  तो हम कृष्ण की नकल कर रहे हैं। यह हमारी स्थिति है। हर कोई कृष्ण बनने की कोशिश कर रहा है। मायावादी, हालांकि वे आत्मसंयम है, तपस्या करते है - बहुत सख्ती से वे आध्यात्मिक जीवन के सिद्धांतों का पालन करते हैं - लेकिन क्योंकि वे माया के अधीन हैं, अंत में वे सोच रहे हैं कि &amp;quot;मैं भगवान हूँ, पुरुष,&amp;quot; वही रोग, पुरुष।&amp;quot;|Vanisource:750813 - Lecture SB 06.01.55 - London|७५०८१३ - प्रवचन SB 06.01.55 - लंडन}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>750813 Lecture - Srila Prabhupada Speaks a Nectar Drop in London</title>
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		<summary type="html">&lt;p&gt;DevakiDD: &lt;/p&gt;
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{{Audiobox_NDrops|Nectar Drops from Srila Prabhupada|&amp;lt;mp3player&amp;gt;https://vanipedia.s3.amazonaws.com/Nectar+Drops/750813SB-LONDON_ND_01.mp3&amp;lt;/mp3player&amp;gt;|&amp;quot;Kṛṣṇa is actually bhoktā. Bhoktāraṁ yajña-tapasām ([[Vanisource:BG 5.29 (1972)|BG 5.29]]). So we are imitating Kṛṣṇa. This is our position. Everyone is trying to become Kṛṣṇa. The Māyāvādīs, although they have undergone penances, austerities—very strictly they follow the principles of spiritual life—but because they are under māyā, at the end they are thinking that &amp;quot;I am God, purusa,&amp;quot; the same disease, puruṣa.&amp;quot;|Vanisource:750813 - Lecture SB 06.01.55 - London|750813 - Lecture SB 06.01.55 - London}}&lt;/div&gt;</summary>
		<author><name>DevakiDD</name></author>
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		<title>HI/760725 - श्रील प्रभुपाद लंडन में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
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		<title>HI/750728 सुबह की सैर - श्रील प्रभुपाद सैंन डीयेगो में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
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		<title>HI/750812 बातचीत - श्रील प्रभुपाद पेरिस में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
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{{Audiobox_NDrops|HI/Hindi - श्रील प्रभुपाद की अमृत वाणी|&amp;lt;mp3player&amp;gt;https://vanipedia.s3.amazonaws.com/Nectar+Drops/750812R1-PARIS_ND_01.mp3&amp;lt;/mp3player&amp;gt;|&amp;quot;कृष्ण सभी भाषाओं में बोलते हैं, और वे इतनी अच्छी तरह से बोलते हैं कि हर कोई सोचता है कि वे केवल अपनी भाषा में बोलते हैं। वे पक्षियों के साथ भी बात कर सकते थे। एक संस्कृत शब्द है, बभूदक। इसका अर्थ है जो सभी भाषाओं को बोल सकता है। तो यह भक्ति-रसामृत-सिंधु में कहा गया है, कि यमुना के तट पर वे एक दिन एक पक्षी के साथ बात कर रहे थे। प्रत्येक जीव की एक अलग भाषा है।&amp;quot;|Vanisource:750812 - Conversation - Paris|७५०८१२ - बातचीत - पेरिस}}&lt;/div&gt;</summary>
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		<title>HI/750907 प्रवचन - श्रील प्रभुपाद वृंदावन में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
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		<title>HI/750813 प्रवचन - श्रील प्रभुपाद लंडन में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
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		<title>HI/750806 सुबह की सैर - श्रील प्रभुपाद डेट्रॉइट में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं</title>
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{{Audiobox_NDrops|HI/Hindi - श्रील प्रभुपाद की अमृत वाणी|&amp;lt;mp3player&amp;gt;https://vanipedia.s3.amazonaws.com/Nectar+Drops/750806MW-DETROIT_ND_01.mp3&amp;lt;/mp3player&amp;gt;|&amp;quot;तमो-गुण का मतलब है आलस्य और नींद। शूद्र, वे आलस्य और नींद में हैं। इसलिए अगर उनके पास खाने के लिए कुछ है, तो वे काम नहीं करेंगे । आलस्य। या ज्यादा खाओ और सो जाओ। यह तमो-गुण है । और रजो-गुण का मतलब है कि वे इन्द्रियतृप्ति के लिए काम कर रहे हैं । वह भी बेकार है। तमो-गुण आलस्य और सोना है, और रजो-गुण का अर्थ है मूर्खता से काम करना या इन्द्रियतृप्ति के लिए काम करना। और सत्व-गुण का मतलब है कि वे जानते हैं कि कैसे काम करना है । और इसलिए इस सत्व-गुण से ऊपर वे भक्त बन जाते हैं, कृष्ण के लिए काम करते हैं । तो कृष्ण के लिए काम किए बिना, हर कोई भौतिक प्रकृति के इन गुणों के वशीभूत है। और कोई प्रशिक्षण नहीं है कि कैसे कृष्ण के लिए काम करना है । यह आधुनिक सभ्यता का दोष है।&amp;quot;|Vanisource:750806 - Morning Walk - Detroit|७५०८०६ - सुबह की सैर - डेट्रॉइट}}&lt;/div&gt;</summary>
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